Tuesday, July 31, 2012

रवींद्र रंगमंच के लिए एक आंदोलन ऐसा भी...

वींद्र रंमं के लिए एक आंदोलन ऐसा भी...

रंगकर्मियांे की भावनाएं और करोड़ों का मंच उपेक्षित

कला-साधकों की पीड़ा

भरोसे में हरेभरे बाग उजड़ जाते हैं
सोने वालों के स्टेशन पीछे छूट जाते हैं
जागने वालों को दिखती है नटवर की अदाएं
सरकार संवेदनशील हो तो अधिकारी रंगमंच बनाएं
कला धर्मियों के ऐसे आंदोलनों और भावनाओं की अनदेखी संवेदनहीन सरकार और प्रशासन करता रहा है और यह द्योतक है इस बात का कि सुशासन नहीं है, क्योंकि सुशासन में सर्वप्रथम राज सांस्कृतिक धरोहरों का संरक्षण कर उन्हें नए आयाम देने में संस्कृतिकर्मियों को प्रोत्साहित करता है।
बीकानेर के अधूरे निर्मित उपेक्षित मंदिर वींद्र रंमं के लिए कला-साधकों ने मंदिर में पूजा-अर्चना को एक आंदोलन का रूप दे दिया किंतु सरकार और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ साथ जनप्रतिनिधि तक इस ओर आंखें मूंदे बैठे हैं।  रंगमंच का निर्माण-कार्य पहले तो अधरझूल में छोड़ा गया, फिर आंदोलन के चलते इसमें प्रगति का मार्ग प्रशस्त कर आशा के दीप प्रज्वलित किए गए किंतु अब फिर से ऐसे हालात सामने आ खड़े हुए कि दूर तक भी रंगमंच की टिमटिमाती रोशनी नजर नहीं आ रही।
सरकार और जन प्रतिनिधियों को यह मालूम होना ही चाहिये कि बीकानेर में करोड़ों का एक मंदिर "वींद्र रंमं" उपेक्षित पड़ा है। यदि मालूम है तो इस ओर कोई प्रयास नहीं होने तथा मालूम नहीं होने की स्थिति में समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा की उपेक्षा किए जाने से रंगमंचीय गतिविधियों से राज्य ही नहीं, देषभर में अपनी विषिष्ट पहचान बनाने में कामयाब बीकानेर के रंगकर्मी आहत हैं।
रंगमंच की सर्वाधिक गतिविधियों वाली कला-नगरी में नुक्कड़ नाटक भी चर्चित रहे हैं तो एमएस, रामपुरिया, जैन, डूंगर और कृषि महाविद्यालयों सहित जूनागढ़, रेलवे स्टेडियम, रेलवे प्रेक्षागृह में भी रंग-प्रस्तुतियां दी और सराही जाती रही हैं।   
वींद्र रंमं का निर्माण डेढ़ दशक में भी अधिक समय से अधरझूल में है जो रंगकर्मियों को संताप दे रहा है। ये तो रंगकर्मियों का मनोबल और विश्वास है कि इस अधूरे निर्मित मंदिर में वे लालटेन की रोषनी में  चित्र-प्रदर्षनी लगाकर विरोध प्रकट करते हैं ताकि सरकार तक उनकी आशा की किरण की जानकारी पहुंच सके। सभी को याद है, चार छह साल पहले युवा चित्रकारों ने अधूरे वींद्र रंमं पर लालटेन जला कर चित्र प्रदर्षित किए थे। अपनी आकांक्षाओं को अंधेरे से उजाले की ओर ले जाते हुए इस ओर से आंखें फिराए बैठी सरकार और स्थानीय प्रशासन को जगाया-चेताया था। दो दशक होने को आए किंतु रंगकर्मियों की आंखांे में आज भी आषा की ज्योति झिलमिला रही है।
आश्चर्य है कि बीकानेर में वींद्र रंमं के निर्माण कार्य पर अब तक करोड़ों खर्च हो चुके हैं मगर रंगकर्मियांे का सपना पूरा नहीं हो रहा। आवास विकास संस्थान और सांसद कोटे से राशि सहित सरकारी स्तर पर भी बजट की सुविधा के बावजूद एक निर्माण कार्य के ये हाल हैं। किसी समय सार्वजनिक निर्माण विभाग ने इसके लिए 1.47 करोड़ के खर्च का अनुमान बताया था और आज इससे कहीं अधिक राशि व्यय होने के बावजूद काम पूरा नहीं हो रहा।
साहित्यकारों ने भी वींद्र रंमं के अधूरे निर्माण पर क्षोभ प्रकट किया। जनकवि हरीश भादानी के सान्निध्य में भवानी शंकर व्यास ‘‘विनोद’’, लक्ष्मीनारायण रंगा सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार सड़कों पर उतरे। इस प्रकार प्रशासन का ध्यानकर्षण करने में राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, जोधपुर के सदस्य रहे वरिष्ठ रंगकर्मी मधु आचार्य ‘‘आशावादी’’ सहित रंगमंच अभियान समिति के ओम सोनी, अनुराग कला केन्द्र के कमल अनुरागी, सुधेश व्यास, संकल्प नाट्य समिति, रंगन, अर्पण आर्ट सोसायटी, नट, साहित्य संस्कृति संस्थान, नेषनल थिएटर, सरोकार आदि कला-संस्थाओं के पदाधिकारियों आनंद वि आचार्य, विपिन पुरोहित, दलीप भाटी, प्रदीप भटनागर सहित नगर के हर  सृजनधर्मी ने रंगमंच के अधूरे निर्माण को पूरा कराने के लिए प्रयास किए हैं। इनमें अनेकानेक वे रंग-कला प्रस्तुतियां भी शामिल हैं जो वींद्र रंमं निर्माण स्थल पर बिना सुविधाओं के भी रंगप्रेमी दर्षकों के सम्मुख दी और सराही गई।
कला धर्मियों के ऐसे आंदोलनों और भावनाओं की अनदेखी संवेदनहीन सरकार और प्रशासन करता रहा है और यह द्योतक है इस बात का कि सुशासन नहीं है, क्योंकि सुशासन में सर्वप्रथम राज सांस्कृतिक धरोहरों का संरक्षण कर उन्हें नए आयाम देने में संस्कृतिकर्मियों को प्रोत्साहित करता है। - मोहन थानवी

Monday, July 30, 2012

आकाश मेरा है "नारी की ये कहानी नहीँ हकीकत है"

