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मॉब लीचिंग और ऑनर किलिंग जैसे काले कानून वापस ले सरकार :- बिहारीलाल बिश्नोई
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मॉब लीचिंग और ऑनर किलिंग जैसे काले कानून वापस ले सरकार :- बिहारीलाल बिश्नोई
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मॉब लीचिंग और ऑनर किलिंग जैसे काले कानून वापस ले सरकार :- बिहारीलाल बिश्नोई*
नोखा । राज्य विधानसभा में आज राजस्थान लिंचिंग से संरक्षण विधेयक 2019 और राजस्थान सम्मान और परम्परा के नाम पर वैवाहिक संबंधों की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप का प्रतिषेध विधेयक 2019 पेश किया गया । विधेयक पर चर्चा की शुरुआत करते हुए विधायक बिहारीलाल बिश्नोई ने कहा कि आज का दिन स्वतंत्रता के 70 सालों बाद प्रजातांत्रिक इतिहास में 2 बातों के लिए याद किया जाएगा । एक इसलिए कि देश की केन्द्र सरकार 70 सालों से चल रहे काले कानून धारा 370 को हटाने का संकल्प लोकसभा व राज्यसभा में प्रस्तुत हुआ है और दूसरा ठीक उसके उलट इसलिए कि हमारे प्रदेश की सरकार माॅब लिचिंग और ऑनर किलिंग जैसे काले कानून आज सदन में लेकर आई है।
सरकार द्वारा रखे गए राजस्थान लिंचिंग से संरक्षण विधेयक 2019 के प्रस्तावित ड्राफ्ट पर चर्चा में भाग लेते हुए भाजपा विधायक बिहारीलाल बिश्नोई ने कहा कि 17 जुलाई 19 को सुप्रीम कोर्ट ने आग्रह किया कि भीड़ द्वारा लोगों को जान से मार दिये जाने पर केन्द्र सरकार को बिल लाना चाहिए और चूंकि ये कृत्य घृणास्पद प्रकृति के है तथा अक्सर सांप्रदायिक होते है ।
माननीय न्यायालय के आग्रह पर केन्द्र सरकार ने एक मंत्रिमण्डलीय कमेटी बनाई और उसकी रिपोर्ट भी आ गई है । समिति ने सिफारिश की है कि केन्द्र सरकार इस पर कानून बनाए या धारा 153 ए में संशोधन लाए । उन्होंने कहा कि राज्य सरकार के मन में अगर वाकई दर्द है तो इससे संबंधित बहुत से कानून पहले से ही अस्तित्व में हैं और उनमें गलत हरकतों के लिए कड़े दण्डों का प्रावधान है, सरकार की राजनैतिक इच्छा शक्ति प्रबल हो, अभियोजन पक्ष मजबूत हो, तो निश्चित रूप से मौजूदा कानूनी प्रावधानों का पालन करते हुए प्रत्येक अपराध पर पूरी तरह अंकुश लगाया जाना संभव है ।
राज्य सरकार ने जो विधेयक प्रस्तुत किया है, इस पर संशोधन के सुझाव रखते हुए बिश्नोई ने कहा विधेयक में सरकार लिचिंग शब्द की हिन्दी में व्याख्या ही नहीं कर पाई है, जिससे लीचिंग शब्द को समझने में ही बड़ी दुविधा है, हम चाहते हैं कि हिंसा को भी परम्परागत रूप से परिभाषित किया जाए । इस विधेयक में जिस तरीके से इसे परिभाषित किया गया है, उससे यह तय है कि पुलिस द्वारा अनुसंधान के दौरान भारी दुरुपयोग किया जा सकता है । उन्होंने कहा कि प्रतिकुल परिवेश को भी बहुत व्यापक रूप से परिभाषित नहीं किया गया है जिससे इनके प्रावधानों के दुरूपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है, जैसेे पीड़ित, उसका कुटुम्ब, साक्षी, पीड़ित अथवा साक्षियों की सहायता करने वाले इत्यादि सभी को सम्मिलित किया गया है जो बिल्कुल स्वीकार्य नहीं है और यह साफतौर पर विधि के प्रतिकूल जान पड़ता है ।
बिश्नोई ने कहा कि इसमें केवल योजनाबद्ध तरीके से की गई हिंसा को ही शामिल किया जाना चाहिए । भौतिक, शारीरिक और आर्थिक हानि तक तो समझ में आता है, लेकिन मनोवैज्ञानिक हानि का मापदण्ड क्या होगा ? क्या पीड़ित के वारिस को इसी विधि के अन्दर पीड़ित माना जायेगा ? विधायक बिश्नोई ने चिंता जताई कि दण्ड समानुपातिक नहीं है, एक ही अपराध के लिए धर्म के आधार पर अलग-अलग दंड नहीं दिया जा सकता है । अतः यह बिल संविधान के विरूद्ध है और इससे समाज में विद्वैष व अलगाव की भावना बढ़ेगी ।
