व्यक्ति जन्म से नहीं कर्म से जैन बनता है: प्रो. व्यास
नैतिकता का शक्तिपीठ पर ‘मर्यादा और आचार्य तुलसी’ विषय पर संगोष्ठी आयोजित
गंगाशहर। देश को और विश्व को व्यवस्थित करने की बात आज हर कोई करता है। सभी जगह परिवर्तन की बातें होती रहती है लेकिन आज जरूरत है देश में बातों के अलावा एक-एक व्यक्ति को सुधारने की। यह विचार नैतिकता का शक्तिपीठ पर ‘‘मर्यादा और आचार्य तुलसी’’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में मुख्य वक्ता राजकीय डूंगर महाविद्यालय के प्रो. राजनारायण व्यास ने कही। उन्होंने कहा कि आचार्य तुलसी ने व्यक्ति-व्यक्ति को सुधारने का दृष्टिकोण प्रदान किया। आचार्य तुलसी का गीत ‘‘सुधरे व्यक्ति समाज व्यक्ति से राष्ट्र स्वयं सुधरेगा’’ के माध्यम से उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति स्वयं सुधरना शुरू हो जाएगा तो देश में परिवर्तन स्वयं होना शुरू हो जाएगा। उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन में बलपूर्वक आचरण करने की बात नहीं है। अपना कार्य अपने विवेक से करने के लिए आचार्य तुलसी ने व्यक्ति में विवेक जागृत करने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति जन्म से जैन नहीं होता है बल्कि कर्म से जैन होता है। आचार्य तुलसी के अवदान अणुव्रत में विश्वास रखना चाहिए। श्रमण परम्परा में यह व्यवस्था रही है कि अपना कर्म ही मुख्य तत्व है जो व्यक्ति को मुक्त करता है। बुद्ध ने कहा कि ‘अपने दीपक स्वयं बनो’ कोई भी शासक ऐसी व्यवस्था पैदा नहीं कर सकता कि हर व्यक्ति पर पुलिस का पहरा बैठा सके। आचार्य तुलसी ने हमें अपनी आत्मा पर अपना नियंत्रण स्थापित करने की प्रेरणा दी और मार्गदर्शन प्रदान किया। व्यास ने कहा कि छोटी-छोटी कहानियों के माध्यम से मर्यादा मय जीवन जीने की प्रेरणा आचार्य तुलसी ने दी। मनुष्यों को सुधारना सबसे कठिन होता है। मनुष्य का वास्तविक जीवन काफी कठिन होता है। उन्होंने कहा कि मुनिजनों का जीवन प्रेरणादायक है ये मर्यादा मय जीवन जीते है। हमें मुनिश्री का जीवन अपने आचरण में उतारने का प्रयास करना चाहिए जिससे हम मर्यादामय जीवन जी सके।
शासनश्री मुनिश्री मणिलालजी स्वामी ने कहा कि आचार्य तुलसी हमेशा कहते थे कि मैं पहले इंसान हूं, फिर जैन और फिर तेरापंथी। आचार्य भिक्षु ने तेरापंथ की स्थापना की। आचार्य श्री जयाचार्य ने मर्यादा की मजबूत नींव रखी और आचार्य तुलसी ने सभी को संवारा, सम्भाला और साथ में रखा।
विषय प्रवर्तन करते हुए आचार्य तुलसी शान्ति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष जैन लूणकरण छाजेड़ ने कहा कि नैतिकता का शक्तिपीठ पर लगभग 5 सालों से नियमित संगोष्ठियांे का आयोजन किया जा रहा है। ‘‘मर्यादा और अनुशासन’’ विषय पर आचार्य तुलसी का नाम लेते ही ‘‘निज पर शासन फिर अनुशासन’’ एक शब्द पर ही मर्यादा की व्याख्या हो जाती है। उन्होंने कहा कि आचार्य तुलसी ने एक लाख किलोमीटर से अधिक की यात्रा करके नैतिकता, चारित्र, मर्यादा, अनुशासन, अणुव्रत का दर्शन जन-जन तक पहंुचाने का भरसक प्रयास किया। आचार्य तुलसी का सम्पूर्ण जीवन मर्यादा से ओत-प्रोत रहा था।
मुनिश्री कुशलकुमारजी ने कहा कि हर व्यक्ति नियम से चलता है। जो अपने आप पर नियम बनाकर चले तो वह जीवन में कुछ बड़ा कर सकता है। कुछ नियम से चलते हैं कुछ नियम तोड़ते रहते हैं। जीवन में हर क्षेत्र में मर्यादा की आवश्यकता है। पानी की कमी को रेखांकित करते हुए पानी का सीमित उपयोग करने की प्रेरणा दी। भगवान महावीर ने कहा खाने-पीने, सोने-बैठने व चलने-फिरने सभी दैनिक गतिविधियांे को नियमों के अनुरूप चलने से पाप नहीं लगता। उन्होंने कहा कि नियम बनाकर मर्यादाओं में रहकर चलने से ज्यादा दुःख नहीं भुगतना पड़ता। जो व्यक्ति अपनी मां को सहने की ताकत पैदा कर लो तो दुनिया से कुछ भी सुनना नहीं पड़ेगा। मां ही पूरे जीवन को मर्यादामय बनाती है। आचार्य तुलसी ने अपनी आत्मा का चौकीदार बनने की प्रेरणा प्रदान की।
संगोष्ठी की शुरूआत शासन श्री मुनिश्री मणिलाल जी स्वामी ने नमस्कार महामंत्र का उच्चारण करके की। मुनिश्री विमलविहारी जी ने उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं को जप करवाया। तेरापंथ महिला मण्डल, कन्या मण्डल भीनासर द्वारा मंगलाचरण किया गया। मुनिश्री श्रेयांसकुमारजी ने गीतिका का संगान किया। संगोष्ठी के दौरान श्रीमती प्रेरणा कोचर, श्रीमती विमला देवी कोचर, सुश्री कोमल बोथरा ने भी विचार रखे।
संगोष्ठी के मुख्य वक्ता प्रो. राजनारायण व्यास का विमल बैद, नेमचन्द सेठिया, नवीन, डॉ. पी.सी. तातेड़ ने जैन पताका, साहित्य व स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मान किया। आभार ज्ञापन तेरापंथ सभा भीनासर के अध्यक्ष नेमचन्द सेठिया ने किया। कार्यक्रम का संचालन तेरापंथ युवक परिषद, गंगाशहर के सहमंत्री देवेन्द्र डागा ने किया।




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