आकाश मेरा है

सिंधी से अनूदित कहानी .../


अचानक कुछ हो जाए तो...! इस विचार ने नरेश को झकझोर दिया। उसे मघी की चिंता हुई। मघी, उसकी अर्द्धांगिनी। उसके सुख दुख की सहयोगी। जब भाई बहिन और मां बाप तक ने बीमारी में उसकी सुध नहीं ली तब भी मघी ने हिम्मत नहीं हारी। वह उसे मातृत्व का सुख नहीं दे सका किंतु मघी ने कभी गिला शिकवा नहीं किया। ऐसे विचार नरेश को उद्वेलित कर रहे थे। वह अपने गांव से बहुत दूर दिल्ली के एक नामी अस्पताल के वार्ड में एक अशुभ माने जाने वाले पलंग पर जीवन के लिए मौत से लड़ रहा था। पिछले कुछ दिनों से अस्पताल में डॉक्टरों से घिरा रहने के कारण वह घबरा गया। दिल्ली के इस अस्पताल में करीब 45 डॉक्टर है। नरेश को पेट का कोई रोग है। दवा के नाम पर उसे केवल इंजेक्शन लगाए जाते है। पिछले दस दिनों से रोजाना दो इंजेक्शन लगवाते हुए वह अधमरा हो गया है।
राजस्थान के फलौदी के नजदीकी गांव का नरेश जोधपुर के एक सरकारी स्कूल में शिक्षक है। सरकारी नौकरी होने के कारण दवा-दारू के बिल पारित हो जाते हैं इसलिए आर्थिक कारणों से इलाज में बाधा नहीं है। उसके पेट में दर्द रहता है। पिछले तीन साल से वह जोधपुर में इलाज कराता रहा लेकिन एक पखवाड़ा पहले डॉक्टर ने नरेश के पेट में गांठ होने की जानकारी दी। कहा कि ऑपरेषन करना पड़ेगा। उन्होंने उसकी पत्नी को दिल्ली जाकर नरेश का ऑपरेशन कराने की सलाह दी। बड़े डॉक्टरों ने उसे दिल्ली के डॉक्टर रूघनाथ से चैकअप और इलाज कराने की मशविरा दी।
दस दिन पूर्व नरेश अपनी पत्नी मघी के साथ दिल्ली पहुंचा। टैक्सी में अस्पताल ढूंढ़ते हुए उसके तीन सौ सत्तर रुपए और दो घंटे खर्च हो गए। अस्पताल में 45 डॉक्टरों के बीच डॉक्टर रूघनाथ को उन्होंने पांच मिनट में ही खोज लिया। डॉक्टर ने आधे घंटे में ही उसकी केस-हिस्ट्री देखकर उसे एम वार्ड में आठ नंबर पलंग पर  भर्ती कर लिया। पलंग के सिरहाने ही खिड़की थी। खिड़की में से अस्पताल के पिछवाड़े का उद्यान और गहरा नीला आकाश नजर आ रहा था।
नरेश की पत्नी मैट्रिक पास है। दुनियादारी में होशियार है। अस्पताल में पहले दिन उसने शाम होते-होते वार्ड, डॉक्टर और परिचायकों के बारे में पर्याप्त जानकारियां जुटा लीं। अस्पताल में 45 डॉक्टर हैं यह जानकारी भी उसे एक नर्स ने दी। एम वार्ड में 15 पलंग हैं। इनमें केवल आठ नंबर पलंग के सिरहाने ही खिड़की है। जहां से सारा आकाश नजर आता है। सात और नौ नंबर पलंग आठ नंबर पलंग से कम से कम दस फीट की दूरी पर हैं। इसका कारण मघी को मालूम है। एम वार्ड के इस पलंग पर केवल सीरियस मरीज को ही भर्ती किया जाता है। पिछले छह दिन से यह पलंग खाली था। मघी को जब अपने पति नरेश के बारे में यह दुःखद जानकारी मिली तो वह नर्स कौशल्या के कंधे पर सिर रखकर जार-जार रोई। कौशल्या ने उसे दिलासा दी।
नरेश की तबीयत पिछले तीन साल से खराब रहती है। नरेश और मघी की शादी चार साल पहले हुई थी। दोनों 25 साल के अंदर की उम्र के हैं। बच्चा अभी तक नहीं हुआ। जांच पड़ताल करवाई तो डॉक्टरों द्वारा मघी में नहीं बल्कि कुछ कुछ कमी होने का शुबहा नरेश में जताया गया। बावजूद इसके पति-पत्नी में मुहब्बत इस कदर बढ़ गई कि मघी ने अपने मायके वालों की नरेश में कमी होने की बात को लेकर दूसरी शादी और नरेश को तलाक देने की सलाह नहीं मानी। फलौदी के पास एक गांव में नरेश के दो भाई और माता-पिता रहते हैं। उन्होंने नरेश की तबीयत की जरा भी परवाह नहीं की। नरेश बीमार होने से पहले उन्हें घर खर्च के लिए प्रतिमाह रुपए भेजता था लेकिन अब नहीं भेज पाता। दिल्ली के इस अस्पताल में आने से पहले उन्होंने गांव में खबर की लेकिन किसी ने चिंता नहीं की, दिलचस्पी नहीं ली।
इस वक्त मघी नरेश के पलंग के सिरहाने स्टूल पर बैठी एक पत्रिका ‘सुरभि’ पढ़ रही थी। ‘सुरभि’ के दीपोत्सव विशेषांक में छपी नई पीढ़ी के सिन्धी साहित्यकारों की कविताएं मघी को काफी पसंद आईं। नरेश नींद में था। शाम गहरा गई थी। मघी ने उठकर टेबल पर रखी भगवान झूलेलाल की तस्वीर के आगे हाथ जोड़कर नरेश को जल्दी ठीक करने की प्रार्थना की। ज्योति और अगरबत्ती जलाकर वह अभी वापस स्टूल पर बैठी ही थी कि वहां एक नर्स आ पहुंची। नर्स स्कूली लड़की लग रही थी। आते ही उसने गुस्सा दिखाया कि मरीज के पास अगरबत्ती क्यों जलाई है। मघी नर्स को चुप कराए उससे पहले शोर के कारण नरेश जाग गया। इस बात के आधे घंटे के अंदर मघी और उस छोटी-सी प्यारी गुड़िया सी लगने वाली नर्स में दोस्ती हो गई। नर्स का नाम परमेश्वरी है। लड़की-सी दिखने वाली परमेष्वरी की उम्र है 27 साल। उसने मघी को बताया कि उसके दो बच्चे हैं। मघी को उसने अपनी सहेली बना लिया।
अस्पताल का बिल बनने से पहले ही मघी को रुपए जमा कराने पड़ रहे थे। मघी अपना और नरेश का एटीएम कार्ड साथ लाई थी। बैंक में अभी 35 हजार रुपए जमा थे। दस दिनों में अस्पताल में छह हजार रुपए खर्च हुए थे। नर्स ने मघी को बताया था कि अभी दो-तीन दिन नरेश की जांच होगी, फिर ऑपरेशन होगा। ऑपरेशन में करीब दस हजार रुपए खर्च होंगे। इस हिसाब को देखकर मघी को इलाज में खर्च के मामले में किसी तरह की फिक्र नहीं थी। दिन बीतते जा रहे थे।
आज नरेश का ऑपरेषन होगा। वह प्रसन्नचित्त नजर आ रहा था। नरेश के पेट की जांच पड़ताल पांच डॉक्टरों ने की। एक्सरे हुआ। दवाइयां मंगवाई। मघी को समझाया, दिलासा दी और एक फॉर्म पर हस्ताक्षर करवाए। नर्स ने मघी को बताया कि फॉर्म पर हस्ताक्षर करवाना एक औपचारिकता है। ऑपरेशन के दौरान मरीज को कुछ हो जाए तो अस्पताल की जिम्मेवारी नहीं है। मघी साक्षर और होशियार है, उसे ऐसी फॉर्मेल्टी’ज की जानकारी है। मघी के पूछने पर नरेश ने कहा, ऑपरेशन के बाद मुझे इसी पलंग पर लाना। इस पलंग पर बैठ खिड़की से बगीचा और आसमान देखना अच्छा लगता है। नरेश की बात सुनकर मघी का अन्तर्मन रो उठा। नरेश के सामने उसने अपनी आंखों के आंसू मुस्कान में छिपा लिए। उसने विश्वास भरे स्वर में नरेश को कहा कि ऑपरेशन के बाद उसे निश्चित रूप से इसी पलंग पर लेकर आएगी। ठीक होने के बाद साथ ही जोधपुर चलेंगे।
डॉक्टर रुघनाथ और चार-पांच दूसरे डॉक्टर रमेश के साथ ऑपेरशन थिएटर में थे। मघी थिएटर के बाहर बेंच पर बैठी थी। आहिस्ता-आहिस्ता वक्त बीतता जा रहा था। शाम के चार बज गए लेकिन ऑपरेशन थिएटर से न तो डॉक्टर बाहर आए, न ही वार्ड बॉय या नर्स ने आकर कोई दवा मंगवाई। मघी ने सुबह से कुछ खाना तो दूर की बात चाय-दूध तक नहीं पिया था। उसके हाथों में भगवान झूलेलाल की तस्वीर थी। सुखमणि साहिब का पाठ वह तीन-चार बार कर चुकी थी। दीवार पर टंगी घड़ी से पांच बार टन-टन की आवाज आने के साथ ही मघी के मन में आशंकाएं सीमा तोड़ने लगीं। सुबह लगभग साढ़े दस बजे नरेश को ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया था और अब शाम के पांच बज चुके थे। छह-सात घंटे हो गए, ऑपरेशन अभी तक किया जा रहा है। इतनी देर तक मघी अपने आंसू छिपाए हुए थी लेकिन अब हिम्मत हार कर सुबक उठी। इस समय बेंच पर तो क्या ऑपरेशन थिएटर के बाहर भी कोई नहीं था। झूलेलाल की तस्वीर को देखती मघी की रुलाई फूट गई। वह जार-जार रोने लगी। उसे याद आया कि नरेश को आठ नंबर पलंग पसंद है क्योंकि उसके सिरहाने खिड़की से अस्पताल के पिछवाड़े का बाग दिखाई देता है। बाग में मोर, बंदर और दूसरे पशु पक्षी आजाद हवा में लंबी सांसे भर उछलते कूदते दिखाई देते हैं। आसमान में उड़ते पंछी और एक दूसरे को पकड़ने की होड़ करते बादल दिखाई देते हैं। ऐसे नजारे देख नरेश अपनी बीमारी से जूझने की ताकत पाता है और उसकी जीने की ललक बढ़ जाती है। मघी ने झूलेलाल की तस्वीर के आगे हाथ जोड़े, विनती की - वरुण देव, मेरी सुनोगे या केवल मुस्कुराते रहोगे! मुझे आठ नंबर पलंग वाली खिड़की चाहिए। मुझे चाहिए इसलिए मैं मांग रही हूं। नरेश को तन्दुरुस्त करके जोधपुर भेज वडेरे लाल। मेरे भरतार के लिए मुझे यह पलंग दे दो। पलंग के पास जो खिड़की है वह मेरे नरेश का जीवन और मेरी जीने की लालसा है। लालसांई वह खिड़की मेरी है, मेरी ही है। भगवान झूलेलाल तस्वीर में अब और अधिक मुस्कुरा रहे थे।
साढ़े पांच बजे ऑपरेशन थिएटर का दरवाजा खुला। पहले कौशल्या नर्स बाहर निकली। उसके पीछे डॉक्टर रुघनाथ बाहर आए। दूसरे डॉक्टर, नर्स और वार्ड बॉय भी बाहर आ गए। डॉक्टर रुघनाथ थके हुए और परेशान लगे। मघी के करीब आकर उन्होंने उसके कंधे पर हाथ रखा। मघी सुबक उठी। डॉक्टर रुघनाथ ने कौशल्या को इशारा किया और खुद लंबे डग भरते हुए वहां से चले गए। उनके पीछे अन्य डॉक्टर भी उसी रफ्तार से निकले। कौशल्या ने मघी को गिलास में पानी दिया। कहा - मघी तू अकेली नहीं है। हम सभी तुम्हारे साथ हैं। नरेश का ऑपरेशन कामयाब हुआ है। तुम उससे चार घंटे बाद मिल सकती हो। उसे आज ही रात या कल सुबह तक वार्ड में शिफ्ट कर देंगे। कौशल्या के यह शब्द सुनकर मानो मघी को नई जिन्दगी मिल गई। वह खुशी से और अधिक जोर से रोने लगी। कौशल्या मघी को अपने क्वार्टर में ले गई। अपने हाथ से बनाकर उसे चावल-दाल और दो रोटियां खिलाई।
नरेश का ऑपरेषन हुए आज एक सप्ताह बीत गया है। नरेश को एम वार्ड के आठ नंबर पलंग पर ही लाया गया था और अब दो-तीन दिन में उसे छुट्टी मिल जाएगी। नरेश आज सुबह खुद चलकर बाथरूम तक गया था। हां, मघी ने उसे सहारा जरूर दिया था। कौशल्या और परमेश्वरी नर्स ने नरेश को स्वयं चलकर बाथरूम तक जाते देखा तो डॉक्टर रुघनाथ को सूचना दी। यह खुशखबरी थी। नरेश के ठीक होने का संकेत था। एक बड़ा जोखिमभरा ऑपरेशन कामयाब होने का सूचक था। डॉक्टर रुघनाथ तुरंत ही दो-तीन डॉक्टरों के साथ नरेश के पास पहुंच गए।
पलंग नंबर आठ के चारों ओर इस समय खुशियां थी। डॉक्टर और नर्सों का जमघट था। इतने लोगों की भीड़ के कारण पलंग के सिरहाने की खिड़की छिप गई थी लेकिन आठ नंबर पलंग का कलंक धुल गया था। इस पलंग पर नरेश पहला मरीज था जिसने मौत से लड़कर जीवन पाया था। डॉक्टरों ने नरेश का चैकअप किया। आपस में एक-दूसरे को बधाइयां दी। मघी को कहा कि मिठाई मंगवाओ। भगवान झूलेलाल को भोग लगाकर वार्ड में सभी का मुंह मीठा कराओ।
मघी मिठाई लेने जाने लगी लेकिन स्टूल से उठते ही गश खाकर गिर पड़ी। उसकी आंखें चढ़ गईं। कौशल्या और परमेष्वरी ने मघी को संभाला। तुरत-फुरत नरेश के पलंग पर ही उसे लिटाकर डॉक्टर रुघनाथ ने उसका चैकअप किया। इस दौरान एक अन्य डॉक्टर ने लेडी डॉक्टर रेखा को फोन करके बुलवा लिया। इस बीच कौशल्या ने मघी को पानी पिलाया। डॉक्टर रेखा के आने से पहले मघी होश में आ गई। उसने डॉक्टर रुघनाथ और कौशल्या को बताया कि स्टूल से उठते ही आंखों के आगे अंधेरा छा गया और उसे चक्कर आ गए। वह गिर पड़ी। डॉक्टर रेखा उसका चैकअप कर रही थी और वह झूलेलाल की तस्वीर की ओर देखती मुस्कुरा रही थी। मन ही मन में बोली - वडेरे लाल तुमने मेरी सुन ली। अब नरेश ठीक हो गया है। यह पलंग अब मेरा है। पलंग के सिरहाने खुलने वाली खिड़की की ओर देख वह जोर से बोल उठी - यह खिड़की और इसमें से दिखाई देने वाला आकाश अब मेरा है। डॉक्टर रुघनाथ और वहां खड़े अन्य लोग मघी की बात समझ नहीं सके। नरेश भी भौंचका-सा उसे देख रहा था। मघी ने उन्हें बताया कि उसने झूलेलाल से नरेश के ठीक होने की मन्नत और बदले में अपने लिए एम वार्ड के पलंग नंबर आठ की मांग की थी। नरेश, नर्स, वार्ड बॉय और डॉक्टर मघी की बात सुनकर मन ही मन में रो उठे। तभी वहां डॉक्टर रेखा आ पहुंची। उसने मघी का चैकअप किया। तब तक मघी नरेश के पलंग नंबर आठ पर ही लेटी हुई थी। डॉक्टर रेखा ने उसे पलंग नंबर 11 पर चलकर लेटनेे को कहा।
पलंग के चारों तरफ हरे पर्द लगा दिए गए। थोड़ी देर में ही पर्दों के पीछे से मघी और डॉक्टर रेखा की हंसी गूंजने लगी। उनकी हंसी सुनकर वार्ड में मौजूद हर व्यक्ति को मघी के प्रति आशंकाओं से राहत मिली। आधे घंटे बाद वार्ड में भगवान झूलेलाल का प्रसाद बांटा जा रहा था। डॉक्टर रेखा मघी को कह रही थी - मघी, तुम्हारे जैसी पत्नी हर नरेश को मिले। अब पलंग नंबर आठ के पास वाली इस खिड़की से तुम सारा आकाश निहारो। तुम्हें दो महीने ऊपर हो गए हैं। तुम मां और नरेश पापा बनने वाले हो। झूलेलाल ने तुम्हारी सुन ली। अब आकाश की ओर खुलने वाली खिड़की तुम्हारी है। अब तुम आकाश की मालकिन हो।
मघी भी मुस्कुरा उठी और बोली - हां, झूलेलाल ने मुझे लोरी सुनाने का भाग्य दिया है। सारा आकाश मेरा है। यह खिड़की मेरी है।
( मूल अरबी सिंधी में लिखी कहानी ‘‘दरी मुहिंजी आहे ’’ (खिड़की मेरी है) का प्रकाशन दैनिक हिंदू अजमेर में हुआ जिसका हिंदी रूपांतरण किया है )
- मोहन थानवी, विश्वास वाचनालय, सार्दूल कॉलोनी, बीकानेर

