Sunday, March 30, 2014

जब आम आदमी अधिकार मांगता है..

Mohan Thanvi
जब आम आदमी अधिकार मांगता है...
अफरातफरी की इस बेला में राजनीति से बोझिल माहौल में भी जब आम आदमी खुद के दम पर अपने वर्ग, अपने समाज के हित में अधिकार मांगने के लिए मुट्ठियां तान लेता है तब भी...,  नहीं चाहते हुए भी राजनीति की बू से घिरा लगता है। क्यों... ? सवाल यह है कि...जब आम आदमी अधिकार मांगता है तो कैसा महसूस होता है... ? उसे खुद को, उसके साथियों को, उसके अधिकारियों को, उसके परिवारजनों को ? उसके पड़ोसियों को... उसके... उसके... उसके और उसके उन सब को... जो उसके आसपास हैं... जिनके दायरे में वह है ? जरूरी नहीं कि हर कोई वाजिब अधिकारों की ही मांग करता हो... दूसरे पहलू भी गौरतलब होते हैं। क्योंकि... अधिकार की बात जहां आती है वहां शासन और समाज के नियम कायदे, कानून, परंपरागत जीवनशैली पहले से मौजूद होना स्वाभाविक है। राजनीति होना भी बड़ी बात नहीं। पिछले दिनों ( बीकानेर में राजस्थान राज्य अभिलेखागार ) एक सेमिनार में सदियों पहले की परिस्थितियों में लोगों के एक रियासत से दूसरी रियासत की ओर पलायन पर विषय विशेषज्ञ की विवेचना सुनने का अवसर मिला। इन प्रखर वक्ता का कहना था, तत्कालीन परिस्थितियों में जब आम आदमी की आय बढ़ने का कोई मार्ग दिखाई नहीं देता तब भी उस पर करों का बोझ लाद दिया जाता तब वह राहत पाने एक से दूसरी रियासत की ओर बढ़ता मगर ... चहुंओर एक-सी स्थिति में उसे राहत मिलना तो दूर बल्कि पीढ़ियों से स्थापित अपने गृह-गांव, जमीन-जायदाद से भी वंचित हो जाता था। विचार उमड़ता है... ... ऐसे में आम आदमी के अधिकार की बात कौन उठाए... वह खुद अपने अधिकार कैसे और किससे मांगे ? स्थितियों से संघर्ष कर शायद वह सफल हो सके लेकिन पलायन को तो पराजय के समान माना जाता है। यूं भी अधिकांश मामलों में पलायन कर्ता अकेला हो जाता है ... या नहीं ? पलायन चाहे सामूहिक रूप से होता रहा हो किंतु कुछ परिस्थितियों को छोड़ कर पलायन को अच्छी बात के रूप में नहीं लिया जा सकता...। क्योंकि... कतिपय अपवाद की स्थितियांें को छोड़ कर संभवतः अधिकार एक अकेले का जाया जन्मा नहीं हो सकता। अधिकार कम से कम दो जनों के मध्य होना चाहिए... शायद... ! इस सोच के मध्य नजर अधिकार पाने वाले को दूसरे, तीसरे... चौथे... अनेकानेक पक्षों के अधिकार का भी भान होना चाहिए... शायद ऐसा हो... शायद ऐसा न होता हो। जब आम आदमी अधिकार मांगता है तो सर्वप्रथम उसे यह महसूस होता होगा... वह जागरूक हो गया है अपने अधिकारों के प्रति। मगर क्या उसे यह महसूस नहीं होता होगा कि वह अन्य पक्षों के लिए भी जागरूक है... या फिर ... उसे दूसरों के प्रति भी जागरूक होना चाहिए ! कई मायनों में आम आदमी का अधिकार मांगना बहुत अच्छा लगता है... खासतौर से तब जब उसके मांगे हुए अधिकारों में ‘‘सर्व समाज’’ का भी लाभ निहित होता है। समाज और शासन से जुड़े विषयों पर जागरूकता एक अच्छी बात है मगर राजनीति के नजरिये से जागरूकता के कई पहलू दिखाई देते हैं... खासतौर से चुनावी वातावरण में ऐसा महसूस होता है मानो अधिकारों की बात कह कर राजनीतिक दुनिया से जुड़े लोग अपने वोट बैंक के सदस्य बढ़ाने की मार्केटिंग करने निकल पड़े हों। ऐसे में आम आदमी जब खुद के दम पर अपने वर्ग, अपने समाज के हित में अधिकार मांगने के लिए मुट्ठियां तान लेता है तब भी...,  नहीं चाहते हुए भी राजनीति की बू से घिरा लगता है।

