Tuesday, May 21, 2013

अच्छी भई, गुड़ सत्तरह सेर


अच्छी भई, गुड़ सत्तरह सेर

आज का युग बाजारवाद से घिरा है। भाव-भंगिमाएं तो बिकती ही रही हैं। यहां भावनाएं भी बिकने लगी हैं। महंगाई के बोझ तले दबे गरीब को महलों के सपने दिखाने का सिलसिला थमता नहीं दिखता... हां... तरीका जरूर बदलता रहता है। आम आदमी भी बाजार की ऐसी चाल को अब समझ गया है और इसी वजह से किसी वस्तु की कीमतें यकायक बढ़ा दिए जाने पर बोल उठता है... बारह रुपए बढ़ाए हैं तीन रुपए कम कर देंगे और कहेंगे अच्छी भई, गुड़ सत्तरह सेर। यानी सस्ताई का जमाना ले आए। गुड़ का प्रचलन भले ही कम हो गया है लेकिन हमारी परंपराओं में, धर्म-संस्कृति में, अनुष्ठानों में और सामाजिक रीति रिवाजों में गुड़ की महत्ता बराबर अपनी गरिमा बनाए हुए है। बधाई में गुड़ आज भी बांटा जाता है। पूजा पाठ में श्रीगणेश जी को गुड़ से प्रसन्न किया जाता है। और... कहावतों में गुरु गुड़ ही रहा चेला शक्कर बन गया भले ही कहा जाता हो लेकिन बाजार में चीनी की कीमतों के मुकाबले गुड़ की कीमत सुर्खियों में रहती है। महंगाई को गुड़ की कीमत की तराजू पर आज नहीं बल्कि 18 वीं शताब्दी के आखिरी दशकों में भी तौला जाता था। कोई वस्तु जब बहुत सस्ती या आसानी से मिल जाए तो आज भी कहा जाता है, अच्छा है खाओ मौज उड़ाओ। 1885 में गुड़ एक रुपए में दस सेर मिलता था इसकी जानकारी कहावत कोष में एस डब्ल्यू फैलन की कलम से मिलती है। उस समय में गुड़ एक रुपए का दस सेर मिलता था और इससे भी सस्ता किसी को मिल जाए तो वाह वाह! बाजारवाद तब नहीं भी होगा तब भी कीमतें बढ़ने घटने का प्रभाव तो समाज पर पड़ता ही था यह तय है और यह भी कि भावनाओं का व्यापार भी होता रहा है। नाट्य विधा के विभिन्न रूपों में भाव-भंगिमाओं का प्रमुख स्थान है और सबसे महत्वपूर्ण है भावना प्रदर्शन। किसी दार्शनिक ने अपने अनुभवों को शब्द दिए - जिंदगी एक नाटक है। बाजार भी इसका एक हिस्सा है और राज के काज या सेठ साहूकारों के निज कार्यों के अलावा बाजार में समर्थ लोग असमर्थ का शोषण भावनाओं की कीमत तय करके ही कर पाते हैं। यदि कोई असमर्थ नहीं है तो कितना भी समर्थ उसका शोषण नहीं कर सकता। महंगाई भी आर्थिक रूप से कमजोर और अधिक आय अर्जित कर पाने में असमर्थ को ही अपनी चपेट में लेती है। इसीलिए श्रमिक संघ और श्रमिक नेता एकता का आह्वान करते हुए मजदूर वर्ग को समर्थ बनने के लिए संघर्ष का संदेश देेते हैं। और यह सर्वविदित है कि जो भावनाओं पर काबू रख सकता है उसके लिए गुड़ सस्ता हो या महंगा, गुड़ तो गुड़ है और गुड़ हमेशा मीठा ही होता है। जय हो ।