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यत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे

यत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे - 1
- यत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे -
- लेखक श्री सुदर्शन शर्मा "रथांग" मुंबई
 जो ब्रह्माण्ड में है वही पिण्ड अर्थात षरीर में है। सृष्टि रचना के पूर्व, केवल
ब्रह्माण्ड अर्थात गोलाकार ब्रह्म था जिसे आधुनिक वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं
और उन्होंने इसे ‘ब्लैक होल’ कहा है - कृष्ण मंडल।  कल्पान्त में सभी कुछ
इसषून्य में, कृष्ण मंडल में, ब्रह्म में समाहित था। ब्रह्म के मन में विचार
उत्पन्न हुआ, एकोऽहम् बहुस्याम् - एक हूं अनेक हो जाऊं। उस विचार की प्रतिध्वनि
कृष्ण मंडल में गूंजी और वह ब्रह्म के अहम् की ध्वनि अऽउम अर्थात ऊ ंके स्वरूप
में प्रतिष्ठित हुई। यह ध्वनि थी,षब्द रूप थी इसे नाद ब्रह्म की संज्ञा दी गई।
षब्द अथवा ध्वनि की उत्पत्ति किन्हीं दो पदार्थों के स्पर्ष से ही संभव है। अब
जब प्रारंभ में केवल ब्रह्म ही था, प्रकृति पूर्णतःषून्य स्थिति में थी तो फिर
स्पर्ष कैसा! सर्व साधारण मनुष्यों को समझाने हित ब्रह्म की उपका आकाष से की गई
है। आकाष को प्रकृति के पांच तत्वों में से एक और प्रथम तत्व माना गया है। आकाष
अर्थात अवकाष रिक्ता और इसका आकार गोल ही दिखता है। विषाल सागर में जैसे लहरें
उत्पन्न होती हैं वैसे ही कुछ आकष में हुआ होगा। उन आकाषीय तरंगों के एक दूसरे
के साथ स्पर्ष से ही वह ध्वनि निकली होगी जिसे अउम के रूप में सुना गया। ये
आकाषीय तरंगे जिनके द्वारा नादब्रह्म अउम प्रसारित हुआ, उन्हें वायु कहा गया जो
भारतीय संस्कृति और परम्परा में प्रकृति का द्वितीय तत्व है। आगे चलकर आकाष में
स्थित वायु के अति संघर्षण से जो ऊण्णता उत्पन्न्न हुई उसे तेज यानी अग्नि कहा
गया, इसे प्रकृति के तृतीय तत्व के रूप में गिना गया। इस वायु और अग्नि के
मिश्रण से जल की उत्पत्ति हुई, यह प्रकृति का चतुर्थ तत्व हुआ। आधुनिक विज्ञान
ने भी जल को वायु (आक्सीजन) और अग्नि (हाइड्रोजिन) का मिश्रण माना है। इस जल
तत्व से पांचवें तत्व पृथ्वी की उत्पति हुई। इस प्रकार सृष्टि के मूल में ये
पांच तत्व ही हैं जिन्हें पंचमहाभूत कहा गया है।
यत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे - 2
- यत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे - ( लेखक श्री सुदर्शन शर्मा "रथांग" मुंबई )
प्रकृति का जो मूल स्वरूप ब्रह्माण्ड वह महद्ब्रह्म के नाम से भी जाना जाता है।
इसके तीन गुण बताये गए हैं, सत्व, रज और तम। ये तीन गुण प्रकृति के, सृष्टि के
प्रत्येक पदार्थ में कम अधिक मात्रा में रहते ही हैं और उस मात्रा के आधार पर
उस पदार्थ का स्वभाव निर्धारित होता है। मंच महाभूतों में भी ये गुण हैं। ऐसी
मान्यता है कि आकाष तत्व में सत्व गुण ही हैं। अतः वहषान्त, स्थिर, साक्षी
स्वरूप है। वायु में सत्व व रज का मिश्रण है। तेज में रजोगुण की प्रबलता है। जल
रज व तम का मिश्रण है तो पृथ्वी में तमोगुण ही प्रमुख है। भारतीय परंपरा में
पांच तत्वों को मान्यता प्राप्त है जबकि चीन के वास्तुषास्त्र में चार तत्व ही
माने गये हैं, आकाष को नहीं माना गया है। वस्तुतः आकाष ही आधार है, प्रकृति का
पूरा खेल आकाष में ही होता हे, अतः इसे हम भारतीयों ने प्रमुख तत्व, मूल तत्व
