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संस्कृति अंतरात्मा रो उजास है - डॉ गजादान चारण
अखिल भारतीय साहित्य परिषद राजस्थान के तत्वावधान में मायड़ भाषा-राजस्थानी भाषा विषय पर तीन दिवसीय संगोष्ठी का आगाज हुआ। प्रथम दिन आयोजित ऑनलाइन गोष्ठी का विषय "मायड़ भाषा छे संस्कार और संस्कृति रो बीज" रहा। कार्यक्रम के संयोजक (जोडनहार ) अखिल भारतीय साहित्य परिषद चित्तौड़गढ़ प्रांत के सह सचिव, डॉक्टर शिवदान सिंह जोलावास रहे। कार्यक्रम का प्रारंभ डॉ करुणा दशोरा द्वारा राजस्थानी भाषा में गाए सरस्वती वंदना (सुरसत अरज) " हे हंस सवारी माय" के साथ हुआ। कार्यक्रम की प्रस्तावना (पैली दीठ) कोटा विभाग संयोजक राजेन्द्र गौड़ ने रखते हुए कहा कि अपनी मायड़ भाषा में जो मिठास है वो और किसी भाषा में नही। बीज वक्तव्य डॉ घनश्याम सिंह कच्छावा ने रखते हुए कहा कि दुनिया में दस करोड़ लोग आज राजस्थानी भाषा का प्रयोग करते हैं। जिसमें मेवाड़ी,ढूंढाड़ी, हाड़ौती और मारवाड़ी बोली का प्रयोग शामिल है। मुख्य वक्ता डॉ गजादान चारण ने राजस्थानी भाषा में दिए अपने उद्बोधन में कहा कि संस्कृति अंतरात्मा रो उजास है। मनुष्य और जानवर प्रकृति से एक जैसे होते हैं। दोनों भोजन निंद्रा इत्यादि कार्यों को अपने जीवन में अंजाम देते हैं।किंतु जो चीज मनुष्यों को जानवरों से भिन्न करती है वह है संस्कृति। मानव अपने जीवन मूल्यों और उदात्त विचारों के कारण प्रकृति से संस्कृति की ओर अग्रसर होता है जबकि जानवर उसकी प्रकृति से विकृति की ओर बढ़ता है।संस्कृति एक निरंतर बहती जीवनधारा है। आदमी के प्रथम विचार सदैव उसकी मातृभाषा में ही पैदा होते हैं अतः हमें अपने जीवन में मातृभाषा को महत्व देना चाहिए।
कार्यक्रम सहसंयोजक मोनिका गौड़ ने कहा कि हमें अपनी भाषा को मजबूत करने हेतु बहुत काम करने की जरूरत है। अपनी भाषा को यथोचित सम्मान मिले इस हेतु कई कदम उठाने की जरूरत है।
चित्तौड़गढ़ प्रान्त अध्यक्ष विष्णु शर्मा ने अपने उद्बोधन में कहा कि अपनी आगामी पीढ़ी को मायड़ भाषा से जोड़ना हमारा कर्तव्य है। मायड़ भाषा की मिठास हमें नज़दीक लाती है। कार्यक्रम के तकनीकी सहायक चित्तौड़गढ़ प्रान्त महामंत्री पंकज कुमार झा ने बताया कि मुख्य अतिथि परिषद के क्षेत्रीय संगठन मंत्री विपीन चंद्र पाठक रहे। विपीन चंद्र पाठक ने अपने उद्बोधन में बताया कि मातृ भाषा माँ की भाषा है।अतिप्रसन्न और अति क्रुद्ध होने पर हमारे मुंह से सबसे पहले अपनी मायड़ भाषा के ही शब्द निकलते हैं। व्यक्ति मातृभाषा के सागर में स्नान कर ही पूर्ण मानव बन सकता है।
कार्यक्रम के अंत में आभार उदयपुर विभाग संयोजक डॉ कुंजन आचार्य ने व्यक्त किया।
कार्यक्रम में परिषद के प्रदेश अध्यक्ष डॉ अन्नाराम शर्मा, सतीश आचार्य, रेखा लोढ़ा, सिया चौधरी, शिवराज, भंवर सिंह, नवीन झा, बीना गुप्ता, विक्रम, अनुज गोदारा, अभिषेक वैष्णव,राजेश गांधी,रतनलाल मेनारिया, रविकांत सनाढ्य, अशोक स्वामी, विवेक सोलंकी, राकेश चौधरी, प्रवीण कुमार सहित प्रमुख कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
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