Wednesday, January 30, 2013

कुछ बहुत, कुछ - कुछ; कुछ बहुत कुछ, बहुत - कुछ

कुछ बहुत कुछ कहते हैं... बहुत कुछ कुछ नहीं कहते...!!!...कुछ लोग कुछ विशेष 
कार्य न करके भी कुछ न कुछ खासियत जोड़ कर कुछ न कुछ अपने ही बारे में बहुत 
लोगो को  कुछ बताते रहते हैं !!!.. जबकि ... बहुत लोग बहुत कुछ उल्लेखनीय कार्य 
करने के बाद भी कुछ लोगो को भी कुछ नहीं बताते...!!! कुछ बहुत कुछ में से 
निकालने के लिए कुछ बहुत कुछ कुछ कार्य करते हैं...कुछ बहुत कुछ कार्य होते 
हुवे भी कुछ नहीं करते...

Tuesday, January 29, 2013

camel fastival :- बर्फानी ओढणी सूं बारै आ पूग्या मरुधरा रौ जहाज देखण नै


photo - Aalam Husain Sindhi BKN
photo - Aalam Husain Sindhi BKN

बर्फानी ओढणी सूं बारै आ पूग्या मरुधरा रौ जहाज देखण नै

बीकानेर।  अंतरराष्ट्रीय ऊंट उत्सव मांय राजस्थानी, खास
तौर सूं मरुनगरी रा लोक रंग मांय देश विदेश रै पावणां नै आपणोपण दिस्यौ।
लोकवाद्यों री ताण सुकून दिरायो। बाळू रा लहरदार धोरां माथै दिन भर
मुळकती धूप अ‘र  ठंडी टीर रात्यां मांय इनै सूं बिनै थिरकती चांदनी।
फेस्टीवल रौ आखिरी दिन स्टेडियम में परंपरागत रूप सूं सज्योड़ा धज्योड़ा
ऊंट। उमंग-उल्लास अ‘र उत्साह सूं गावंता नाचता लोक कलाकार। इण सब रौ
हिवड़ै तांईं खुशी भरियोड़ा आनंद सूं निहारता सैलानियों रा झुंड। रेत रै
इण समन्दर बिचाळै बस्योड़ो बीकाणे रौ ओ रूप ही तो सावन बीकानेर री
लोकोक्ति पछै अबै पूस री रात बीकानेर री नूवीं नकोर-उक्ति रच रैयो है।
मरुनगरी बीकानेर। राव बीकाजी रौ बीकाणो। अठै सावन मांय  प्रवासी तो पूगणा
तय ही है। अबै नूवां आयाम स्थापित कर रैया है देश विदेश रा सैलानी। सावन
नीं पण पूस री रात बितावणनै। हां जी। विगत मंे कुछ बरसां सूं अठै  पौष
मास में यानी जनवरी महीने में अंतरराष्ट्रीय ऊंट उत्सव (camel fastival)
मनायो जावै । चांदनी रात्यां में लाडेरा रा चिमकता धोरां अ‘र शहर रै
विशाल डा करणी सिंह स्टेडियम में तीन दिनां रौ ऊंट उत्सव मनाइजै। इण रै
ठोड़ लोकरंगा नै साकार होवता देखण रा शौकीन जवानां रौ वर्ग तो आकरसन में
बंध्यो इज है। विदेशी पर्यटक भी खूब पहुंचै।
बर्फ री चादर सूं ढक्योड़ी जमीन नै देखणिया विदेशी पर्यटकां नै अठे रेत
रै टीबां माथै भागता दौड़ता ऊंटां रा टोळा अ‘र उणारी कलाबाजियां सूं
भरयोड़ा करतब
देखणै रौ अनुभव रोमांचित तो करै इ है। ओ इ रोमांच लगोलग सालोसाल पर्यटकों
री गिणती बढ़ावण में सैयोग करै। फेस्टीवल मायं फगत ऊंटों रा टोळा इ नीं
पण मरु भूमि रै लोक जीवन रौ भी आकरसण है। विदेशी युवतियों खातिर पर्यटन
विभाग अबकी साल मिस मरवण होडाहोड राखी जिकी खास आकरसण रैयी।  26  जनवरी
2013 से 28 जनवरी 13 तांई रो तीन दिनां रौ केमल फेस्टीवल पैलीपोत रा दो
दिन कन्नै रै गांव लाडेरा रै धोरा माथै धमाल सूं मनायो गयो। आखिरी अंतिम
सोमवार नै स्टेडियम में लोक संगीत और परंपरागत पहरावे में कलाकारां री
रंगारंग प्रस्तुतियां सूं पर्यटक मंत्रमुग्ध होया। जय बीकाणा।

Monday, January 21, 2013

गढ़ों में गुमटियां ज्यों प्रहरियों की यारों

गढ़ों में गुमटियां
ज्यों प्रहरियों की यारों  
 जलसों में गुटबंदी  
त्यों  
रहबरों की यारों        
जख्मे जिगर कह रहे थे
शहर पनाह पे
चिल्ला के
नजराना शय ही ऐसी है
सनद रहे यारों 

हर दफतर में, नांगनि सां बिर भरियल आहिनि

हर दफतर में, नांगनि सां बिर भरियल आहिनि  *

पंध परे जा   *
** पुस्तक परिचय
शाइरु -             मुरली गोविंदाणी
प्रकाषक -     ेंग 34 आदिपुर 370205 कछ गुजरात
        टेलीफोन 0236 261150
संस्करण -        2012