पनघट पर परंपरा मुंह छुपाए खड़ी

घास
खाने को
नहीं मिलती
बरसात के बाद जल गई
तेज धूप से
मैं
पषुओं को ले
दर-दर भटकता रहा
षहर और गांवों में
टीवी, रेल, हवाई जहाज, आलीषान मकान
व्ैाज्ञानिकों का सम्मान
सबकुछ देखा
न देखा तो केवल कहीं बच्चों का स्वछन्द खेलना
कहीं हराभरा खेत और पषु धन के लिए
घास
संस्कृति एक कोने में दुबकी
गांव के पनघट पर
परंपरा मुंह छुपाए खड़ी
मेरे बेजुबान पषुओं के पास
जो निरीह आंखों से ढूंढ़ रहे
घास
( मोहन थानवी के हिंदी उपन्यास काला सूरज से ...)

Saturday, July 28, 2012

मित्र सुरेश की काव्य पंक्तियां...

मित्र  सुरेश हिंदुस्तानी की काव्य पंक्तियां...
विस्मृत प्यार...
तुम्हारे प्यार में
विस्मृत है
प्यार के अर्थ
शब्द, ताल, लय
किसी बंद गली से।
..............
शर्मसार....
अब
कितना तरल हूं
हर सांचे में, ढला जाता हूं
कहीं भी तो नहीं
मुझमें कुछ ऐसा
जो चट्टान - सा दिखे
कहे गर्व है तुम पर
..........
इमारत...
ऊंची इमारतों के भीतर
घुसने के लिये
जरूरी है
घटा लें कद को
झुका लें चेहरे को।
दरवाजों से इंसाफ की उम्मीद
बेकार है दोस्त
वे अपने कद से
कभी नहीं बढ़ते
हटा जरूर लिये जाते हैं
कभी - कभी अपनी जगह से
पर तब भी इमारत
भीतर से नहीं बदलती
जन्म देती है, सैकड़ों दरवाजों को
अपने भीतर,
गहरे तक
...............
मौसम...
मौसम
तुम भी हो गये
मेरे इर्द - गिर्द
बिखरे चेहरों से
ओढ़ लिये
बिछा लिये
कृतिम मुस्ककुराहटों के वसन
काश बन पाता मैं भी
तुम्हारी तरह
तब तुम आते
समय - समय पर
कई बसंत
मेरे भीतर

Thursday, July 19, 2012

दर्द...दर्द


दर्द
आंख उठाकर देख सकता नहीं
नजर मिला सकता नहीं
देता जो हमेशा दूसरों को तिरस्कार
अपनापन किसी से ले सकता नहीं
हृदय तो उसका भी व्यथित होता होगा
जब कोई उसे हिकारत से देखता होगा
अपनों में रहता होगा पराया बनकर
परायों में ढूंढ़ता होगा अपना रो.रोकर
जीवन में किसी को दी नहीं जिसने खुशी
जरावस्था में किसे बताएगा वह अपना दर्द
अस्तांचल का सूर्य नहीं वह
जिसने सुबह किया आशा का संचार
दोपहर में दिखाये तेवर तीखे
फिर दूसरे दिन आ जायेगा
नई उमंग के साथ
दुपहर की तल्खी लेकर
दर्द में डूबा जोे वह तो नश्वर है
मानव है
दर्द दिया तो दर्द ही पायेगा

Tuesday, July 17, 2012

नींद में जागा-जागा- सा... ...वह भागता रहा

bahubhashi: नींद में जागा-जागा- सा......वह भागता रहा


वह यूं ही भागता रहा उसके पीछे...
 इंद्रधनुष को पकड़ने
 वह कल से आज तक भागता रहा
 हर बार वह बस... थोड़ी दूर ही रह गया
वह यूं ही भागता रहा उसके पीछे...
इंद्रधनुष को पकड़ने
वह कल से आज तक
भागता रहा
हर बार वह बस...
थोड़ी दूर ही रह गया
उसके हाथ न आया।

मंदिर-मस्जिद, चर्च-गुरुद्वारा
वह हर दिन जाता
शीष नवाता
प्रार्थना करता
प्रसाद पाता
प्रवचन सुनता।
शांति की चाह में
उद्वेलित मन से जाता
अषांत ही लौटता
वह भागता रहा
कल से आज तक
श्ंाांति की चाह में।

खेत-खलिहान में पसीना बहाया
पषुधन के साथ भरी दोपहरी
अंधेरी रातों में
टाट बिछा
धुआं-धुआं फिजां
धुंधलाती रोषनी
भूखा पेट
वह सालों से सोया
सोचता था 
उठेगा तो सुनहरा कल होगा
नींद में जागा-जागा- सा...


...वह भागता रहा
सुनहरे भविष्य के पीछे

उसकी तमन्नाओं की तस्वीर 
रंगों को तरसती रही
वह कुंची लिए
जीवन तलाषता रहा
केनवास पर उकेरी
रेखाओं को
गहरा देने की
उसकी
चाहत
बेनूर ही रही
चुनाव होते रहे
वह 55 का हो गया
बचपन के पीछे
भागता रहा

वह तरसता रहा
मां की गोद
पिता के स्नेह पाने
और दादा-दादी
नाना-नानी से कहानी
सुनने को
कापी-किताबों का बोझ
उसके बस्ते में था
ज्ञान पाने को बेताब
वह
रोजगार पाने के लिए
भागता रहा
निठल्ले लोगों के हुजूम के पीछे
भागता रहा
भागता रहा।सके हाथ न आया। मंद...

वह यूं ही भागता रहा उसके पीछे.... उसकी चाहत बेनूर ही रही चुनाव होते रहे

वह यूं ही भागता रहा उसके पीछे...
इंद्रधनुष को पकड़ने
वह कल से आज तक
भागता रहा
हर बार वह बस...
थोड़ी दूर ही रह गया
उसके हाथ न आया।

मंदिर-मस्जिद, चर्च-गुरुद्वारा
वह हर दिन जाता
शीष नवाता
प्रार्थना करता
प्रसाद पाता
प्रवचन सुनता।
शांति की चाह में
उद्वेलित मन से जाता
अषांत ही लौटता
वह भागता रहा
कल से आज तक
श्ंाांति की चाह में।

खेत-खलिहान में पसीना बहाया
पषुधन के साथ भरी दोपहरी
अंधेरी रातों में
टाट बिछा
धुआं-धुआं फिजां
धुंधलाती रोषनी
भूखा पेट
वह सालों से सोया
सोचता था  
उठेगा तो सुनहरा कल होगा
नींद में जागा-जागा- सा...


