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Showing posts from October, 2012

भासा अ’र देस री बात्यां कागद माथै उकेर आजादी री अलख जगाई / राजस्थानी उपन्यास *कुसुम संतो* से

याद राखणौ जरूरी है कै 1857 रै जुद्ध रै बाद भारतेन्दु अष्र दूजा कवि भासा अष्र परतंत्र देस री बात्यां कागद माथै उकेर लोगां रै मन में आजादी री अलख जगाई ही ! ( राजस्थानी उपन्यास ’कुसुम संतो’ से  )...भाषा साहित्य मिनख.मिनख नै जोड़ै! देस री एकता रै वास्तै भासा अेक जरियो बणै! आ बात कैई जा सकै। जियांष्क विदेसियां रै आक्रमण सूं जद आपणै देस रो जनए या कैवां कै म्है लोग जद त्रस्त हुईग्या हाए बीं बखत साहित्यकार जगत जिकी एकता रो दरसण आपणी कलम सूं करायोए बा बात कोई दो.चार सताब्दियां में भी भूलीजणी आसान कोनी। बीं बखत किरसण भगवान रो बखान बिपती रै दिनां सूं छुटकारो पावण रो एक उपाय जियां लागै कैवां तो सायद गलत कोनी समझो जावैळा। सूरदास उण बगत स्री किरसनजी री लीलावां नै कागद माथै उकेर जीव.जगत नै जीवण रो नूवांे अंदाज दिरायो। राजपाट नै एक तरफां राख इब्राहीम मियां जद रसखान बण सकै तो समझणोें कै ओ भगती रो ई ज बखान है।  केरल रा एक महाराजा राम वर्मा ष्स्वाति तिरुनालष् रै नाम सूं कविता करता हा।  महारास्टर रा संत ज्ञानेस्वरए नामदेव अष्र सिन्धु प्रदेस  रा श्रीलालजी भी कवि ही नीं किरसनजी री लीलावां नै भगतां रै साम्है…

कृपालु संत साधु वासवानी जी / दादा श्याम जो भजन

कृपालु संत साधु वासवानी जी का यह भजन पूना से प्रकाशित श्याम साप्ताहिक से अरबी सिंधी से देवनागरी में रूपांतरित कर अपने नाटक कपालु संत में शामिल किया । यह नाटक अजमेर से प्रकाशित दैनिक हिंदू में अरबी सिंधी में  ( मोहन थानवी जी कलम मां कॉलम में ) 2011 प्रकाशित हो चुका है।  अलख धाम मां नाल्हे मौत तिनि लाइ, अंखियूंनि जिनि जूं निहारनि,
पहाड़नि त तिनि डे, जीअं प्यारनि खे पुकारनि!
रहनि रहम में से त आल्यिूंनि अंख्यिूंनि,
सबक इक त सिक जो, से आहिनि सुख्यूं!
पया था त कोठनि, प्रभुअ जा पहाड़ा!
अचनि यादु वरी वरी, पया से त प्यारा!
करे केरु दूर, प्यारनि जी जुदाई !
जीवन आहे जिनि जी, प्रभुअ में समाये!
मरे ही बदनु थो, जिस्मु ही जले,
पर आत्मा अमर, सदा पयो हले!
काल डिस जो घर, फकत काल ढाहे,
पर आत्मा अजरु ऐं अविनाशी आहे!
मरे कीअं कोई ऊंव, न कोई कीअं सड़े,
न कोई मौत परदो, रखी उन परे
अलख धाम मां आहे, नूरी निमाणी
रहे रोज रोषन, न रह तूं वेगाणी।

साथ जुड़ना ... हेनरी फ़ोर्ड (mahapurushon ki wani )

साथ जुड़ना एक शुरूआत है; साथ रहना प्रगति है और साथ काम करना ही सफलता है- हेनरी फ़ोर्ड

eid mubaraq ईद मुबारक

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ईद मुबारक eid mubaraq
ईद मुबारक eid mubaraq
ईद मुबारक eid mubaraq ईद मुबारक eid mubaraq  ईद मुबारक eid mubaraq  ईद मुबारक eid mubaraq  ईद मुबारक eid mubaraq
ईद मुबारक eid mubaraq
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ईद मुबारक eid mubaraq
ईद मुबारक eid mubaraq
ईद मुबारक
ईद मुबारक

हम और हमारा विश्वास

हम और हमारा विश्वास

वैश्वीकरण... दिखाउं जो आईना तो बड़ी बात

देखू जो आईना तो कोई बड़ी बात नहीं कहती है दुनिया
दिखाउं जो आईना तो बड़ी बात मान लेती है दुनिया...
...  
अल्बर्ट कैमस के क्रास प्रपोज पर आधारित हरिकांत जेठवानी रचित पांच पात्रीय सिंधी नाटक हत्या एक सपने की... पढ़ते समय अहसास हुआ कि हिंदी अंग्रेजी सिंधी राजस्थानी गुजराती मराठी या किन्हीं भी भाषाओं में रचे साहित्य को किसी भी भाषा में अनूदित कर साहित्यकार किस तरह सहजता सरलता से वैश्वीकरण में पाठक की महत्वपूर्ण भूमिका बना देते हैं ।

मां, रोटी भी क्यों गोल !