पंध परे जा
असां कीअं सडायूं त सिंधी आहियूं / न असां खे मिलियो सिंधु देश जो टुकरो / न रहियो आ असां जो वेसु को हिकड़ो / असां त हर देश जा पांधी आहियूं /असां कीअं सडायूं त सिंधी आहियूं ।
इनि पंजकिड़े मंझ सिंधी समाज जो उवो सूरु साम्हूं अचे थो जेको विरहांङे बैद वधंदो इ रहियो आहे। तकरीबनि 66 वरिहयह अगु जेको सूरु दिल डुखाइंदो रहियो आहे उनिजो को इलाजु बि को हकीमु वैदु कोन करे सघंदो। सिंधी साहित्यकारनि इनि सूरु खे पहिंजे रचनाकर्म में साम्हूं आनियो आहे ऐं सिलसिलो 2012 में बि जारी रहियो। शाइरीअ जे करे जातलि सुञातलि नालो आहे मुरली गोविंदाणी। मुरली गोविंदाणी जो नवों किताबु पंध परे जा मंझ बारनि जीयूं भावनाउं बि खुली करे साम्हूं अचनि थियूं। इनिमें गीत आहिनि, बाल गीत बि आहिनि। आजाद कविता में शाइरु आधुनिक जमाने में थिंदड़ अप्राकृतिक गाल्हिनि ऐं हादसनि ते चिंता जाहिरु कंदे चवे थो - भगवान कडहिं / सोचियो बि न हूंदो /त बिना आदम ऐं हवा /को पैदा थी सघे थो /ऐं बिना काल को मरी सघे थो। इनि संग्रह में अगिते तन्हा बि आहिनि जहिमें अजु समाज खे चकु पाइंदड़ भ्रष्टाचार खे कविअ ईअं जाहिरु कयो आहे - हर दफतर में, नांगनि सां बिर भरियल आहिनि। जापान जी मशहूर विधा आहे हाइकू। कविअ पहिंजे इनि संग्रह में हाइकू सां बि पहिंजो प्रेमु जाहिरु कयो आहे ऐं वधंदड़ आविरजा जी चिंता बारनि सदके ईअं बुधाई अथाईं - कन मथां अछा वार /लिकी लिकी कारा कया / डिसी न वठनि बार। संग्रह नई टेहीअ लाइ बि चंङनि कविताउंनि सां भरियलि आहे। इनि में कतआ, पंजकिड़ा, तराईल बि दिल ते लगनि ता ऐं दोहा त बरोबरु हालात ते तब्सरो करण में कामयाबु आहिनि। इनिसां गडोगडु कबीर जा दोहा (साखियूं )बि संग्रह खे समूरो हिकई बैठक में पढ़ही पूरो करण लाइ पाण डे छिकनि था। सुठे ऐं समाज जी लाइब्रेरीनि में संग्रह करण लाइकु इनि किताब लाइ कवि मुरली गोविंदाणी खे साधुवाद। 
 - मोहन थानवी 

Sunday, January 20, 2013

तारीख भी क्या कमाल करती...रोशन राहों पे ला सजा देती है...

तारीख भी क्या कमाल करती है 

तारीख भी क्या कमाल करती है
चेहरे पे चेहरे लगा
औरों को
मोहरा बनाने वालों को
स्याह कोठरी से निकाल
रोशन राहों पे ला सजा देती है
तारीख भी क्या कमाल करती है
कैलेंडर के पन्नों में खुद बदल जाती
दुनिया में इतिहास बदल देती है
घंटे पहले डुबो देती सूरज
और छह घंटे बाद
फिर
सूरज उगा देती है
तारीख भी क्या कमाल करती है
चेहरे पे चेहरे लगा
औरों को मोहरा बनाने वालों को
स्याह कोठरी से निकाल
रोशन राहों पे ला सजा देती है

Friday, January 18, 2013

हजार हवेलियों का शहर के रचनाकार श्री उपध्यानचंद्र कोचर

Shri U C Kochar - Bikaner Raj.                                                                                                                                                                                                                                                                                                                            कविता संग्रह मैं और मेरी कविता **            

मैं उसे रोक नहीं सकता
गलत रास्ते पर जाने से
वह इक्कीस साल का हो चुका है
कहेगा कि आपका रास्ता गलत है
मैं तो न समय
को समझ पाया हूं
न उसको
बुढ़ापे में सचमुच
मति भ्रमित हो जाती है ।

