Monday, July 30, 2012

आकाश मेरा है "नारी की ये कहानी नहीँ हकीकत है"

आकाश मेरा है

सिंधी से अनूदित कहानी .../


अचानक कुछ हो जाए तो...! इस विचार ने नरेश को झकझोर दिया। उसे मघी की चिंता हुई। मघी, उसकी अर्द्धांगिनी। उसके सुख दुख की सहयोगी। जब भाई बहिन और मां बाप तक ने बीमारी में उसकी सुध नहीं ली तब भी मघी ने हिम्मत नहीं हारी। वह उसे मातृत्व का सुख नहीं दे सका किंतु मघी ने कभी गिला शिकवा नहीं किया। ऐसे विचार नरेश को उद्वेलित कर रहे थे। वह अपने गांव से बहुत दूर दिल्ली के एक नामी अस्पताल के वार्ड में एक अशुभ माने जाने वाले पलंग पर जीवन के लिए मौत से लड़ रहा था। पिछले कुछ दिनों से अस्पताल में डॉक्टरों से घिरा रहने के कारण वह घबरा गया। दिल्ली के इस अस्पताल में करीब 45 डॉक्टर है। नरेश को पेट का कोई रोग है। दवा के नाम पर उसे केवल इंजेक्शन लगाए जाते है। पिछले दस दिनों से रोजाना दो इंजेक्शन लगवाते हुए वह अधमरा हो गया है।
राजस्थान के फलौदी के नजदीकी गांव का नरेश जोधपुर के एक सरकारी स्कूल में शिक्षक है। सरकारी नौकरी होने के कारण दवा-दारू के बिल पारित हो जाते हैं इसलिए आर्थिक कारणों से इलाज में बाधा नहीं है। उसके पेट में दर्द रहता है। पिछले तीन साल से वह जोधपुर में इलाज कराता रहा लेकिन एक पखवाड़ा पहले डॉक्टर ने नरेश के पेट में गांठ होने की जानकारी दी। कहा कि ऑपरेषन करना पड़ेगा। उन्होंने उसकी पत्नी को दिल्ली जाकर नरेश का ऑपरेशन कराने की सलाह दी। बड़े डॉक्टरों ने उसे दिल्ली के डॉक्टर रूघनाथ से चैकअप और इलाज कराने की मशविरा दी।
दस दिन पूर्व नरेश अपनी पत्नी मघी के साथ दिल्ली पहुंचा। टैक्सी में अस्पताल ढूंढ़ते हुए उसके तीन सौ सत्तर रुपए और दो घंटे खर्च हो गए। अस्पताल में 45 डॉक्टरों के बीच डॉक्टर रूघनाथ को उन्होंने पांच मिनट में ही खोज लिया। डॉक्टर ने आधे घंटे में ही उसकी केस-हिस्ट्री देखकर उसे एम वार्ड में आठ नंबर पलंग पर  भर्ती कर लिया। पलंग के सिरहाने ही खिड़की थी। खिड़की में से अस्पताल के पिछवाड़े का उद्यान और गहरा नीला आकाश नजर आ रहा था।
नरेश की पत्नी मैट्रिक पास है। दुनियादारी में होशियार है। अस्पताल में पहले दिन उसने शाम होते-होते वार्ड, डॉक्टर और परिचायकों के बारे में पर्याप्त जानकारियां जुटा लीं। अस्पताल में 45 डॉक्टर हैं यह जानकारी भी उसे एक नर्स ने दी। एम वार्ड में 15 पलंग हैं। इनमें केवल आठ नंबर पलंग के सिरहाने ही खिड़की है। जहां से सारा आकाश नजर आता है। सात और नौ नंबर पलंग आठ नंबर पलंग से कम से कम दस फीट की दूरी पर हैं। इसका कारण मघी को मालूम है। एम वार्ड के इस पलंग पर केवल सीरियस मरीज को ही भर्ती किया जाता है। पिछले छह दिन से यह पलंग खाली था। मघी को जब अपने पति नरेश के बारे में यह दुःखद जानकारी मिली तो वह नर्स कौशल्या के कंधे पर सिर रखकर जार-जार रोई। कौशल्या ने उसे दिलासा दी।
