Friday, February 28, 2014

नूरजहां का फरमान और इतिहास देख मुस्कराता है भविष्य

नूरजहां का फरमान और इतिहास देख मुस्कराता है भविष्य
जहां शब्दों से होता है संवाद। ऐसे शिक्षा के मंदिर, शब्दों से संवाद करवाने वाले स्थल पर एक-दो मार्च 2014 को राष्ट्रीय - अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त इतिहासकार जुटेंगे और भविष्य के लिए इतिहास का मंथन करेंगे।
नूरजहां के फरमान - मुगल बादशाह जहांगीर, शाहजहां, औरंगजेब, नूरजहां, बहादुरशाह द्वारा लिखे गए ऐतिहासिक फरमान, निशान और जयपुर, जोधपुर एवं सिरोही के राजाओं को लिखे पत्र इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए आकर्षण का केंद्र हैं। ये पत्र संरक्षित है और आनलाइन भी किए गए हैं।
रियासतकालीन 35 लाख से भी अधिक ऐतिहासिक दस्तावेजों से शोधार्थी इतिहास में झांकते हैं। शब्दों से संवाद स्थापित कर अपना भविष्य बनाते हैं। ऐसा स्थान है बीकानेर में राजस्थान राज्य अभिलेखागार।
यहां स्वतंत्रता संग्राम में अपना सबकुछ होम कर देने वाले 246 देशभक्तों के संस्मरण भी संरक्षित है और उन्हें सुना भी जा सकता है। इनमें गोकुल भाई भट्ट, सिद्धराज ढढ्ढा, रणछोड़दास गट्टाणी, मथुरादास माथुर, हीरालाल शास़्त्री शामिल हैं।
इतिहास के शोधार्थियों के लिए अभिलेखागार में अकूत सामग्री संरक्षित है। संबंधित क्षेत्र की कला-संस्कृति, सामाजिक जीवन, लोकरंग, लोक रीतियांे के बारे में ऐसी सामग्री से तत्कालीन तथ्यात्मक जानकारियां हासिल होती हैं। यहां संरक्षित अभिलेखों को आनलाइन भी किया गया है। इनमंे बीकानेर महकमा खास, ऐतिहासिक बहियां, रामपुरिया रिकॉर्ड, परवाना बहियां, कौंसिल के हुकुम की बहियां शामिल हैं। जयपुर रियासत के लगभग 11 लाख ऐतिहासिक अभिलेख, जिनमें प्रमुख रूप से स्याह हुजूर वकील रिपोर्ट्स, अखबारात, अर्जदाश्त, लोजी, रुक्के, परवाने, आमेर अभिलेख, दस्तूर कौमवार, मुगलकालीन ऐतिहासिक फरमान, निशान व मंसूर, विल्स रिपोर्ट, मुगल राजपूत व राजपूत मराठा से संबंधित ऐतिहासिक दस्तावेज शामिल है।
दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का आगाज एक मार्च 2014 को - निदेशालय, राजस्थान राज्य अभिलेखागार बीकानेर के आयोजन में अभिलेखागार के स्रोत एवं महत्व विषयक इस राष्ट्रीय सेमिनार का आगाज न्यायमूर्ति आर एस चौहान, राजस्थान हाईकोर्ट, जयपुर के मुख्य आतिथ्य में सुबह साढ़े दस बजे होगा।
इतिहासकार पुरस्कार - अभिलेखागार निदेशक डॉ महेंद्र खड़गावत के अनुसार सेमिनार के दौरान पूर्व निदेशक नाथूराम खड़गावत की स्मृति में इतिहासकार पुरस्कार की घोषणा की जाएगी।
पुस्तक विमोचन - फारसी फरमानों के प्रकाश में मुगलकालीन भारत एवं राजपूत शासक, भाग-2, अभिलेख जर्नल एवं ए लिस्ट आफ दी इंग्लिश रिकॉर्ड ऑफ दी अजमेर कमिश्नर, द्वितीय संस्करण का विमोचन भी किया जाएगा।

Wednesday, February 26, 2014

शिव पर वैज्ञानिक-शोध ! शिव ही सत्य है... !

