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Showing posts from December, 2012

स्वागत... नववर्ष का स्वागत करने को अब दिल नहीं करता

स्वागत !!! ( Old Poem )
नववर्ष का स्वागत करने को अब दिल नहीं करता
क्योंकि
कुछ लोग ऊपर से नजर आते हैं गांधी, कुछ नेहरू
मगर कोई बोस नहीं दिखता
इन सभी का जो सच्चा अवतार आ जाता
पता नहीं क्या से क्या हो जाता
कुछ लोग रावण हैं हर बार एक और चेहरा लगा लेते हैं
परन्तु रावण का चेहरा  नया हो या पुराना
देखकर रावण ही याद आता है
क्योंकि बदल लेने पर भी चेहरा
राम वो बन नहीं पाता इसलिए
स्वागत करने को अब दिल नहीं करता
क्योंकि
वर्ष नया हो या पुराना दिल के घाव नहीं भरता
पूरब को पश्चिम से नहीं जोड़ता
एषिया को यूरोप से नहीं मोड़ता
हिंसा, जो थी महाभारत काल में
या थी जो प्रभु यीशु के समक्ष
या उस समय जब गिराए गए परमाणु बम
वहीं हिंसा कारगिल की ऊंची पहाड़ी में छिपी
अपहृत हुए कंधार पहुंचे विमान में दिखी
इस हिंसा को कोई वर्श अहिंसा में नहीं बदलता
नववर्ष का स्वागत करने को अब दिल नहीं करता

फिर सो ना जाना

फिर सो ना जानाकह रही है
सितारों से झाँकती वो आंखें
हर घर हर बेटी बन
देखती रहूंगी
जाग्रत रहना
फिर सो ना जाना

Gidwani's "March of the Aryans" along with his earlier book, Return of the Aryans"

Gidwani's "March of the Aryans" along  with his earlier book, Return of the Aryans"  सम्माननीय भगवान गिदवानी जी की सद्य प्रकाशित पुस्तक के बारे में ईमेल प्राप्त हुआ। अमूमन अनजाने स्रोत से प्राप्त ईमेल पढ़ने से गुरेज करता हूं किंतु श्री गिदवानी जी का नाम और प्रेषक  के बारे में अल्प जानकारी पर मेल पढ़ा और नायाब पुस्तक के बारे में जिज्ञासा बढ़ गई। प्राप्त मेल के अंश साझा कर रहा हूं...
...   Gidwani also explains how the country, with  far-flung frontiers, and thrice the size  of present-day India, came to be known as Bharat Varsha.

 All literature on India begins with the Vedic Age. Gidwani's "March of the Aryans" along  with his earlier book, Return of the Aryans"  are  the only books which trace India's drama far back to pre-Vedic roots. Its appeal is, therefore, powerful and enduring to those in search of India's pre-ancient cultural, philosophic, spiritual and material heritage. Also, it fulfils a long-felt need to keep alive, for younger…

समकालीन चूहे और लोहे की तराजू

समकालीन चूहे और लोहे की तराजू भेड़िया आया, रँगा सियार जैसी कहानियाँ हमेशा राह दिखाती हैँ।डरने और डराने वालोँ को। दोनों को । सभी को । आखिर लोहे की तुला और चूहे भी तो खत्म ना होवै ...। चूहे और तराजू किसके प्रतीक हैं, कथा में यह समझना उत्तर आधुनिक काल में साहित्यिक जगत में कोलाज की मीमांसा करने जैसा है । जिसे जैसा अनुभूत हो वैसा अर्थ अभिव्यक्त करे ।  जमाना चाहे कोई हो, अमर सँस्कृत साहित्य की कथाएँ जीवन के हर क्षेत्र मेँ प्रासँगिक लगती हैँ। समसामयिक परिप्रेक्ष्य मेँ जीवँत होती दिखती हैँ। छल कपट से भरे पात्रोँ के नकाब उतारने के अलावा ऐसी कहानियाँ मलिन विचारोँ वाले धूर्त पाखँडी लोगोँ की पहचान कराने मेँ भी सहायक हैँ। बड़े बुजुर्गोँ ऋषि मुनि व विषय विशेषज्ञ विद्वानोँ ने सुखी और सफल जीवन जीने के मँत्र साहित्य के जरिये सुरक्षित सँरक्षित रखे हैँ। पँचतँत्र, हितोपदेश लोक कथाएँ , कहावतेँ मुहावरे, लोकोक्तियाँ , लोकगीत , जनश्रुतियोँ मेँ ऐसे "मँत्र" भरे पड़े हैँ।

