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परमात्मा के चरणों की शरण लें - प्रवर्तिनी साध्वीश्री शशि प्रभा
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परमात्मा के चरणों की शरण लें-प्रवर्तिनी साध्वीश्री शशि प्रभा म.सा.
बीकानेर, 30 जुलाई। जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ के आचार्यश्री जिन मणिप्रभ सूरिश्वरजी म.सा. की आज्ञानुवर्ती प्रवर्तिनी साध्वीश्री शशि प्रभा म.सा. ने मंगलवार को बागड़ी मोहल्ले की ढढ्ढा कोटड़ी में प्रवचन में कहा कि लक्ष्य, ध्येय, मजबूत संकल्प और भावों से परमात्मा के चरणों की शरण लें।
उन्होंने कहा कि सांसारिक सुख, वैभव,रूप, सौन्दर्य, धन, सम्पति, संतान आदि की सुविधाएं पुण्योदय से मिली है। सुख-सुविधाओं को स्थाई नहीं माने, ये बदल रही है। वास्तविक आत्मसुख परमात्मा के चरणों में शरण लेने व मोक्ष का लक्ष्य रखकर सम्यक्् दृष्टि से देव, गुरु व धर्म की साधना, आराधना व भक्ति से मिलता है।
साघ्वीश्री ने कहा कि सूर्योदय से पहले उठकर मन को नियंत्रित करते हुए नित्य वीर प्रभु का स्मरण करते हुए ’’नवकार महामंत्र’’ का जाप करें । जाप करने व माला फेरने का समय, देव की प्रतिमा व चित्र, आसन आदि एक ही होने चाहिए। माला फेरते वक्त ध्यान इधर-उधर नहीं भटकना चाहिए। समयबद्ध जाप, ध्यान, आराधना व प्रभु भक्ति अधिक फलदायी होती है। घर-परिवार तथा अपने पर आश्रितों के भरण पोषण के साथ आत्म पोषण के प्रयास व पुरुषार्थ करने चाहिए।
साध्वी सौम्यगुणा श्रीजी ने महोपाध्याय विनय विजय जी.म.सा. द्वारा विरचित और आचार्य विजय रत्न सेन सूूरिश्वर जी.मसा. द्वारा आलेखित ’’ शांत सुधारस’’ का वाचन विवेचन करते हुए कहा कि मिथ्यात्व को त्याग कर जिन्दगी असलियत व सच्चाई को समझे और जीवन में बदलाव लाए। जिन्दगी में कोनसी घटना, वाक्या या हृृदय पर लगी चोट हमारा जीवन बदल दे, पता नहीं है। गोस्वामी तुलसी दासजी का जीवन उनकी पत्नी ने बदल दिया। पत्नी ने उन्हें संदेश दिया कि काम-वासना का त्याग कर परमात्मा के प्रति अनन्य भाव से प्रेम रखे । ’’जिन्दगी का क्या ठिकाना, यूंही इसे न गंवाना, घड़ी-घड़ी दो घड़ी धर्म आराधना करना’’ सुनाते हुए स्वाध्याय व सत्संग में आकर विवेक से भीतर की दृृष्टि को खोले ं। इस अवसर पर वरिष्ठ श्रावक महेन्द्र बैंद व महेन्द्र बोथरा का निर्मल पारख व भीखम चंद बैद व राजेन्द्र लूणिया ने अभिनंदन किया।
परमात्मा के चरणों की शरण लें - प्रवर्तिनी साध्वीश्री शशि प्रभा
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परमात्मा के चरणों की शरण लें-प्रवर्तिनी साध्वीश्री शशि प्रभा म.सा.
बीकानेर, 30 जुलाई। जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ के आचार्यश्री जिन मणिप्रभ सूरिश्वरजी म.सा. की आज्ञानुवर्ती प्रवर्तिनी साध्वीश्री शशि प्रभा म.सा. ने मंगलवार को बागड़ी मोहल्ले की ढढ्ढा कोटड़ी में प्रवचन में कहा कि लक्ष्य, ध्येय, मजबूत संकल्प और भावों से परमात्मा के चरणों की शरण लें।
उन्होंने कहा कि सांसारिक सुख, वैभव,रूप, सौन्दर्य, धन, सम्पति, संतान आदि की सुविधाएं पुण्योदय से मिली है। सुख-सुविधाओं को स्थाई नहीं माने, ये बदल रही है। वास्तविक आत्मसुख परमात्मा के चरणों में शरण लेने व मोक्ष का लक्ष्य रखकर सम्यक्् दृष्टि से देव, गुरु व धर्म की साधना, आराधना व भक्ति से मिलता है।
साघ्वीश्री ने कहा कि सूर्योदय से पहले उठकर मन को नियंत्रित करते हुए नित्य वीर प्रभु का स्मरण करते हुए ’’नवकार महामंत्र’’ का जाप करें । जाप करने व माला फेरने का समय, देव की प्रतिमा व चित्र, आसन आदि एक ही होने चाहिए। माला फेरते वक्त ध्यान इधर-उधर नहीं भटकना चाहिए। समयबद्ध जाप, ध्यान, आराधना व प्रभु भक्ति अधिक फलदायी होती है। घर-परिवार तथा अपने पर आश्रितों के भरण पोषण के साथ आत्म पोषण के प्रयास व पुरुषार्थ करने चाहिए।
साध्वी सौम्यगुणा श्रीजी ने महोपाध्याय विनय विजय जी.म.सा. द्वारा विरचित और आचार्य विजय रत्न सेन सूूरिश्वर जी.मसा. द्वारा आलेखित ’’ शांत सुधारस’’ का वाचन विवेचन करते हुए कहा कि मिथ्यात्व को त्याग कर जिन्दगी असलियत व सच्चाई को समझे और जीवन में बदलाव लाए। जिन्दगी में कोनसी घटना, वाक्या या हृृदय पर लगी चोट हमारा जीवन बदल दे, पता नहीं है। गोस्वामी तुलसी दासजी का जीवन उनकी पत्नी ने बदल दिया। पत्नी ने उन्हें संदेश दिया कि काम-वासना का त्याग कर परमात्मा के प्रति अनन्य भाव से प्रेम रखे । ’’जिन्दगी का क्या ठिकाना, यूंही इसे न गंवाना, घड़ी-घड़ी दो घड़ी धर्म आराधना करना’’ सुनाते हुए स्वाध्याय व सत्संग में आकर विवेक से भीतर की दृृष्टि को खोले ं। इस अवसर पर वरिष्ठ श्रावक महेन्द्र बैंद व महेन्द्र बोथरा का निर्मल पारख व भीखम चंद बैद व राजेन्द्र लूणिया ने अभिनंदन किया।




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