Monday, December 31, 2012

स्वागत... नववर्ष का स्वागत करने को अब दिल नहीं करता


स्वागत !!!

( Old Poem )
नववर्ष का स्वागत करने को अब दिल नहीं करता
क्योंकि
कुछ लोग ऊपर से नजर आते हैं गांधी, कुछ नेहरू
मगर कोई बोस नहीं दिखता
इन सभी का जो सच्चा अवतार आ जाता
पता नहीं क्या से क्या हो जाता
कुछ लोग रावण हैं हर बार एक और चेहरा लगा लेते हैं
परन्तु रावण का चेहरा  नया हो या पुराना
देखकर रावण ही याद आता है
क्योंकि बदल लेने पर भी चेहरा
राम वो बन नहीं पाता इसलिए
स्वागत करने को अब दिल नहीं करता
क्योंकि
वर्ष नया हो या पुराना दिल के घाव नहीं भरता
पूरब को पश्चिम से नहीं जोड़ता
एषिया को यूरोप से नहीं मोड़ता
हिंसा, जो थी महाभारत काल में
या थी जो प्रभु यीशु के समक्ष
या उस समय जब गिराए गए परमाणु बम
वहीं हिंसा कारगिल की ऊंची पहाड़ी में छिपी
अपहृत हुए कंधार पहुंचे विमान में दिखी
इस हिंसा को कोई वर्श अहिंसा में नहीं बदलता
नववर्ष का स्वागत करने को अब दिल नहीं करता

Sunday, December 30, 2012

फिर सो ना जाना

फिर सो ना जाना

कह रही है
सितारों से झाँकती वो आंखें
हर घर हर बेटी बन
देखती रहूंगी
जाग्रत रहना
फिर सो ना जाना

Friday, December 28, 2012

Gidwani's "March of the Aryans" along with his earlier book, Return of the Aryans"


Gidwani's "March of the Aryans" along  with his earlier book, Return of the Aryans" 

सम्माननीय भगवान गिदवानी जी की सद्य प्रकाशित पुस्तक के बारे में ईमेल प्राप्त हुआ। अमूमन अनजाने स्रोत से प्राप्त ईमेल पढ़ने से गुरेज करता हूं किंतु श्री गिदवानी जी का नाम और प्रेषक  के बारे में अल्प जानकारी पर मेल पढ़ा और नायाब पुस्तक के बारे में जिज्ञासा बढ़ गई। प्राप्त मेल के अंश साझा कर रहा हूं...
...   Gidwani also explains how the country, with  far-flung frontiers, and thrice the size  of present-day India, came to be known as Bharat Varsha.

 All literature on India begins with the Vedic Age. Gidwani's "March of the Aryans" along  with his earlier book, Return of the Aryans"  are  the only books which trace India's drama far back to pre-Vedic roots. Its appeal is, therefore, powerful and enduring to those in search of India's pre-ancient cultural, philosophic, spiritual and material heritage. Also, it fulfils a long-felt need to keep alive, for younger generation, the awareness of the foundation and eternal values of India's culture.


Author Gidwani is a best-selling historical novelist. His earlier book, “The Sword of Tipu Sultan was made into a major TV Serial for which he wrote the script, screen-play & dialogues.

Writing recently about March of the Aryans, Mr. Jadunath Shiroor observed:

“….Gidwani was a bureaucrat by profession. He was India’s Additional
Director General of Tourism, ex officio Joint Secretary & Director
General of Civil Aviation, Counsel for India at the World Court at
The Hague, Representative of India at ICAO (UN agency)
and finally, Director of ICAO (UN) in Montreal, Canada. Yet, he makes
an original and fundamental contribution to historical literature….”

Dr.Keane and Prof.Townsend have also endorsed the view of Mr. Shiroor to say that ‘March of the Aryans’ as also Gidwani’s earlier work, ’Return of the Aryans’, present an original contribution to historical literature though Gidwani does combine novelistic imagination along with his considerable research.

You have no doubt read other reviews as well, though the book was released only recently.

