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पापों का प्रायश्चित करते हुए तीन घंटे तक क्षमा याचना के लिए साधना, आराधना व प्रार्थना की
पश्चाताप जीवन का सार व मुक्ति का द्वार-साध्वीश्री शशिप्रभा जी.म.सा.
बीकानेर, 27 जुलाई। जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ के गच्छाधिपति आचार्यश्री मणि प्रभ सूरिश्वर की आज्ञानुवर्ती, साध्वी सज्जनश्रीजी म.सा की शिष्या वरिष्ठ साध्वी, प्रवर्तिनी, शशि प्रभा म.सा. के सान्निध्य में रविवार को बागड़ी मोहल्ले की ढढ्ढा कोटड़ी सैकड़ों श्रावक-श्राविकाओं ने जन्म जन्मातरों के जाने-अनजाने में हुए पापों का प्रायश्चित करते हुए तीन घंटें तक क्षमा याचना के लिए साधना, आराधना व प्रार्थना की। विश्व शांति, सद्भावना व अहिंसा की स्थापना के लिए 111 श्रावक-श्राविकाओं ने सामूहिक एकासना किया।
’’जीव राशि क्षमापना दिवस’ पर साध्वीश्री शशि प्रभाजी व उनकी शिष्या साध्वीश्री सौम्यगुणाजी ने 18 वीं शताब्दी में 8 शब्दों से 8 लाख श्लोकों की रचना करने वाले जैनाचार्य समय सुन्दरजी महाराज द्वारा रचित पदमावती आलोचना स्तवन का सस्वर वाचन विवेचन करते हुए यह साधना करवाई। साधना में कई परिवार तो बच्चों सहित जन्म-जन्मांतरों के दौरान विभिन्न योनियों में, वर्तमान जीवन में जाने-अनजाने में हुए पापों, गलतियों, मन, कर्म व देह से हुई हिंसा के लिए साढ़े तीन घंटें तक अरिहंत परमात्मा को साक्षी मानते हुए प्रायश्चित करते हुए क्षमापना ’’ मिच्छामी दुक्कड़़म’’ किया।
’’जेमे जीवन विराधिया योनी चउरासी लाख, ते मुझ मिच्छामी दुक्क्ड़म अरिहंत नी साख’’ का सामूहिक उच्चारण करते हुए ताज्य कर्मों, समस्त पापकारी व हिंसाकारी कार्यों, किसी के साथ विश्वासघात, धोखाधड़ी, अपने व्यवसायिक कार्य, परिवारिक जिम्मेदारी निर्वहन के दौरान हुई जीव हिंसा, क्रोध, मान, माया व लोभवश और मोहनीय कर्म के कारण किए गए पापों की आलोचना की गई। बीकानेर में लगभग दो दशक बाद हुई इस साधना के दौरान बाड़मेर सहित विभिन्न स्थानों से आए श्रावक-श्राविकाओं ने ध्यान मग्न व एकाग्रचित होकर भागीदारी निभाई। कार्यक्रम स्थल पर अच्छे, नेक, देव, गंुरु व धार्मिक सुकार्यों की अनुमोदना भी की गई ।
साध्वीश्री शशि प्रभा जी.म.सा. ने नियमित प्रवचन में कहा कि पश्चाताप जीवन का सार व मुक्ति का द्वार है। जैन धर्म भावना प्रधान धर्म है। जैनाचार्य कहते है ’’ परिणामे बंध परिणामे मोक्ष’’ अर्थात भावों के आधार पर ही आत्मा कर्मों का बंध करती है और भावों से ही मोक्ष प्राप्त होता है। अनंतकाल से हमारी आत्मा 84 लाख जीव योनियों में अनेक बार भ्रमण कर चुकी है। इस यात्रा में मात्र शरीर बदलता है, बाहर की पैकिंग बदलती है, आत्मा वही रहती है । अनगिनत पापों से छूटकारा पाने के लिए प्रभु वीर ने आलोचना एवं प्रायश्चित का मार्ग बताया है। उसी मार्ग को अपनाते हुए भव-भव के पापों का मिच्छामि दुक्कड़म’’ यानि क्षमायाचना के लिए यह साधना-आराधना की गई है। इस साधना-आराधना से प्रेरणा लेकर जीवन में पाप व हिंसा से बचने का दृृढ़ संकल्प लेकर मन के मजबूत बनाते हुए देव, गुरु व धर्म की आराधना करें।
शांति एकासना-विश्व शंाति के लिए 111 श्रावक श्राविकाओं ने दिव्य दर्शना व साध्वीश्री सौम्यगुणा की ओर से सुनाए गए शांति पाठ के साथ 20 मिनट में एक साथ एकासना किया। एकासना मंें सात वर्षीय हर्षिता पारख व भूनिधि बांठिया भी शामिल हुई। शांति एकासना का लाभ कन्हैयालाल, महावीर और नमन कुमार नाहटा परिवार ने लिया।
अभिनंदन-प्रवचन स्थल पर बाड़मेर श्री संघ के वरिष्ठ श्रावक रतन लाल संकलेचा, सतीश छाजेड़ और जिन शासन विहार सेवा ग्रुप बाड़मेर और खरतरगच्छ युवा परिषद के सदस्यों का श्रीसंघ की ओर से छगन लाल भुगड़ी आदि श्रावकों ने अभिनंदन किया।
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पापों का प्रायश्चित करते हुए तीन घंटे तक क्षमा याचना के लिए साधना, आराधना व प्रार्थना की
पश्चाताप जीवन का सार व मुक्ति का द्वार-साध्वीश्री शशिप्रभा जी.म.सा.