साजिश और सादगी

साजिश और सादगी  साजिश  में  मशगूल /
साजिशी  को  फुर्सत  नहीं  थी /
सज्जन  साजगिरी  गुंजाता /
सादगी  से  'पार ' पहुँच  गया...
......( दूसरो को भटकाने वाला अपने ही
लक्ष्य से भटक जाता है और  कभी मंजिल तक नहीं पहुचता जबकि अपने काम से काम रखते
हुव़े लगातार लक्ष्य की ओर बढ़ने वाले को निश्चय ही मंजिल मिल जाती है...)

रोने से रोज़ी नहीं बढ़ती

रोने से रोज़ी नहीं बढ़ती अनथक कर्म करने के बावजूद वांछित प्रतिफल नहीं मिलने की षिकायत करने वाले बहुतेरे होंगे लेकिन कोई उनसे पूछे क्या रोना रोने से रोज़ी बढ़ती है ! दरअसल मैनेजमेंट कोर्स, अध्यात्म और व्यक्तित्व विकास जैसे प्रषिक्षणों में सकारात्मक विचारों की महत्ता बताई ही जाती है। ये सकारात्मक विचार-पाठ कोई आज के ईजाद पाठ्यक्रमों में प्रयुक्त नहीं होते बल्कि ‘‘उस्ताद-षागिर्द’’ काल से भी बहुत - बहुत पहले ‘‘गुरु-षिश्य’’ युग से सकारात्मकता को महत्व मिला हुआ है। पुराण कथाओं, ऐतिहासिक एवं लोककथाओं में भी सकारात्मक विचार अपनाने संबंधी सीख देने वाले उद्धहरण भरे पड़े हैं। आज का युग कल कारखानों में सिक्के ढालता है तो कभी श्रमिक वर्ग को खेत खलिहान में पसीना बहाकर या व्यापार के लिए दुरूह यात्राएं कर सेठ साहूकारों के लिए ‘‘गिन्नियों की थैलियां’’ भर लानी होती थी। श्रमिक वर्ग तब भी वांछित लाभ से वंचित रहता और आज भी कमोबेस ऐसा होता है। साथ ही यह भी तय है कि जगह जगह ऐसा रोना रोने वाले को लाभ भी बढ़ा हुआ नहीं मिलता। अर्थात युग और काम का रूप बदल गया लेकिन व्यवस्था ले देकर वहीं की वहीं रही ! प्रवष्त्ति भी नह…
पल पल
विश्वास मुस्करा रहा
पल पल
आओ करें
आने वाले नए पल का स्वागत
पल पल
बीत रहा
पल पल
जी रहा
पल पल
मुस्काना
सिखा रहा
पल पल
पास बुला रहा
पल पल
विश्वास बढ़ा रहा
पल पल
पल पल
अंधेरा दूर भाग रहा
पल पल
उजाला बढ़ा रहा
पल पल
आओ करें
आने वाले नए पल का स्वागत

मचलना हवाओं से सीख
संग चलना लहरों से सीख
जीना जिंदादिलों से सीख
हर खुशी हऱ दर्द से सीख
भीड़ में अलग दिखना सीख


कूचु ऐं शिकस्त...1300 साल पहले...

पंजाब केसरी राजस्थान संस्करण में ...  18 Dec 2012   (श्री राजेंद्र सैन)  ऐतिहासिक उपन्यास कूचु ऐं शिकस्त...1300 साल पहले का कथानक 

1300 साल पहले का कथानक ...