बीकानेर में हजार हवेलियों का शहर पुस्तक के रचनाकार और पर्यटन लेखक संघ के अध्यक्ष एडवाकेट श्री उपध्यानचंद्र कोचर की लेखनी से सभी परिचित हैं। श्री कोचर युवावस्था से ही नामचीन कवियों और अपने अपने क्षेत्र के विख्यात शख्सियतों का सान्निध्य प्राप्त करने वाले रहे हैं और इसका जिक्र उन्होंने अपने स़ प्रकाशित और लोकार्पित पहले कविता संग्रह मैं और मेरी कविता में किया भी है।  80 वर्षी श्री कोचर ने दुनियादारी के बहुत से उतार चढ़ाव देखे हैं। उनकी कविताओं में अनुभव के इशारे तो हैं ही, समाज को अपने नजरिये से देखने के साथ साथ समाज का व्यक्ति को देखने का दृष्टिकोण भी सामने आता है।
श्री कोचर के कविता संग्रह के पेज 27 पर छपी कविता का सिंधी अनुवाद भाई राजकुमार थानवी ने समारोह में वाचन किया था। समारोह में श्री कोचर की कविताओं का बंगाली, उर्दू, अंग्रेजी, पंजाबी आदि कुल आठ भाषाओं में अनुवाद वाचन हुआ था। यहां सिंधी अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूं।
युवा वर्ग के चहेते श्री कोचर ने मेरे पहले सिंधी उपन्यास करतार सिंह का लोकार्पण 2005 में किया था और इसके कथानक बुना हुआ जवाहर कला केंद्र से पुरस्कृत नाटक अपना अपना नाम करतार सिंह का मंचन उन्हीं के हैरिटेज होटल मरुधर के विनायक सभागार में 2008 में मेरे पूर्णावधि नाटक पुस्तक कोलाहल से दूर के लोकार्पण समारोह में सुरेश हिंदुस्तानी के निर्देशन में किया गया था। वह अवसर उपलब्ध कराया था वरिष्ठ रंगकर्मी और संपादक श्री मधु आचार्य आशावादी ने। समारोह भाई हरीश बी शर्मा के संचालन में हुआ था। प्रसन्नता की बात यह है कि (14 Jan 2013) श्री कोचर के पुस्तक लोकार्पण समारोह में राजस्थान संगीत नाटक अकादमी का सदस्य मनोनीत होने पर श्री मधु आचार्य आशावादी सहित अन्य अकादमी सदस्यों का सम्मान भी सारे शहर ने किया।
* ( श्री उपध्यानचंद्र कोचर जी कविता जो अनुवाद उननि जे कविता संग्रह मैं और मेरी कविता मंझु । संग्रह जो लोकार्पण 14 जनवरी 2013 शाम जो थिओ जहिं जलसे में इनि कविता जो अनुवाद वाचन राजकुमार थानवी कयो। संग्रह मूं कुल अठनि कविताउंनि जो अनुवाद जुदा जुदा भाषाउंनि में बीकानेर जे कवि गणनि कयो हुओ। )

मां उनिखे झलण में नाकामु आह्यां
खोटे दग ते वंञी रह्यो आहे
हू इकवीहें जो थी चुक्यो आहे
इकवीहें जो
चवंदो, तव्हां जो दगु खोटो आहे
मां, न त वक्ति खे समझी सघयुसि
न उनिखे
बुढापे मंझु सचपचु
मति मारिजी वेई आहे
बुद्धि अमंूझजी वई आहे।   
                             ( translater - राज कुमार थानवी )
                                    

Tuesday, January 15, 2013

ये प्यास है ही बड़ी ... आब की बात है प्यास की बात है

प्यास
प्रेम की हो
या
सूखे कंठ की

ऋतु हो सर्द

या

बासंतिक चले हवा

ऋतु हो परिवर्तन दौर में

या

हिम सा ठंडा हो प्रांगण

चलती जब हवा गर्म

इसी प्यास के  बहाने

पिघलते हिमालय के दहाने

ये प्यास है ही बड़ी ...

आब की बात है

प्यास की बात है

Monday, January 14, 2013

When life does not find a singer... उथो जागो त पहिंजी इन्हींअ सिंधु खे ठाह्यूं


  • When life does not find a singer to sing her heart, she produces a philosopher to speak her mind.          –KHALIL GIBRAN (1883-1931) 
  • नई टेहीअ खे बि सिंधु संस्कृति ऐं सिंधीयत जी अहमियत जी जाण बखूबी आहे ऐं हिमथायो व´े त कहिं शक जी गाल्हि कोन आहे कि अचण वारे वक्ति में सिंधु संस्कृति जी जोत दुनिया जी कुंड कुड़झ में वरी उवांई भभके जीअं हजार वरियह अगु चिमकंदी हुई। उथो जागो त पहिंजी इन्हींअ सिंधु खे ठाह्यूं ... उथो जागो त-
    उथो जागो त पहिंजी इन्हींअ सिंधु खे ठाह्यूं
    अजमेर इन्दौर न उल्हास नगर
    हिन्द सजी सिंधु समझयूं असां सभई भाउर
    विकणी सभु बुराइयूं पहिज्यूं, चंङाई ठाह्यूं
    सच्चा व्यापारी चवायूं सिंधी
    हिन्दु जी कुण्ड-कुड़छ में जोति जगायूं सिंधी
    उथो जागो त पहिंजी इन्हींअ सिंधु खे ठाह्यूं
    जेका विसामिजण ते आहे
    सिंधियतजी उवाई वडी जोति भभिकायूं
    पहिंजे बारनि जे- जीवन खेत में खोटयूं
    कर्म जो दरिया
    वाह्यूं पसीनो थे खीरु मिठ्ठो
    खारायूं पहिंजे बारनि खे
    व्यापार जो गुण साणु पहिंजियूं रितियूं
    उथो जागो त पहिंजी इन्हींअ सिंधु खे ठाह्यूं 

Friday, January 11, 2013

सुपने जी हत्या मंझ रंगकर्म जी खुशी

सुपने जी हत्या मंझ रंगकर्म जी खुशी

पुस्तक परिचयनाटक -     

हत्या हिक सुपने जी ( Besed on Cross purposes – Albert Camus )

लेखक -     हरिकांत जेठवानी
प्रकाषक -     सुनील जेठवानी,
        राजकोट 360007
        संस्करण 2012