Wednesday, December 26, 2012

समकालीन चूहे और लोहे की तराजू

समकालीन चूहे और लोहे की तराजू   

भेड़िया आया, रँगा सियार जैसी कहानियाँ हमेशा राह दिखाती हैँ।डरने और डराने वालोँ को। दोनों को । सभी को । आखिर लोहे की तुला और चूहे भी तो खत्म ना होवै ...। चूहे और तराजू किसके प्रतीक हैं, कथा में यह समझना उत्तर आधुनिक काल में साहित्यिक जगत में कोलाज की मीमांसा करने जैसा है । जिसे जैसा अनुभूत हो वैसा अर्थ अभिव्यक्त करे ।  जमाना चाहे कोई हो, अमर सँस्कृत साहित्य की कथाएँ जीवन के हर क्षेत्र मेँ प्रासँगिक लगती हैँ। समसामयिक परिप्रेक्ष्य मेँ जीवँत होती दिखती हैँ। छल कपट से भरे पात्रोँ के नकाब उतारने के अलावा ऐसी कहानियाँ मलिन विचारोँ वाले धूर्त पाखँडी लोगोँ की पहचान कराने मेँ भी सहायक हैँ। बड़े बुजुर्गोँ ऋषि मुनि व विषय विशेषज्ञ विद्वानोँ ने सुखी और सफल जीवन जीने के मँत्र साहित्य के जरिये सुरक्षित सँरक्षित रखे हैँ। पँचतँत्र, हितोपदेश लोक कथाएँ , कहावतेँ मुहावरे, लोकोक्तियाँ , लोकगीत , जनश्रुतियोँ मेँ ऐसे "मँत्र" भरे पड़े हैँ।   

साजिश और सादगी

साजिश और सादगी 

साजिश  में  मशगूल /
साजिशी  को  फुर्सत  नहीं  थी /
सज्जन  साजगिरी  गुंजाता /
सादगी  से  'पार ' पहुँच  गया...
......( दूसरो को भटकाने वाला अपने ही
लक्ष्य से भटक जाता है और  कभी मंजिल तक नहीं पहुचता जबकि अपने काम से काम रखते
हुव़े लगातार लक्ष्य की ओर बढ़ने वाले को निश्चय ही मंजिल मिल जाती है...)

Monday, December 24, 2012

रोने से रोज़ी नहीं बढ़ती

रोने से रोज़ी नहीं बढ़ती  

अनथक कर्म करने के बावजूद वांछित प्रतिफल नहीं मिलने की षिकायत करने वाले बहुतेरे होंगे लेकिन कोई उनसे पूछे क्या रोना रोने से रोज़ी बढ़ती है ! दरअसल मैनेजमेंट कोर्स, अध्यात्म और व्यक्तित्व विकास जैसे प्रषिक्षणों में सकारात्मक विचारों की महत्ता बताई ही जाती है। ये सकारात्मक विचार-पाठ कोई आज के ईजाद पाठ्यक्रमों में प्रयुक्त नहीं होते बल्कि ‘‘उस्ताद-षागिर्द’’ काल से भी बहुत - बहुत पहले ‘‘गुरु-षिश्य’’ युग से सकारात्मकता को महत्व मिला हुआ है। पुराण कथाओं, ऐतिहासिक एवं लोककथाओं में भी सकारात्मक विचार अपनाने संबंधी सीख देने वाले उद्धहरण भरे पड़े हैं। आज का युग कल कारखानों में सिक्के ढालता है तो कभी श्रमिक वर्ग को खेत खलिहान में पसीना बहाकर या व्यापार के लिए दुरूह यात्राएं कर सेठ साहूकारों के लिए ‘‘गिन्नियों की थैलियां’’ भर लानी होती थी। श्रमिक वर्ग तब भी वांछित लाभ से वंचित रहता और आज भी कमोबेस ऐसा होता है। साथ ही यह भी तय है कि जगह जगह ऐसा रोना रोने वाले को लाभ भी बढ़ा हुआ नहीं मिलता। अर्थात युग और काम का रूप बदल गया लेकिन व्यवस्था ले देकर वहीं की वहीं रही ! प्रवष्त्ति भी नहीं बदली ! हां, जमाने ने अनथक परिश्रम करने वालों को षिखर पहुंचते जरूर देखा है।

