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खबरों में बीकानेर 🎤 🌐 बजट : बजा दिया "घंटा"
"उम्मीद की किरण चमकती देखने से वंचित हमलोग"
-✍️ मोहन थानवी
डंका नहीं बजा। कुछ तो बजट में बजाना था। सो एक ऐसा "घंटा" बजा दिया जिसकी प्रतिध्वनि सुनने से बचने के लिए कोई भी आय वर्ग तैयार नहीं। सच में, आर्थिक सुधारों और बेरोजगारी दूर करने के प्रयासों की श्रृंखला न्यूनतम, निम्न और मध्यम आय वर्ग को तो अपने भार तले दबाती ही जा रही है साथ ही उच्च आय/ कारपोरेट वर्ग की पेशानी पर भी पसीना चमका रही है। काफी समय से बाजार तो घुटनों पर चल ही रहा था, टैक्स के चक्कर में अब व्यापारी - उद्यमी को अतिरिक्त सावधानी अलग से रखने की नौबत आन पड़ी है कि कहीं जरा-सी चूक टैक्स चोरी के इल्जाम में चक्करघिनी ना बना दे। आयकर का दायरा महज उन कर्मचारियों के लिए प्लस पॉइंट हो सकता है जो महीने की पहली तारीख का इंतजार करते हैं। निजी क्षेत्र के 96% कामगारों के ऐसे भाग्य कहां कि उनके सेलेरी एकाउंट में सालभर में 5-7 लाख की एंट्री हो सके। आम किसान अपनी सुविधा अनुसार अपनी पसीने की कमाई आज तक तो गिन नहीं सका, अभी भी उम्मीद की किरण चमकती देखने से वंचित रहा। किसान को या अंतिम पंक्ति के आमजन को कभी भी सीधे-सीधे लाभान्वित होने का अवसर नहीं मिला, हमेशा कागजों के पुलिंदों और योजनाओं के जंतर मंतर से गुजरने में सफल वीरमानुष को ही सरकारी इमदाद के दर्शन हो पाते थे, अबकी बार भी वही योजनाओं कि चक्रव्यूह नजर आया है। बहरहाल, बजट नितांत निराशाजनक तो नहीं है, दूर से आती खुशियों के घंटे की आवाजें आशाएं जगाती तो हैं ।
-✍️ मोहन थानवी
"उम्मीद की किरण चमकती देखने से वंचित हमलोग"
-✍️ मोहन थानवी
डंका नहीं बजा। कुछ तो बजट में बजाना था। सो एक ऐसा "घंटा" बजा दिया जिसकी प्रतिध्वनि सुनने से बचने के लिए कोई भी आय वर्ग तैयार नहीं। सच में, आर्थिक सुधारों और बेरोजगारी दूर करने के प्रयासों की श्रृंखला न्यूनतम, निम्न और मध्यम आय वर्ग को तो अपने भार तले दबाती ही जा रही है साथ ही उच्च आय/ कारपोरेट वर्ग की पेशानी पर भी पसीना चमका रही है। काफी समय से बाजार तो घुटनों पर चल ही रहा था, टैक्स के चक्कर में अब व्यापारी - उद्यमी को अतिरिक्त सावधानी अलग से रखने की नौबत आन पड़ी है कि कहीं जरा-सी चूक टैक्स चोरी के इल्जाम में चक्करघिनी ना बना दे। आयकर का दायरा महज उन कर्मचारियों के लिए प्लस पॉइंट हो सकता है जो महीने की पहली तारीख का इंतजार करते हैं। निजी क्षेत्र के 96% कामगारों के ऐसे भाग्य कहां कि उनके सेलेरी एकाउंट में सालभर में 5-7 लाख की एंट्री हो सके। आम किसान अपनी सुविधा अनुसार अपनी पसीने की कमाई आज तक तो गिन नहीं सका, अभी भी उम्मीद की किरण चमकती देखने से वंचित रहा। किसान को या अंतिम पंक्ति के आमजन को कभी भी सीधे-सीधे लाभान्वित होने का अवसर नहीं मिला, हमेशा कागजों के पुलिंदों और योजनाओं के जंतर मंतर से गुजरने में सफल वीरमानुष को ही सरकारी इमदाद के दर्शन हो पाते थे, अबकी बार भी वही योजनाओं कि चक्रव्यूह नजर आया है। बहरहाल, बजट नितांत निराशाजनक तो नहीं है, दूर से आती खुशियों के घंटे की आवाजें आशाएं जगाती तो हैं ।
-✍️ मोहन थानवी
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