सुपने जी हत्या मंझ रंगकर्म जी खुषी
सिंधी साहित्य जगत मंझ हरिकांत न सिर्फ नाटकनि लाइ बल्कि सिंधु समाज, साहित्य धारा ऐं आखाणी जे संपादन जे करे हमेषह याद रहिण वारो नालो आहे। पहिंजी लंबी हिंदी कविता एक टुकड़ा आकाष समेत हरिकांत हिंदी साहित्य संसार जो बि जातलि सुञातलि लेखक आहे। कविता में नवाचार ऐं पहिंजी कहाणिनि में समाज जी नुमाइंदी कंदड़ चरित्रनि खे बुलंद सिंधी जुबान डिअण वारे हरिकांत जेठवानी जो नवों नाटक हत्या हिक सुपने जी इनि साल 2012 मंझ साया थी आयो आहे। अल्जेरियन-फ्रेंच राइटर अल्बर्ट कैमस ( 1913-1960 ) जी दुनिया भर में चर्चित रचना क्रॉस प्रपोजेज जो उल्थौ कयलि इयो नाटक टाइटल सां भलेषकु हत्या हिक सुपने जी जाहिरु करे थो लेकिन सही माइननि मंझ सिंधी रंगकर्म जे जुझारू रंगकर्मिनि वास्ते इनि नाटक मंझ खुषीयूंनि जो दरियाह वही रह्यो आहे। पंञनि पात्रनि वारे इनि नाटक खे पढ़हंदे वक्ति पाठक जी अखियूंनि अगियूं हरेक सीन जी सनीअ में सनी हिक हिक षइ अची थी वंञें। आधुनिक नाटक लेखन में लेखक निर्देषक खे हिदायतूं डई उनिजे आजाद नजरिये खे कैद कोन कंदा आहिनि ऐं हरिकांत जी ईआ खासियत 1965 में साम्हूं आइलि इनि नाटक जे 21 सदीअ जे बें डहाके जी षुरूआत में साया थिअलि उल्थै में साफतौर सां जाहिरु थी रही आहे। सिंधी भाषा साहित्य में अंतरराष्ट्रीय सतहं ते मषहूरीअ जी पताका फहराइण वारे इनि नाटक जो साया थिअण रंगकर्म में तपस्या कंदड़ अजु जी टेहीअ लाइ वरदानु समान मंञणु गलत न थिंदो छा काण जो लंदन थिएटर समेत इनिजो मंचन तमामु मुल्कनि में कयो ऐं सराहिजी चुक्यो आहे। सिंधी रंगमंच जे अजु जे हालात खे ध्यान में रखी इनि नाटक में संभावनाउंनि जो दरियाह वहिंदो नजर अचे थो। कुल जमा टिनि सीननि वारे इनि नाटक जा पात्र पहिंजे अभिनय ऐं डायलॉग प्रजेंटेषन सां समाजी ऐं दुनियावी झंझावात सहूलाइति सां दर्षकनि तोणी पहुंचाइनि था। सठि साल जीमाउ समेत नाटक जा पात्र नौकर, षारदा, चेतन ऐं सावित्री पहिंजे संवाद ऐं भावनाउंनि जे प्रदर्षन सां दर्षकनि खे षुरूआत में इ बधी था वठनि ऐं नाटक पूरो थिंदे थिंदे ऐतिरियूं उलझनूं, समस्याउं, द्वन्द्व ऐं समाज जी नुमाइंदगी कंदड़ केतरनि इ चरित्रनि जा मुखौटा जाहिरु थिंदा था वञनि। 76 सुफनि वारे इनि नाटक में आषा-निराषा में तरंदड़ - बुडंदड़ पात्रनि जा सुपना हालात जी तरवारु जी धार जी भेंट चढ़हनि था या किन्हनि पात्रनि जी सकारात्मक सोच खटी थी वंञे इनि मिस्ट्रीय खां जुदा नाटक वाचंदड़ पाठक खे सिंधी रंगकर्म में इनि रचना जे मार्फतु संभावनाउंनि जा द्वार खुलंदा जरूर नजरनि था। मूल भावना खे कायम रखंदे नाटक जी आत्मा खे सिंधी भाषा जो वगो पाराइण हरिकांत जी लेखनीअ जो इ कमु थी सघंदो आहे।  ईआ खासियत इ हरिकांत जे इनि नाटक खे खास अहमियत वारो साबित करे थी। नाटक खे पुस्तक रूप में पाठकनि तोणी पहुंचाइण जोे कमु करण लाइ लेखक हरिकांत, प्रकाषक सुनील जेठवानी, कवर डिजाइनर मेहरवान ममतानी ऐं कॉपी राइट रखदंड़ श्रीमती राधा जेठवानी खे साधुवाद। - मोहन थानवी
 

Monday, January 7, 2013

कार्य फल तय है, जय हो

अनचाहे किया जाने वाला कोई काम पूर्णता को प्राप्त नहीं हो सकता। कोई न कोई कसर रह ही जाती है। हां, शनै शनै कार्य का आनंद आने पर यदि कर्ता अनचाहे शुरू किए गए कार्य से दिल लगा लेता है तो उसे शिखर छूने का अवसर भी मिल जाता है। महापुरुषों से संबंधित बहुत से ऐसे उदाहरण हम आप गाहेबगाहे पढ़ चुके हैं। ख्याति-सीमा के मध्यनजर भी बहुत सी शख्सियतों के ऐसे वक्तव्य पत्र पत्रिकाओं में पढ़ने को मिल जाते हैं। इसीलिए अनुभवी, ज्ञानी, बुजुग कहते हैं कि काम कोई भी हो, मन लगा कर, आनंद लेकर, काम को पूजा मान कर करने वाले को सफल होने से कोई रोक नहीं सकता। अनचाहे, अनमना हो कर कोई काम शुरू कर ही दिया हो तो उसे अभी से आनंदित होकर कीजिए। काम अनचाहा नहीं रहेगा, आप भी स्वयं को अनमना नहीं पाएंगे। तय है। जय हो।