Saturday, December 22, 2012


पल पल
विश्वास मुस्करा रहा
पल पल
आओ करें
आने वाले नए पल का स्वागत
पल पल
बीत रहा
पल पल
जी रहा
पल पल
मुस्काना
सिखा रहा
पल पल
पास बुला रहा
पल पल
विश्वास बढ़ा रहा
पल पल
पल पल
अंधेरा दूर भाग रहा
पल पल
उजाला बढ़ा रहा
पल पल
आओ करें
आने वाले नए पल का स्वागत

Wednesday, December 19, 2012

मचलना हवाओं से सीख
संग चलना लहरों से सीख
जीना जिंदादिलों से सीख
हर खुशी हऱ दर्द से सीख
भीड़ में अलग दिखना सीख


Tuesday, December 18, 2012

कूचु ऐं शिकस्त...1300 साल पहले...

पंजाब केसरी राजस्थान संस्करण में ... 

18 Dec 2012  

(श्री राजेंद्र सैन) 

ऐतिहासिक उपन्यास कूचु ऐं शिकस्त...1300 साल पहले का कथानक 


1300 साल पहले का कथानक ...

ऐतिहासिक उपन्यास कूचु ऐं शिकस्त...1300 साल पहले का कथानक 


Saturday, December 15, 2012

... सौदा कर नफा हो


... सौदा कर नफा हो   

अनोखे काम करने वाले को प्रसिद्धि मिलती है लेकिन ऐसे ‘‘अनोखे लाल’’ बहुत कम होते हैं। कम ही जगहों पर होते हैं। लेकिन सामाजिक जीवन में ही नहीं बल्कि हर क्षेत्र में एक बात बहुत ही विश्वास के साथ कही जाती है, भला कर भला हो । साधु संत या फकीर ही नहीं बल्कि साधारण गृहस्थ भी इस मंत्र को मानता और जपता है। सभी इसे क्रियान्वित भी करते हैं। जमाना आधुनिक है तो विचारों में भी नयापन आना ही है सो भला कर भला हो के साथ कहा जाने लगा सौदा कर नफा हो। यह कोई ताना मार कर कही जाने वाली बात नहीं बल्कि हकीकत की तरफ इशारा है। कहते हैं हर बात के एकाधिक अर्थ होते हैं। कभी किसी फकीर ने इसका मर्म समझा और कहा। क्योंकि जब भला करने पर भी भले की चाह हो तो इसे सर्वशक्तिमान से सौदा नहीं माना जाएगा क्या ! दूसरे अर्थ में व्यापारिक सौदे में भला करने से तो नफा हाथ आएगा नहीं लेकिन भलेमन यानी ईमानदारी से सौदा करने वाला नफे से वंचित भी नहीं रहता।

Thursday, December 13, 2012

रब वसदा उस घर ...

निक्की जई कुड़ी  

 रब वसदा उस घर
जिस घर विच होवे
 इक निक्की जई कुड़ी
जेड़े वेले वेखो
खेडदी कुडदी
खिलदी खिलाँदी
 रोन्दी पर
 रोण नीँ डेन्दी
वडे वडाँ वास्ते
तकलीफाँ दूर करण लई
इक इ दवा दी पुड़ी
 इक निक्की जई कुड़ी
 जेठ विच जदोँ तपदी दुपैरी
  झल झल पखा
थक जान्दी दादी
 राणी जगदी
सोन्दी बान्दी
 वेड़े विच खेडदी
नचदी टपदी
बण आन्दी ठँडी हवा
 दे जान्दी निन्दर दा झोँका
इक निक्की जई कुड़ी
 निक्के काके दी हँसी
पापे दी खुशी
माँ दी लाड़ली
भरावाँ दी अखाँ दा तारा
बुआ लई गुड्डे दी गुड्डी
 इक निक्की जई कुड़ी
ताँ ई ताँ केन्देन साडे बाबा
रब वसदा उस घर
जिस घर विच होवे
इक निक्की जई कुड़ी

सिन्धु जे करे... sindhi story - sindhu je kare....



सिन्धु जे करे... 