Tuesday, March 25, 2014

bahubhashi: कूचु ऐं शिकस्त...1300 साल पहले...

bahubhashi: कूचु ऐं शिकस्त...1300 साल पहले...: पंजाब केसरी राजस्थान संस्करण में ...  18 Dec 2012   (श्री राजेंद्र सैन)  ऐतिहासिक उपन्यास कूचु ऐं शिकस्त...1300 साल पहले का कथानक ...

Thursday, March 20, 2014

मन कबूतर पंख पसारता यहां...

Aawo meet... Geet vahi gaate hain... ये रोषनी हमारे लिए है... हमारे लिए है... ये खुषियां हमारे लिए है... हमारे लिए है... आषाओं का सागर लहराता यहां... मन कबूतर पंख पसारता यहां... विष्वास की मजबूत डोर से बंधे हैं सभी... निराषा की जगह यहां नहीं है नहीं... ये रोषनी हमारे लिए है... हमारे लिए है... ये खुषियां हमारे लिए है... हमारे लिए है...

Tuesday, March 18, 2014

bahubhashi: गौरैया के घोंसले पे

bahubhashi: गौरैया के घोंसले पे: धूप ने दीवार को सहलाया ... उसे मिली राहत ... गौरैया के घोंसले पे जमी बर्फ भी पिघल गई ... मतवाली हुई हवा ... आशा क...

गौरैया के घोंसले पे

धूप ने दीवार को सहलाया ... उसे मिली राहत ... गौरैया के घोंसले पे जमी बर्फ भी पिघल गई ... मतवाली हुई हवा ... आशा के गीत गूंज उठे ... दूर हुआ निराशा का साया !..

Saturday, March 15, 2014

होली पर... इश्क में... क्या हाल बना लिया

होली पर इश्क में मोहन ऐसा क्या हाल बना लिया होली आई मगर पानी मिलना दुश्वार हो गया न छोटों की आंख में बड़ों के लिए पानी न नलों में ही आता पीने योग्य साफ पानी होली पर इश्क के रंग में रंग गया मोहन दुनिया को भूल गया मोहन मोहन करती रही गोपियां मोहन पिचकारी संग ले गया

होली पर... इश्क में... क्या हाल बना लिया

होली पर इश्क में मोहन ऐसा क्या हाल बना लिया होली आई मगर पानी मिलना दुश्वार हो गया न छोटों की आंख में बड़ों के लिए पानी न नलों में ही आता पीने योग्य साफ पानी होली पर इश्क के रंग में रंग गया मोहन दुनिया को भूल गया मोहन मोहन करती रही गोपियां मोहन पिचकारी संग ले गया

होली पर... इश्क में... क्या हाल बना लिया

होली पर इश्क में मोहन ऐसा क्या हाल बना लिया होली आई मगर पानी मिलना दुश्वार हो गया न छोटों की आंख में बड़ों के लिए पानी न नलों में ही आता पीने योग्य साफ पानी होली पर इश्क के रंग में रंग गया मोहन दुनिया को भूल गया मोहन मोहन करती रही गोपियां मोहन पिचकारी संग ले गया

एक संपादक का सच...

