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Showing posts from May, 2013

अच्छी भई, गुड़ सत्तरह सेर

अच्छी भई, गुड़ सत्तरह सेर आज का युग बाजारवाद से घिरा है। भाव-भंगिमाएं तो बिकती ही रही हैं। यहां भावनाएं भी बिकने लगी हैं। महंगाई के बोझ तले दबे गरीब को महलों के सपने दिखाने का सिलसिला थमता नहीं दिखता... हां... तरीका जरूर बदलता रहता है। आम आदमी भी बाजार की ऐसी चाल को अब समझ गया है और इसी वजह से किसी वस्तु की कीमतें यकायक बढ़ा दिए जाने पर बोल उठता है... बारह रुपए बढ़ाए हैं तीन रुपए कम कर देंगे और कहेंगे अच्छी भई, गुड़ सत्तरह सेर। यानी सस्ताई का जमाना ले आए। गुड़ का प्रचलन भले ही कम हो गया है लेकिन हमारी परंपराओं में, धर्म-संस्कृति में, अनुष्ठानों में और सामाजिक रीति रिवाजों में गुड़ की महत्ता बराबर अपनी गरिमा बनाए हुए है। बधाई में गुड़ आज भी बांटा जाता है। पूजा पाठ में श्रीगणेश जी को गुड़ से प्रसन्न किया जाता है। और... कहावतों में गुरु गुड़ ही रहा चेला शक्कर बन गया भले ही कहा जाता हो लेकिन बाजार में चीनी की कीमतों के मुकाबले गुड़ की कीमत सुर्खियों में रहती है। महंगाई को गुड़ की कीमत की तराजू पर आज नहीं बल्कि 18 वीं शताब्दी के आखिरी दशकों में भी तौला जाता था। कोई वस्तु जब बहुत सस्ती या आ…

... दूसरे ग्रह के प्राणी इस धरा पर आते थे ? एलियन... ?

... दूसरे ग्रह के प्राणी इस धरा पर आते थे ? एलियन... ?  दूसरे ग्रह के प्राणी इस धरा पर आते थे ? ? ?  जिन्हें हम आज एलियन संबोधन से जानने का प्रयास कर रहे हैं ! एलियन ऐसा ही पात्र है।    

बीते वर्षों में एलियन के पात्र के साथ सेलोलाइड पर रची गई मायावी रचना देखने वालों के लिए एलियन डरावना नहीं बल्कि मित्र समान बन गया। खास तौर से बच्चों के साथ फिल्माए एलियन पात्र के सीन लोगों में एलियन के प्रति लगाव का भाव जगाने वाले रहे। फिल्म थी कोई मिल गया। आज किसी के लिए एलियन नया शब्द नहीं है। भले ही किसी ने एलियन को देखा या नहीं देखा हो। एक और दुनिया भी है, वैज्ञानिकों की दुनिया। कितने ही  वैज्ञानिक हर बात, हर पात्र, हर चीज को अपने नजरिये से, विभिन्न पहलुओं से देखते और संभावनाएं तलाशते रहते हैं। एलियन के बारे में भी विज्ञान की दुनिया में शोध कार्य चलते रहे हैं। आम आदमी के मन में भी ऐसे अनजान किंतु समाज पर अपना प्रभाव डालने वाले पात्रों के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न होती है। ऐसे ही विचारो के साथ जब लोक कथाओं, पौराणिक कथाओं में कतिपय पात्रों की ओर ध्यान जाता है तो वे इस लोक के नहीं लगते। ऐसी कथाएं याद आ र…

रंगबिरंगी पतंगों से घिरा बीकानेर का आकाश

बीकानेर का आकाश रंगबिरंगी पतंगों से घिरा  गुनगुनाता है जिसे हर शख्स वो एक गजल है मेरा नगर ...! चंदा महोत्सव का आनंद आज भी उतना ही आया जितना कि बीते सालों में । दो तीन दिन से तो बीकानेर का आकाश रंगबिरंगी पतंगों से घिरा दिखा और अच्छा भी लगा। यादें जो जुड़ी हुई है बीकानेर की पतंगबाजी से। लड़तों से। लड़तें यानी... पतंगों के पेच। यानी पतंग प्रतियोगिता। छह भून की लटाई पक्के डोर की और चार चार पांच पांच लटाइयां सादे डोर की। भूण या भून यानी करीब 900 मीटर की दूरी के धागे का नाप।
सादुल स्कूल के आगे जेलवेल तक मांझा सूतने वालों की कतार। आज भी  मार्ग से निकलने पर ऐसा नजारा हुआ तो सुखद लगा। बीते दो तीन दिन तो शाम के समय आकाश में पतंगें  दिखी। आंधी बारिश भी आई और शनिवार का मौसम तो बल्ले बल्ले। किंतु वो समय भी याद आता है जब ऐसा माहौल और ऐसी पतंगबाजी आखातीज से महीना महीना पहले तक से दिखाई देने लगती थी। बीते दो तीन साल से महंगाई ने इस कदर अपना जाल बिछाया है कि आकाश से पतंगों का जाल खत्म - सा होता लगने लगा है।  सच कहूं । पतंगबाजी के लिए जुनून में वो बात नहीं दिखाई देती जो 21 वीं सदी के आगमन तक बरकरार थी।…