Sindhi story

सिंधी कहानी - मोहन थानवी
..........................................
बेबी - पचाइणि जे लाय अटो कोने। तव्हां था चवो दिकीय ते दियो बार। मटि वटि दियो बार।
शामो - पुटि, चांवर त रंध्या अथई। उननि जो पिण्डु ठाहे करे ब दिया बारे वठि।
बेबी - बाबा...खाइणि जो घीयु-तेल बि कोने। कवड़ो तेल प्यो आहे। दियनि में उवो विझां...।
शामो - हा...हा पुटि, अजु चण्डरात आहे। दियो बारनि जरूरी आहे।
गाल्हि-बोल्हि कन्दे बेबीअ दिया ठाहे-बारे वड़ता। 12वरहें जी बेबीअ खे याद आहे, साल अगि ताईं उनजी माउ, सखीबाई चण्डरात जे दिहं दियो जरूर बारदी हुई। उनजे बीमार थिहणि खां पोय बाबा बि दियो जरूर बारदो आहे। अजु बाबा चाक कोने। सखीबाई इस्पाताल में आहे। घर जो सजो कमुकारु बेबीअ जे कंधनि ते अची वियो आहे। पैसे जी सोड़, दवा-दारूअ जी घुरज। बाबा जी 1500रुप्यनि जी प्राइवेट नौकरी। इन सभिनी गाल्हिनि बेबीअ खे जल्दी वदो करे छजो आहे। उन बाबा खूं पूछो - चण्डरात ते दियो छो बारदा आह्यो।
शामो - पुटि, दरियाशाह जी मेहर कदंहि थे, कुझ खबरु कोने। उदेरेलालजी खुशी एं पंहिंजी सिन्धु जी रीति, पंहिंजा दिहं-त्योहार मनाइणि में सभिनी जो भलो आहे।
बेबी - पर बाबा, रन्धणे में भलि अटो बि न हुजे!
बेबीअ जे सुवाल शामेमल खे कुझु चवण जे लाइ लफ्ज गोलणि जो वंझ बि कोन दिनो। हू वीझे रखयलि लोटे खे खणी पाणीअ जा ब ढ़ु़ुक पंहिंजी सुकयलि निरीय में गिड़काए वियो।
बेबी बि पंहिंजे बाबा जी मजबूरी समझी वेई। उन चुपड़ी करे वेहणि सुख्यो समझियो। पर केतरी देर। आखिरु उन बाबा खे चई मन हलको कयो। बाबा - अजु राधी मासी आई हुई। चयांईं त स्कूल में सफाई करणि एं मास्तर-मास्तराननि खे चांय-पाणी पिराइणि जो कमु कन्दींअ त चार सौ रुपिया महीनो बधी दिन्दी। बाबा, मां सुभाणे खां स्कूल वं´ां!
शामेमल जी अख्यिूनि मूं गोड़ा प्या वहनि। इन नन्ढुड़ी उम्र में उनजी किकी पंहिंजे लाइ फ्राक कोन थी घुरे। साइरनि सां गदिजी रांद करणिजी जिद कोन थी करे। घर में पैसे जी सोड़ दिसी मुंहिंजी धीअ, मुंंिहंजो पुटि थी बणजे। शामे पंहिंजी अख्यिूं बे पासे फेराये बेबीअ खे चवो - पुटि, भलि वं´ें।
बेबी बाबा जे वातूूं हा बुधी खुश थी वेई। बाबा खे थालीअ में चांवर एं वटिअ में दहीअ जी कढ़ी विझी दिनई। इस्पाताल वं´णि जी तियारी कन्दे शामे खे चवई - बाबा, महीनो पूरो थीेन्देई स्कूल मूं मिलन्दड़ रुप्यिनि मूं मां छा वठि इन्दसि - खबर अथव!
शामे चयूसि - पुटि, बुधाइन्दीअं त खबरु पवन्दी।
बेबीअ चवो - सभनि खं अगु मां पितल जा ब सुहिणा दिया एं अध सेरु सचो घीअ आनदसि। सच्चे घीअ जा दिया रोज बारदसि। बाबा, दिसजो, पोइ त झूलणलाल सब दुख यकदमि दूर कन्दो। एं हा बाबा - अम्मा चाक थी इस्पाताल मूं घर इन्दी त थदो बि पचाइन्दसि। सिन्धु जी रीति आहे न! इयो मुहिंजे मन जो - लाल सांईंअ खे पल्लव बि आहे।
शामोमल अख्यिूनि मूं वहिन्दड़ पाणी हथ सां उघी अमरलाल जी फोटूअ खे प्यो निहारे। फोटूअ में पलो-मछीय ते वेठलि अमरलाल चपनि में मुश्के प्यो। शामे अख्यिूं बूटे ज्योतिनि वारे साहिब खे चवो - सिन्धु जा वली - लज रखजें। जंहिं नन्ढुड़ी नर फकत सिन्धु जो नालो इ बुधो - उवा बि तोखे ऐतरो मने थी। सिन्धु जे करे उनजे मन में बि प्रेम आहे। शलि - असां सभि वदा - नन्ढुड़ा थी वं´ूं। सिन्धु जे करे। जय झूलेलाल।