Saturday, January 5, 2013

भीड़ में तनहा यात्रिक


भीड़ में तनहा यात्रिक

खो गया है आदमी
भीड़ में
तनहा हो गया है आदमी
यात्रिक है मगर सोया हुआ है आदमी
यात्रा के हर पड़ाव पर
अपने आपको ढूंढ़ता है आदमी

Friday, January 4, 2013

किस्सा-ए-प्रस्तर उद्धारक

किस्सा-ए-प्रस्तर उद्धारक

‘लंबी कविता’
अक्सर तुम्हारा चेहरा आईने में देखता हूं
मक्कारी से भरा कुटिल मुस्कान वाला शख्स मैं तो नहीं
आईना झूठ नहीं बोलता किसी भी घर में लगा हो
तुम्हारे घर शायद कोई आईना नहीं वरना मेरी शक्ल देख लेते
अब भूल जाओ अपने पापों को प्रस्तर बनने के शापित हो तुम
प्रस्तर उद्धारकों को तो पूजा जाता है, हे पापी इसे भूलना नहीं
द्रोणाचार्य मांगते हैं आज भी मगर एकलव्य देते नहीं दिखाते हैं अंगूठा
दधिचि अब ढूंढे़ नहीं मिलते मगर बस्तियों में लगे हैं हड््िडयों के ढेर
अक्सर ऐसे ढेर पर बिखरा-बिखरा तुम्हारा चेहरा देखता हूं
खाल विहीन रक्त-पिपासु इस दुनिया में कोई दूसरा तो है नहीं    
याद रखो भूलो मत हरिष्चद्र की संतान कोई जीवित नहीं
आघात बड़ा है कफन न होने का, वक्त जाता है ठाठ-वैभव को चाट
संवाद तंत्र पंचतंत्र से सीख और साध हित हितोपदेष से
अतीत के अंधे-सागर में लगा डुबकी पुराण सुना और बटोर दक्षिणा
प्रस्तर उद्धारकों के ही प्रस्तर पूज और पापियों को बदल डाल प्रस्तरों में
खड़ा कर दो चौराहों पर नगर-रखवालों को, खाली करवा दो नगर
अक्सर तुम्हारे जैसे चेहरे वालों को नगर में घूमते देखता हूं
बाणभट्ट तो एक हुआ मगर किस्से आज भी अधूरे हैं बेषुमार
दिन व्यतीत करते हो रात के इंतजार में फिर डूब जाना अंधेरे में
सड़कों के बीच और किनारे चमकते प्रस्तरों से ज्ञात करना राह
यूं ही गुजार देना युग मगर चेहरा न बदलना मुखौटा लगाकर
चेहरा तुम्हारा है इतना लावा उगलता कि मुखौटा पिघल जाएगा
छिप न सकेगा रावण अगर छिपकर राम बनना चाहेगा
षहरभर में तुम्हारा चेहरा घर-घर से निकलता देखता हूं रोज
पसीने से लथपथ कंधे पर थैला दायित्वों के बोझ से होता है भरा
एक चरित्र हो तो नायक बन खलनायक को दे हर रात षिकस्त
कितने ही चरित्र समाज में पापों के हर सुबह उनींदे और दिखते हैं पस्त
अक्सर ऐसे में दिख जाता है फिर तुम्हारा चेहरा बंसरी बजाता
अधरों से प्रस्फुटित होते हैं षब्द ‘आर्तनाद’ गूंजता है दबा-दबा
फिर दिन बीता उमस भरा
कहानी रचते रहे लोग
रात यूं ही गुजर जाएगी 
सुबह होते ही नये पात्र करेंगे
सूरज का स्वागत ऐसे ही
कथा-नायक पूज-पूज कर
उमसभरे दिन छोटे करने के लिए
प्रस्तरों में बदल-बदलकर प्रस्तर-उद्धारकों को
किस्सा-ए-प्रस्तर उद्धारक का अंत कभी होगा नहीं
हर बार सामने आएगा तुम्हारा चेहरा आईने में
जब भी जी चाहे देखेंगे लोग अपने गिरहबान में झांककर
कुछ तारीखें प्रस्तर बन जाएंगी कुछ बह जाएंगी समय-धार में
आतंक के साये गहरायेंगे प्रतोद1 हो न सकेगा निरंकुष पर
प्रतिहंता2 खुद घोटेगा ग्रीवा प्रजा की बैठ खूनी तख्त पर
कहलाएगा फिर भी उद्धारक वह जो प्रस्तरों को तैरायेगा
तरा दे तू, उठ चल साथ मेरे धुआं उगलते मरघट पर
सुन किस्सा उस तपस्वी3 का ए जमाने रो न देना जार-जार
जिसका उद्धार उसकी मां ने किया गुरु से बढ़कर है मां कहकर
चित्र-लिखित हो संसार से भागे फिरते, गुरु क्या भगवान से मिलाएगा
अपनी सहधर्मिणी को भी स्वर्ग की चाह में तजने वाले
अक्सर तुम्हारा चेहरा अपने चेहरे पर महसूस करता हूं
तुम भले हो दस्यु मगर मैं नहीं तुम्हारे दस्युदल में षामिल  
