जनआंदोलन राजनीतिक व्यवस्था की कमियों पर सवालिया निशान खड़ा करते हैं : आदित्य निगम अन्यायपूर्ण व्यवस्था और कानून का विरोध करना हर नागरीक का कर्तव्य है : डॉ नंदकिशोर आचार्य

डॉ.छगन मोहता स्मृति व्याख्यानमाला 2026 का आयोजन

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डॉ.छगन मोहता स्मृति व्याख्यानमाला 2026 का आयोजन 

जनआंदोलन राजनीतिक व्यवस्था की कमियों पर सवालिया निशान खड़ा करते हैं : आदित्य निगम

अन्यायपूर्ण व्यवस्था और कानून का विरोध करना हर नागरीक का कर्तव्य है : डॉ नंदकिशोर आचार्य 

जनांदोलन राजनीति व्यवस्था की कमियों पर सवालिया निशान खड़ा करते हुए इसे सिरे से खारिज करते हैं। ये आंदोलन सत्ता के दुरूपयोग और भ्रष्टाचारयुक्त औपचारिक राजनीति पर सवाल उठाते हैं और सभी जनांदोलनों के केन्द्र में जनता ही होती है। ये उद्बोधन मुख्यवक्ता सुख्यात विचारक आदित्य निगम ने बीकानेर प्रौढ़ शिक्षण समिति द्वारा आज 25 सितंबर, 2026 को आयोजित डॉ.छगन मोहता स्मृति व्याख्यानमाला की 23वीं कड़ी के तहत आयोजित इक्कीसवीं सदी के जनांदोलनों के आईने में ‘राजनीति’ और ‘सियासत’ व्याख्यान में मुख्यवक्ता के रूप में स्थानीय प्रौढ़ शिक्षा भवन सभागार में अभिव्यक्त किए गए। प्रारंभ में मुख्यवक्ता एवं मुख्यअतिथि आदित्य निगम का शॉल एवं बीकानेर गोल्डन आर्ट से सजा सम्मान अर्पित कर स्वागत किया गया।
 मुख्यवक्ता आदित्य निगम ने देश-विदेश के विभिन्न जनांदोलनों की पृष्ठभूमि और प्रकृति पर स्थानीय तथ्यों को जोड़ते हुए कहा कि ‘राजनीति’ जिस शै का नाम है उसका वजूद ही ‘द्वंद्व’ और ‘अंतर्विरोध’ पर टिका है। जिस समाज में द्वंद्व और अंतर्विरोध या कलह नहीं है वहां ‘राजनीति’ भी नहीं हो सकती है। उन्होंने अपने व्याख्यान के प्रारंभ में कहा कि पिछली सदी में अस्सी की दहाई के आखि़री बरसों में उस वक़्त के समाजवादी देशों में हमने जनांदोलनों का ऐसा ज्वार देखा था जिसके फलस्वरूप समूचे पूर्वी यूरोप और सोवियत संघ में राज्य-आधारित समाजवाद का क़िला चरमरा कर ढह गया । मार्क्स ने दिखाया कि वर्गों के बीच आर्थिक अंतर्विरोधों का भी एक राजनीतिक पहलू होता है जो अक्सर वर्ग संघर्ष की राजनीतिक शक्ल में सामने आता है। परिवार और स्त्री-पुरुष के अंतरंग संबंधों में व्याप्त सत्ता-संबंधों और हिंसा की ओर ध्यान आकर्षित करने वाला यह सैद्धांतिकरण राजनीति की हमारी समझ को और विस्तृत करता है। ऐसा ही कुछ देखने को मिलता है जब हम जाति-आधारित छुआछूत जैसे अन्य भेदभावों पर नज़र डालते हैं। जाति के सत्ता-संबंध भले ही ‘संस्कृति’ की शक्ल में हमारे सामने हाज़िर हों, होते हैं वह आधिपत्य और शोषण की ही संरचनाएं। 
‘उत्तर-राजनीतिक’ अवस्था और ‘सियासत’ के बारे में कहा कि राजनीति की अंदरूनी बनावट ऐसी है जैसे रंगमंच में दर्शकों को वही दिखता है जो रोशनी के घेरे में दिखाया जाता है जबकि असली खेल तो अंधेरे में पर्दे के पीछे खेला जा रहा होता है। संविधान में केवल नागरीक व कानून है, पार्टियां कहीं भी नहीं है फिर भी संविधान का उपयोग पार्टियां अपने हितो को साधने में करती है। 
उनका मानना है कि जब तक राजनीति का कारोबार पार्टियाँ चलाएंगी तब तक हर नुमाइंदा अपने चुनने वालों की नहीं बल्कि पार्टी की नुमाइंदगी ही करेगा। दूसरी बात जो हेबरमास उठाते हैं वह है मास मीडिया का सवाल। उनका यह दावा था कि मास मीडिया के आविर्भाव के साथ, पार्टी नाम की शै से उसका जो रिश्ता बना उसने एक अभूतपूर्व और ख़तरनाक़ स्थिति को जन्म दिया। इन दोनों के मिलन से पैदा होता है वह ज़हर जिसे हम ‘प्रोपेगैंडा’ नाम से जानते हैं। प्रोपेगैंडा का एक पूरा का पूरा तामझाम खड़ा हो जाता है। 
