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Showing posts from March, 2014

जब आम आदमी अधिकार मांगता है..

जब आम आदमी अधिकार मांगता है...
अफरातफरी की इस बेला में राजनीति से बोझिल माहौल में भी जब आम आदमी खुद के दम पर अपने वर्ग, अपने समाज के हित में अधिकार मांगने के लिए मुट्ठियां तान लेता है तब भी...,  नहीं चाहते हुए भी राजनीति की बू से घिरा लगता है। क्यों... ? सवाल यह है कि...जब आम आदमी अधिकार मांगता है तो कैसा महसूस होता है... ? उसे खुद को, उसके साथियों को, उसके अधिकारियों को, उसके परिवारजनों को ? उसके पड़ोसियों को... उसके... उसके... उसके और उसके उन सब को... जो उसके आसपास हैं... जिनके दायरे में वह है ? जरूरी नहीं कि हर कोई वाजिब अधिकारों की ही मांग करता हो... दूसरे पहलू भी गौरतलब होते हैं। क्योंकि... अधिकार की बात जहां आती है वहां शासन और समाज के नियम कायदे, कानून, परंपरागत जीवनशैली पहले से मौजूद होना स्वाभाविक है। राजनीति होना भी बड़ी बात नहीं। पिछले दिनों ( बीकानेर में राजस्थान राज्य अभिलेखागार ) एक सेमिनार में सदियों पहले की परिस्थितियों में लोगों के एक रियासत से दूसरी रियासत की ओर पलायन पर विषय विशेषज्ञ की विवेचना सुनने का अवसर मिला। इन प्रखर वक्ता का कहना था, तत्कालीन परिस्थितियों में ज…

bahubhashi: कूचु ऐं शिकस्त...1300 साल पहले...

bahubhashi: कूचु ऐं शिकस्त...1300 साल पहले...: पंजाब केसरी राजस्थान संस्करण में ...  18 Dec 2012   (श्री राजेंद्र सैन)  ऐतिहासिक उपन्यास कूचु ऐं शिकस्त...1300 साल पहले का कथानक ...

मन कबूतर पंख पसारता यहां...

Aawo meet... Geet vahi gaate hain... ये रोषनी हमारे लिए है... हमारे लिए है... ये खुषियां हमारे लिए है... हमारे लिए है... आषाओं का सागर लहराता यहां... मन कबूतर पंख पसारता यहां... विष्वास की मजबूत डोर से बंधे हैं सभी... निराषा की जगह यहां नहीं है नहीं... ये रोषनी हमारे लिए है... हमारे लिए है... ये खुषियां हमारे लिए है... हमारे लिए है...

bahubhashi: गौरैया के घोंसले पे

bahubhashi: गौरैया के घोंसले पे: धूप ने दीवार को सहलाया ... उसे मिली राहत ... गौरैया के घोंसले पे जमी बर्फ भी पिघल गई ... मतवाली हुई हवा ... आशा क...

गौरैया के घोंसले पे

धूप ने दीवार को सहलाया ... उसे मिली राहत ... गौरैया के घोंसले पे जमी बर्फ भी पिघल गई ... मतवाली हुई हवा ... आशा के गीत गूंज उठे ... दूर हुआ निराशा का साया !..

होली पर... इश्क में... क्या हाल बना लिया

होली पर इश्क में मोहन ऐसा क्या हाल बना लिया होली आई मगर पानी मिलना दुश्वार हो गया न छोटों की आंख में बड़ों के लिए पानी न नलों में ही आता पीने योग्य साफ पानी होली पर इश्क के रंग में रंग गया मोहन दुनिया को भूल गया मोहन मोहन करती रही गोपियां मोहन पिचकारी संग ले गया

होली पर... इश्क में... क्या हाल बना लिया

होली पर इश्क में मोहन ऐसा क्या हाल बना लिया होली आई मगर पानी मिलना दुश्वार हो गया न छोटों की आंख में बड़ों के लिए पानी न नलों में ही आता पीने योग्य साफ पानी होली पर इश्क के रंग में रंग गया मोहन दुनिया को भूल गया मोहन मोहन करती रही गोपियां मोहन पिचकारी संग ले गया

होली पर... इश्क में... क्या हाल बना लिया

होली पर इश्क में मोहन ऐसा क्या हाल बना लिया होली आई मगर पानी मिलना दुश्वार हो गया न छोटों की आंख में बड़ों के लिए पानी न नलों में ही आता पीने योग्य साफ पानी होली पर इश्क के रंग में रंग गया मोहन दुनिया को भूल गया मोहन मोहन करती रही गोपियां मोहन पिचकारी संग ले गया

एक संपादक का सच...

एक संपादक का सच... मुझे नहीं लगता था कि मेरे प्रकाशक महोदय को कुछ कहानियों में से एक का यह शीर्षक संग्रह के लिए आकर्षक लगेगा... अब बारी प्रकाशन की है। देखते हैं कब नंबर लगता है। कहानी उस खबर पर केंद्रित है जो संपादक महोदय ने अपने पाक्षिक में छापी लेकिन फिर उस खबर को देने वाले संपादक के सूत्रों सहित हर पक्ष उसे झुठलाने में जुट गया... फिर ऐसा कुछ हुआ कि... संपादक का सच सभी को मानना ही पड़ा...।

कब से ताक रहा था परेशां सूरज कोहरे में सिमटा रास्ता जमीं चूमने को बेताब थी किरणें - शुभ मंगल दिवस साथियों... नमस्कार।

कब से ताक रहा था परेशां सूरज कोहरे में सिमटा रास्ता जमीं चूमने को बेताब थी किरणें - शुभ मंगल दिवस साथियों... नमस्कार।

दिल की सल्तनत के ये बेताज बादशाह

दिल की सल्तनत के ये बेताज बादशाह
( प्रमुख अंश ) - प्रदीप भटनागर,
... नगर बीकाणा में भी कई राजा भोज, शहंशाह अकबर और सम्राट कृष्णदेव राय हुए हैं। उनके पास सत्ता और साम्राज्य भी नहीं रहा। इनके रीते हाथों ने सृजन-धर्मियों की पीठ थपथपाकर उनके रचना संसार को पल्लवित और विकसित करने में महती भूमिका निभाई है। हां जी। मेरी मुराद उन रेस्टोरेंट और पान भंडार के मालिकों से है जहां संस्कृतिकर्मियों ने चाय/कॉफी की एक बटा दो प्याली के बाद पान के साथ जुगाली की है। एक-दूसरे से बतियाते हुए  रातें गुजारी है। सृजन किया है। सुना है-सुनाया है। आलोचनाएं-समालोचनाएं व समीक्षाएं की है। कई नाटकों के वाचन और पूर्वाभ्यास भी किए हैं। कोटगेट के भीतर जहां आज हिम्मत मेडिकोज है कभी वहां देर रात तक खुला रहने वाला लालचंद भादाणी का होटल ‘गणेश मिष्ठान्न भंडार’ था; एक ओर जहां होटल के अंदर बुलाकीदास ‘‘बावरा’’, ए वी कमल, वासु आचार्य और नवल बीकानेरी चाय की प्याली में कविताओं के तूफान उठाते थे, तो दूसरी ओर होटल के बाहर लगी बुलाकी दास भादाणी की पान की दुकान पर अभय प्रकाश भटनागर, मनोहर चावला, महबूब अली और मांगीलाल माथुर पान चबाते हु…