मारकाट से तुम्हें मिलता होगा जीवन, रक्त-पिपासु हो तुम मैं नहीं
प्रभावती4 को भूलने वाले, मां को गुरु से बढ़कर मान, थाम हाथ संगिनी का
सूर्यपत्नी है प्रभावती तो षिव के एक गण की वीणा-सी झंकार भी है
मत भूल संसार में अंग-देष5 भी है एक और राजा-चित्ररथ6 की रानी है प्रभावती
प्रस्तर-चित्र बनना है अगर तो सूर्य-चित्र का प्रत्यंकन7 कर जीवन में
चित्र-मंडित हो मूक रहे जो वह मेरा जीवन नहीं, जीने की कला का प्रत्यंकन होता नही
बंदूकों के साये और बमों के धमाके में खुलते नहीं फाटक सुख-महल8 के
बंद फाटकों में तो रंभाते हैं गोवंष भी, पीड़ा व्यक्त कर पाते नहीं
अजगर लिपटा रहता है चंदन से जो महकता है
फूत्कार जहरीली फिर भी अजगर की, उसकी वृत्ति बनी रहेगी
हंतक खुषियों के तुमसे और क्या आषाएं रख सकता है जमाना
अजगर के फूत्कार से भी तप्त वायु और क्या होगा तेरी सांसों के सिवाय
प्रस्तर फिर भी पिघल सकता नहीं, ज्वालामुखी का लावा चाहिये
उद्धारक आयेगा जरूर बदलकर चेहरा तुम्हारा या कि मेरा
अक्सर प्रस्तर-उद्धारक का किस्सा याद दिला देता है चेहरा तुम्हारा
अधरों की प्रत्यंचा पर स्मित जीवन-स्वर प्रस्फुटित होता है
सच, ‘सारसों की क्रेंकार’9 घुंघरुओं की मधुर ध्वनि तो नहीं
हां, नीरव वनांचल में जल और जीवन होने का विष्वास तो है
अतिथि बन पहुंचा हूं इस ‘बन’ में पसरा है जहां तुम्हारा चेहरा
‘चार भांज का पत्र’1॰ है मालिक का लिखा तुम्हारे नाम
जानते ही हो ऐसा पत्र अधीनस्थों को संबोधित होता है
ताम्बूल वीटक11 की आस नहीं तुमसे स्वागत में मुस्कान चाहिये
अक्सर मुस्कराहट गमगमा देती है निस्तेज तुम्हारा चेहरा
जीवन की अतिथिषाला का फाटक है मुस्कान उसी की दरकार है
पंचभंजी पत्रिका12 लिख दो अपने पापों के प्रायष्चित में
प्रस्तर उद्धारक से मित्रता स्थापित करने का साधन मुस्कान है
अरे हर्ष-भंजक नहीं जानते तुम अपने कर्मों से जीवन-खंडित करने पर तुले हो
यह कोई समाज-सुधार या मातृभूमि की स्वतंत्रता संग्राम की बेला नहीं
जन्म-जन्मान्तर के बंधन से मोक्ष का काल उपस्थित है हर्षो जरा
किंकर्तव्यमूढ़ से निहारते रहोगे तो विकृत ही होता जायेगा तुम्हारा चेहरा
कंकण-वलय13 तुम्हारे कर-कमलों में षोभित नहीं, ये तो नारी का शृंगार है
उठो और परषुराम-प्रतिरूप उपस्थित हो रणभूमि की पुकार है
अरे सिंह-नादी बड़ा कायर है रे तेरा मन, भीड़ में अकेला बेचारा
आतंकी तू अपने स्वार्थ की खातिर नरसंहार को आतुर
नीरवता में ही नहीं भरी बस्ती में भी नितांत अकेला चेहरा तुम्हारा
आततायी के हिमायती दुंदुभियों का वादक बन डराता है
कायर इतना कि गली में कुत्तों को रोते सुन तेरा कलेजा कांप जाता है
जिसके अंक में पला-बढ़ा उसी मातृभूमि पर दानव तू रक्त बहाता है
अक्सर ऐसा एक तुम्हारा चेहरा प्रस्तर उद्धारक के आगे झुक जाता है
आं... वह चेहरा आईने में आंसुओं से भीगा भी देखता हूं
तुम्हारे घर कोई आईना नहीं वरना मुझे रोता हुआ देख लेते
मानवता को दानवता के षिकंजे से छुड़ाने का संकल्प कर लेते
आंक14 ले जीवन में मृत्यु के षाष्वत सत्य को प्रस्तर मत बना
आंसुओं को व्यर्थ मत बहा, मन की कालिख घोल और इंक बना ले
रच ले एक इंग-इतिहास15 और प्रस्तरों में अहिल्या के प्राण फूंक
प्रस्तर उद्धारकों का ऐसा ही कृत्य रावण के अट्टहास को दबायेगा
अहिल्या बनी प्रजा में आत्म-ज्योति प्रज्वलित कर फिर तू इतरायेगा
ईंखन16 करना सावन के झूलों पर, उंकुण17 की भांति खून चूसने को भूल जा