...वह भागता रहा
सुनहरे भविष्य के पीछे

उसकी तमन्नाओं की तस्वीर  
रंगों को तरसती रही
वह कुंची लिए
जीवन तलाषता रहा
केनवास पर उकेरी
रेखाओं को
गहरा देने की
उसकी
चाहत
बेनूर ही रही
चुनाव होते रहे
वह 55 का हो गया
बचपन के पीछे
भागता रहा

वह तरसता रहा
मां की गोद
पिता के स्नेह पाने 
और दादा-दादी
नाना-नानी से कहानी
सुनने को
कापी-किताबों का बोझ
उसके बस्ते में था
ज्ञान पाने को बेताब
वह
रोजगार पाने के लिए
भागता रहा 
निठल्ले लोगों के हुजूम के पीछे 
भागता रहा
भागता रहा।

Friday, July 13, 2012

चित्र-मंडित हो मूक रहे जो वह मेरा जीवन नहीं ( काव्यांश ...)

काव्यांश ...
मत भूल संसार में अंग-देश भी है एक और राजा-चित्ररथ6 की रानी है प्रभावती
प्रस्तर-चित्र बनना है अगर तो सूर्य-चित्र का प्रत्यंकन7 कर जीवन में
चित्र-मंडित हो मूक रहे जो वह मेरा जीवन नहीं, जीने की कला का प्रत्यंकन होता नही
बंदूकों के साये और बमों के धमाके में खुलते नहीं फाटक सुख-महल8 के
बंद फाटकों में तो रंभाते हैं गोवंश भी, पीड़ा व्यक्त कर पाते नहीं
अजगर लिपटा रहता है चंदन से जो महकता है  
फूत्कार जहरीली फिर भी अजगर की, उसकी वृत्ति बनी रहेगी
हंतक खुशियों के तुमसे और क्या आशाएं रख सकता है जमाना
अजगर के फूत्कार से भी तप्त वायु और क्या होगा तेरी सांसों के सिवाय
प्रस्तर फिर भी पिघल सकता नहीं, ज्वालामुखी का लावा चाहिये
उद्धारक आयेगा जरूर बदलकर चेहरा तुम्हारा या कि मेरा....
( अंगदेश - काया, /राजा-चित्ररथ - वाणी, जीवन, मन, /प्रत्यंकन - नकल,/ प्रभावती - प्रभावकविता-अंश ...
मत भूल संसार में अंग-देश भी है एक और राजा-चित्ररथ6 की रानी है प्रभावती
प्रस्तर-चित्र बनना है अगर तो सूर्य-चित्र का प्रत्यंकन7 कर जीवन में
चित्र-मंडित हो मूक रहे जो वह मेरा जीवन नहीं, जीने की कला का प्रत्यंकन होता नही
बंदूकों के साये और बमों के धमाके में खुलते नहीं फाटक सुख-महल8 के
बंद फाटकों में तो रंभाते हैं गोवंश भी, पीड़ा व्यक्त कर पाते नहीं
अजगर लिपटा रहता है चंदन से जो महकता है  
फूत्कार जहरीली फिर भी अजगर की, उसकी वृत्ति बनी रहेगी
हंतक खुशियों के तुमसे और क्या आशाएं रख सकता है जमाना
अजगर के फूत्कार से भी तप्त वायु और क्या होगा तेरी सांसों के सिवाय
प्रस्तर फिर भी पिघल सकता नहीं, ज्वालामुखी का लावा चाहिये
उद्धारक आयेगा जरूर बदलकर चेहरा तुम्हारा या कि मेरा....
( अंगदेश - काया, /राजा-चित्ररथ - वाणी, जीवन, मन, /प्रत्यंकन - नकल,/ प्रभावती - प्रभावशाली,/ सुख-महल - वर्ल्ड ट्रेड सेंटर)
ली,/ सुख-महल - वर्ल्ड ट्रेड सेंटर)

Monday, July 9, 2012

अध्यात्म और प्रबंधन - 1 कर्म, प्रबंधन और फल



अध्यात्म और प्रबंधन - 1 कर्म, प्रबंधन और फल

ं भीतर के द्वन्द्व और उमड़ते विचारों को षब्दाकार देना अज्ञान को दूर करने के
लिए ज्ञान की खोज में षब्दयात्रा है। यह भी कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भले ही 
हो लेकिन विचारों से किसी को ठेस पहुंचती हो तो अग्रिम क्षमायाचना। हां,
विद्वानों का मार्गदर्षन मिल जाए तो जीवन सफल हो जाए।
भारतीय संस्कृति में जीवन की सफलता की खोज अध्यात्म के माध्यम से की जाती रही
है। अध्यात्म में भी कुषल प्रबंधन को मैंने महसूस किया है तो इसके लिए कर्म
किया जाना भी अनिवार्य लगा है। अध्यात्म में कर्म है ज्ञान प्राप्ति का
प्रयास।  और जीवन की सफलता को फल कह सकते है।
जीवन प्रबंधन से ही व्यवस्थित और सुखमय हो सकता है। बिना प्रबंधन के तो चींटी
भी नहीं जीती। चींटी ही क्यों, प्रत्येक प्राणी को समूह में जीते ही हम देखते
हैं। ऐसा कोई प्राणी नहीं जो अकेला जीता हो या आज तक जीया हो। पेड़-पौधों को भी
समूह में लहलहाना अच्छा लगता है क्योंकि वे भी बीज रूप से प्रस्फुटित होने से
लेकर मुरझाने तक एक कुषल प्रबंधन प्रणाली से विकसित होते हैं, फल देते हैं।
जीवन का मकसद ही फल देना है। गीता का संदेष है, कर्म किए जाओ फल की इच्छा मत
करो... साथ ही यह भी कोई भी कर्म बिना फल का नहीं होता। जीवन का यही प्रबंधन
है। विचार भी कर्म है। अच्छा विचारने से अच्छे की प्राप्ति होती है। मैनेजमेंट
गुरु आज भी यही कहते हैं, सदियों पूर्व वेद-षास्त्र रचे जाने से पहले भी भारतीय
संस्कृति के महर्षि ऐसा ही कहते रहे हैं। मूलमं़त्र ही यह है तो फिर भले ही
दूसरे मंत्रों को रटते रहें, असर तो मूल को सिद्ध करने पर ही होगा। जिस प्रकार
मंत्र सिद्धि के लिए ज्योतिष-योग-षास्त्र बीज मंत्रोच्चार को प्रथम सोपान मानता
है उसी प्रकार अंक गणित, बीज गणित और रेखा गणित के भी मूल सिद्धांत हैं जिनके
अनुसार प्रष्न हल न करने पर जवाब गलत ही मिलता है। प्रबंधन में बीजाक्षर है
अनुषासन और आत्म विष्वास। हम जितना प्रयत्न करेंगे हमें उतना प्रतिफल मिलेगा।
एक खेत में एक बोरी बीज बोने से यदि दो सौ बोरी अनाज पैदा हो सकता है तो चार सौ
बोरी नहीं होगा और यह भी कि यदि अनुषासन से कृषि कार्य नहीं किया तो दो सौ बोरी
भी उत्पादन नहीं होगा, हो सकता है बिल्कुल ही न हो लेकिन यहां भी गीता का संदेष
याद आता है, कर्म किया है तो फल भी मिलेगा... यहां इस खेत के उदाहरण में वो फल
खरतपवार, घास-फूस भी हो सकता है। अनुषासन, परिश्रम, आत्म विष्वास के माध्यम से
लक्षित फल प्राप्ति में सफलता मिलती है लेकिन सवाल यह है कि कर्म किए जाओ फल की
इच्छा मत करो... संदेष का क्या मतलब हुआ...! यदि फल की इच्छा ही नहीं करेंगे तो
लक्षित फल प्राप्ति के लिए विचार करना भी गलत सिद्ध होता है। और यदि कर्मफल
अवष्य मिलता है कथन को विचारते हैं तो फिर फल की चिंता किए बिना कर्म करने के
संदेष को किस रूप में ग्रणह करें...! इसे माया कहें...! या... मंथन करें...!!!

Thursday, July 5, 2012

ताउम्र साथ रहता है बचपन...

बचपन
खेल-खिलौनों तक ही नहीं सिमटा रहता बचपन
दादी -नानी और दादा -दादी के साथ बीतता है बचपन
कहानियों के दौर से भी आगे यादें समेटता है बचपन
ज्ञानार्जन करता है बड़े भाई - बहिनों से बचपन
आस पड़ोस के लोगों से भी बहुत कुछ सीखता है बचपन
घर के आंगन में उतरने वाली चिड़िया से भी खेलता है बचपन
किसी किसी घर के आंगन में किसी पिंजरे को भी कौतूहल से देख्ता है बचपन
पिंजरे में बंद मियां मिट्ठू से तुतलाकर आजादी की बोली भी बोलता है बचपन
कहीं चारदीवारी के एक हिस्से में बंधी गाय की पूंछ पकड़ने की चेष्टा भी करता है बचपन
कार्तिक में ब्याही भूरी कुत्ती के नन्हें प्यारे पिल्लों को अजीबोगरीब नाम भी देता है बचपन
पत्ते बदलते देख पेड़ों के मन की पीड़ा समझने की चेष्टा भी करता है बचपन
परियों-सी तितलियों की उड़ानं को भी अपने में समाता है बचपन....
इसीलिए तो ... ताउम्र साथ रहता है बचपन... 