बीकानेर, 27 जुलाई। जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ के गच्छाधिपति आचार्यश्री मणि प्रभ सूरिश्वर की आज्ञानुवर्ती, साध्वी सज्जनश्रीजी म.सा की शिष्या वरिष्ठ साध्वी, प्रवर्तिनी, शशि प्रभा म.सा. के सान्निध्य में रविवार को बागड़ी मोहल्ले की ढढ्ढा कोटड़ी सैकड़ों श्रावक-श्राविकाओं ने जन्म जन्मातरों के जाने-अनजाने में हुए पापों का प्रायश्चित करते हुए तीन घंटें तक क्षमा याचना के लिए साधना, आराधना व प्रार्थना की। विश्व शांति, सद्भावना व अहिंसा की स्थापना के लिए 111 श्रावक-श्राविकाओं ने सामूहिक एकासना किया।
’’जीव राशि क्षमापना दिवस’ पर साध्वीश्री शशि प्रभाजी व उनकी शिष्या साध्वीश्री सौम्यगुणाजी ने 18 वीं शताब्दी में 8 शब्दों से 8 लाख श्लोकों की रचना करने वाले जैनाचार्य समय सुन्दरजी महाराज द्वारा रचित पदमावती आलोचना स्तवन का सस्वर वाचन विवेचन करते हुए यह साधना करवाई। साधना में कई परिवार तो बच्चों सहित जन्म-जन्मांतरों के दौरान विभिन्न योनियों में, वर्तमान जीवन में जाने-अनजाने में हुए पापों, गलतियों, मन, कर्म व देह से हुई हिंसा के लिए साढ़े तीन घंटें तक अरिहंत परमात्मा को साक्षी मानते हुए प्रायश्चित करते हुए क्षमापना ’’ मिच्छामी दुक्कड़़म’’ किया।
’’जेमे जीवन विराधिया योनी चउरासी लाख, ते मुझ मिच्छामी दुक्क्ड़म अरिहंत नी साख’’ का सामूहिक उच्चारण करते हुए ताज्य कर्मों, समस्त पापकारी व हिंसाकारी कार्यों, किसी के साथ विश्वासघात, धोखाधड़ी, अपने व्यवसायिक कार्य, परिवारिक जिम्मेदारी निर्वहन के दौरान हुई जीव हिंसा, क्रोध, मान, माया व लोभवश और मोहनीय कर्म के कारण किए गए पापों की आलोचना की गई। बीकानेर में लगभग दो दशक बाद हुई इस साधना के दौरान बाड़मेर सहित विभिन्न स्थानों से आए श्रावक-श्राविकाओं ने ध्यान मग्न व एकाग्रचित होकर भागीदारी निभाई। कार्यक्रम स्थल पर अच्छे, नेक, देव, गंुरु व धार्मिक सुकार्यों की अनुमोदना भी की गई ।
साध्वीश्री शशि प्रभा जी.म.सा. ने नियमित प्रवचन में कहा कि पश्चाताप जीवन का सार व मुक्ति का द्वार है। जैन धर्म भावना प्रधान धर्म है। जैनाचार्य कहते है ’’ परिणामे बंध परिणामे मोक्ष’’ अर्थात भावों के आधार पर ही आत्मा कर्मों का बंध करती है और भावों से ही मोक्ष प्राप्त होता है। अनंतकाल से हमारी आत्मा 84 लाख जीव योनियों में अनेक बार भ्रमण कर चुकी है। इस यात्रा में मात्र शरीर बदलता है, बाहर की पैकिंग बदलती है, आत्मा वही रहती है । अनगिनत पापों से छूटकारा पाने के लिए प्रभु वीर ने आलोचना एवं प्रायश्चित का मार्ग बताया है। उसी मार्ग को अपनाते हुए भव-भव के पापों का मिच्छामि दुक्कड़म’’ यानि क्षमायाचना के लिए यह साधना-आराधना की गई है। इस साधना-आराधना से प्रेरणा लेकर जीवन में पाप व हिंसा से बचने का दृृढ़ संकल्प लेकर मन के मजबूत बनाते हुए देव, गुरु व धर्म की आराधना करें।
शांति एकासना-विश्व शंाति के लिए 111 श्रावक श्राविकाओं ने दिव्य दर्शना व साध्वीश्री सौम्यगुणा की ओर से सुनाए गए शांति पाठ के साथ 20 मिनट में एक साथ एकासना किया। एकासना मंें सात वर्षीय हर्षिता पारख व भूनिधि बांठिया भी शामिल हुई। शांति एकासना का लाभ कन्हैयालाल, महावीर और नमन कुमार नाहटा परिवार ने लिया।
अभिनंदन-प्रवचन स्थल पर बाड़मेर श्री संघ के वरिष्ठ श्रावक रतन लाल संकलेचा, सतीश छाजेड़ और जिन शासन विहार सेवा ग्रुप बाड़मेर और खरतरगच्छ युवा परिषद के सदस्यों का श्रीसंघ की ओर से छगन लाल भुगड़ी आदि श्रावकों ने अभिनंदन किया।
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