ऊंघता है मानव सिर्फ जड़ वृक्ष हमेषा जागता अक्सर देखता हूं
घिरी है हमारी ईद-होली-दिवाली आतंकी ऋंजनान18 एक से
क्रिसमस पर समृद्धि की ऐषणाएं19 भी हमारी कम नहीं जानते हो
प्रस्तरों के ओझर2॰ नहीं होता और उद्धारकों का ओझर-ओसार21 समान
औदार्यता22 बढ़ती गई पेड़ों की औझड़23 उद्धारक बढ़े और प्रस्तर बुतों में बदले
भीग रहे हैं चौराहों पर पावस में और झुलसते मई-जून में बिता रहे जून
ऐसे उद्धारकों के मानव-हित के किस्से अब यूं ही बस सुनाये जाते रहेंगे
आतंक के साये में इनके हाथ-पांव टोपी चष्मा खंडित करने को उठेंगे हाथ
अक्सर ऐसे वाकिओं पर हंसता दिख जाता है भीड़ में चेहरा तुम्हारा
संषय यह कि कहीं तुम्हारा चेहरा मेरा तो नहीं आईने में दिखता
तुममें और मुझमें यही तो सेतु है, जैसा तुम्हारा वैसा ही है मेरा चेहरा
दोनों प्रस्तर उद्धारकों के पुजारी और प्राणवानों के षत्रु तो कदापि नहीं
दिषा-वास्तु, नक्षत्र-मुहूर्त और मंत्र-ऋचाओं से प्रतिष्ठित देव हैं
सुर-असुर हमारी पुराण कथाओं-से हम नायक-खलनायक मरे नहीं
सेतु-दर-सेतु पार करने को समन्दर अपने-अपने गढ़ते हैं प्रस्तर
जीवन नैया पार लगाने को रहते आतुर नहीं जानते मंझधार अपार है
मुखौटों मंे छिपाये स्वयं को कंस और रावण देखो जिधर उस ओर है
कसमसा कर रह जाते ऐसे व्यक्तित्व भी कदम-कदम पर दिख जाते
प्रस्तर उद्धारक बनने को लालायित उनमें एक षामिल है तुम्हारा चेहरा
मंदिर-मस्जिद-चर्च-गुरुद्वारों से अक्सर दूर नहीं दिखता देव-रूप
प्रस्तरों की आत्मा को भी सिहराता मगर विभत्स-आतंकी तुम्हारा चेहरा
जीवन को जीना नहीं सीखा रे तुमने मिटाना ही जानते हो
इतराओ मत मानवता के दुष्मन नीरव नहीं षूरवीरों से मेरा षहर
यहां दधिचि भी मौन उत्सर्ग को तत्पर सुन आतंकी है तू बेसहारा
ईद-दिवाली साथ मनायेंगे, है यह इस भारत-भूमि की परम्परा
डरा नहीं सकता तू मानवता को क्रूर, उत्तेजित है मेरा चेहरा
मानुष है इस कारण भ्रमित रहा लेकिन मेरे जैसा नहीं तुम्हारा चेहरा
सप्त-द्वीपों पर मुस्करा रहा देख मेरा चेहरा प्रस्तरों को तराष कर
पाप और पुण्य में जो अंतर वही तुझ और मुझमें है
मैं मानव मानवता का पुजारी, तू विधर्मी प्रस्तरांे में कैद है
भ्रम में थे जो अब तक तू ब्रह्मा की रचना मानवों को डराता रहा
जान गया है अब हर मानव तेरी करतूतें, हममें अब छिप न सकेगा तू
अक्सर तुम्हारा चेहरा आईने में देखता हूं
मक्कारी से भरा कुटिल मुस्कान वाला शख्स मैं तो नहीं
*****-अंकुष, 2-रोकने वाला, 3- डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के उपन्यास बाणभट्ट का एक पात्र, जो अपनी मां और पत्नी को छोड़कर संन्यासी बनने चला गया और अंतराल के बाद संयोगवष मिलन होने पर मां को पहचानने के बाद भी मां कहने से कतराने लगा, परिस्थितिवष मरणासन्न मां की इच्छा पूरी करने तथा आज्ञा मानने के लिए भी गुरु की आज्ञा ले आने को उद्यत हुआ तब मां ने उसे गुरु और मां की महत्ता बताई, 4-प्रभावषाली/मां, 5-काया, 6-वाणी/जीवन/मन, 7-प्रतिलिपि/नकल, 8-वर्ल्ड ट्रेड सेंटर, 9-सफेदपोष लोगों की भ्रमित करने वाली बातें, 10-अधीनस्थों को लिखा जाने वाला पत्र, संदर्भ डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी-बाणभट्ट की आत्मकथा, 11-पान, 12-मित्रता स्थापित करने के लिए लिखा जाने वाला पत्र, 13-चूड़ियां, 14-निष्चय, 15-आष्चर्यजनक, 16- झूलना, 17-खटमल, 18-बादल, 19-इच्छाएं/चाहनाएं, 20-पेट, 21-बारामदे-सा पेट, 22-उदारता, 23-निरंतर
- मोहन थानवी

