जीवन का श्रम ताप हरो हे!सुख सुषुमा के मधुर स्वर्ण हे!सूने जग गृह द्वार भरो हे!लौटे गृह सब श्रान्त चराचरनीरव, तरु अधरों पर मर्मर,करुणानत निज कर पल्लव सेविश्व नीड प्रच्छाय करो हे!उदित शुक्र अब, अस्त भनु बल,स्तब्ध पवन, नत नयन पद्म दलतन्द्रिल पलकों में, निशि के शशि!सुखद स्वप्न वन कर विचरो हे!(सुमित्रानंदन पंत )
sundar hai... जिस दर पे कभी ताला न लगाऐ खुदा वो ही अपना घर देना... badhiya.
यहां व्यक्त कीजिए - खबर आपकी नजर में...
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जीवन का श्रम ताप हरो हे!
ReplyDeleteसुख सुषुमा के मधुर स्वर्ण हे!
सूने जग गृह द्वार भरो हे!
लौटे गृह सब श्रान्त चराचर
नीरव, तरु अधरों पर मर्मर,
करुणानत निज कर पल्लव से
विश्व नीड प्रच्छाय करो हे!
उदित शुक्र अब, अस्त भनु बल,
स्तब्ध पवन, नत नयन पद्म दल
तन्द्रिल पलकों में, निशि के शशि!
सुखद स्वप्न वन कर विचरो हे!
(सुमित्रानंदन पंत )
sundar hai... जिस दर पे कभी ताला न लगा
ReplyDeleteऐ खुदा वो ही अपना घर देना... badhiya.
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