नरेश की तबीयत पिछले तीन साल से खराब रहती है। नरेश और मघी की शादी चार साल पहले हुई थी। दोनों 25 साल के अंदर की उम्र के हैं। बच्चा अभी तक नहीं हुआ। जांच पड़ताल करवाई तो डॉक्टरों द्वारा मघी में नहीं बल्कि कुछ कुछ कमी होने का शुबहा नरेश में जताया गया। बावजूद इसके पति-पत्नी में मुहब्बत इस कदर बढ़ गई कि मघी ने अपने मायके वालों की नरेश में कमी होने की बात को लेकर दूसरी शादी और नरेश को तलाक देने की सलाह नहीं मानी। फलौदी के पास एक गांव में नरेश के दो भाई और माता-पिता रहते हैं। उन्होंने नरेश की तबीयत की जरा भी परवाह नहीं की। नरेश बीमार होने से पहले उन्हें घर खर्च के लिए प्रतिमाह रुपए भेजता था लेकिन अब नहीं भेज पाता। दिल्ली के इस अस्पताल में आने से पहले उन्होंने गांव में खबर की लेकिन किसी ने चिंता नहीं की, दिलचस्पी नहीं ली।
इस वक्त मघी नरेश के पलंग के सिरहाने स्टूल पर बैठी एक पत्रिका ‘सुरभि’ पढ़ रही थी। ‘सुरभि’ के दीपोत्सव विशेषांक में छपी नई पीढ़ी के सिन्धी साहित्यकारों की कविताएं मघी को काफी पसंद आईं। नरेश नींद में था। शाम गहरा गई थी। मघी ने उठकर टेबल पर रखी भगवान झूलेलाल की तस्वीर के आगे हाथ जोड़कर नरेश को जल्दी ठीक करने की प्रार्थना की। ज्योति और अगरबत्ती जलाकर वह अभी वापस स्टूल पर बैठी ही थी कि वहां एक नर्स आ पहुंची। नर्स स्कूली लड़की लग रही थी। आते ही उसने गुस्सा दिखाया कि मरीज के पास अगरबत्ती क्यों जलाई है। मघी नर्स को चुप कराए उससे पहले शोर के कारण नरेश जाग गया। इस बात के आधे घंटे के अंदर मघी और उस छोटी-सी प्यारी गुड़िया सी लगने वाली नर्स में दोस्ती हो गई। नर्स का नाम परमेश्वरी है। लड़की-सी दिखने वाली परमेष्वरी की उम्र है 27 साल। उसने मघी को बताया कि उसके दो बच्चे हैं। मघी को उसने अपनी सहेली बना लिया।
अस्पताल का बिल बनने से पहले ही मघी को रुपए जमा कराने पड़ रहे थे। मघी अपना और नरेश का एटीएम कार्ड साथ लाई थी। बैंक में अभी 35 हजार रुपए जमा थे। दस दिनों में अस्पताल में छह हजार रुपए खर्च हुए थे। नर्स ने मघी को बताया था कि अभी दो-तीन दिन नरेश की जांच होगी, फिर ऑपरेशन होगा। ऑपरेशन में करीब दस हजार रुपए खर्च होंगे। इस हिसाब को देखकर मघी को इलाज में खर्च के मामले में किसी तरह की फिक्र नहीं थी। दिन बीतते जा रहे थे।
आज नरेश का ऑपरेषन होगा। वह प्रसन्नचित्त नजर आ रहा था। नरेश के पेट की जांच पड़ताल पांच डॉक्टरों ने की। एक्सरे हुआ। दवाइयां मंगवाई। मघी को समझाया, दिलासा दी और एक फॉर्म पर हस्ताक्षर करवाए। नर्स ने मघी को बताया कि फॉर्म पर हस्ताक्षर करवाना एक औपचारिकता है। ऑपरेशन के दौरान मरीज को कुछ हो जाए तो अस्पताल की जिम्मेवारी नहीं है। मघी साक्षर और होशियार है, उसे ऐसी फॉर्मेल्टी’ज की जानकारी है। मघी के पूछने पर नरेश ने कहा, ऑपरेशन के बाद मुझे इसी पलंग पर लाना। इस पलंग पर बैठ खिड़की से बगीचा और आसमान देखना अच्छा लगता है। नरेश की बात सुनकर मघी का अन्तर्मन रो उठा। नरेश के सामने उसने अपनी आंखों के आंसू मुस्कान में छिपा लिए। उसने विश्वास भरे स्वर में नरेश को कहा कि ऑपरेशन के बाद उसे निश्चित रूप से इसी पलंग पर लेकर आएगी। ठीक होने के बाद साथ ही जोधपुर चलेंगे।