ऐतिहासिक उपन्यास कूचु ऐं शिकस्त...1300 साल पहले का कथानक 

... सौदा कर नफा हो

... सौदा कर नफा हो    अनोखे काम करने वाले को प्रसिद्धि मिलती है लेकिन ऐसे ‘‘अनोखे लाल’’ बहुत कम होते हैं। कम ही जगहों पर होते हैं। लेकिन सामाजिक जीवन में ही नहीं बल्कि हर क्षेत्र में एक बात बहुत ही विश्वास के साथ कही जाती है, भला कर भला हो । साधु संत या फकीर ही नहीं बल्कि साधारण गृहस्थ भी इस मंत्र को मानता और जपता है। सभी इसे क्रियान्वित भी करते हैं। जमाना आधुनिक है तो विचारों में भी नयापन आना ही है सो भला कर भला हो के साथ कहा जाने लगा सौदा कर नफा हो। यह कोई ताना मार कर कही जाने वाली बात नहीं बल्कि हकीकत की तरफ इशारा है। कहते हैं हर बात के एकाधिक अर्थ होते हैं। कभी किसी फकीर ने इसका मर्म समझा और कहा। क्योंकि जब भला करने पर भी भले की चाह हो तो इसे सर्वशक्तिमान से सौदा नहीं माना जाएगा क्या ! दूसरे अर्थ में व्यापारिक सौदे में भला करने से तो नफा हाथ आएगा नहीं लेकिन भलेमन यानी ईमानदारी से सौदा करने वाला नफे से वंचित भी नहीं रहता।

रब वसदा उस घर ...

निक्की जई कुड़ी    रब वसदा उस घर
जिस घर विच होवे
 इक निक्की जई कुड़ी
जेड़े वेले वेखो
खेडदी कुडदी
खिलदी खिलाँदी
 रोन्दी पर
 रोण नीँ डेन्दी
वडे वडाँ वास्ते
तकलीफाँ दूर करण लई
इक इ दवा दी पुड़ी
 इक निक्की जई कुड़ी
 जेठ विच जदोँ तपदी दुपैरी
  झल झल पखा
थक जान्दी दादी
 राणी जगदी
सोन्दी बान्दी
 वेड़े विच खेडदी
नचदी टपदी
बण आन्दी ठँडी हवा
 दे जान्दी निन्दर दा झोँका
इक निक्की जई कुड़ी
 निक्के काके दी हँसी
पापे दी खुशी
माँ दी लाड़ली
भरावाँ दी अखाँ दा तारा
बुआ लई गुड्डे दी गुड्डी
 इक निक्की जई कुड़ी
ताँ ई ताँ केन्देन साडे बाबा
रब वसदा उस घर
जिस घर विच होवे
इक निक्की जई कुड़ी

सिन्धु जे करे... sindhi story - sindhu je kare....

सिन्धु जे करे...  Sindhi story सिंधी कहानी - मोहन थानवी
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बेबी - पचाइणि जे लाय अटो कोने। तव्हां था चवो दिकीय ते दियो बार। मटि वटि दियो बार।
शामो - पुटि, चांवर त रंध्या अथई। उननि जो पिण्डु ठाहे करे ब दिया बारे वठि।
बेबी - बाबा...खाइणि जो घीयु-तेल बि कोने। कवड़ो तेल प्यो आहे। दियनि में उवो विझां...।
शामो - हा...हा पुटि, अजु चण्डरात आहे। दियो बारनि जरूरी आहे।
गाल्हि-बोल्हि कन्दे बेबीअ दिया ठाहे-बारे वड़ता। 12वरहें जी बेबीअ खे याद आहे, साल अगि ताईं उनजी माउ, सखीबाई चण्डरात जे दिहं दियो जरूर बारदी हुई। उनजे बीमार थिहणि खां पोय बाबा बि दियो जरूर बारदो आहे। अजु बाबा चाक कोने। सखीबाई इस्पाताल में आहे। घर जो सजो कमुकारु बेबीअ जे कंधनि ते अची वियो आहे। पैसे जी सोड़, दवा-दारूअ जी घुरज। बाबा जी 1500रुप्यनि जी प्राइवेट नौकरी। इन सभिनी गाल्हिनि बेबीअ खे जल्दी वदो करे छजो आहे। उन बाबा खूं पूछो - चण्डरात ते दियो छो बारदा आह्यो।
शामो - पुटि, दरियाशाह जी मेहर कदंहि थे, कुझ खबरु कोने। उदेरेलालजी खुशी एं पंहिंजी सिन्धु जी रीति, पंहिंजा दिहं-त्योहार मनाइणि में सभि…