ईरान-अमरीका, ईजराईल-आज ग़ज़ा, बांग्लादेशी उपद्रव, नेपाल जेनजी क्रांति, श्रीलंका आंदोलन और के माध्यम से बताया कि उन्होंने कहा कि आमजन तो राजनीति और सत्ता के उद्देश्यों को साधने के लिए रसद सामग्री के समान है। जनसंहार के खि़लाफ़ और इस्राएल के विरुद्ध सारी दुनिया में उठ रहे आंदोलन अपने अपने देशों में जिस बेरहमी से दबाये जा रहे हैं - ख़ासकर अमरीका और यूरोप में, और ख़ुद हमारे जैसे देशों में - उससे सब जगह सरकारों और अवाम के बीच गहरी खाई साफ़ दिखाई देने लगी है।  
अपने व्याख्यान के अंत में उन्होंने कहा कि यहाँ मैं इतना भर कहना चाहता हूँ कि यूरोप और अमरीका में साधारण लोगों की सत्ता-विहीनता और उत्तर-औपनिवेशिक व दक्षिण गोलार्ध के देशों का उपरोक्त तजुर्बा - दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। आज वैश्विक स्तर पर इन आंदोलनों के माध्यम से एक सचाई हमारे सामने उजागर हो रही है - राजनीति के पुराने रूप अब मरणासन्न हैं मगर नए की पुरज़ोर तलाश जारी है। अभी नए का जन्म नहीं हुआ है मगर शायद वह एक अलग तरह का जनतंत्र होगा जहाँ निर्वाचक ही निर्णायक होगा और जहाँ नुमाइंदा अपने निर्वाचकों के प्रति ही ज़िम्मेदार होगा। आपके वोट से बना आपका प्रतिनिधि आपके लिए उत्तरदायी बनें न कि अपनी पार्टी के लिए। अब शिकारी को नहीं शेर को अपनी दास्तां लिखनी होगी।
अध्यक्षीय उद्बोधन के तहत कवि-चिंतक डॉ. नंदकिशोर आचार्य ने कहा कि लोकतंत्र में किसी के भरोसे नहीं रहना है। अन्यायपूर्ण व्यवस्था और कानून का विरोध करना हर नागरीक का कर्तव्य है। इसलिए हमें हमें खुद को लोकतंत्र के योग्य बनाएं रखना है नहीं तो हमें ऐसा ही लोकतंत्र मिलेगा। लोकतंत्र में किसी के भरोसे नहीं रहना है। उन्होंने कहा कि वास्तविक जनांदोलन वहीं है जो सत्ता प्राप्ति की लालसा से मुक्त हो। क्योंकि हर पार्टी ने अपने संख्याबल का फायदा उठाते हुए लोगों के अधिकारों का हनन किया है। सत्ता का चरित्र होता है राजनीति का नहीं। आज सबसे बड़ी समस्या केन्द्रीकरण राजनीति की है। जो जाति-समाज अन्याय का विरोध नहीं करते वे असल में गुलामी की ओर बढ़ते हैं। जब तक आपके अंदर आंदोलन नहीं जगेगा तब तक बाहरी आंदोलनों से आपकी स्वतंत्रता और आपके अस्तित्व की रक्षा कोई नहीं कर सकता।
आयोजन के प्रारंभ में बीकानेर प्रौढ़ शिक्षण समिति के अध्यक्ष डॉ.ओम कुवेरा ने आगंतुकों का स्वागत करते हुए डॉ.छगन मोहता के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि डॉ.छगन मोहता अपने आप में बेजोड़ एवं फड़दी थे। उनके व्यक्तित्व में ज्ञान के प्रति किंचित मात्र भी अहंकार नहीं था। 
कार्यक्रम के खुल सत्र में संपत जैन, धर्मचन्द्र जैन, मुकेश व्यास, मोतीलाल बोदानी, भवानी सोलंकी, शकूर बीकानेरी, बुलाकी शर्मा,, जीतेन्द्र श्रीमाली आदि ने जनांदोलनों में नैतिकता, कानून पेचीदिगियां, विउपनिवेशीकरण, जेपी आंदोलन,आरक्षण रिव्यू आंदोलन की संभावना आदि पर अपनी जिज्ञासाओं की अभिव्यक्तियां दी - जिस पर मुख्यवक्ता द्वारा तथ्यपरक जानकारियां एवं प्रत्युत्तर दिए गए।
कार्यक्रम का प्रभावी संयोजन करते हुए संस्था के संयुक्त सचिव डॉ.ब्रजरतन जोशी ने मुख्यवक्ता का परिचय देते हुए कहा कि आज का विषय राजनीति, इतिहास एवं दर्शन के रूप में बहुत प्रासंगिक है।
शहर के विभिन्न क्षेत्रों के प्रबुद्धजन की सक्रिय सहभागिता ने व्याख्यानमाला को सार्थकता प्रदान की।
संस्था के कोषाध्यक्ष एडवोकेट गिरिराज मोहता ने आगंतुकों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस प्रकार के आयेाजनों से हमें आत्मबोध एवं सामाजिक चिंतन करने का अवसर मिलता है।

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