एक संपादक का सच... मुझे नहीं लगता था कि मेरे प्रकाशक महोदय को कुछ कहानियों में से एक का यह शीर्षक संग्रह के लिए आकर्षक लगेगा... अब बारी प्रकाशन की है। देखते हैं कब नंबर लगता है। कहानी उस खबर पर केंद्रित है जो संपादक महोदय ने अपने पाक्षिक में छापी लेकिन फिर उस खबर को देने वाले संपादक के सूत्रों सहित हर पक्ष उसे झुठलाने में जुट गया... फिर ऐसा कुछ हुआ कि... संपादक का सच सभी को मानना ही पड़ा...।

Thursday, March 6, 2014

कब से ताक रहा था परेशां सूरज कोहरे में सिमटा रास्ता जमीं चूमने को बेताब थी किरणें - शुभ मंगल दिवस साथियों... नमस्कार।

कब से ताक रहा था परेशां सूरज कोहरे में सिमटा रास्ता जमीं चूमने को बेताब थी किरणें - शुभ मंगल दिवस साथियों... नमस्कार।

Tuesday, March 4, 2014

दिल की सल्तनत के ये बेताज बादशाह

दिल की सल्तनत के ये बेताज बादशाह
( प्रमुख अंश ) - प्रदीप भटनागर,
... नगर बीकाणा में भी कई राजा भोज, शहंशाह अकबर और सम्राट कृष्णदेव राय हुए हैं। उनके पास सत्ता और साम्राज्य भी नहीं रहा। इनके रीते हाथों ने सृजन-धर्मियों की पीठ थपथपाकर उनके रचना संसार को पल्लवित और विकसित करने में महती भूमिका निभाई है। हां जी। मेरी मुराद उन रेस्टोरेंट और पान भंडार के मालिकों से है जहां संस्कृतिकर्मियों ने चाय/कॉफी की एक बटा दो प्याली के बाद पान के साथ जुगाली की है। एक-दूसरे से बतियाते हुए  रातें गुजारी है। सृजन किया है। सुना है-सुनाया है। आलोचनाएं-समालोचनाएं व समीक्षाएं की है। कई नाटकों के वाचन और पूर्वाभ्यास भी किए हैं। कोटगेट के भीतर जहां आज हिम्मत मेडिकोज है कभी वहां देर रात तक खुला रहने वाला लालचंद भादाणी का होटल ‘गणेश मिष्ठान्न भंडार’ था; एक ओर जहां होटल के अंदर बुलाकीदास ‘‘बावरा’’, ए वी कमल, वासु आचार्य और नवल बीकानेरी चाय की प्याली में कविताओं के तूफान उठाते थे, तो दूसरी ओर होटल के बाहर लगी बुलाकी दास भादाणी की पान की दुकान पर अभय प्रकाश भटनागर, मनोहर चावला, महबूब अली और मांगीलाल माथुर पान चबाते हुए भिन्न भिन्न विषयों पर बतियाते नजर आते थे। पान का जिक्र आए और गुणप्रकाश सज्जनालय के पास अभी भी आबाद ‘दाऊ पान भंडार’ की याद न आए। भला ऐसे कैसे हो सकता है। आज ही तो भाई बुलाकी शर्मा ने दाऊलाल भादाणी से मिलवाया था। उन्होंने क्या जायकेदार पान खिलाया था। दाऊ पान भंडार और दाऊजी के बारे में बहुत कुछ सुना था। थोड़ा बहुत देखा भी था। लगे हाथों पूछ ही लिया: ‘‘ कौन-कौन आता था आपकी दुकान पर ? ’’ हाथोंहाथ जवाब मिला - ‘ ये पूछिए कौन नहीं आता था। नंद किशोर आचार्य, हरीश भादाणी, भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’, मोहम्मद सदीक, भीम पांडिया, कांति कोचर, अजीज आजाद, मालचंद तिवाड़ी, दीपचंद सांखला। सभी तो आते थे; वो लोग-वो समय याद आता है सब। पर वो बात कहां है अब।’’ कहते कहते दाऊजी भावनाओं में बह गए। भावुकता से बचने के लिए मैं भी केईएम रोड की तरफ निकल आया।... (दैनिक युगपक्ष में प्रकाशित रंगचर्चा से साभार)