पनघट पर... मुंह छुपाए... बेजुबान पशुओं के पास
घासखाने को
नहीं मिलती
बरसात के बाद जल गई
तेज धूप से
मैं
पशुओं को ले
दर-दर भटकता रहा
षहर और गांवों में
टीवी, रेल, हवाई जहाज, आलीशान मकान
व्ैाज्ञानिकों का सम्मान
सबकुछ देखा
न देखा तो केवल कहीं बच्चों का स्वछन्द खेलना
कहीं हराभरा खेत और पशु धन के लिए
घास
संस्कृति एक कोने में दुबकी
गांव के पनघट पर
परंपरा मुंह छुपाए खड़ी
मेरे बेजुबान पशुओं के पास
जो निरीह आंखों से ढूंढ़ रहे
घास
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