खबरों में बीकानेर 🎤 🌐 खबर :- ✍️
हे जल... हम काक भी न भये !
-✍️ मोहन थानवी
कहानी लिखते-लिखते कलम ने कागज पर आपबीती अंकित करना शुरू कर दिया। सच-मुच। महंगाई इतनी बढ़ी, आय का स्रोत भी न रहा और बचत के नाम पर हमारे पास एक पैसा तक नहीं। हमारा गुजारा कैसे होगा ? बाबा की सीख न मानने का परिणाम अब पेट पर कपड़ा बांधकर सोने की कोशिश करने तक आ पहुंचा। कल क्या होगा... ? प्राणी मूक हो या वाचाल हो, उसे हर हाल में पेट तो भरना ही होता है। रोटी-पानी चाहिए ही चाहिए । रोटी कमाने तो सुबह कमठाणा ही कर लिया जाएगा मगर... पानी खत्म हो गया तो कहां से लाया जाएगा... ... ??? कलम इससे आगे न चल सकी... दवात में नजर डाली तो वहां स्याही सूखी दिखी। ओह... कलम को चलाने के लिए भी दवात में सूखी स्याही को पानी से भिगोना है...! ओह... बाबा ने यही सीख तो दी थी... जल है तो जीवन है। घड़े की तल में पानी था तभी तो कौए ने युक्ति से पानी पीकर अपने प्राण बचाए। हमारी नीतिकथा में इसे बेहतर ढंग से समझाया गया है कि घड़े के पानी को ऊपर लाने के लिए कौआ उसमें कंकड़ डालता है। मगर... हमारे घड़े तो रीत गए हैं...। पानी का संकट विश्व पर मंडरा रहा है। प्रश्न कौंधा... हम कौआ बनकर उसकी युक्ति से भी पानी नहीं पी सकेंगे...?
सच, कलम तो फिर कागज पर आपबीती उतारने को नहींं चल रही... लेकिन आय, व्यय और बचत के साथ-साथ पानी-पानी-पानी जरूर लिखती जा रही है। क्यूंकि... बिन पानी सब सून...। कर्मकाण्डों, प्रथाओं तथा परिपाटियों की पूरी प्रक्रिया को देखने से प्रतीत होता है कि हमारी संस्कृति और परंपराओं के अनुसार जीवनयापन में बिना पानी के कोई संस्कार, कोई पूजा या अनुष्ठान पूरा नहीं होता । पानी से जुड़े मेले, रीति-रिवाज, त्रिवेणी स्नान तथा आनन्दोत्सव, वास्तव में, जल एवं जल संरचनाओं से समुदाय के अटूट रिश्ते के द्योतक हैं। जल को साक्षी मानकर ही तो लोक-जीवन को संस्कारित किया गया है। कोई भी संकल्प लेते समय अंजुरि में जल और अक्षत लिए जाते हैं। सभी संस्कार करने से पूर्व स्नान करना अनिवार्य है। प्रसव कराने वाली दाई या महिला द्वारा नवजात शिशु को जन्म के तत्काल बाद गुनगुने साफ पानी से नहलाया जाता है। मृतक के दाह संंस्कार से पूर्व भी उसके पार्थिव शरीर को स्नान करवाया जाता है।
सूर्य नमस्कार में सूर्य को जल का अर्घ्य दिया जाता है। इतिहास में झांकें... वाराणसी से शिक्षा प्राप्त कर लौटे विद्यार्थी, जल संरक्षण तथा जल शुद्धिकरण की विद्या में पारंगत होते थे। एक पुराण कथा के अनुसार जल का अपव्यय रोकने के लिए आरुणि ने तो अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी। गुरु उद्दालक के आदेश पर आरुणि खेतों में फसल की सिंचाई की निगरानी कर रहा था। अचानक आरुणि ने देखा कि पानी खेत की मेड़ क्षतिग्रस्त कर बहने लगा हैै। आरुणि ने पानी व्यर्थ बहने से रोकने के प्रयासों में स्वयं को उस जगह पर बाधक बनाया । पानी तो रुक गया लेकिन सर्दी की रात में आरुणि बेहोश हो गया। सुबह गुरुजी नेे ही आश्रम में लाकर उसका उपचार किया। आज जल संचय के लिए आरुणि जैसे शिष्यों की कमी खलती है ।
-✍️ Mohan Thanvi
दैनिक युगपक्ष में प्रमुखता से प्रकाशित 26 जून 2019
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हे जल... हम काक भी न भये !





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