पांच ज्ञान पूजाओं के साथ चौमासिक प्रतिक्रमण, साधर्मिकों ने ‘मिच्छामि दुक्कडम्’ कहकर मांगी परस्पर क्षमा
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पर्युषण की तप-संयम आराधना का समापन, संवत्सरी पर बारसा सूत्र वाचन और चैत्य परिपाटी
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पांच ज्ञान पूजाओं के साथ चौमासिक प्रतिक्रमण, साधर्मिकों ने ‘मिच्छामि दुक्कडम्’ कहकर मांगी परस्पर क्षमा
बीकानेर। तपागच्छीय गच्छाधिपति पद्मश्री आचार्य श्रीमद् विजय नित्यानंदसूरिश्वरजी महाराज साहेब की आज्ञानुवर्तिनी साध्वीश्री प्रीतिरत्ना, साध्वीश्री प्रीतिसुधा एवं साध्वीश्री प्रीतियशा महाराजसा आदि ठाणा-3 की पावन निश्रा में रांगड़ी चौक स्थित पौषधशाला में चल रहे चातुर्मास एवं पर्वाधिराज पर्युषण के समापन अवसर पर मंगलवार को संवत्सरी पर्व मनाया गया।
चौमासिक प्रतिक्रमण में आत्मावलोकन, ‘मिच्छामि दुक्कडम्’ से मांगी क्षमा
आयोजन में बड़ी संख्या में साधर्मिक शामिल हुए। इनमें डॉ. धनपत कोचर, डॉ. अभिषेक कोचर, विजय कोचर, रिखबचंद-भीखमचंद परिवार, नीलम सिपानी परिवार तथा शांतिलाल-हनु कोचर परिवार सहित अनेक श्रावक-श्राविकाओं ने सहभागिता निभाई।
आठ दिनों तक चली जप, तप, स्वाध्याय, पूजा, प्रतिक्रमण और विभिन्न धार्मिक आराधनाओं के बाद संवत्सरी पर श्रीसंघ ने आत्मावलोकन और क्षमापना की साधना की। सुबह बारसा सूत्र का वाचन हुआ, जिसका श्रावक-श्राविकाओं ने श्रद्धा और एकाग्रता के साथ श्रवण किया। इसके साथ पांच ज्ञान पूजाएं-मति ज्ञान, श्रुत ज्ञान, अवधि ज्ञान, मन:पर्यव ज्ञान और केवलज्ञान- करवाई गईं। साध्वीवृंद ने ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप की आराधना के महत्व को समझाते हुए पर्युषण के दौरान की गई धर्मसाधना को आत्मसंयम और आत्मशुद्धि से जोड़कर बताया।
गाजे-बाजे के साथ निकली चैत्य परिपाटी, महावीर मंदिर में की आराधना
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साध्वीवृंद की पावन निश्रा में चैत्य परिपाटी निकाली गई। रांगड़ी चौक स्थित पौषधशाला से शुरू हुई चैत्य परिपाटी महावीर मंदिर, बैदों का चौक पहुंची। श्रीसंघ के श्रावक-श्राविकाएं गाजे-बाजे के साथ इसमें शामिल हुए। मंदिर पहुंचकर भगवान महावीर के दर्शन-वंदन, चैत्यवंदन एवं पूजा-अर्चना की गई। चैत्य परिपाटी को तपागच्छीय परंपरा में जिनालय दर्शन और जिनभक्ति की महत्वपूर्ण आराधना माना जाता है। इस दौरान साधर्मिकों में धार्मिक उत्साह और पर्व के प्रति श्रद्धाभाव देखने को मिला।
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