Wednesday, October 31, 2012

भासा अ’र देस री बात्यां कागद माथै उकेर आजादी री अलख जगाई / राजस्थानी उपन्यास *कुसुम संतो* से

याद राखणौ जरूरी है कै 1857 रै जुद्ध रै बाद भारतेन्दु अष्र दूजा कवि भासा अष्र परतंत्र देस री बात्यां कागद माथै उकेर लोगां रै मन में आजादी री अलख जगाई ही ! ( राजस्थानी उपन्यास ’कुसुम संतो’ से  )...

भाषा साहित्य मिनख.मिनख नै जोड़ै! देस री एकता रै वास्तै भासा अेक जरियो बणै! आ बात कैई जा सकै। जियांष्क विदेसियां रै आक्रमण सूं जद आपणै देस रो जनए या कैवां कै म्है लोग जद त्रस्त हुईग्या हाए बीं बखत साहित्यकार जगत जिकी एकता रो दरसण आपणी कलम सूं करायोए बा बात कोई दो.चार सताब्दियां में भी भूलीजणी आसान कोनी। बीं बखत किरसण भगवान रो बखान बिपती रै दिनां सूं छुटकारो पावण रो एक उपाय जियां लागै कैवां तो सायद गलत कोनी समझो जावैळा। सूरदास उण बगत स्री किरसनजी री लीलावां नै कागद माथै उकेर जीव.जगत नै जीवण रो नूवांे अंदाज दिरायो। राजपाट नै एक तरफां राख इब्राहीम मियां जद रसखान बण सकै तो समझणोें कै ओ भगती रो ई ज बखान है। 
केरल रा एक महाराजा राम वर्मा ष्स्वाति तिरुनालष् रै नाम सूं कविता करता हा।  महारास्टर रा संत ज्ञानेस्वरए नामदेव अष्र सिन्धु प्रदेस  रा श्रीलालजी भी कवि ही नीं किरसनजी री लीलावां नै भगतां रै साम्है राखणियां भी मानीजे क्यों कै इयां सूं पैली लोगां रै साम्है भगती रा  दूजा सबद आयौड़ा हा। पंजाब रा गुरुनानकदेवजी नै कुण नीं बांच्यो हैए रनजीतसिंह रै दरबार में कवियां रो जित्तो मान हो बीनै भी साहित्य जगत जाणै ही है। गुजरात रा भालणए नरसी मेहताए दयाराम आज भी आपणै आखरां री गूंज बणाय राखी है। आ बात भूलीजण जिसी कोनी कै कोई अेक भासा में रचयोड़ी रचना नै बांचणै रै वास्ते कितराई विद्वान आपरी भासा रै अलावा दूजी भासावां सीख्या। बंगाल रा कवि यसोराज खांनए मिथिला रा विद्यापतिए आसाम रा संकरदेवए माधवदेव रा सबद राजस्थान रो गौरव मीरां रै सबदां स्यूं कम गूंज कोनी मचायोड़ा है। राजस्थान रा राजा.महाराजा ताईं ईं भगती री नद्यां मांय बहियोड़ा हाए जैपुर रा ब्रजनिधि संतागढ़ रा नागरीदासए जोधपुर रा जसवंतसिंहए झालावाड़ रा सुधाकर अष्र भरतपुर रा बलदेवसिंह जिसा कित्ताई नाम गिणाया जाय सकै। साहित्य अर भगती कवियां रो इतिहास रा जाणकार जाणै है कै जिकै बगत कलकत्ता रै फोर्ट विलियम कॉलेज रै वातायन सूं  पस्चिम री संस्कृति देस में झांक री ही बिण बखत भगती री कवितावां ई सूरज री किरणां जियां देस नै उजियारो दिरायो। इण रो कारण ओ है कै लोगां री भासा में कैयोड़ी बात्यां ही आम आदमी ताईं पूगावण में कवि.साहितकार सक्षम हुवै। बीं बखत गुजराती लल्लूलालजी प्रेम सागर री रचना करी ही। आ बात याद राखण आळी है कै ओ ग्रन्थ जित्तो कोई और ग्रन्थ सायद ही बिक्री रो रिकॉर्ड बणायो हुवै।भगती रै सागर रै मांय डुबकी लगाष्र सताब्दियां सूं अपां दुविधा री नद्यां री वैतरणी पार करतां रिया हां। याद राखणौ जरूरी है कै 1857 रै जुद्ध रै बाद भारतेन्दु अष्र दूजा कवि भासा अष्र परतंत्र देस री बात्यां कागद माथै उकेर लोगां रै मन में आजादी री अलख जगाई ही। राजस्थान रा गिरधर षर्मा नवरत्न री ष्मातृ.वंदनाष् स्वतंत्रता री जिकी भावना नै सबद दियोड़ा है बियांनै पढ़णियो भूलै कोनी। सूरए तुलसीए सूर्यमल्लए बांकीदास विद्यापति अष्र कित्ताई नाम भगती रै सागर में तैर रिया है अष्र प्रेरणा देता थकै कोनी कै भगती कोई भगवान सारू कोनी। इण कवियां रै सागै विगत सताब्दी अष्र आधुनिक युग रा कवियां नै सामिल करीजै तो फकत नामां सूं छोटी.मोटी पोथी लिखीज जावैलीए इण वास्तै नामां रो मोह छोड़ म्हैं ओ कैवणों चावूं कै भगती सारू भासाए प्रदेसए काल अष्र राज रै अवसर री जरूरत  बियानै पड़ सकै जिका लिखणिया पेट रै वास्तै ई ज लिखैए समाज रै वास्तै लिखणो धर्म समझणिया तो हजारू.हजार बरस पैली भी लिखताए बियांरो लिख्योड़ो बांचण रै वास्तै भी विद्वानां री फौज लगायोड़ी हैए जियां के सिन्धु सभ्यता री लिखावट अजताईं समझ सूं बारै है। अठै हूं कै सकूं कै भासा रै प्रति भगती और ज्यादा प्रगाढ़ता मांग रैयी है। भगती रचनावां लिखणी कै लिख्यौड़ी पर लिखणौं तो म्हानै भी सौरो लागैए मन में भगती राखणी जुदा बात लाग री है। सगळा एक जीसा कोनी हुवै आ बात भी हूं जाणूं। धन्य है बै मायड़ भासा रा हितैसी जिका तन.मन.धन सूं इण रै प्रति समर्पित हैए भगती में लीन है।भगती सूं काम करता अष्र उण रै प्रति समर्पण राखता निस्चै ही अपानै सफलता मिलैली। भगती रो परताप अपां सगळा जाणा हा। . ; मोहन थानवी के राजस्थानी उपन्यास कुसुम संतो से  )...