शिव पर वैज्ञानिक-शोध !
शिव ही सत्य है... !
शिवजी का डमरू और त्रिशूल। शिवजी की जटाओं से निकलती गंगा। शिवजी का तीसरा नेत्र। नटराज रूप। शिवजी का तांडव नृत्य। और... और... और... अनेकानेक प्रसंग। जिन पौराणिक कथाओं को कुछ लोग कपोलकल्पित करार देने में पल भर भी नहीं लगाते, उन्हीं कथाओं के लघु से लघु प्रसंगों पर कतिपय वैज्ञानिक गहन शोध कार्य भी कर रहे हैं। सभी शोध-परिणाम सार्वजनिक भी नहीं किए जा रहे। क्यों? खासतौर से सिंधु सभ्यता, सिंधु संस्कृति, धार्मिक मान्यताओं पर किए जाने वाले शोधों की जानकारी, उनके परिणाम के बारे में हिंदी भाषी क्षेत्र के लोग तो लगभग अनजान ही रह जाते हैं। क्यों ? शिवजी संबंधी ही नहीं बल्कि सभी देवी-देवताओं और संसार भर में देवतुल्य अथवा मानव जीवन से श्रेष्ठ माने जाने वाले चरित्रों और उनसे जुड़ी वस्तुओं पर ऐसे शोध आज से नहीं बल्कि बीती सदियों से जारी हैं। यह अलग बाल है है कि कतिपय वैज्ञानिकों ने ऐसी रोमांचक, अद्भुत और अचंभित कर देने वाली बातों, चीजों, जीवों को एलियन से भी जोड़ा है, जो कि इस तरह के वैज्ञानिक शोधों के कोटि कोटि पहलुओं में से एक है। ऐसे शोधों में इस तरह के पहलू होना अनिवार्य भी है। वैज्ञानिक नहीं रहते लेकिन उनके शोध कार्य को जारी रखा जाता है। ऐसी शोध-यात्रा अनवरत जारी है। इसमें भूगर्भ से खोजे गए हजारों साल पुराने जीवन के अवशेष और शिलाओं पर उकेरे गए ज्ञात अज्ञात लिपियों तथा अनजान संकेत भी शामिल हैं। यात्रा - यात्रा जारी है। श्वांस आने-जाने तक। हां... ? अनुभूति भी यात्रा है..? हां ! जीवन ... अनुभूति की यात्रा ही तो है । अनुभूति और जीवन क्या एक दूसरे के पर्याय नहीं ? मृतक को किसी प्रकार की कोई अनुभूति होती हो, ऐसा संभव नहीं। किसी से सुना भी नहीं, कहीं पढ़ा भी नहीं। जीवितावस्था ही अनुभूति कराती है। चराचर जगत में पेड़-पहाड़ भी प्राणवान है और यह तो सभी ने सुना ही है... गीत गाया पत्थरों ने...!!! शिवलिंग को आप क्या कहेंगे ! शिवलिंग ही तो कहेंगे। किंतु शिवलिंग के रूप में देखने से पूर्व उसे कीमती शिलाखंड भी माना जा सकता है। शिवलिंग भी कितने ही प्रकार के हैं। संसारभर के वैज्ञानिकों को शिवजी के त्रिशूल पर एक वैपन, यानी हथियार के नजरिये से देखने के लिए किसने प्रेरित किया! संभवतः शोध कार्य को हर पहलू से करने के नजरिये ने ही त्रिशूल और ऐसे अन्य चिन्हों को हथियार अथवा किसी विशेष प्रयोजन से जांचने परखने की आवश्यकता उत्पन्न की। बहरहाल, भारतीय संस्कृति में, सिंधु संस्कृति में शिव को ही सत्य कहा गया है। शिव में ही इस दुनिया, चराचर जगत के रहस्य छिपे हैं। हमें उन्हें जानना होगा। शिव को जानने का अर्थ सत्य को जानना है। शिव ही सत्य है।