Tuesday, July 3, 2012

परवाज के लिये कोंपलों के हौसले बुलंद है -- सम्मति - मीनाक्षी स्वर्णकार की काव्यकृति ‘‘कोंपलें’

सम्मति - मीनाक्षी स्वर्णकार की काव्यकृति ‘‘कोंपलें’’
परवाज के लिये कोंपलों के हौसले बुलंद है। क्योंकि सृजन के प्रति समर्पण है। जहां समर्पण होता है वहां लगाव भी स्थायी तौर से वास करता है। शब्द-शब्द चुन-चुनकर रचना-संसार को आकार देने वाली कलम में ऐसी ही समर्पण की स्याही भरकर मीनाक्षी स्वर्णकार ने सृजन की परवाज पर कोंपलें उकेरी है। अभिव्यक्ति के कितने ही तरीके हो सकते हैं मगर काव्याभिक्त संस्कृत-काल से लेखन-संस्कृति में शीर्ष पर रही है। मीनाक्षी स्वर्णकार के काव्य-संग्रह कोंपले में 67 काव्य आकृतियां हैं और सभी मन के आईने अंकित हो जाती है। इनमें से संवेदनाओं को जगाती ओस की बूंद अन्तस को भिगो देती है।
बावरी-सी ओस की बूंद/
हरी-हरी पत्तियों से गिरकर/
फैल गई सुनहरी धरा पर/
कुछ इठलाती, कुछ इतराती-सी/
खालिस मोतियों की तरह/
चारों ओर बिखरकर/
आलिंगन करने लगी/
सूखी बिखरी घास का/
और अपना सारा यौवन/
इन्हें सौंपकर/
समा गई इनके अंतःकरण में हमेशा हमेशा के लिये/
ये बावरी-सी ओस की बून्द।  (पृष्ठ 31)
काव्य-रस से जब तक संवेदनाएं भीगें नहीं, पाठक को भी शीतलता की प्राप्ति नहीं होती। ऐसी ही शिल्पगत प्रवृत्तियों की आवश्यकता को पूरा करती मीनाक्षी की कोंपले में उकेरी हुई रचनाएं प्रभावित करती हैं। भाषात्मक संरचना का वैशिष्ट्य तो कोंपलें में झलकता ही है, सान्द्र बिम्ब योजना अर्थलय, मुक्त छन्द के साथ पौराणिक प्रतीकों का प्रयोग व नवीन उपमान-विधान भी पाठक को काव्य-रस का आनंद लेने में सहायक बनते हैं।  बीकानेर साहित्य-नगरी है। यहां हर विधा में सृजनहार सदैव मरुधरा की सुनहरी रेत पर शब्दांकन करते रहे हैं। चिंतक डा नंदकिशोर आचार्य ने जो आयाम प्रतिपादित किये हैं वे नयी कविता की अनवरत यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं और डा आचार्य की यात्रा अथक जारी है। मीनाक्षी इसी नगरी की युवा रचनाकार है, बहुप्रतिभा की धनी है। काव्यकृति के साथ-साथ उन्होंने रेखाचित्रण भी किया है जो कविताओं को जीवंत बना देता है। नयी कविता ने भारतेन्दु युग में राष्ट्रीय चेतना एवं पुनर्जागरण से परवाज भरना आरंभ किया और द्विवेदीजी के काल में आदर्शवादी सुधार मूलक के रूप में समाज में जागृति के दीप प्रज्वलित किये। छायावाद, प्रगतिवादी मार्क्सवादी, प्रयोगवादी, प्रयोगधर्मी विचार दर्शन के सौपान सर करती हुई आधुनिक भाव-बोध की नयी कविता ने समानान्तर काव्यान्दोलन का नजारा भी किया। अकविता, प्रतिबद्ध कविता, बीटनिक कविता, विचार कविता, हाईकू, गजल, नवगीत इस काल में प्रमुखता से मूर्तरूप में सामने आये। कोंपलें में मीनाक्षी की कविताएं ऐसे रूप भी झलकाती हैं। कहीं बेहतरी के लिये परिष्कृत होने की बाट भी जोहती दिखती हैं मगर अंततः अन्तस में स्थान बना लेती हैं। खासतौर से तब जब आंचलिकता का बोध करवाते शब्द-चित्रण से मरुधरा का ग्राम्य-जीवन आंखों के आगे जीवंत हो जाता है। बानगी है,
हजार हवेलियों के साथ की/
यह अनोखी नगरी/
खट्टे-मीठे स्वाद के संग/
रसगुल्ले, भुजिया-पापड़ के भी रंग/
इनसे है रिश्ता पुराना/
ये है मेरा शहर बीकाणा। (20) ....