Tuesday, July 3, 2012

परवाज के लिये कोंपलों के हौसले बुलंद है -- सम्मति - मीनाक्षी स्वर्णकार की काव्यकृति ‘‘कोंपलें’

सम्मति - मीनाक्षी स्वर्णकार की काव्यकृति ‘‘कोंपलें’’
परवाज के लिये कोंपलों के हौसले बुलंद है। क्योंकि सृजन के प्रति समर्पण है। जहां समर्पण होता है वहां लगाव भी स्थायी तौर से वास करता है। शब्द-शब्द चुन-चुनकर रचना-संसार को आकार देने वाली कलम में ऐसी ही समर्पण की स्याही भरकर मीनाक्षी स्वर्णकार ने सृजन की परवाज पर कोंपलें उकेरी है। अभिव्यक्ति के कितने ही तरीके हो सकते हैं मगर काव्याभिक्त संस्कृत-काल से लेखन-संस्कृति में शीर्ष पर रही है। मीनाक्षी स्वर्णकार के काव्य-संग्रह कोंपले में 67 काव्य आकृतियां हैं और सभी मन के आईने अंकित हो जाती है। इनमें से संवेदनाओं को जगाती ओस की बूंद अन्तस को भिगो देती है।
बावरी-सी ओस की बूंद/
हरी-हरी पत्तियों से गिरकर/
फैल गई सुनहरी धरा पर/
कुछ इठलाती, कुछ इतराती-सी/
खालिस मोतियों की तरह/
चारों ओर बिखरकर/
आलिंगन करने लगी/
सूखी बिखरी घास का/
और अपना सारा यौवन/
इन्हें सौंपकर/
समा गई इनके अंतःकरण में हमेशा हमेशा के लिये/
ये बावरी-सी ओस की बून्द।  (पृष्ठ 31)
काव्य-रस से जब तक संवेदनाएं भीगें नहीं, पाठक को भी शीतलता की प्राप्ति नहीं होती। ऐसी ही शिल्पगत प्रवृत्तियों की आवश्यकता को पूरा करती मीनाक्षी की कोंपले में उकेरी हुई रचनाएं प्रभावित करती हैं। भाषात्मक संरचना का वैशिष्ट्य तो कोंपलें में झलकता ही है, सान्द्र बिम्ब योजना अर्थलय, मुक्त छन्द के साथ पौराणिक प्रतीकों का प्रयोग व नवीन उपमान-विधान भी पाठक को काव्य-रस का आनंद लेने में सहायक बनते हैं।  बीकानेर साहित्य-नगरी है। यहां हर विधा में सृजनहार सदैव मरुधरा की सुनहरी रेत पर शब्दांकन करते रहे हैं। चिंतक डा नंदकिशोर आचार्य ने जो आयाम प्रतिपादित किये हैं वे नयी कविता की अनवरत यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं और डा आचार्य की यात्रा अथक जारी है। मीनाक्षी इसी नगरी की युवा रचनाकार है, बहुप्रतिभा की धनी है। काव्यकृति के साथ-साथ उन्होंने रेखाचित्रण भी किया है जो कविताओं को जीवंत बना देता है। नयी कविता ने भारतेन्दु युग में राष्ट्रीय चेतना एवं पुनर्जागरण से परवाज भरना आरंभ किया और द्विवेदीजी के काल में आदर्शवादी सुधार मूलक के रूप में समाज में जागृति के दीप प्रज्वलित किये। छायावाद, प्रगतिवादी मार्क्सवादी, प्रयोगवादी, प्रयोगधर्मी विचार दर्शन के सौपान सर करती हुई आधुनिक भाव-बोध की नयी कविता ने समानान्तर काव्यान्दोलन का नजारा भी किया। अकविता, प्रतिबद्ध कविता, बीटनिक कविता, विचार कविता, हाईकू, गजल, नवगीत इस काल में प्रमुखता से मूर्तरूप में सामने आये। कोंपलें में मीनाक्षी की कविताएं ऐसे रूप भी झलकाती हैं। कहीं बेहतरी के लिये परिष्कृत होने की बाट भी जोहती दिखती हैं मगर अंततः अन्तस में स्थान बना लेती हैं। खासतौर से तब जब आंचलिकता का बोध करवाते शब्द-चित्रण से मरुधरा का ग्राम्य-जीवन आंखों के आगे जीवंत हो जाता है। बानगी है,
हजार हवेलियों के साथ की/
यह अनोखी नगरी/
खट्टे-मीठे स्वाद के संग/
रसगुल्ले, भुजिया-पापड़ के भी रंग/
इनसे है रिश्ता पुराना/
ये है मेरा शहर बीकाणा। (20) ....
और भी, ...
प्रकृत्ति जब श्रृंगार करे/
पत्ते बन गये हरे-भरे/
रूप जब नवयौवन से भर जाये....। (42)
ऐसे ही पौराणिक संदर्भों को मीनाक्षी ने अपनी रचनाओं में यूं पिरोया है मानो वे इसी वर्णन के लिये ही ग्रंथों में रहे हैं। देखें -
हे पुराणपुरुष/
हे सुदर्शन/
आज फिर से करो/
पांचजन्य का शंखनाद/
और अंत करो/
इस महाभारत का..... (65-66)।
बीकानेर के ख्यातनाम रचनाकारों ने आंचलिकता को भी अपनी लेखनी से दुनियाभर तक पहुंचाया है, कुछ उदाहरण समीचीन रहेंगे। सर्वेश्वरदयाल सक्सेना (कुआनो नदी) - झमाझम, झमझमाता, टट्टा आदि।  शम्भूदयाल सक्सेना, (रत्नरेणु)- छोकरिया, छितरे, लतराएं आदि। हरीश भादानी (सुलगते पिण्ड) - पूरबिया समन्दर, थेगड़े, धूप पोरों से पखारी आदि। योगेन्द्र किसलय (और हम) - ठरठराती, सींवन, गंदलाए आदि। इन बीकाणा के रचनाकारों समेत भारत भर में कितने ही सुविख्यात कवियों ने अपनी कविताओं में केर-सांगरी, धूजणी, भुजिया, पूरबिया आदि आंचलिक शब्दों का प्रयोग किया है। यह सुखद है कि मीनाक्षी की रचनाओं में भी ऐसे शब्द मिलते हैं, जैसे - ... भूल जाते हैं थपेड़ों को... (22), खारे पानी के रेले को धता बता.... (24) आदि। यूं प्रतीकों और बिम्बों को कविता में अनिवार्य रूप से देखा जाने लगा है मगर नवाचार, सामाजिक सरोकार, समाज के प्रति अपना दायित्व बोध, राज और काज की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाती सुगठित रचनाएं एक साथ हों तो रसास्वादन दीर्घ और अधिक आनंददायक हो जाता है। मीनाक्षी ने अपनी रचना-माल कृति कोंपलें में ऐसी रचनाएं भी पिरोयी है। एक ही मिसाल काफी है .... भारतवर्ष शीर्षक से यह कविता ) अपने साथ साथ समग्र कृति की महत्ता प्रतिपादित कर देती है,
मेरे समक्ष खड़ा है/
एक कृशकाय विश्वविजेता/
रुदन करता हुआ/
साथ मंे है/
उसकी दो बेटियां/
सभ्यता और संस्कृति/
जिनका/
पाश्चात्य दुर्योधन ने/
चीर हरण करवाया है/
पास ही पड़ा है/
उसका स्वर्णमुुकुट/
बेद-गीता पर।   (35)
कोंपलें महक रही है। ये महज कोंपलें नहीं बल्कि समग्र पर्यावरणीय संरचनाओं को अपने में समेटे एक विशाल वृक्ष है। इसमें मौसम, रिश्ते-नाते, अपना शहर, बेगाने लोग, प्यार, नफरत, हार-श्रृंगार और जीवन का हर पहलू मीनाक्षी ने पल्लवित किया है। हां, लेखिका को यह हमेशा याद रखना चाहिये कि बेहतरी के प्रयास असीम होते हैं। पठनीय एवं संग्रहणीय कृति के लिये मीनाक्षी को साधुवाद। लेखिका की पहली लेकिन परिपक्व कलम से साकार हुई इस सुकृति को आकर्षक मुद्रण के साथ गुणवत्तायुक्त पेपर काम में लेते हुए मनोहारी एवं प्रभावित करने वाले आवरण के साथ साहित्य-रसिकों को उपलब्ध करवाया है इसके लिये खासतौर से प्रकाशक साहित्यागार को साधुवाद।
-- मोहन थानवी

परवाज के लिये कोंपलों के हौसले बुलंद हैसम्मति - मीनाक्षी स्वर्णकार की काव्यकृति ‘‘कोंपलें’

