Saturday, March 16, 2013

किताब के खुले पन्ने...


किताब के खुले पन्ने...



किताब के खुले पन्ने
फड़फड़ाते पन्ने
कितनी कथाएं
कितने काव्य
कितने नाटक
अपने में सहेजे हुए हैं
इन्हीं पन्नों में कहीं
तुम्हारे संग
मेरा भी अक्स
उभर आता है
कभी कभी
जब
हवा थम जाती है
और
किताबों के पन्ने
गहरी खामोशी अख्तियार कर लेते हैं
तब
मेरे तुम्हारे अक्सों में
बहुतेरे और अक्स
गडमड हो जाते हैं
हवा को थामने वाला
फिर हवा चला नहीं पाता
चला पाता तो
कुछ कर पाता तो...
जरूर करता
पेड़ों को भंभोड़ता
पत्तों को अपनी सांसों से गति देता
ताकि
हवा चले
किताबों के पन्ने फड़फड़ाएं
अक्स
मुस्कराएं