और भी, ...
प्रकृत्ति जब श्रृंगार करे/
पत्ते बन गये हरे-भरे/
रूप जब नवयौवन से भर जाये....। (42)
ऐसे ही पौराणिक संदर्भों को मीनाक्षी ने अपनी रचनाओं में यूं पिरोया है मानो वे इसी वर्णन के लिये ही ग्रंथों में रहे हैं। देखें -
हे पुराणपुरुष/
हे सुदर्शन/
आज फिर से करो/
पांचजन्य का शंखनाद/
और अंत करो/
इस महाभारत का..... (65-66)।
बीकानेर के ख्यातनाम रचनाकारों ने आंचलिकता को भी अपनी लेखनी से दुनियाभर तक पहुंचाया है, कुछ उदाहरण समीचीन रहेंगे। सर्वेश्वरदयाल सक्सेना (कुआनो नदी) - झमाझम, झमझमाता, टट्टा आदि।  शम्भूदयाल सक्सेना, (रत्नरेणु)- छोकरिया, छितरे, लतराएं आदि। हरीश भादानी (सुलगते पिण्ड) - पूरबिया समन्दर, थेगड़े, धूप पोरों से पखारी आदि। योगेन्द्र किसलय (और हम) - ठरठराती, सींवन, गंदलाए आदि। इन बीकाणा के रचनाकारों समेत भारत भर में कितने ही सुविख्यात कवियों ने अपनी कविताओं में केर-सांगरी, धूजणी, भुजिया, पूरबिया आदि आंचलिक शब्दों का प्रयोग किया है। यह सुखद है कि मीनाक्षी की रचनाओं में भी ऐसे शब्द मिलते हैं, जैसे - ... भूल जाते हैं थपेड़ों को... (22), खारे पानी के रेले को धता बता.... (24) आदि। यूं प्रतीकों और बिम्बों को कविता में अनिवार्य रूप से देखा जाने लगा है मगर नवाचार, सामाजिक सरोकार, समाज के प्रति अपना दायित्व बोध, राज और काज की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाती सुगठित रचनाएं एक साथ हों तो रसास्वादन दीर्घ और अधिक आनंददायक हो जाता है। मीनाक्षी ने अपनी रचना-माल कृति कोंपलें में ऐसी रचनाएं भी पिरोयी है। एक ही मिसाल काफी है .... भारतवर्ष शीर्षक से यह कविता ) अपने साथ साथ समग्र कृति की महत्ता प्रतिपादित कर देती है,
मेरे समक्ष खड़ा है/
एक कृशकाय विश्वविजेता/
रुदन करता हुआ/
साथ मंे है/
उसकी दो बेटियां/
सभ्यता और संस्कृति/
जिनका/
पाश्चात्य दुर्योधन ने/
चीर हरण करवाया है/
पास ही पड़ा है/
उसका स्वर्णमुुकुट/
बेद-गीता पर।   (35)
कोंपलें महक रही है। ये महज कोंपलें नहीं बल्कि समग्र पर्यावरणीय संरचनाओं को अपने में समेटे एक विशाल वृक्ष है। इसमें मौसम, रिश्ते-नाते, अपना शहर, बेगाने लोग, प्यार, नफरत, हार-श्रृंगार और जीवन का हर पहलू मीनाक्षी ने पल्लवित किया है। हां, लेखिका को यह हमेशा याद रखना चाहिये कि बेहतरी के प्रयास असीम होते हैं। पठनीय एवं संग्रहणीय कृति के लिये मीनाक्षी को साधुवाद। लेखिका की पहली लेकिन परिपक्व कलम से साकार हुई इस सुकृति को आकर्षक मुद्रण के साथ गुणवत्तायुक्त पेपर काम में लेते हुए मनोहारी एवं प्रभावित करने वाले आवरण के साथ साहित्य-रसिकों को उपलब्ध करवाया है इसके लिये खासतौर से प्रकाशक साहित्यागार को साधुवाद।
-- मोहन थानवी