सम्मति - मीनाक्षी स्वर्णकार की काव्यकृति ‘‘कोंपलें’’
परवाज के लिये कोंपलों के हौसले बुलंद है। क्योंकि सृजन के प्रति समर्पण है। जहां समर्पण होता है वहां लगाव भी स्थायी तौर से वास करता है। शब्द-शब्द चुन-चुनकर रचना-संसार को आकार देने वाली कलम में ऐसी ही समर्पण की स्याही भरकर मीनाक्षी स्वर्णकार ने सृजन की परवाज पर कोंपलें उकेरी है। अभिव्यक्ति के कितने ही तरीके हो सकते हैं मगर काव्याभिक्त संस्कृत-काल से लेखन-संस्कृति में शीर्ष पर रही है। मीनाक्षी स्वर्णकार के काव्य-संग्रह कोंपले में 67 काव्य आकृतियां हैं और सभी मन के आईने अंकित हो जाती है। इनमें से संवेदनाओं को जगाती ओस की बूंद अन्तस को भिगो देती है।
बावरी-सी ओस की बूंद/
हरी-हरी पत्तियों से गिरकर/
फैल गई सुनहरी धरा पर/
कुछ इठलाती, कुछ इतराती-सी/
खालिस मोतियों की तरह/
चारों ओर बिखरकर/
आलिंगन करने लगी/
सूखी बिखरी घास का/
और अपना सारा यौवन/
इन्हें सौंपकर/
समा गई इनके अंतःकरण में हमेशा हमेशा के लिये/
ये बावरी-सी ओस की बून्द।  (पृष्ठ 31)
काव्य-रस से जब तक संवेदनाएं भीगें नहीं, पाठक को भी शीतलता की प्राप्ति नहीं होती। ऐसी ही शिल्पगत प्रवृत्तियों की आवश्यकता को पूरा करती मीनाक्षी की कोंपले में उकेरी हुई रचनाएं प्रभावित करती हैं। भाषात्मक संरचना का वैशिष्ट्य तो कोंपलें में झलकता ही है, सान्द्र बिम्ब योजना अर्थलय, मुक्त छन्द के साथ पौराणिक प्रतीकों का प्रयोग व नवीन उपमान-विधान भी पाठक को काव्य-रस का आनंद लेने में सहायक बनते हैं।  बीकानेर साहित्य-नगरी है। यहां हर विधा में सृजनहार सदैव मरुधरा की सुनहरी रेत पर शब्दांकन करते रहे हैं। चिंतक डा नंदकिशोर आचार्य ने जो आयाम प्रतिपादित किये हैं वे नयी कविता की अनवरत यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं और डा आचार्य की यात्रा अथक जारी है। मीनाक्षी इसी नगरी की युवा रचनाकार है, बहुप्रतिभा की धनी है। काव्यकृति के साथ-साथ उन्होंने रेखाचित्रण भी किया है जो कविताओं को जीवंत बना देता है। नयी कविता ने भारतेन्दु युग में राष्ट्रीय चेतना एवं पुनर्जागरण से परवाज भरना आरंभ किया और द्विवेदीजी के काल में आदर्शवादी सुधार मूलक के रूप में समाज में जागृति के दीप प्रज्वलित किये। छायावाद, प्रगतिवादी मार्क्सवादी, प्रयोगवादी, प्रयोगधर्मी विचार दर्शन के सौपान सर करती हुई आधुनिक भाव-बोध की नयी कविता ने समानान्तर काव्यान्दोलन का नजारा भी किया। अकविता, प्रतिबद्ध कविता, बीटनिक कविता, विचार कविता, हाईकू, गजल, नवगीत इस काल में प्रमुखता से मूर्तरूप में सामने आये। कोंपलें में मीनाक्षी की कविताएं ऐसे रूप भी झलकाती हैं। कहीं बेहतरी के लिये परिष्कृत होने की बाट भी जोहती दिखती हैं मगर अंततः अन्तस में स्थान बना लेती हैं। खासतौर से तब जब आंचलिकता का बोध करवाते शब्द-चित्रण से मरुधरा का ग्राम्य-जीवन आंखों के आगे जीवंत हो जाता है। बानगी है,
हजार हवेलियों के साथ की/
यह अनोखी नगरी/
खट्टे-मीठे स्वाद के संग/
रसगुल्ले, भुजिया-पापड़ के भी रंग/
इनसे है रिश्ता पुराना/
ये है मेरा शहर बीकाणा। (20) ....
और भी, ...
प्रकृत्ति जब श्रृंगार करे/
पत्ते बन गये हरे-भरे/
रूप जब नवयौवन से भर जाये....। (42)
ऐसे ही पौराणिक संदर्भों को मीनाक्षी ने अपनी रचनाओं में यूं पिरोया है मानो वे इसी वर्णन के लिये ही ग्रंथों में रहे हैं। देखें -
हे पुराणपुरुष/
हे सुदर्शन/
आज फिर से करो/
पांचजन्य का शंखनाद/
और अंत करो/
इस महाभारत का..... (65-66)।
बीकानेर के ख्यातनाम रचनाकारों ने आंचलिकता को भी अपनी लेखनी से दुनियाभर तक पहुंचाया है, कुछ उदाहरण समीचीन रहेंगे। सर्वेश्वरदयाल सक्सेना (कुआनो नदी) - झमाझम, झमझमाता, टट्टा आदि।  शम्भूदयाल सक्सेना, (रत्नरेणु)- छोकरिया, छितरे, लतराएं आदि। हरीश भादानी (सुलगते पिण्ड) - पूरबिया समन्दर, थेगड़े, धूप पोरों से पखारी आदि। योगेन्द्र किसलय (और हम) - ठरठराती, सींवन, गंदलाए आदि। इन बीकाणा के रचनाकारों समेत भारत भर में कितने ही सुविख्यात कवियों ने अपनी कविताओं में केर-सांगरी, धूजणी, भुजिया, पूरबिया आदि आंचलिक शब्दों का प्रयोग किया है। यह सुखद है कि मीनाक्षी की रचनाओं में भी ऐसे शब्द मिलते हैं, जैसे - ... भूल जाते हैं थपेड़ों को... (22), खारे पानी के रेले को धता बता.... (24) आदि। यूं प्रतीकों और बिम्बों को कविता में अनिवार्य रूप से देखा जाने लगा है मगर नवाचार, सामाजिक सरोकार, समाज के प्रति अपना दायित्व बोध, राज और काज की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाती सुगठित रचनाएं एक साथ हों तो रसास्वादन दीर्घ और अधिक आनंददायक हो जाता है। मीनाक्षी ने अपनी रचना-माल कृति कोंपलें में ऐसी रचनाएं भी पिरोयी है। एक ही मिसाल काफी है .... भारतवर्ष शीर्षक से यह कविता ) अपने साथ साथ समग्र कृति की महत्ता प्रतिपादित कर देती है,
मेरे समक्ष खड़ा है/
एक कृशकाय विश्वविजेता/
रुदन करता हुआ/
साथ मंे है/
उसकी दो बेटियां/
सभ्यता और संस्कृति/
जिनका/
पाश्चात्य दुर्योधन ने/
चीर हरण करवाया है/
पास ही पड़ा है/
उसका स्वर्णमुुकुट/
बेद-गीता पर।   (35)
कोंपलें महक रही है। ये महज कोंपलें नहीं बल्कि समग्र पर्यावरणीय संरचनाओं को अपने में समेटे एक विशाल वृक्ष है। इसमें मौसम, रिश्ते-नाते, अपना शहर, बेगाने लोग, प्यार, नफरत, हार-श्रृंगार और जीवन का हर पहलू मीनाक्षी ने पल्लवित किया है। हां, लेखिका को यह हमेशा याद रखना चाहिये कि बेहतरी के प्रयास असीम होते हैं। पठनीय एवं संग्रहणीय कृति के लिये मीनाक्षी को साधुवाद। लेखिका की पहली लेकिन परिपक्व कलम से साकार हुई इस सुकृति को आकर्षक मुद्रण के साथ गुणवत्तायुक्त पेपर काम में लेते हुए मनोहारी एवं प्रभावित करने वाले आवरण के साथ साहित्य-रसिकों को उपलब्ध करवाया है इसके लिये खासतौर से प्रकाशक साहित्यागार को साधुवाद।
-- मोहन थानवी

Monday, July 2, 2012

झोली भर दुखड़ा अ’र संभावनावां रा मोती (एक डाक्टर की डायरी)

झोली भर दुखड़ा अ’र संभावनावां रा मोती

झोली भर दुखड़ा (एक डाक्टर की डायरी)
मूल हिंदी  - डा श्रीगोपाल काबरा 
राजस्थानी अनुवाद - श्री बिहारीशरण पारीक
प्रकाशक - बोधि प्रकाशन, 
झोली भर दुखड़ा अ’र संभावनावां रा मोती
हिंदी सूं  राजस्थानी में उल्थौ कहाणी संग्रै झोली भर दुखड़ा कै मायं भावनावां की लहरां माथै संभावनावां की नाव तैरती दिखै। मायड़ भाषा में मोती जियां चिमकता आखर। नाव में सवार है रोगी अ’र पतवार चलावण रौ काम दूजा पात्र नीं बल्कि कलमकार री आपणी अनूठी शैली करै। श्री बिहारीशरण पारीक इण कहाणियां को उल्थौ कर्यो है जिकी हिंदी में डा श्रीगोपाल काबरा रची अ’र डायरी विधा नै नूवां आयाम दिराया। हालांकि आ डायरी री शिकल में कोनी पण अेक डाक्टर री डायरी मायं इसौ शिल्प रच्यो गयो है जिकै सूं आंख्यां सामै को दरसाव किताब कै पाना माथै पाठक नै दूरदर्शन करावै। संग्रै में मरीज अ’र उण रै परिवारवालां सागै सागै अेक डाक्टर री उण पीड़ री दास्तान है जिकी हंसती खेलती जिनगाणी में आज कै समै री खुशरंग चादर माथै दुख तकलीफ रै मवाद सूं भर्योड़ी बीमारी सूं बणयोड़ो पैबंद है। पीड़ रा भी कितराइ दरसाव होय सकै अ’र इण संग्रै में अेक भाषा सूं दूजी भाषा रा गाबा धारण करता शब्द भांत भांत रै दरसावां नै सामै राखै। झोली भर दुखड़ा संग्रै में कैंसर रोगी अ’र गरभसमापन सागै नसबंदी विसै माथै कुल 15 कहाणियां है। सगळी कहाणियां पाठक नै झकझोर देवण वाली हैं। कहाणीकार संवेदनशील है इण रौ भान कुछैक कथावां में कैंसर सूं जूझतौ थकौ मरीज अ’र उणनै काल कोठरी में खेंच’र ले जावंती यमराज री छियां बिचालै मरीज री जीवणै री ललक बांचता थका पाठकां री आंख सूं बैवतो पाणी करा देवै। गरभपात को अधिकार, कहाणी आज रै समै में समाज री सोच नै उजागर करै तो कंवारी धाय कथा कै मायं नारी मन कै अंधेरे अ’र उंडे कोना के मायं चिलकती रोशनी री लकीर सांप सरीखी लैराती चाल पाठक नै उद्वैलित बणा दैवै। चांदी का पालणा मांय लड्डू गोपाल कहाणी अेकखानी तो नारी मन री पीड़ नै दरसावै तो दूजी ठौड़ गरभपात खातर समाज री सोच नै बतावै पण इणरौ समापन कहाणी परंपरा सूं अलग नीं होवंतों भी नूवंेपण री उजास देवै अ’र प्रभावित करै। सबसूं इलायदा बात है इण कहाणी में अेक डॉक्टर को नजरियो, जिकै सूं कहाणी कै मायं घटना, संवाद अ’र घणासीक पात्र होवतां थका भी आखिरतांई चांदी का पालणा मायं लड्डू गोपाल पाठक री आंख्यां सामै थिरकता दिखै। कहाणी इच्छा मरण कैंसर पीडिृत अेक रोगी रै आखाण रै बहाने सूं जिनगाणी अ’र मौत रौ फलसफो बतावै। आज कै हाईटेक कंप्यूटरीकृत आधुनिक युग के मायं भी कैंसर जिसै रोग री चपेट में पीड़ादायी जीवन सूं हार मानता थका उण भावनावां नै सामी राखै जिकी अेक मिनख दूजै मिनख खातिर कदैई पाल पोस कोनी सकै। इच्छा मरण रै सामाजिक, चिकित्सकीय अ’र कानूनी पक्ष माथै मूल लेखक तो साधुवाद को पात्र है ही, सागै सागै मार्मिक ढंग सूं आखाण करण में अनुवादक बिहारीशरण पारीक जी रै दीर्घ साहित्यिक जीवन रै अनुभव नै भी कहाणी बांचता ताण पाठक खुद ब खुद नमन करै। करोड़ा राजस्थानियां री मायड़ भाषा में हिंदी सूं अनूदित कथा संग्रै समृद्ध राजस्थानी साहित्य में अेक अनमोल मोती मानीजसी। झोली भर मोती। -prastuti  - मोहन थानवी      

