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26 दिसंबर 2025 गुरुवार
खबरों में बीकानेर
✒️@Mohan Thanvi
अपनी संतति को संस्कृति से जोड़ें, ना की संपत्ति से - आचार्य हरि प्रसाद
स्थानीय होटल पाणिग्रहण में प्रारंभ हुई छह दिवसीय कृष्ण कथा का शुभारंभ आज अग्निहोत्र यज्ञ से हुआ। आर्ष न्यास अजमेर, पर्यावरण पोषण यज्ञ समिति एवं आरएसवी ग्रुप ऑफ स्कूल्स के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में उपस्थित दर्शकों को अपने प्रवचन से आनंद में सरोबार करते हुए आचार्य रवि शंकर जी ने कहा कि
*श्री कृष्णा विशिष्ट थे, ऐश्वर्यमान थे समर्थ थे, सर्व शक्तिमान थे*
आपने कहा कि सामान्य जन एवं श्री कृष्णा में क्या अंतर है
हम सभी माता-पिता, गुरु, मित्र, शिक्षक, चिकित्सक, नेता, निर्देशक किसी न किसी रूप में है परंतु श्री कृष्णा सभी रूपों में है।
स्थिति विशेष के समय मित्र हो या परिवारजन किसी को यदि सन्मार्ग दिखाते हैं तो हम गुरु के रूप में होते हैं यह सब मनोविज्ञान पर आधारित है। और हम किसी की सहायता करना चाहते हैं तो हमें उसके मनोभाव को समझना होगा तभी हम सही हल कर पाएंगे इसके लिए हमे सोचना पड़ेगा पुरुषार्थ करना पड़ेगा। वास्तव में हम अपने कर्तव्य का निर्वहन न करके अपनी जिम्मेदारियां दूसरों पर डाल रहे हैं। हम परिवार, समाज एवं व्यवसाय में अपनी जिम्मेदारियां को भली प्रकार से नहीं समझ पा रहे। कृष्ण के दृष्टिकोण अनुसार किसी भी समस्याओं के मूल को समझना आवश्यक है तभी उसका निराकरण संभव है। किसी से प्रश्न पूछना अर्थात अपनी शंका को बाहर निकाल कर रखना है। हमें अच्छा श्रोता और सिखाने वाला बनाना चाहिए। जब अर्जुन ज्ञान लेन को तत्पर हुए तभी योगेश्वर उन्हें ज्ञान देने में समर्थ हुए। व्यक्ति की विशेषता तभी प्रकट होती है जब वहां अतिरिक्त करने का प्रयास करता है अपनी इच्छा और कामनाओं को अलग रखकर श्रम करने का प्रयास करता है। विशेष परीक्षा में हम शिक्षक होते हैं तथा विशिष्ट परिस्थितियों में हम विद्यार्थी या शिष्य की भूमिका में भी होते हैं। हमें किसी की समस्या का समाधान करना है तो पहले उसे समझना आवश्यक है। उसके मन के भय,असमंजस्य, परिस्थितियों को समझना अत्यंत आवश्यक है। परिस्थितियां विशिष्ट अनुरूप ही समाधान भी तलाश करने पडते हैं। जब व्यक्ति सहज भाव से रहना शुरू करता है तो अन्य सहज रूप से उसकी ओर आकर्षित भी होने लगते हैं तथा अपने मन के भाव उसके समक्ष प्रकट करने लगते हैं। जब अर्जुन ने सहज भाव से श्री कृष्ण के सामने अपने मन के भाव को प्रकट किया तभी वह अर्जुन के प्रश्नों का जवाब दे पाए।
आचार्य हरि प्रसाद ने अपने उद्बोधन में कहा कि अपनी संतति को संस्कृति से जोड़े ना की संपत्ति से यदि ऐसा करेंगे तो वृद्ध आश्रम की
आवश्यकता स्वत ही समाप्त हो जाएगी।
कृष्ण कथा के संगीतमय प्रस्तुतीकरण द्वारा आचार्य कुलदीप जी ने दर्शकों को मंत्र मुग्ध कर दिया आपने बीच-बीच में संसार मे उत्पन्न विभिन्न कुरीतियों एवं अंधविश्वासों पर भी अपने विचार प्रकट किए। प्राचीन काल से वर्तमान आधुनिक काल तक कृष्ण का चरित्र किस प्रकार प्रासंगिक है इसका भी सरल रूप से वर्णन किया।






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