डॉक्टर रुघनाथ और चार-पांच दूसरे डॉक्टर रमेश के साथ ऑपेरशन थिएटर में थे। मघी थिएटर के बाहर बेंच पर बैठी थी। आहिस्ता-आहिस्ता वक्त बीतता जा रहा था। शाम के चार बज गए लेकिन ऑपरेशन थिएटर से न तो डॉक्टर बाहर आए, न ही वार्ड बॉय या नर्स ने आकर कोई दवा मंगवाई। मघी ने सुबह से कुछ खाना तो दूर की बात चाय-दूध तक नहीं पिया था। उसके हाथों में भगवान झूलेलाल की तस्वीर थी। सुखमणि साहिब का पाठ वह तीन-चार बार कर चुकी थी। दीवार पर टंगी घड़ी से पांच बार टन-टन की आवाज आने के साथ ही मघी के मन में आशंकाएं सीमा तोड़ने लगीं। सुबह लगभग साढ़े दस बजे नरेश को ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया था और अब शाम के पांच बज चुके थे। छह-सात घंटे हो गए, ऑपरेशन अभी तक किया जा रहा है। इतनी देर तक मघी अपने आंसू छिपाए हुए थी लेकिन अब हिम्मत हार कर सुबक उठी। इस समय बेंच पर तो क्या ऑपरेशन थिएटर के बाहर भी कोई नहीं था। झूलेलाल की तस्वीर को देखती मघी की रुलाई फूट गई। वह जार-जार रोने लगी। उसे याद आया कि नरेश को आठ नंबर पलंग पसंद है क्योंकि उसके सिरहाने खिड़की से अस्पताल के पिछवाड़े का बाग दिखाई देता है। बाग में मोर, बंदर और दूसरे पशु पक्षी आजाद हवा में लंबी सांसे भर उछलते कूदते दिखाई देते हैं। आसमान में उड़ते पंछी और एक दूसरे को पकड़ने की होड़ करते बादल दिखाई देते हैं। ऐसे नजारे देख नरेश अपनी बीमारी से जूझने की ताकत पाता है और उसकी जीने की ललक बढ़ जाती है। मघी ने झूलेलाल की तस्वीर के आगे हाथ जोड़े, विनती की - वरुण देव, मेरी सुनोगे या केवल मुस्कुराते रहोगे! मुझे आठ नंबर पलंग वाली खिड़की चाहिए। मुझे चाहिए इसलिए मैं मांग रही हूं। नरेश को तन्दुरुस्त करके जोधपुर भेज वडेरे लाल। मेरे भरतार के लिए मुझे यह पलंग दे दो। पलंग के पास जो खिड़की है वह मेरे नरेश का जीवन और मेरी जीने की लालसा है। लालसांई वह खिड़की मेरी है, मेरी ही है। भगवान झूलेलाल तस्वीर में अब और अधिक मुस्कुरा रहे थे।
साढ़े पांच बजे ऑपरेशन थिएटर का दरवाजा खुला। पहले कौशल्या नर्स बाहर निकली। उसके पीछे डॉक्टर रुघनाथ बाहर आए। दूसरे डॉक्टर, नर्स और वार्ड बॉय भी बाहर आ गए। डॉक्टर रुघनाथ थके हुए और परेशान लगे। मघी के करीब आकर उन्होंने उसके कंधे पर हाथ रखा। मघी सुबक उठी। डॉक्टर रुघनाथ ने कौशल्या को इशारा किया और खुद लंबे डग भरते हुए वहां से चले गए। उनके पीछे अन्य डॉक्टर भी उसी रफ्तार से निकले। कौशल्या ने मघी को गिलास में पानी दिया। कहा - मघी तू अकेली नहीं है। हम सभी तुम्हारे साथ हैं। नरेश का ऑपरेशन कामयाब हुआ है। तुम उससे चार घंटे बाद मिल सकती हो। उसे आज ही रात या कल सुबह तक वार्ड में शिफ्ट कर देंगे। कौशल्या के यह शब्द सुनकर मानो मघी को नई जिन्दगी मिल गई। वह खुशी से और अधिक जोर से रोने लगी। कौशल्या मघी को अपने क्वार्टर में ले गई। अपने हाथ से बनाकर उसे चावल-दाल और दो रोटियां खिलाई।
नरेश का ऑपरेषन हुए आज एक सप्ताह बीत गया है। नरेश को एम वार्ड के आठ नंबर पलंग पर ही लाया गया था और अब दो-तीन दिन में उसे छुट्टी मिल जाएगी। नरेश आज सुबह खुद चलकर बाथरूम तक गया था। हां, मघी ने उसे सहारा जरूर दिया था। कौशल्या और परमेश्वरी नर्स ने नरेश को स्वयं चलकर बाथरूम तक जाते देखा तो डॉक्टर रुघनाथ को सूचना दी। यह खुशखबरी थी। नरेश के ठीक होने का संकेत था। एक बड़ा जोखिमभरा ऑपरेशन कामयाब होने का सूचक था। डॉक्टर रुघनाथ तुरंत ही दो-तीन डॉक्टरों के साथ नरेश के पास पहुंच गए।