Sunday, July 1, 2012

पिता ऐसा ही कहते हैं

पिता ऐसा ही कहते हैं
बढ़ता अनाचार रिश्तों को डुबो रहा
आंख का पानी सूखा इशारे बेमानी हुए
जमाना पैसे की गुड़िया का दास बना
कलपुर्जों की भीड़ में इनसान कहां होंगे
आदमी को ढूंढ़ता रोबोट पृथ्वी पर आएगा
युग बीते कितने इतिहास में नहीं दर्ज हुए
पुराण कथाओं के किस्से पिता कहते हैं
बीत रहा युग नया जमाना आएगा
खेलने की उम्र में अपने ही बच्चों को खेलाएंगे
पिता ऐसा ही कहते हैं हर बार लगता रहा
हैरानगी बढ़ी जानकर समाज सोता रहा
पता चला मानव अपना ही गुर्दा बेच रहा
रिश्ते रिसते रहे जीवन एकाकी बनता रहा
शाख से शाख न निकली पेड़ ठूंठ बन गया
फूलों का मकरंद कहां भंवरा ढूंढ़ता रहा

यत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे

यत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे - 1
- यत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे -
- लेखक श्री सुदर्शन शर्मा "रथांग" मुंबई
 जो ब्रह्माण्ड में है वही पिण्ड अर्थात षरीर में है। सृष्टि रचना के पूर्व, केवल
ब्रह्माण्ड अर्थात गोलाकार ब्रह्म था जिसे आधुनिक वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं
और उन्होंने इसे ‘ब्लैक होल’ कहा है - कृष्ण मंडल।  कल्पान्त में सभी कुछ
इसषून्य में, कृष्ण मंडल में, ब्रह्म में समाहित था। ब्रह्म के मन में विचार
उत्पन्न हुआ, एकोऽहम् बहुस्याम् - एक हूं अनेक हो जाऊं। उस विचार की प्रतिध्वनि
कृष्ण मंडल में गूंजी और वह ब्रह्म के अहम् की ध्वनि अऽउम अर्थात ऊ ंके स्वरूप
में प्रतिष्ठित हुई। यह ध्वनि थी,षब्द रूप थी इसे नाद ब्रह्म की संज्ञा दी गई।
षब्द अथवा ध्वनि की उत्पत्ति किन्हीं दो पदार्थों के स्पर्ष से ही संभव है। अब
जब प्रारंभ में केवल ब्रह्म ही था, प्रकृति पूर्णतःषून्य स्थिति में थी तो फिर
स्पर्ष कैसा! सर्व साधारण मनुष्यों को समझाने हित ब्रह्म की उपका आकाष से की गई
है। आकाष को प्रकृति के पांच तत्वों में से एक और प्रथम तत्व माना गया है। आकाष
अर्थात अवकाष रिक्ता और इसका आकार गोल ही दिखता है। विषाल सागर में जैसे लहरें
उत्पन्न होती हैं वैसे ही कुछ आकष में हुआ होगा। उन आकाषीय तरंगों के एक दूसरे
के साथ स्पर्ष से ही वह ध्वनि निकली होगी जिसे अउम के रूप में सुना गया। ये
आकाषीय तरंगे जिनके द्वारा नादब्रह्म अउम प्रसारित हुआ, उन्हें वायु कहा गया जो
भारतीय संस्कृति और परम्परा में प्रकृति का द्वितीय तत्व है। आगे चलकर आकाष में
स्थित वायु के अति संघर्षण से जो ऊण्णता उत्पन्न्न हुई उसे तेज यानी अग्नि कहा
गया, इसे प्रकृति के तृतीय तत्व के रूप में गिना गया। इस वायु और अग्नि के
मिश्रण से जल की उत्पत्ति हुई, यह प्रकृति का चतुर्थ तत्व हुआ। आधुनिक विज्ञान
ने भी जल को वायु (आक्सीजन) और अग्नि (हाइड्रोजिन) का मिश्रण माना है। इस जल
तत्व से पांचवें तत्व पृथ्वी की उत्पति हुई। इस प्रकार सृष्टि के मूल में ये
पांच तत्व ही हैं जिन्हें पंचमहाभूत कहा गया है।
यत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे - 2
- यत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे - ( लेखक श्री सुदर्शन शर्मा "रथांग" मुंबई )
प्रकृति का जो मूल स्वरूप ब्रह्माण्ड वह महद्ब्रह्म के नाम से भी जाना जाता है।
इसके तीन गुण बताये गए हैं, सत्व, रज और तम। ये तीन गुण प्रकृति के, सृष्टि के
प्रत्येक पदार्थ में कम अधिक मात्रा में रहते ही हैं और उस मात्रा के आधार पर
उस पदार्थ का स्वभाव निर्धारित होता है। मंच महाभूतों में भी ये गुण हैं। ऐसी
मान्यता है कि आकाष तत्व में सत्व गुण ही हैं। अतः वहषान्त, स्थिर, साक्षी
स्वरूप है। वायु में सत्व व रज का मिश्रण है। तेज में रजोगुण की प्रबलता है। जल
रज व तम का मिश्रण है तो पृथ्वी में तमोगुण ही प्रमुख है। भारतीय परंपरा में
पांच तत्वों को मान्यता प्राप्त है जबकि चीन के वास्तुषास्त्र में चार तत्व ही
माने गये हैं, आकाष को नहीं माना गया है। वस्तुतः आकाष ही आधार है, प्रकृति का
पूरा खेल आकाष में ही होता हे, अतः इसे हम भारतीयों ने प्रमुख तत्व, मूल तत्व
माना है।
प्राचीन काल में ऋषि मुनियों ने, जिन्होंने प्रकृति के, सृष्टि के रहस्य का
अनुसंधान किया, उन्होंने सृष्टि की तीन स्थितियां निर्धारित कीं, आदि, मध्य और
अंत, उत्पत्ति, स्थिति व लय, जन्म, जीवन, मृत्यु। वैसे तो विभिन्न पंचमहाभूतों
के विविध प्रकार के मिश्रणों सेस्वयमेव पदार्थ बनते गये परन्तु आगे चलकर ऋषि
मुनियों ने उपरोक्त तीन स्थितियों को तीन विभागों का स्वरूप दे दिया और उस
व्यवस्था के अंतर्गत उन तीन विभागों के व्यस्थापक अथवा विभागाध्यक्ष बनाये गये
- ब्रह्मा, विष्णु, महेष। सृष्टि के उत्पत्तिकर्ता ब्रह्मा, पालनकर्ता अर्थात
जीवनरक्षाकर्ता, पालन पोषण कर्ता विष्णु और संहारक, मृत्युदाता को महेष की
उपाधि से प्रतिष्ठित किया गया। सृष्टि रचना यानी उत्पत्ति, जन्म जिसमें गति
होती है, गति और उसका परिणाम ऊष्णता, ये दोनों रजोगुुुण के परिणाम हैं, इसलिए
ब्रह्मा को रजोगुण काप्रतीक माना गया। जीवन अर्थात स्थिति, स्थापना, अस्तित्व,
इसमें सत्वुण की प्रधानता है, अतः पालन पोषण कर्ता, जीवन के अस्तित्व को
निर्धारित करने वाले विष्णु को सत्वगुण का प्रतीक माना गया। लय, मृत्यु, अंत
अर्थात निष्क्रियता, निष्चेष्टता, यह तमोगुण का परिणाम है, अतः महेष को तमोगुण
का प्रतीक माना गया। इन तीनों विभागध्यक्षों के, उन गुणोंतथा कार्यानुसार उनके
निवासस्थान भी निष्चित किये गये। जल ही जीवन है अतः पालनपोषणकर्ता विष्णु को
सागर-क्षीरसागर में निवासित किया गया। सूर्य की ऊष्णता से सागर का जल वाष्प
बनकर बादलों के रूप में वर्षा द्वारा पृथ्वी पर बरसता है जिससे बनस्पति,
धान्यादि उत्पन्न होते हैं जिनसे प्राणियों केषरीर पुष्ट और नीरोगी बनते हैं।
ब्रह्मा, जन्मदाता जो जलचल, थलचर तथा खेचर तीनों प्रकार के पदार्थों प्राणियों
का सृष्टिकर्ता है उसे विष्णु के नाभिकमल पर बिठाया गया, न जल में न थल में और
न तो नभ में। औरमहेष अर्थात महा ईष्वर उसे सबसे ऊंचेषीतल स्थान कैलाष पर बैठाया
गया।
इस प्रकार प्रकृति द्वारा प्रचालित ब्रह्माण्ड - सृष्टि कीव्यवस्था का साक्षी
परब्रह्म परमात्मा इन सम्पूर्ण कार्यभार से निर्लिप्त साक्षी स्वरूप स्वयं में
लीन हो गया।
यत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे - 3
- यत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे - लेखक श्री सुदर्शन शर्मा "रथांग" मुंबई
उपरोक्त प्रकार से ऋषि-मुनियों ने सर्वसाधारण मनुष्य के सम्मुख प्रकृति के इस
रहस्य को रखा। कई पौराणिक कथाओं में उल्लेखित हुआ है कि भक्तों ने तपस्या के
द्वारा ब्रह्मा, विष्णु तथा महेष के दर्षन किये थे। परन्तु आधुनिक युग में अब
तक कहीं पढ़ने सुनने में नहीं आया कि एवरेस्ट पर गये लोगों में से किसी ने महेष
को वहां देखा अथवा पनडुब्बियों में सवार लोगों की या गोताखोरों की महासागर में
विष्णु से भेंट हुई हो या फिर पृथ्वी के सैलानियों का साक्षात्कार ब्रह्मा से
हुआ हो। आधुनिक युग विज्ञान का है, लोग विषेषतः युवाजन इस रहस्य को तर्क के
आधार पर वैज्ञानिक दृष्टि से देखना व समझना चाहते हैं। वैसे विज्ञान की दृष्टि
प्रकृति के समक्ष बहुत ही सीमित है। प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ कृति मनुष्य को
माना गया है। वस्तुतः मनुष्य ने ही स्वयं को इस उपाधि से विभूषित किया है।
परन्तु यदि सूक्ष्मतः विचार किया जाये तो मनुष्यषरीर ब्रह्माण्ड का ही लघु रूप
भासित होगा।
सृष्टि में सर्वप्रथम है जन्म और जन्मदाता है ब्रह्म जिसका निवास है नाभिकमल -
मनुष्यषरीर में नाभि और उसके नीचे का भाग - प्रजनन तंत्र। गीता में श्रीकृष्ण
