जाग उठा प्रशासन : समय कम और दीपावली सर पर निगम सकते में, पीडब्ल्यूडी बेफिक्र, ठेकेदारों के पास चैन की बंसी

ऐसे नकारात्मक परिणामों की सीधी सीधी जिम्मेदारी उन प्रशासनिक कार्मिकों पर आती है जिन्हें धरातल पर अधिकारियों के दिशा निर्देश को क्रियान्वित करना चाहिए। 

औरों से हटकर सबसे मिलकर

file photo social media 



bahubhashi.blogspot.com
गतिविधियां, वक्तव्य, विश्लेषण

खबरों में बीकानेर


✒️@Mohan Thanvi

जाग उठा प्रशासन : समय कम और दीपावली सर पर
निगम सकते में, पीडब्ल्यूडी बेफिक्र, ठेकेदारों के पास चैन की बंसी
Affiliate Disclaimer : "नोट: इस पोस्ट में कुछ एफिलिएट लिंक्स शामिल हैं। अगर आप इन पर क्लिक करके कुछ खरीदते हैं, तो मुझे बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के छोटा सा कमीशन मिल सकता है।" - मोहन थानवी (खबरों में बीकानेर) औरों से हटकर सबसे मिलकर

https://bahubhashi.blogspot.com


https://bahubhashi.blogspot.com


जागा हुआ प्रशासन : समय कम और दीपावली सर पर
निगम सकते में, पीडब्ल्यूडी बेफिक्र, ठेकेदारों के पास चैन की बंसी 

- मोहन थानवी 

आम जनता की मूलभूत व्यवस्थाओं को लेकर प्रशासन सदैव जागा हुआ ही रहता है, इसमें संदेह नहीं करना चाहिए।  लेकिन कुछ विभाग ऐसे हैं जिनके प्रशासनिक अधिकारी भले ही कितने ही दिशा निर्देश जारी कर अपने विभाग से संबंधित  व्यवस्थाओं को दुरुस्त रखते रहने के लिए प्रयासरत रहते हों लेकिन नकारात्मक परिणाम सबके सामने दिखाई देता रहता है । ऐसे नकारात्मक परिणामों की सीधी सीधी जिम्मेदारी उन प्रशासनिक कार्मिकों पर आती है जिन्हें धरातल पर अधिकारियों के दिशा निर्देश को क्रियान्वित करना चाहिए। 

फल स्वरुप अब जबकि दीपावली में कुछ ही दिन शेष रह गए हैं, तब प्रमुख प्रशासनिक अधिकारियों को दीपावली के दौरान व्यवस्थाओं के चाक चौबंद बने रहने के निर्देश फिर से संबंधित विभागों को देने पड़ रहे हैं। 

 आमजन के लिए मूलभूत व्यवस्थाओं में सबसे पहले आती है साफ सफाई की बात और उसके बाद  देखा जाए तो लगभग जन समस्याएं पहले नंबर पर ही मानी जानी चाहिए । ऐसे में नगर निगम शहर की सफाई व्यवस्था को चंद दिनों में दुरुस्त कर दिखाने के निर्देश पर सकते में हो तो बड़ी बात नहीं। 

 आम समस्याएं :-  टूटी-फूटी सड़कें। प्रतिदिन बिजली कटौती। पेयजल पाइप लाइनों के संबंधित शिकायतें।  सीवर लाइन की बारहों महीने चलने वाली शिकायतों की झड़ी । बारिश के दौरान पानी निकासी का प्रमुख मुद्दा । जिस समस्या से रोजाना लगभग सभी को दो-चार होना पड़ता है वह है शहर के बाजारी इलाकों में यातायात की परेशानी। 

सड़कों की बात करें तो बीते दर्जनों महीनों के अनुभव से यह कहने में संकोच नहीं करना चाहिए कि सड़कों को दुरुस्त करने वाला विभाग बेफिक्र है। 

सच तो यह भी है कि आम जन की समस्याओं से जुड़े विभागों में पर्याप्त कार्मिक मुहैया ही नहीं है। और बहुत से कार्यों के लिए बहुत पहले से ठेकेदारी प्रथा काबिज है। ऐसे में जिम्मेदार कार्मिकों अथवा उनके ठेकेदारों पर सख्त कार्यवाही की गई ऐसा कभी सुनाई दिया हो तो उसे दिमाग पर जोर देकर याद करना पड़ता है। 

यही कारण समझ में आता है कि ठेकेदार दिन-त्योहार, राष्ट्रीय पर्वों और मंत्रियों-नेताओं के शहर में आगमन पर मिलने वाले अतिरिक्त कार्यों के ठेके मिलने के प्रति आशान्वित रहते हैं।  इस स्थिति को आम आदमी की भाषा में बयां किया जाए तो ठेकेदारों के पास चैन की बंसी मौजूद है।

ऐसा नहीं है कि इन हालात से प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी नावाकिफ हों, किंतु सरकारी व्यवस्था के आगे उनकी भी सीमा रेखाएं आमजन से छिपी नहीं हो सकती। संभवतया यही कारण है कि अब एक परंपरा सी बन गई है की खास खास मौकों पर प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी व्यवस्थाओं के चाक चौबंद बने रहने के प्रति अधीनस्थों को सजग करते रहते हैं। 

इसी के साथ सरकारी दफ्तरों के दैनंदिनी कार्यों के लिए भी विशेष कैंप आयोजित किए जाते हैं जिनमें शहरी और ग्रामीण इलाकों के वर्षों से लंबित कार्यों को संपन्न करवाया जाता है और प्रचार तंत्र के माध्यम से आम जन तक बहुत ही फख्र से खबरें पहुंचाई जाती है की कैंप में 30 वर्ष पुराने इन इन मामलों को सुलटाया गया अथवा 2 साल से रुकी फलां फलां की पेंशन को चालू करवाया गया। 

कमोबेश ऐसा ही हाल सफाई अभियान (जिसे आजकल स्वच्छता अभियान का गौरवान्वित करने वाला नाम दिया गया है,) में भी सामने आता है । और बताया जाता है की फलाने बाजार/कार्यालयों के परिसर/अस्पतालों में इतने घंटों मे सफाई अभियान चला कर इतने ट्रेक्टर ट्रॉली कचरे को डंपिंग यार्ड में भेज कर संबंधित स्थल की काया पलट कर दी गई।

इन सब वर्षपर्यंत अनवरत चलने वाली प्रक्रियाओं की गूंज में आम आदमी की सवालों से भरी आवाज दब जाती है । सवाल अनुत्तरित ही रह जाता है कि जब अपवाद छोड़ कर तमाम  कामों के लिए ठेकेदारों को जनता की गाढ़ी कमाई में से प्राप्त राजस्व का खर्च किया जाता है तो बावजूद इसके फिर विशेष अभियान और विशेष कैंप लगाने की आवश्यकता ही क्यों पड़ती है ? बहरहाल दीपावली सर पर है । सदैव की भांति प्रशासन तो जागा हुआ ही है । लेकिन प्रशासनिक अमले के कुछ एक अंशों को जगाने के लिए प्रमुख प्रशासनिक अधिकारियों को सजग करते रहने की परंपरा निर्वहन करने की बाध्यता को नकारने के उपाय सरकारी नियमों में से ढूंढ़नें हीं होंगे।



Comments