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"अबखाई में राजस्थानी साहित्य" विषय पर अखिल भारतीय साहित्य परिषद राजस्थान का हुआ मंथन /
अबखाई ( विपरीत परिस्थिति ) के काल में भी राजस्थानी साहित्यकारों ने अपने घुटने नहीं टेके- डॉ अन्नाराम शर्मा /
प्रारंभिक शिक्षा हमारी मातृभाषा राजस्थानी में होनी चाहिए- जग जितेंद्र सिंह /
अखिल भारतीय साहित्य परिषद राजस्थान की ओर से राजस्थानी साहित्य के संरक्षण संवर्धन हेतु तीन दिवसीय विचार गोष्ठी के आयोजन के क्रम में दूसरे दिन "अबखाई में राजस्थानी साहित्य" विषय पर वैचारिक मंथन संपन्न हुआ। चित्तौड़गढ़ प्रान्त महामंत्री पंकज कुमार झा ने बताया कि कार्यक्रम का शुभारंभ श्रीमती किरण राजपुरोहित द्वारा सरस्वती वंदना के साथ किया गया। कार्यक्रम की प्रस्तावना रखते हुए शिवराज भारतीय ने बताया कि विपरीत परिस्थितियों (अबखाई) में सदैव हमारे प्रदेश के स्थानीय कवियों ने अपनी बात बड़ी गंभीरता से समाज के सामने रखी है। वर्तमान के कोरोना संकट काल में भी कई कवियों ने राजस्थानी में कोरोना विषय पर अपनी कविताएं लिखी है। कार्यक्रम संयोजक डॉ शिवदान सिंह जोलावास ने बताया कि खास वक्ता अतुल कनक जी ने अपनी बात रखते हुए कहा कि राजस्थानी भाषा को भी राज्य द्वारा संरक्षण,संवर्धन दिया जाना चाहिए । राजभाषा की मान्यता भी दी जानी चाहिए। चूरू से सुरेंद्र सोनी ने अपना विषय रखते हुए कहा कि सभी राज्यों को अपनी भाषा में पाठ्यक्रम बनाने की छूट होनी चाहिए जिससे उस राज्य की क्षेत्रीय भाषा को संरक्षण मिले। सिरे पावणा डॉ परमेंद्र दशोरा ने अपनी बात रखते हुए बताया कि कैसे राजस्थान की समस्याओं के बीच राजस्थानी कविता ने, राजस्थानी साहित्य ने अपनी भूमिका निभाई है। हम सब जानते हैं "चेतावनी रा चूंगट्या " इसका एक श्रेष्ठ उदाहरण है । विपरीत परिस्थितियों में मीराबाई द्वारा अपनी कृष्ण भक्ति में कविताओं को मायड़ भाषा में रखना एक बड़ा उदाहरण है । जग जितेंद्र सिंह ने कहा कि गुजराती और राजस्थानी दोनों बहने साथ-साथ बड़ी हुई लेकिन गुजराती आगे बढ़ गई । उसे राज्य का संरक्षण मिला। किंतु राजस्थानी भाषा के साथ ऐसा न्याय नहीं हो पाया। हमारी प्रारंभिक पढ़ाई हमारी मातृभाषा अर्थात राजस्थानी में हो ऐसा सरकारों को सोचना चाहिए ।कार्यक्रम के मुख्य अतिथि अखिल भारतीय साहित्य परिषद राजस्थान के प्रदेश अध्यक्ष डॉ अन्नाराम शर्मा ने अपने उद्बोधन में कहा कि विपरीत परिस्थितियों में भी हमारे राजस्थानी साहित्यकारों ने घुटने नहीं टेके । जैसा कि हम सब जानते हैं अकाल के कारण राजस्थान लगातार जूझता रहा। जहां लोगों को अपने जीवन के लिए संघर्ष करना पड़ता रहा। वहां ऐसी कठिन परिस्थिति में साहित्य सृजन अपने आप में एक दुर्लभ कार्य है। ऐसी परिस्थिति में साहित्य सृजन करने वाले हमारे साहित्यकार धन्यवाद के पात्र हैं ।कार्यक्रम का संचालन मनोज कुमार स्वामी ने किया। कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन सह संयोजक डॉ मोनिका गौड़ ने किया।
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