कहते हैं ‘मम योनि मद्धब्रह्म तस्मन्गर्भ द्दाम्यहम्’ (14-3)’ ‘तासां ब्रह्म
मध्द्योनिरहं बीजप्रदः पिता (14-4)’।’ ब्रह्मा द्वारा अर्थात प्रजनन प्रणाली
में पुरुष केषुक्राणु (बीज) का स्त्री योनि द्वारा गर्भ में प्रवेष और वहां
जीवांड से मिलन के विस्फोट से नये जीव की रचना होती है। वनस्पतिषास्त्र के
अनुसार भी बीज का पृथ्वी रूपी योनि में प्रवेष से पेड़ पौधों की उत्पत्ति होती
है। यह ही है सृष्टि का आदि जिसका संचालन ब्रह्मा द्वारा नाभि से प्रजनन तंत्र
द्वारा होता है। गर्भस्थषिषु का पोषण भी उसके बाहर आने तक नाभिनाल द्वारा होता
है।
विष्णु का निवास स्थान जल में बताया गया है और मनुष्यषरीर में विष्णु का निवास
हृदय में है। हृदय में जल रक्त के रूप में है। विष्णु का दायित्व है प्राणी के
अस्तित्व को स्थापित करना, जीवन की रक्षा करना, पोषण करना। नाभि के ऊपर से गले
तक का भाग विष्णु का क्षेत्र है। प्राणी जो भी खाद्य वस्तु ग्रहण करता है उसे
पाचन प्रणाली की प्रक्रिया द्वारा सत्व में परिवर्तित किया जाता है। इस प्रणाली
में खाद्य नलिका, जठर, यकृत, आंतें, तथा गुर्दे आते हैं। यह पूरा तंत्र ग्रहण
किये हुए पदार्थाें से सत्व निकालकर उसे रक्त में परिवर्तित करषेष अवांछित
पदार्थों कोषरीर के बाहर निकाल देता है। पाचन तंत्र से रक्त हृदय में पहुंचता
है जहां से फेफड़ों में सेषुद्ध होकर वह पुनः हृदय द्वारा पूरेषरीर में संचारित
होकरषरीर को पुष्ट करता है। ये दोनों प्रणालियां पाचन व रक्त प्रसारण
प्रणालियांषरीर को सत्व प्रदान करती है। जीवन की रक्षा करती हैं और ये
दोनोंषरीर के मध्य भाग में स्थित हैं। अतः इस क्षेत्र को विष्णु के आधिपत्य में
माना जाना चाहिये।
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- यत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे - ( लेखक श्री सुदर्शन शर्मा "रथांग" मुंबई )
महेश का निवास गगनचुम्बी कैलाष पर अर्थात पृथ्वी के उच्चतम षिखर पर बताया गया
है। मनुष्यषरीर में उच्चतम स्थान है मस्तक का। यहीं मन मस्तिष्क में महेष
बिराजते हैं। महेष, महा ईष्वर के तीन प्रमुख रूप हैं, षिव,षंकर और प्रलयंकर ।
महेष जब समाधिस्थ है,षांत है, स्थिर है तोवह षिव है अर्थात कल्याणकारी है।षरीर
स्वस्थ व नीरोगी रहता है। गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है, ‘ईष्वर सर्वभूतानां
हृद्देरोऽर्जुन तिष्ठति, भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्ररूढानि माद्यया’ (18-61)।
ईष्वरषब्द का प्रयोग अब तो सर्वसाधारणतः भगवान के लिए किया जाता है परन्तु
प्राचीन काल में ईष्वरषब्द महेष, महादेव, षिव के लिए ही प्रयुक्त होता था।
उपरोक्त गीता के ष्लोकानुसार ईष्वर सभी के अन्तस में बैठकर अपनी माया द्वारा
प्राणियों को यन्त्रवत घुमाकर भ्रमित करता है। ईष्वर की यह माया कौन है! मन
मस्तिष्क हृदेष में उपजे काम, लोभ, मद, मोह व अहंकार के भाव। कहते हैं कंकर
कंकर मेंषंकर है। यह महेष काषंकर रूप मनुष्य के मन में काम, लोभ, मोहादि के
कंकर मारता रहता है।षांत सरोवर में कंकर फेंकने से लहरें उत्पन्न होती हैं, जल
में उद्विग्नता आती है। कंकर की तीव्रता पर उद्विग्नता निर्भर करती है। अर्जुन
के मन पर मोह रूपी पाषाण ने ऐसा प्रहार किया कि उसके मुंह से स्वीकारोक्ति
निकली, ‘न च षक्नोम्यवस्थातंु भ्रमतीव च मे मनः’ (1-30) मेरा मन भ्रमित हो रहा
है और मैं खड़े रहने में भी असमर्थ हूं। ईष्वर की इस माया से उत्पन्न
उद्विग्नता, तनाव का प्रभावषरीर की अन्य प्रणालियों पर भी पड़ता है। उनमें दोष
उत्पन्न होते हैं जो विभिन्न रोगों के रूप में प्रकट होते हैं औरषरीर मृत्यु की
ओर अग्रसर होने लगता है। महेष का महाभयंकरषस्त्र है त्रिषूल - क्रोध जिसकी
तुलना अग्नि से की गयी है। जब यह क्रोध का त्रिषूल चलता है तो जैसेषरीर में
प्रलयंकारी अग्नि प्रज्वलित हो उठती है। मस्तक में स्थापित सारे अवयव मानो आग
उगलने लगते हैं। आंखें लाल, नथुने फूली हुई, उनसे गर्म सांसें निकलती रहती हैं,
कानों सेजैसे धुआं निकल रहा हो, मंुह से लार टपकने लगती है। यह महेष का
प्रलयंकर स्वरूप है जिसका परिणाम नाष है, संहार है। इस अवस्था में मनुष्य या तो
दूसरों पर आधात करता है या स्वयं पर। दोनों स्थितियों में मृत्यु की संभावना
प्रबल होती है।
मनुष्य अधिकतर महेष के इस प्रलयंकारी स्वरूप से डरकर उसका पूजन करता है। मृत्यु
जीवन का सत्य है परन्तु लोग जितना हो सके उसे टालने का प्रयास करते हैं। उसके
लिए महामृत्युञ््य जपादि भी करते हैं।इसके दो कारण हैं, मोह और भय। जीवन में जो
कुछ कमाया, रिष्ते नाते, धनादि, उन्हें मोह के कारण छोड़ने को मन नहीं करता।
मृत्यु के बाद क्या! दुर्गति का भय भी रहता है। एक विद्वान मनीषी ने मृत्युपर
पुस्तक लिखी है जिसमें मृत्यु की बड़ी प्रषंसा की गयी है। मृत्यु के साथ
विस्मृति जुड़ी रहती है। भारतीय समाज, विषेषतः हिन्दू समाज पुनर्जन्म में
विष्वास करता है। इस पुनर्जन्म की कितनी कथाएं पौराणिकषास्त्रों में देखी जा
सकती हैं। स्वयं श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि उनके तथा अर्जुन के बहुत से
जन्म हो गये हैं, श्रीकृष्ण को तो उनके गत जन्मों की जानकारी है परन्तु अर्जुन
को उसके जन्मों की नहीं। बहूनि में व्यतीतानि जन्मानि तव यार्जुन। तान्यहं वेद
सर्वाणि न त्वं वेत्ध परन्तप (4-5)। मनुष्य केे एक जन्म में ही इतने दुख सुखादि
होते हैं और यदि मृत्यु के साथ पूर्वजन्म की स्मृति बनी रहती है तो कैसी
विचित्र स्थिति पैदा होती। पूर्वजन्मों के दुखों की पीड़ा से इस जन्म में मन
व्याकुल रहता। पूर्वजन्मों के सभीषत्रु मनुष्य, पषु पक्षी आदि एक साथ इस जन्म
में सामने आकर खड़े हो जाते तो बचना कठिन हो जाता। इन सभी दुखों से छुटकारे का
प्रकृति ने एकही रामबाण औषधि प्रदान कर दी - विस्मृति। मृत्यु हुई कि अगले जन्म
में पुनष्च हरिओम्।
ये तो हुई प्रकृति की बातें। पुरुष का, परब्रह्म का सरनामा! प्रारंभ में कहा
गया कि परमात्मा को समझने के लिए उनकी उपमा आकाष से की गयी है, निरभ्र स्वच्छ
आकाष। पंचमहाभूतों में मूल तत्व आकाष से मनुष्य का अन्तःकरण बना है। इस
अन्तःकरण का एक भाग है चित्त। इसे चिदाकाष भी कहा गया है। जब तक बाह्य
प्राकृतिक आकाष में बादल छाये रहते हैं, हमें आकाष दिखाई नहीं देता। उसी प्रकार
यह चिदाकाष जब तक स्मृतियों से अर्थात भौतिक प्रतिबिंबों से मुक्त नहीं होता
उसमें परमात्मा के दर्षन नहीं होते। मनुष्य कोे अभ्यास द्वारा धीरे धीरे चित्त
से इन बाह्य पदार्थों के बिंबों तथा मानसिक भावों को निकाल इसे रिक्त करना
होगा। यह रिक्तषांत चित्त ही पुरुष है। परमात्मा है जिसे ही सत् चित् आनंद कहा
गया है। ऐसे कहा गया है कि सर्वप्रथम नाद ब्रह्म की अउम के स्वरूप में उत्पत्ति
हुई।इसमें से अ से ब्रह्मा, ऊं से विष्णु तथा म से महेष षिव की उत्पत्ति मानी
गयी। अउम का जप करते समय अ के उच्चारण से नाभिकमल जो ब्रह्मा का स्थान है वह
प्रभावित होता है। यहां से ही कुण्डलिनिषक्ति का उद्गम बताया गया है। ऊ ंके
उच्चारण से हृदय चक्र जो विष्णु का स्थान है, वह प्रभावित होता है।
कुण्डलिनिषक्ति यहां से होती हुई ऊर्ध्वगामी होती है। म -षब्द से मस्तिष्क
झंकृत होता है, यह षिव का स्थान है। यहांषक्ति का षिव से समागम होता है। अउम
द्वारा ब्रह्मा, विष्णु और महेष तीनों का संगम एक रूप प्रकृति की पुरुष में
विलीनता,षक्ति षिव में समा गयी। द्वैत समाप्त, अद्वैतषांति। इस स्थिति में आकर
आदिषंकराचार्य के मुख से निकला ‘चिदानन्द रूप षिवोऽहम् षिवोऽहम्’।
इस प्रकार ऋषियों की उक्ति सिद्ध हुई, यत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे।
writer - सुदर्शन शर्मा ‘रथांग’ मुंबई
prastuti --- Mohan Thanvi  - विश्वास वाचनालय बीकानेर