Wednesday, January 2, 2013

अट्टू-पट्टू की उधारी


अट्टू-पट्टू की उधारी 

 (हास्य  -- सिन्धी से अनुवादित) --- (अरबी सिन्धी मे ये
श्रंखला हिन्दू डेली अजमेर से २०१० में पब्लिश  हो चुकी है  ).................................
बीमारी की बदकिस्मती। बरसात के मौसम में वह अट्टू को जा लगी। बदन दर्द, सर्दी,
खांसी, जुकाम हां भाई हां ये सब।
मौसम को कोसते हुए अट्टू साहिब ने दो दिन में तीन डॉक्टर बदल लिये। इन
बीमारियों में से एक भी कम नहीं हुई बल्कि थकान की बीमारी और बढ़ गई। चाइनाराम
सिन्धी हलवाई की सिन्धी मिठाई सिन्धी हलवा के टीन के एक डिब्बे में अट्टू साहिब
ने ठूंस ठूंस कर टेबलेट्स की स्ट्रिप्स रखी। साथ में इनव्हेलर, बाम और एक
थर्मामीटर भी सहेजा। चार दिन बाद तो उन्हंे आफिस से भी फोन आने लगे - आफिस आ
जाओ भैया वरना विदाउट पे माने जाओगे। अट्टू साहिब भला ऐसा कैसे होने देते, सो
पांचवें दिन जा पहुंचे आफिस।
पिऑन से लेकर बड़े साहब तक सबसे पहले उन्होंने ‘जय हो’ से दुआ-सलाम की। फिर अपनी
सीट पर बैठे तो पूछापाछी के लिए साथियों ने तांता लगा दिया। चार दिन में अलग
अलग डॉक्टरों का अनुभव लेने वाले अट्टू साहिब भला ऐसा मौका कैसे चूक सकते थे।
सो वे अपनी बीमारी को भूल गए। खांसी-जुकाम, सिरदर्द यूं भी स्वाभाविक रूप से
चार-पांच दिन बाद आदमी का पीछा छोड़ देते हैं।ऐसा ही अट्टू साहब के साथ हुआ मगर
अच्छा हुआ। वे खुद को हकीम लुकमान का रिश्तेदार समझने लगे।
माथुर साहब ने उनसे पूछा - कौनसी दवा ली आपने, जल्दी असर कर गई। देखो न सुबह से
मुझे भी सरदर्द हो रहा है।
खांसी भी है क्या! अट्टू साहब ने अपनी डॉक्टरी चलाई।
हां हां साहब, जुकाम भी है।
बदन दर्द भी कर रहा होगा!
हां भाई हां!
तो समझो तुम्हारा रोग मैंने दूर कर दिया। ये लो दो गोली।
कैसे लूं।
कैसे... अरे भाई दो चाय मंगवाओ। एक तुम पिओ, एक मैं पी लूंगा।
इससे मेरी बीमारी दूर हो जाएगी!
अरे क्या बात करते हो! चुटकियों में...
साहब, पिछले चार घंटे से परेशान हूं...
चिंता मत करो। जैसा कहूं वैसा करते जाओ।
आप कहते हैं तो यकीन करना पड़ रहा है वरना...
फिर वही निराशावादी बातें। भैया आशावादी बनो...आशावादी
लेकिन जब नाक बहती रहेगी तो आशाएं रह कहां जाएंगी साहब...
अच्छा, टेंशन भी बहुत है तुम्हंे... ये लो, एक टेबलेट और...
मर गया! अरे साहब आप चाहेें तो समोसे भी चाय के साथ मंगवा देता हूं। बस और दवाई
न दें साहब
ऐसे कैसे हो सकता है। दवा खाए बगैर तुम्हें आराम कैसे मिलेगा भैया
मेरी हालत पर तरस खाएं...
तुम दवाइयां खाओ भैया। मैं तरस खाउं या सरस...इसकी चिंता मत करो। और अब
तुम्हारा समय खत्म...प्लीज अब शर्माजी को आने दो। बहुत देर से अपनी सीट पर पहलू
बदल रहे हैं। और हां भैया, कल चैकअप करवाने जरूर आना।
शर्माजी वास्तव में अट्टू साहिब से मिलने को बेचैन थे। माथुर के जाते ही वे
अट्टू साहब के केबिन में जा घुसे। पहले खंखारे, फिर मुस्कराये। कुर्सी को जरा
पीछे खिसकाया और बड़ी अदा से उस पर बैठ गए। अट्टू साहिब अपनी डॉक्टरी के नशे
में... क्षमा कीजिये... कुछ देर पहले खाई दवा की खुमारी में थे। अधखुली आंखों
से उन्होंने शर्माजी को देखा, कुछ सजग हुए और बोले - तो शर्माजी आपको भी कब्ज
हो गई।
शर्माजी हैरान! यह राज की बात अट्टू साहिब को कैसे मालूम हुई! खैर उन्होंने मन
ही मन तय किया और फिर खंखारते हुए बोलने को उद्यत हुए - अट्टू साहब, बात दरअसल
ये....
अट्टू साहब ने उनकी बात लपक ली - छोड़ो भी शर्माना, शर्माजी मैं आपकी समस्या दस
मिनट में दूर कर दूंगा...
सच साहब...
हां भाई हां!
ओ... फिर तो मैं पट्टू से भी शर्त जीत जाउंगा...।
शर्त... कैसी शर्त... खैर छोड़ो... ये लो, इसे गर्म पानी के साथ ले लो।
नहीं नहीं मैं ये नहीं लूंगा मैं तो आपसे....
कैसे नहीं लोगे... मुझे जानते नहीं! मैं देकर ही दम लूंगा।
अट्टू साहिब... आपने छह महीने पहले मुझसे पांच सौ रुपये लिये थे वही दे
दीजिये... प्लीज
हें... क्या ... अट्टू साहिब की जुबान मानो अकड़ गई।
हां साहब। शर्माजी बोले - मैं तो आपसे वे रुपये लेने ही आया था। पट्टू ने भी
मुझसे शर्त लगाई है, यदि आपने रुपये लौटा दिये तो वह मुझे सौ रुपये अतिरिक्त
देगा।
अट्टू साहब को इतनी देर बाद फिर से सर्दी-जुकाम, खांसी-सरदर्द ने घेर लिया। वे
अपने दवाइयों के जखीरे से टेबलेट निकाल कर सामने रखने लगे। शर्माजी से नजरें
मिलाने से पहले वे ब्लड प्रेशर की टेबलेट ले चुके थे। - मोहन थानवी (अरबी
सिन्धी मे ये श्रंखला हिन्दू डेली अजमेर से २०१० में पब्लिश  हो चुकी है  )

Tuesday, January 1, 2013

फैला पंख और भर उड़ान...


उड़ान..

आकाश असीम और खुला है
फैला पंख और भर उड़ान
गा नवगीत और स्थापित कर नव आयाम