Wednesday, December 12, 2012

काटा और उलट गया


 काटा और उलट गया  

आज कतिपय लोग अपनी बात से, अपने द्वारा किए गए काम से, अपने बयान से, अपने वक्तव्य से, अपने वादों से मुकर जाते हैं। दरअसल ऐसी प्रवष्त्ति नई नई पैदा नहीं हुई है। प्राचीन काल से ऐसे लोग समाज और राज में रहे हैं। मैंने ऐसा तो नहीं कहा था, ... कहने में देर नहीं लगाते। फिर आज तो मीडिया द्वारा प्रचार प्रसार का जमाना है और ऐसे में कोई बात पलभर में दुनिया भर में चर्चा का विषय बन जाती है। तुर्रा यह कि अधिकांश विवादित मामलों में संबंधित पक्ष यह कह कर पल्ला झाड़ने का प्रयास करता है कि मेरे या हमारे कहने का गलत अर्थ लगाया गया है। हमारे कहे को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया है। बड़े बुजुर्गों की बात याद करें तो ‘‘काटा और उलट गया’’ के माइने समझ में आते हैं। बुजुर्ग कह गए हैं, काटा और उलट गया। उलट या पलट जाने के माइना भी हर बात की तरह एकाधिक हैं। उलट जाना यानी सर्प की तरह काट कर उलट जाना । किसी काम को करके मुकर जाना। अपने अनुभवों के इशारों से बुजुर्गों ने ऐसे लोगों से सचेत रहने की नसीहत दी है।

Sunday, December 9, 2012

आप से गया तो जहान से गया


आप से गया तो जहान से गया   

आज की बात नहीं बल्कि प्राचीन काल से हमारी संस्कष्ति, हमारे संस्कार और परंपराएं हमें सामाजिक जीवन में आगे बढ़ने में सहयोगी रहे हैं। हम किसी भी धर्म में आस्था रखते हों, किसी भी समुदाय से जुड़े हों हमंे अपने जमीर, अपनी अंतरआत्मा की आवाज को वरीयता देने की सीख मिली है। पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जी ने भी अंतरआत्मा की बात कही थी। दरअसल अध्यात्म में अपने विवेक को जगाने की शक्ति है और जो खुद उच्च विचारों वाला और मानसिक - बौद्धिक रूप से शक्तिशाली होता है उसे खुदा किसी भी क्षेत्र में कभी भी कमजोर नहीं होने देता। सूफी संतों ने भी कुछ ऐसा ही संदेश दिया है। मन की शक्ति बढ़ाने की बात कही है। यही कारण है कि हमारे बुजुर्ग कहते रहे हैं, आपसे गया तो जहान से गया। सच भी तो है, जो अपने काम से खुद संतुष्ट नहीं, वह आसानी से समझ जाता है, दूसरे लोग भी उसके काम से संतुष्ट नहीं हैं। जो जाने अनजाने खुद से हुए कुकष्त्यों को जान समझ कर भी पश्चाताप नहीं करता, उसे अंततः ग्लानि तो होती ही है और ऐसा व्यक्ति अपनी ही नजरों में गिर जाता है। यह तो जाहिर बात है कि जो खुद अपनी नजर में गिरा, वह दुनिया की नजरों में भी गिरा।

Friday, December 7, 2012

शब्द तेरे लिए हैं अपने मायना खुद लगा मेरे या किसी और के अर्थ किताबों से बाहर आ भी जाएं तो क्या तेरे लिए तो वो तब तक शब्द ही होंगे जब तक तेरे मायना न होंगे