काटा और उलट गया

काटा और उलट गया   आज कतिपय लोग अपनी बात से, अपने द्वारा किए गए काम से, अपने बयान से, अपने वक्तव्य से, अपने वादों से मुकर जाते हैं। दरअसल ऐसी प्रवष्त्ति नई नई पैदा नहीं हुई है। प्राचीन काल से ऐसे लोग समाज और राज में रहे हैं। मैंने ऐसा तो नहीं कहा था, ... कहने में देर नहीं लगाते। फिर आज तो मीडिया द्वारा प्रचार प्रसार का जमाना है और ऐसे में कोई बात पलभर में दुनिया भर में चर्चा का विषय बन जाती है। तुर्रा यह कि अधिकांश विवादित मामलों में संबंधित पक्ष यह कह कर पल्ला झाड़ने का प्रयास करता है कि मेरे या हमारे कहने का गलत अर्थ लगाया गया है। हमारे कहे को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया है। बड़े बुजुर्गों की बात याद करें तो ‘‘काटा और उलट गया’’ के माइने समझ में आते हैं। बुजुर्ग कह गए हैं, काटा और उलट गया। उलट या पलट जाने के माइना भी हर बात की तरह एकाधिक हैं। उलट जाना यानी सर्प की तरह काट कर उलट जाना । किसी काम को करके मुकर जाना। अपने अनुभवों के इशारों से बुजुर्गों ने ऐसे लोगों से सचेत रहने की नसीहत दी है।

आप से गया तो जहान से गया

आप से गया तो जहान से गया    आज की बात नहीं बल्कि प्राचीन काल से हमारी संस्कष्ति, हमारे संस्कार और परंपराएं हमें सामाजिक जीवन में आगे बढ़ने में सहयोगी रहे हैं। हम किसी भी धर्म में आस्था रखते हों, किसी भी समुदाय से जुड़े हों हमंे अपने जमीर, अपनी अंतरआत्मा की आवाज को वरीयता देने की सीख मिली है। पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जी ने भी अंतरआत्मा की बात कही थी। दरअसल अध्यात्म में अपने विवेक को जगाने की शक्ति है और जो खुद उच्च विचारों वाला और मानसिक - बौद्धिक रूप से शक्तिशाली होता है उसे खुदा किसी भी क्षेत्र में कभी भी कमजोर नहीं होने देता। सूफी संतों ने भी कुछ ऐसा ही संदेश दिया है। मन की शक्ति बढ़ाने की बात कही है। यही कारण है कि हमारे बुजुर्ग कहते रहे हैं, आपसे गया तो जहान से गया। सच भी तो है, जो अपने काम से खुद संतुष्ट नहीं, वह आसानी से समझ जाता है, दूसरे लोग भी उसके काम से संतुष्ट नहीं हैं। जो जाने अनजाने खुद से हुए कुकष्त्यों को जान समझ कर भी पश्चाताप नहीं करता, उसे अंततः ग्लानि तो होती ही है और ऐसा व्यक्ति अपनी ही नजरों में गिर जाता है। यह तो जाहिर बात है कि जो खुद अपनी नजर म…