पलंग नंबर आठ के चारों ओर इस समय खुशियां थी। डॉक्टर और नर्सों का जमघट था। इतने लोगों की भीड़ के कारण पलंग के सिरहाने की खिड़की छिप गई थी लेकिन आठ नंबर पलंग का कलंक धुल गया था। इस पलंग पर नरेश पहला मरीज था जिसने मौत से लड़कर जीवन पाया था। डॉक्टरों ने नरेश का चैकअप किया। आपस में एक-दूसरे को बधाइयां दी। मघी को कहा कि मिठाई मंगवाओ। भगवान झूलेलाल को भोग लगाकर वार्ड में सभी का मुंह मीठा कराओ।
मघी मिठाई लेने जाने लगी लेकिन स्टूल से उठते ही गश खाकर गिर पड़ी। उसकी आंखें चढ़ गईं। कौशल्या और परमेष्वरी ने मघी को संभाला। तुरत-फुरत नरेश के पलंग पर ही उसे लिटाकर डॉक्टर रुघनाथ ने उसका चैकअप किया। इस दौरान एक अन्य डॉक्टर ने लेडी डॉक्टर रेखा को फोन करके बुलवा लिया। इस बीच कौशल्या ने मघी को पानी पिलाया। डॉक्टर रेखा के आने से पहले मघी होश में आ गई। उसने डॉक्टर रुघनाथ और कौशल्या को बताया कि स्टूल से उठते ही आंखों के आगे अंधेरा छा गया और उसे चक्कर आ गए। वह गिर पड़ी। डॉक्टर रेखा उसका चैकअप कर रही थी और वह झूलेलाल की तस्वीर की ओर देखती मुस्कुरा रही थी। मन ही मन में बोली - वडेरे लाल तुमने मेरी सुन ली। अब नरेश ठीक हो गया है। यह पलंग अब मेरा है। पलंग के सिरहाने खुलने वाली खिड़की की ओर देख वह जोर से बोल उठी - यह खिड़की और इसमें से दिखाई देने वाला आकाश अब मेरा है। डॉक्टर रुघनाथ और वहां खड़े अन्य लोग मघी की बात समझ नहीं सके। नरेश भी भौंचका-सा उसे देख रहा था। मघी ने उन्हें बताया कि उसने झूलेलाल से नरेश के ठीक होने की मन्नत और बदले में अपने लिए एम वार्ड के पलंग नंबर आठ की मांग की थी। नरेश, नर्स, वार्ड बॉय और डॉक्टर मघी की बात सुनकर मन ही मन में रो उठे। तभी वहां डॉक्टर रेखा आ पहुंची। उसने मघी का चैकअप किया। तब तक मघी नरेश के पलंग नंबर आठ पर ही लेटी हुई थी। डॉक्टर रेखा ने उसे पलंग नंबर 11 पर चलकर लेटनेे को कहा।
पलंग के चारों तरफ हरे पर्द लगा दिए गए। थोड़ी देर में ही पर्दों के पीछे से मघी और डॉक्टर रेखा की हंसी गूंजने लगी। उनकी हंसी सुनकर वार्ड में मौजूद हर व्यक्ति को मघी के प्रति आशंकाओं से राहत मिली। आधे घंटे बाद वार्ड में भगवान झूलेलाल का प्रसाद बांटा जा रहा था। डॉक्टर रेखा मघी को कह रही थी - मघी, तुम्हारे जैसी पत्नी हर नरेश को मिले। अब पलंग नंबर आठ के पास वाली इस खिड़की से तुम सारा आकाश निहारो। तुम्हें दो महीने ऊपर हो गए हैं। तुम मां और नरेश पापा बनने वाले हो। झूलेलाल ने तुम्हारी सुन ली। अब आकाश की ओर खुलने वाली खिड़की तुम्हारी है। अब तुम आकाश की मालकिन हो।
मघी भी मुस्कुरा उठी और बोली - हां, झूलेलाल ने मुझे लोरी सुनाने का भाग्य दिया है। सारा आकाश मेरा है। यह खिड़की मेरी है।
( मूल अरबी सिंधी में लिखी कहानी ‘‘दरी मुहिंजी आहे ’’ (खिड़की मेरी है) का प्रकाशन दैनिक हिंदू अजमेर में हुआ जिसका हिंदी रूपांतरण किया है )
- मोहन थानवी, विश्वास वाचनालय, सार्दूल कॉलोनी, बीकानेर