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रियासत कालीन शिक्षाविद् ”पाटळ“ को श्रद्धाजंलि
”पाटळ“ की हस्तलिखित पाण्डुलिपियों एवं अप्रकाशित साहित्य के प्रचार प्रसार पर हुई चर्चा
बीकानेर 02, फरवरी, 2020
स्वतंत्रता सेनानी एवं बीकानेर रियासत काल में बीकानेर स्टेट के शिक्षा विभाग के निदेशक, रहे रामसिंह तंवर ”पाटळ“ की 118 वीं जयन्ती पर रविवार को उनके समाधी स्थल पर बड़ी संख्या में लोगों ने पुष्पाजिंंल अर्पित कर उनके व्यक्त्वि व कृतित्व का स्मरण किया।
रामसिंह ”पाटळ“ के पौत्र शेरसिंह तंवर ने बताया कि उन्होंने उपनाम पाटळ, सरस्वती कुमार एवं संच्चिदानंद नाम से राजस्थानी डिगंल भाषा की कई कृत्तियों की रचना की। उन्होंने बताया कि ”पाटळ“ भोपाल नोबल कॉलेज,उदयपुर, के प्रिन्सीपल, प्रथम अखिल भारतवर्षीय राजस्थानी साहित्य सम्मेलन, दिनाजपुर ( बंगाल )1943 में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता की। वे शार्दुल राजस्थानी रिसर्च इन्स्टीट्यूट, बीकानेर के अध्यक्ष रहे। ”पाटळ“ हिन्दी, अग्रेजी,ं राजस्थानी एवं मराठी में छपने वाली हस्तलिखित बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की मासिक पत्रिका “प्रेमाश्रम” के प्रधान सम्पादक रहे।
पिछले लम्बे समय से ”पाटळ“ के साहित्य पर शोध कर रहे भारतीय विद्या मंदिर शोध प्रतिष्ठान के महामंत्री कृष्ण शंकर पारीक ने बताया कि देश की आजादी के आन्दोलन की रूपरेखा के लिए सन् 1922 में बिहार में सरोजनी नायडू की अध्यक्षता में आयोजित कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में ”पाटळ“ ने पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के साथ स्वयं सेवक के रूप में सहभागिता निभाई थी। पारीक ने श्रद्धाजंलि सभा में ”पाटळ“ के राजस्थानी दोहे : “ जलम जलम री मावड़ी, मन री मोटी माम, हसंता हसंता मरण रो, थारो बिडछ बताय।। चर्चा की। पारीक ने बताया कि ढोला मारू रा दूहा, काशी नागरी प्रचारिणी, राजस्थान के ग्राम गीत तीन भागों में 1938 ई प्रकाशित हुई। जटमल ग्रंथावली, राव जैतसी रो छंद, राजस्थानी के वीर गीत, रति रानी, चर्या गीत-मूल पाठ हिन्दी टीका तथा भूमिका सहित, चौरासी सिद्धों की जीवनियां, ब्रजयान सिद्धांत और इतिहास, मध्यकालीन साहित्य में प्रयुक्त धार्मिक एवं प्रतीकात्मक शब्दों का प्रमाणिक कोश आदि का रचना एवं सम्पादकिय का कार्य किया।
इस अवसर पर धन्नेश्वर सिंह ने बताया कि ”पाटळ“ के हस्तलिखित पाण्डुलिपियों एवं अप्रकाशित साहित्य को जन-जन तक पहुंचाने के लिए उपस्थित जनों ने अपने अपने सुझाव दिये एवं इस पर विस्तृत चर्चा हुई। ”पाटळ“ को श्रद्धाजंलि देने प्रोफेसर चन्द्र शेखर पारीक, प्रभाकरसिंह शेखावत, कृष्णदेवसिंह राठौड, प्रणव, एस.के.व्यास,हरिसिंह एवं जयवर्धन आदि लोग उपस्थित रहे।
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”पाटळ“ की हस्तलिखित पाण्डुलिपियों एवं अप्रकाशित साहित्य के प्रचार प्रसार पर हुई चर्चा
बीकानेर 02, फरवरी, 2020
स्वतंत्रता सेनानी एवं बीकानेर रियासत काल में बीकानेर स्टेट के शिक्षा विभाग के निदेशक, रहे रामसिंह तंवर ”पाटळ“ की 118 वीं जयन्ती पर रविवार को उनके समाधी स्थल पर बड़ी संख्या में लोगों ने पुष्पाजिंंल अर्पित कर उनके व्यक्त्वि व कृतित्व का स्मरण किया।
रामसिंह ”पाटळ“ के पौत्र शेरसिंह तंवर ने बताया कि उन्होंने उपनाम पाटळ, सरस्वती कुमार एवं संच्चिदानंद नाम से राजस्थानी डिगंल भाषा की कई कृत्तियों की रचना की। उन्होंने बताया कि ”पाटळ“ भोपाल नोबल कॉलेज,उदयपुर, के प्रिन्सीपल, प्रथम अखिल भारतवर्षीय राजस्थानी साहित्य सम्मेलन, दिनाजपुर ( बंगाल )1943 में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता की। वे शार्दुल राजस्थानी रिसर्च इन्स्टीट्यूट, बीकानेर के अध्यक्ष रहे। ”पाटळ“ हिन्दी, अग्रेजी,ं राजस्थानी एवं मराठी में छपने वाली हस्तलिखित बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की मासिक पत्रिका “प्रेमाश्रम” के प्रधान सम्पादक रहे।
पिछले लम्बे समय से ”पाटळ“ के साहित्य पर शोध कर रहे भारतीय विद्या मंदिर शोध प्रतिष्ठान के महामंत्री कृष्ण शंकर पारीक ने बताया कि देश की आजादी के आन्दोलन की रूपरेखा के लिए सन् 1922 में बिहार में सरोजनी नायडू की अध्यक्षता में आयोजित कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में ”पाटळ“ ने पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के साथ स्वयं सेवक के रूप में सहभागिता निभाई थी। पारीक ने श्रद्धाजंलि सभा में ”पाटळ“ के राजस्थानी दोहे : “ जलम जलम री मावड़ी, मन री मोटी माम, हसंता हसंता मरण रो, थारो बिडछ बताय।। चर्चा की। पारीक ने बताया कि ढोला मारू रा दूहा, काशी नागरी प्रचारिणी, राजस्थान के ग्राम गीत तीन भागों में 1938 ई प्रकाशित हुई। जटमल ग्रंथावली, राव जैतसी रो छंद, राजस्थानी के वीर गीत, रति रानी, चर्या गीत-मूल पाठ हिन्दी टीका तथा भूमिका सहित, चौरासी सिद्धों की जीवनियां, ब्रजयान सिद्धांत और इतिहास, मध्यकालीन साहित्य में प्रयुक्त धार्मिक एवं प्रतीकात्मक शब्दों का प्रमाणिक कोश आदि का रचना एवं सम्पादकिय का कार्य किया।
इस अवसर पर धन्नेश्वर सिंह ने बताया कि ”पाटळ“ के हस्तलिखित पाण्डुलिपियों एवं अप्रकाशित साहित्य को जन-जन तक पहुंचाने के लिए उपस्थित जनों ने अपने अपने सुझाव दिये एवं इस पर विस्तृत चर्चा हुई। ”पाटळ“ को श्रद्धाजंलि देने प्रोफेसर चन्द्र शेखर पारीक, प्रभाकरसिंह शेखावत, कृष्णदेवसिंह राठौड, प्रणव, एस.के.व्यास,हरिसिंह एवं जयवर्धन आदि लोग उपस्थित रहे।
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