शब्द तेरे लिए हैं अपने मायना खुद लगा मेरे या किसी और के अर्थ किताबों से बाहर आ भी जाएं तो क्या तेरे लिए तो वो तब तक शब्द ही होंगे जब तक तेरे मायना न होंगे

शब्द तेरे लिए हैं
अपने मायना खुद लगा
मेरे
या
किसी और के अर्थ
किताबों से बाहर
आ भी जाएं तो क्या
तेरे लिए तो वो
तब तक शब्द ही होंगे
जब तक
तेरे मायना न होंगे

आगे चलते हैं पीछे की खबर नहीं

आगे चलते हैं पीछे की खबर नहीं      
अकस्मात तो कुछ भी हो सकता है। जागरूक हो कर चलने वाले को कभी परेषानी का सामना नहीं करना पड़ता। वरना - आगे चलते हैं पीछे की खबर नहीं की तर्ज पर भविश्य प्रभावित हो सकता है। खासतौर से नव धनिकों को आज के ‘‘सेंसेक्स लाइन’’ पर दौड़ते युग में सोच विचार कर ही दांव लगाने चाहिए। बड़े बुजुर्गों ने अपने अनुभवों से ऐसी बातें कही हैं जो व्यक्ति को व्यवहार कुषल बनने में सहयोगी बनती हैं। मैनेजमेंट और व्यक्तित्व विकास के पाठ्यक्रमों में भी ऐसी बातें आज की आवष्यकता के अनुसार नए रंग रूप में ढाल कर षामिल की गई हैं। पैसा और रुतबा कमाने के लिए एक उम्र गुजार दी जाती है किंतु आसानी से धनिक बनने वाली नई पीढ़ी बेखबर रहकर धन राषि खर्चने के लिए कदम उठाती है तो लगता है बस चले जा रहे हैं, कहां पहुंचेंगे खबर नहीं। याद रखना जरूरी है, अकस्मात धन आने के रास्ते खुले है तो जाने के रास्ते बंद करने की जिम्मेवारी भी सामने है।

sindhi paheli = कारे बन में कारो जीवु खून पीअण वारो आ हीउ = जूं+ सिर के काले बालों में जूं

sindhi paheli = कारे बन में कारो जीवु
खून पीअण वारो आ हीउ = जूं+सिर के काले बालों में जूं

तिनके की चटाई नौ बीघा फैलाई

तिनके की चटाई नौ बीघा फैलाई आदमी का स्वभाव वक्त बीतने के साथ बदलता है और हम कहते हैं वक्त बदल गया। लेकिन आदमी का दिखावा करने का स्वभाव कितना ही वक्त बीत जाएए बदलने का नाम ही नहीं लेता। कोई न कोई कहीं न कहीं किसी न किसी बात पर दिखावा कर ही लेता है। किसी काम को बढ़ा चढ़ा कर भी पेष किया जाता है। तिनके की चटाईए नौ बीघा फैलाई। काम से अधिक प्रचारित करना। गंभीरता से किए जाने वाले कामों का भी ऐसा हश्र होता देख जानकार आदमी अफसोस जताता है। अक्सर सरकारी योजनाओं के प्रचार प्रसार में ऐसा होता है। कुछ निजी क्षेत्र की कपनियां भी अपने लाभ को बढ़ाने के लिए अपने कामों को बढ़ा चढ़ा कर प्रचारित करती हैं। ऐसी ही प्रवष्त्ति किसी व्यक्ति में भी दिख जाती है। बिजनेस के लिए प्रचार करना तो फिर भी समझ में आता है जैसे कि किसी सिनेमा के रिलीज होने के तीन चार महीने पहले से ही प्रतिदिन टीवी चैनल और अखबारों में रोजाना आठ दस बार प्रोमो दिखाना। इस तरह जितनी संख्या में प्रोमो दिखाया जाता है कुल उतने दिनों तक कोई फिल्म सुनहरे पर्दे पर टिकती भी है। इसकी जानकारी हो भी तो फर्क क्या पड़ेगा। हांए सीधा समाज और लोगों के हित से जुड़े…