खबरों में बीकानेर 🎤 🌐
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यह आर्टिकल 👇 जरूर पढ़ें - बांट तो रहे हैं... जनता को मिलेगा क्या...?
किसलय के आंसू
-✍️ मोहन थानवी
1
जीवन
कदमों की लड़खड़ाहट
लाठी की ठक ठक
खांसी की धसक
गति-प्रगति का संकेत
कितना दौड़े-भागे
अनहद है जीवन
जीवन अभी शेष
2
चिड़िया, शाख और सांप
बसंत आया
- गया
अब चिड़िया आएगी
पेड़ झूमा
शाख नाची
और सांप मुटियाया
चिंघाड़ा समाज
बेबस फूलों की महक में डूबा बसंत
निराश हो गया
कुम्हलाया मौसम
चिड़िया नहीं आई
गरीब की बेटी जैसे
गिलहरी रोई
दूर से गूंजा
चुन लो गठबंधन
चिड़िया
शाख
और सांप
अकाल-सुकाल की मानिंद
पांच साल में फिर आऊंगा
ये स्वर बसंत का है
3
मां कहती है
बेटी हौसला रखना
अपना -
- पराया
भरोसा न करना
वरना
अपने लूट ले जाएंगे
मेरा तुम्हारा -
- पराये
घर जाने का सपना
बेटी
सुनना सबकी
भगवान बनकर
भगवान की तरह
करना अपने मनकी
👇👇👇 दो कविताएं 👇👇
खबरों में बीकानेर 🎤 🌐 ✍️
4
सुन कबीर की बात
हे साधु-बेरोजगार
त्याग डिग्री
फेंक गर्व
चल साथ बाजार
कर विनती
मांग काम
मिला!
नहीं मिलेगा
यह दौर ही ऐसा है
कबीर ने भी कहा था
बाजार में खड़े होकर
लकुटि ले साथ चल
वह युग बदला कहां
बदला तो सिर्फ
आज का कबीर
उसकी लकुटि
मत भूल
डंडे का जमाना है
गर्व, डिग्री, विनती, आत्म सम्मान
बीते जमाने की बात
उतार नकाब शराफत का
खड़ा हो बाजार में
खड़का लकुटि
मिलेगी उजरत
हे साधु-बेरोजगार
5
पिता ऐसा ही कहते हैं
बढ़ता अनाचार रिश्तों को डुबो रहा
आंख का पानी सूखा
इशारे बेमानी हुए
जमाना पैसे की गुड़िया का दास बना
कलपुर्जों की भीड़ में
इनसान कहां होंगे
आदमी को ढूंढ़ता रोबोट पृथ्वी पर आएगा
युग बीते कितने इतिहास में नहीं दर्ज हुए
पुराण कथाओं के किस्से
पिता कहते हैं
बीत रहा युग
नया जमाना आएगा
खेलने की उम्र में
अपने ही बच्चों को खेलाएंगे
पिता ऐसा ही कहते हैं
हर बार लगता रहा
हैरानगी बढ़ी जानकर
समाज सोता रहा
पता चला
मानव अपना ही गुर्दा बेच रहा
रिश्ते रिसते रहे
जीवन एकाकी बनता रहा
शाख से शाख न निकली
पेड़ ठूंठ बन गया
फूलों का मकरंद कहां
भंवरा ढूंढ़ता रहा
पिता ऐसा ही कहते हैं
बढ़ता अनाचार रिश्तों को डुबो रहा
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