उन्होंने कहा कि पीड़ित व्यक्ति को राज्य सरकार की ओर से सरकारी वकील उपलब्ध कराए जाने का पहले से ही प्रावधान है, किंतु इस प्रस्ताव में यह व्यवस्था विधि के सर्वथा विरूद्ध है कि यदि पीड़ित व्यक्ति किसी निजी वकील को भी करता है तो उसका व्यय भी सरकार उठाएगी, ऐसे गैर कानूनी प्रावधान किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब यह सुविधा बलात्कार पीड़ित को भी नहीं दी जाती है तो फिर यहां क्यों ? राहत शिविरों का प्रावधान भी गलत है क्योंकि ये नए और अनावश्यक विवादों को जन्म देगा । श्री बिश्नोई ने कहा कि उपरोक्त सुझावों को संशोधन में शामिल करते हुए इसे जनमत के लिए परिचालित किया जाये ।
बिहारीलाल बिश्नोई ने दूसरे विधेयक राजस्थान सम्मान और परंपरा के नाम पर वैवाहिक संबंधों की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप का प्रतिषेध विधेयक 2019 के प्रस्तावित किये गये ड्राफ्ट पर चर्चा में भाग लिया और कहा कि इस विधेयक के माध्यम से सरकार सगोत्र विवाह को मान्यता देने जा रही है जो अमान्य है । विवाह में आशचित विवाह से क्या मतलब है ? क्या पंजीयन हो गया है और विवाह होना शेष है या मन में सोच रखा है कि इससे विवाह करूंगा या करूंगी ? हम चाहते हैं कि इसमें केवल पंजीयन को ही माना जाना प्रस्तावित किया जाए ।
खाप पंचायतों में भाग लेने वाले, लेकिन जो खाप के निर्णयों का समर्थन नहीं करते है, उन्हे भी अपराध में भागीदार माना जाना उचित नहीं है । उन्होंने कहा कि पूरे समूह को पकड़ना, ये उन सदस्यों के लिए हानिकारक होगा जो ऐसी हत्या का समर्थन नहीं करते है ।
बिश्नोई ने कहा कि भारतीय परिवार के शताब्दियों से चले आ रहे विधान को तोड़ने एंव लव-जिहाद के समर्थन में यह बिल लाया जाना प्रतीत हो रहा है । जो माता-पिता बच्चों का लालन पालन करते है क्या उन्हे उनके भविष्य के लिए क्या अच्छा है, यह सोचने का भी अधिकार नहीं होना चाहिए ?
श्री बिश्नोई ने कहा कि क्या सरकार अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति के लड़के-लड़कियों से स्वर्ण जातियों के लड़की या लड़कों द्वारा किए गए विवाह में किसी प्रोत्साहन देने का अभिप्राय रखती है ? क्या विवाह उपरांत उस लड़के या लड़की को अनुसूचित जाति या जनजाति का दर्जा देकर आरक्षण देने की भी कोई योजना है ? उन्होंने कहा कि अंतरजातीय अथवा अंतर धार्मिक विवाह के लिए पहले से ही कानून उपलब्ध है फिर सरकार क्यों सामाजिक ताने बाने को तोड़ना चाहती है ? मसौदा बिलों की एकतरफा रचना और इसे बिना किसी हितधारक के सार्वजनिक इनपूट के अंतिम रूप देना 5 फरवरी 2014 को कानून और सामाजिक न्याय मंत्रालय द्वारा दिए गए निर्देशों की अवहेलना है ।
श्री बिशनोई ने कहा कि इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि बिल के मसौदे को अंतिम रूप देने और विधानमंडल में रखने से पहले, यह परामर्श और जांच के लिए जनता के सामने होना चाहिए ।
सरकार द्वारा रखा जा रहा मसौदा विधेयक को इन्टरनेट पर डाला जाना चाहिए ताकि यह सभी के लिए सुलभ हो । जनता द्वारा दिए गए किसी भी सुझाव को वेबसाइट पर अपलोड करके सार्वजनिक डौमेन में भी रखा जाना चाहिए और यह आवश्यक है कि इस बिल को सेलेक्टिव कमेटी या जनमत हेतु भेजा जाना चाहिए ।
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