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मानव कोटर में भरे कौस्तुभ (kavy sangrah(2007) me meri APNI BAAT)



kaustubh bhara kotar... sahit publish 9 me se 8 book's... 9 waan
Navel koochu ain shikast 2011 me publish huwa tha.
अपनी बात

मानव कोटर में भरे कौस्तुभ

मानव कोटर (तन, मसितश्क) में कैसे-कैसे और कितने कौस्तुभ (रत्न) सहेजे हुए
है इसकी खोज आदि काल से जारी है। कम से कम हमारी भारतीय संस्कृति में अध्यात्म
इसी खोज के छोर की ओर ले जाता है। इतना सब कुछ जानते-बूझते भी हम चिंता
से मुक्त नहीं हो सके हैं। कन्फयूसियस का नाम लेकर अपने विदेषी ज्ञान का दम
भरने वाले देसी जानकारों के लिए यह विषय नाम कमाने का साधन हो सकता है।
जनता के लिए चिंता जताना नेताओं के लिए वोट बैंक तैयार करने का जरिया हो
सकता है। कलमकार के लिए अछूते विषय को खोजने का विषय भी हो सकता है। सचय
ही है कि आदि काल से चिंतन करने वाले विद्वान आज तक समाज को चिंता-मुक्त नहीं
कर सके। हर बार नये रूप में चिंता सामने आ ही जाती है।  

        यूं भी, चिंता हुर्इ तभी तो समुद्र मंथन से दैत्यों और देवताओं
को ऐसा कुछ मिला, जो अमृत और जहर की प्रकृति एवं संज्ञा से विभूशित हुआ।
बहुत-कुछ और पाने की चाह में सागर आज तक मथा जा रहा है। पता नहीं कब समुद्र
मंथन हुआ और जहर के साथ अमृत समाज को मिला। पौराणिक कथाओं में समुद्र
मंथन का वर्णन और उसकी विवेचना में भूत-भविष्य के कितने ही कौतूहल छिपे
है। कितने ही कौस्तुभ भरे हैंं। कौस्तुभ यानी समुद्र मंथन से निकला एक ऐसा
रत्न जिसे स्वयं विष्णु भगवान अपने सीने पर धारण किए रहते हैं। यूं कौस्तुभ
उंगलियां मिलाने की एक कला को भी कहते हैं। एक तरह के तेल को भी कौस्तुभ
कहते हैंं।

        हमारे वेद-षास्त्र आज भी भारत को विष्व का गुरु ही सिद्ध करने के लिए
काफी हैं मगर जिन्हें खास विचारधारा के कुछ लोग प्राय: काव्य कहते हैं। जरूरत
इनमें निहित उन फलों को सामने लाने की है जो ज्ञान-वृक्ष पर लदे हैं मगर दृषिट
में वृक्ष ही नहीं आ रहा। केवल तना दिखार्इ दे रहा है। उसे भी सूखा, बेकारसमझ
कर उपेक्षित किया जा रहा है। अपनी-अपनी आंख से दिखते तने की कोटर में ही झ
ांक लिया जाये तब भी हमें उसमें कौस्तुभ भरा नजर आएगा। निषिचत रूप से-सच। य
ूं भी 'जंगलात की जानकारी रखने वाले आसानी से कह सकते हैं, कोटर में नभचर
और थलचर साथ भी रहते हैं। किन्हीं मायनों में जलचर भी इस कोटर से परे
नहीं रह सकते। वे भी इसमें समाहित कौस्तुभ हैं।

        यह भौतिक जगत एक जंगल ही के समान तो है। इसमें मानव-वृक्षों की
अपनी-अपनी श्रेणियां है, वर्ग हैं, जातियां है।  कोटिष: श्रेणियों वाले
जीव-जन्तुओं के लिए यहां सुख-दुख दृषिटगत होता है। क्या यह केवल अनुभूति है!
मृग-मरीचिका है! अध्यात्म है या भौतिक ! कौस्तुभ भरा कोटर में सुख की
अनुभूति बनी रहे और अक्षरों के समूह प्रफुलिलत कर सकें, यह लक्ष्य है। मन में
विष्वास और गुरुजनों के आषीर्वाद से कुछ पंकितयों को कविता के नाम से इस
कोटर में प्रस्तुत किया है। आपके मत कौस्तुभ की तरह सहेज कर रखने के लिए तत्पर
- मोहन थानवी   12 मर्इ 2007

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