घर में तू बनाती
पेट भरने को
मां,
वह रोटी भी क्यों गोल !...

क्या हम भूख को देते धोखा
सच्ची बोल

मां, रोटी भी क्यों गोल!

मां, सारी दुनिया देती धोखा

चारों और हो रहा गोलमाल

लंबी, चपटी सब चीजों में भरी पोल

घर में तू बनाती पेट भरने को

मां, वह रोटी भी क्यों गोल!

क्या हम भूख को देते धोखा सच्ची बोल

सीखा तुझसे तोलमोल के बोल

मां, फिर भी सारी दुनिया देती धोखा

मानव-मानव में अपने पराये का जहर घोल

प्रकृति का खजाना स्वार्थ की चाबी से खोल

चांद-सूरज ठंडे-गरम मगर हैं वे भी गोल

मां, ऐसा कर कुछ समझे दुनिया सच्चाई का मोल

मां, सारी दुनिया में हो अपनापन

कहीं न हो कोई परेशान

सब तुझ-से हों निश्छल, ममतामयी

तू दे ऐसी घुट्टी बच्चों को मां

और घर में तू बनाती
पेट भरने को
मां,
वह रोटी भी क्यों गोल !...

क्या हम भूख को देते धोखा
सच्ची बोल

मां, रोटी भी क्यों गोल!

मां, सारी दुनिया देती धोखा

चारों और हो रहा गोलमाल

लंबी, चपटी सब चीजों में भरी पोल

घर में तू बनाती पेट भरने को

मां, वह रोटी भी क्यों गोल!

क्या हम भूख को देते धोखा सच्ची बोल

सीखा तुझसे तोलमोल के बोल

मां, फिर भी सारी दुनिया देती धोखा

मानव-मानव में अपने पराये का ज…

तितली बन पंख लगा ...

फ़ूल और तितली की तरह /
मुस्कुरा /
पंख लगा  /
काँटों में भी जी /
प्रकृति - समभाव आत्मसात कर !
तितली !
फ़ूल और तितली की तरह /
मुस्कुरा कर जीयें हम /
तितली बन पंख लगा कर जीयें हम /
काँटों में भी मुस्कुराएँ और फ़ूल बनकर जीयें हम /
फ़ूल - कांटे और तितली जैसे हिलमिल कर रहें हम /
फ़ूल और तितली की तरह ...मुस्कुरा कर जीयें हम...

प्रकृति के साथ रह कर हम समभाव से जीवन जीने की कला को आत्मसात कर सकते हैं !
ऐसे जैसे तितली ! प्रकृति के साथ नृत्य करती तितली...। तितली को देखकर बच्चे ही
नहीं बल्हि हर आयुवर्ग के लोग प्रसन्न होते हैं। खासतौर से बच्चों को तो मानो
तितली अपने पास बुलाती है... इसीलिए बाग बगीचे का नाम आते ही बच्चे सबसे पहले
तितली को याद करें तो आष्चर्य कैसा...! और ... हम भी ऐसे बन जाएँ की हर कोई
हमारे और हम हर किसी के पास जाकर प्रसन्न हों !

Life...

दूर हुआ निराशा का साया !..

पनघट पर... मुंह छुपाए... बेजुबान पशुओं के पास

घास
खाने को
नहीं मिलती
बरसात के बाद जल गई
तेज धूप से
मैं
पशुओं को ले
दर-दर भटकता रहा
षहर और गांवों में
टीवी, रेल, हवाई जहाज, आलीशान मकान
व्ैाज्ञानिकों का सम्मान
सबकुछ देखा
न देखा तो केवल कहीं बच्चों का स्वछन्द खेलना
कहीं हराभरा खेत और पशु धन के लिए
घास
संस्कृति एक कोने में दुबकी
गांव के पनघट पर
परंपरा मुंह छुपाए खड़ी
मेरे बेजुबान पशुओं के पास
जो निरीह आंखों से ढूंढ़ रहे
घास