शब्द तेरे लिए हैं
अपने मायना खुद लगा
मेरे
या
किसी और के अर्थ
किताबों से बाहर
आ भी जाएं तो क्या
तेरे लिए तो वो
तब तक शब्द ही होंगे
जब तक
तेरे मायना न होंगे  

Thursday, December 6, 2012

आगे चलते हैं पीछे की खबर नहीं

MUKHAUTE = mohan thanvi

आगे चलते हैं पीछे की खबर नहीं      
अकस्मात तो कुछ भी हो सकता है। जागरूक हो कर चलने वाले को कभी परेषानी का सामना नहीं करना पड़ता। वरना - आगे चलते हैं पीछे की खबर नहीं की तर्ज पर भविश्य प्रभावित हो सकता है। खासतौर से नव धनिकों को आज के ‘‘सेंसेक्स लाइन’’ पर दौड़ते युग में सोच विचार कर ही दांव लगाने चाहिए। बड़े बुजुर्गों ने अपने अनुभवों से ऐसी बातें कही हैं जो व्यक्ति को व्यवहार कुषल बनने में सहयोगी बनती हैं। मैनेजमेंट और व्यक्तित्व विकास के पाठ्यक्रमों में भी ऐसी बातें आज की आवष्यकता के अनुसार नए रंग रूप में ढाल कर षामिल की गई हैं। पैसा और रुतबा कमाने के लिए एक उम्र गुजार दी जाती है किंतु आसानी से धनिक बनने वाली नई पीढ़ी बेखबर रहकर धन राषि खर्चने के लिए कदम उठाती है तो लगता है बस चले जा रहे हैं, कहां पहुंचेंगे खबर नहीं। याद रखना जरूरी है, अकस्मात धन आने के रास्ते खुले है तो जाने के रास्ते बंद करने की जिम्मेवारी भी सामने है।

Monday, December 3, 2012

sindhi paheli = कारे बन में कारो जीवु खून पीअण वारो आ हीउ = जूं+ सिर के काले बालों में जूं


sindhi paheli = कारे बन में कारो जीवु
खून पीअण वारो आ हीउ = जूं+सिर के काले बालों में जूं

Sunday, December 2, 2012

तिनके की चटाई नौ बीघा फैलाई

तिनके की चटाई नौ बीघा फैलाई

आदमी का स्वभाव वक्त बीतने के साथ बदलता है और हम कहते हैं वक्त बदल गया। लेकिन आदमी का दिखावा करने का स्वभाव कितना ही वक्त बीत जाएए बदलने का नाम ही नहीं लेता। कोई न कोई कहीं न कहीं किसी न किसी बात पर दिखावा कर ही लेता है। किसी काम को बढ़ा चढ़ा कर भी पेष किया जाता है। तिनके की चटाईए नौ बीघा फैलाई। काम से अधिक प्रचारित करना। गंभीरता से किए जाने वाले कामों का भी ऐसा हश्र होता देख जानकार आदमी अफसोस जताता है। अक्सर सरकारी योजनाओं के प्रचार प्रसार में ऐसा होता है। कुछ निजी क्षेत्र की कपनियां भी अपने लाभ को बढ़ाने के लिए अपने कामों को बढ़ा चढ़ा कर प्रचारित करती हैं। ऐसी ही प्रवष्त्ति किसी व्यक्ति में भी दिख जाती है। बिजनेस के लिए प्रचार करना तो फिर भी समझ में आता है जैसे कि किसी सिनेमा के रिलीज होने के तीन चार महीने पहले से ही प्रतिदिन टीवी चैनल और अखबारों में रोजाना आठ दस बार प्रोमो दिखाना। इस तरह जितनी संख्या में प्रोमो दिखाया जाता है कुल उतने दिनों तक कोई फिल्म सुनहरे पर्दे पर टिकती भी है। इसकी जानकारी हो भी तो फर्क क्या पड़ेगा। हांए सीधा समाज और लोगों के हित से जुड़े सरकारी और अन्य क्षेत्रों के कामों के बारे में ऐसे प्रचार का असर पड़ता है। लोगों की जेब से ही निकाली गई राषि से भरी सरकार की तिजोरी जो खाली होती है। - mohan thanvi - 
बीकानेर एक्सप्रेस से साभार