दूसरो को भटकाने वाला अपने ही लक्ष्य से भटक जाता है

धुँआ कभी स्थिर और ठोस नहीं होता...  आने वाला समय अच्छा ही होता है...ऐसे बहुत
से वाकिये होते हैं जिन्हें दफ़न कर देना ही उचित होता है! मगर बदकिस्मती से मन
की भीतरी परतों मे दफ़न ऐसे वाकिये आंसुओ के साथ बाहर झाँकने आ ही जाते हैं...!
....और ...आंसुओ को भी बाहर न आने  के लिए पाबन्द किया हो तो ... फिर भावनाओ के
बहाव के साथ ज्वालामुखी के लावे की मानिंद वे दफ़न किस्से या कि वाकिये ...
द्वंद्व मचाते हुव़े चेहरे के सम्मुख धुआँ धुआँ  हो आकार ले लेते हैं....यादो
के भंवर का ...! तब वे साजिशी चेहरे भी धुऐं की लकीर बन सामने आ खड़े होते हैं
...जो शाश्वत सत्य को झुठला नही सकते ... बस ...उसके इर्द-गिर्द छाये रह कर उसे
उजागर होने से रोकने की भरसक कोशिश यानी .... साजिश रचते हैं ...किन्तु ...सभी
जानते हैं... धुआँ कभी ठोस और स्थिर नहीं हो सकता ...भले ही समय लगता है किन्तु
... ऐसे में आने वाला समय ...सदा अच्छा ही होता है... ऐसी नजीर मिलने पर ...
भीतर से सदा आती है ....
साजिश  में  मशगूल  / साजिशी  को  फुर्सत  नहीं  थी / सज्जन  साजगिरी  गुंजाता
/ सादगी  से  'पार ' पहुँच  गया.... ......( दूसरो को …

मानव कोटर में भरे कौस्तुभ (kavy sangrah(2007) me meri APNI BAAT)

अपनी बात

मानव कोटर में भरे कौस्तुभ

मानव कोटर (तन, मसितश्क) में कैसे-कैसे और कितने कौस्तुभ (रत्न) सहेजे हुए
है इसकी खोज आदि काल से जारी है। कम से कम हमारी भारतीय संस्कृति में अध्यात्म
इसी खोज के छोर की ओर ले जाता है। इतना सब कुछ जानते-बूझते भी हम चिंता
से मुक्त नहीं हो सके हैं। कन्फयूसियस का नाम लेकर अपने विदेषी ज्ञान का दम
भरने वाले देसी जानकारों के लिए यह विषय नाम कमाने का साधन हो सकता है।
जनता के लिए चिंता जताना नेताओं के लिए वोट बैंक तैयार करने का जरिया हो
सकता है। कलमकार के लिए अछूते विषय को खोजने का विषय भी हो सकता है। सचय
ही है कि आदि काल से चिंतन करने वाले विद्वान आज तक समाज को चिंता-मुक्त नहीं
कर सके। हर बार नये रूप में चिंता सामने आ ही जाती है।  

        यूं भी, चिंता हुर्इ तभी तो समुद्र मंथन से दैत्यों और देवताओं
को ऐसा कुछ मिला, जो अमृत और जहर की प्रकृति एवं संज्ञा से विभूशित हुआ।
बहुत-कुछ और पाने की चाह में सागर आज तक मथा जा रहा है। पता नहीं कब समुद्र
मंथन हुआ और जहर के साथ अमृत समाज को मिला। पौराणिक कथाओं में समुद्र
मंथन का वर्णन और उसकी विवेचना में भूत-भविष्य के कितने ह…

Lakhdaad... Madhu Acharya Aashawadi ji bikaner & All

badhaiyan.... lakhdaad... Madhu Acharya Aashawadi ji bikaner / Atul Kank ji Kota sahit prakashan ke liye pandulipi chayan par sambandhit  sabhi rajasthani sahitykaron ko lakhdaad ...
राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर के अध्यक्ष श्री श्याम महर्षि द्वारा वर्ष २०१२-१३ की पांडुलिपि सहयोग योजनान्तर्गत ५७ राजस्थानी पाण्डुलिपियों पर ५ लाख ७७ हजार रूपये की सहयोग राशि की घोषणा की गई है ।
स्वीकृति के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी देते हुए महर्च्चि ने बताया कि इस बार २० जिलों एवं एक प्रवासी राजस्थानीे साहित्यकारों की ५७ पाण्डुलिपियों को सहयोगार्थ स्वीकार किया गया है । स्वीकृत पाण्डुलिपियों में ३ उपन्यास, ११कहानी संग्रह,२१ गीत, गजल, हाइकू, दूहा एवं कविता संग्रह, २ नाटक की पाण्डुलिपियां, ३लोक साहित्य,   ४ अनुवाद कृतियां, २ आलोचना, ६ निबंध कृतियां और ५ बाल साहित्य की पाण्डुलिपियों को आर्थिक सहयोग स्वीकृत किया गया है ।  इस बार कुल १२ महिला रचनाकारों की पाण्डुलिपियों को स्वीकार किया गया है । उन्होंने बताया कि १६ कृतियों को १२-१२ हजार, ३६ पाण्डुलिपियों को १० हजार प्रत्येक या किएवं बाल सा…