माना है।
प्राचीन काल में ऋषि मुनियों ने, जिन्होंने प्रकृति के, सृष्टि के रहस्य का
अनुसंधान किया, उन्होंने सृष्टि की तीन स्थितियां निर्धारित कीं, आदि, मध्य और
अंत, उत्पत्ति, स्थिति व लय, जन्म, जीवन, मृत्यु। वैसे तो विभिन्न पंचमहाभूतों
के विविध प्रकार के मिश्रणों सेस्वयमेव पदार्थ बनते गये परन्तु आगे चलकर ऋषि
मुनियों ने उपरोक्त तीन स्थितियों को तीन विभागों का स्वरूप दे दिया और उस
व्यवस्था के अंतर्गत उन तीन विभागों के व्यस्थापक अथवा विभागाध्यक्ष बनाये गये
- ब्रह्मा, विष्णु, महेष। सृष्टि के उत्पत्तिकर्ता ब्रह्मा, पालनकर्ता अर्थात
जीवनरक्षाकर्ता, पालन पोषण कर्ता विष्णु और संहारक, मृत्युदाता को महेष की
उपाधि से प्रतिष्ठित किया गया। सृष्टि रचना यानी उत्पत्ति, जन्म जिसमें गति
होती है, गति और उसका परिणाम ऊष्णता, ये दोनों रजोगुुुण के परिणाम हैं, इसलिए
ब्रह्मा को रजोगुण काप्रतीक माना गया। जीवन अर्थात स्थिति, स्थापना, अस्तित्व,
इसमें सत्वुण की प्रधानता है, अतः पालन पोषण कर्ता, जीवन के अस्तित्व को
निर्धारित करने वाले विष्णु को सत्वगुण का प्रतीक माना गया। लय, मृत्यु, अंत
अर्थात निष्क्रियता, निष्चेष्टता, यह तमोगुण का परिणाम है, अतः महेष को तमोगुण
का प्रतीक माना गया। इन तीनों विभागध्यक्षों के, उन गुणोंतथा कार्यानुसार उनके
निवासस्थान भी निष्चित किये गये। जल ही जीवन है अतः पालनपोषणकर्ता विष्णु को
सागर-क्षीरसागर में निवासित किया गया। सूर्य की ऊष्णता से सागर का जल वाष्प
बनकर बादलों के रूप में वर्षा द्वारा पृथ्वी पर बरसता है जिससे बनस्पति,
धान्यादि उत्पन्न होते हैं जिनसे प्राणियों केषरीर पुष्ट और नीरोगी बनते हैं।
ब्रह्मा, जन्मदाता जो जलचल, थलचर तथा खेचर तीनों प्रकार के पदार्थों प्राणियों
का सृष्टिकर्ता है उसे विष्णु के नाभिकमल पर बिठाया गया, न जल में न थल में और
न तो नभ में। औरमहेष अर्थात महा ईष्वर उसे सबसे ऊंचेषीतल स्थान कैलाष पर बैठाया
गया।
इस प्रकार प्रकृति द्वारा प्रचालित ब्रह्माण्ड - सृष्टि कीव्यवस्था का साक्षी
परब्रह्म परमात्मा इन सम्पूर्ण कार्यभार से निर्लिप्त साक्षी स्वरूप स्वयं में
लीन हो गया।
यत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे - 3
- यत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे - लेखक श्री सुदर्शन शर्मा "रथांग" मुंबई
उपरोक्त प्रकार से ऋषि-मुनियों ने सर्वसाधारण मनुष्य के सम्मुख प्रकृति के इस
रहस्य को रखा। कई पौराणिक कथाओं में उल्लेखित हुआ है कि भक्तों ने तपस्या के
द्वारा ब्रह्मा, विष्णु तथा महेष के दर्षन किये थे। परन्तु आधुनिक युग में अब
तक कहीं पढ़ने सुनने में नहीं आया कि एवरेस्ट पर गये लोगों में से किसी ने महेष
को वहां देखा अथवा पनडुब्बियों में सवार लोगों की या गोताखोरों की महासागर में
विष्णु से भेंट हुई हो या फिर पृथ्वी के सैलानियों का साक्षात्कार ब्रह्मा से
हुआ हो। आधुनिक युग विज्ञान का है, लोग विषेषतः युवाजन इस रहस्य को तर्क के
आधार पर वैज्ञानिक दृष्टि से देखना व समझना चाहते हैं। वैसे विज्ञान की दृष्टि
प्रकृति के समक्ष बहुत ही सीमित है। प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ कृति मनुष्य को
माना गया है। वस्तुतः मनुष्य ने ही स्वयं को इस उपाधि से विभूषित किया है।
परन्तु यदि सूक्ष्मतः विचार किया जाये तो मनुष्यषरीर ब्रह्माण्ड का ही लघु रूप
भासित होगा।
सृष्टि में सर्वप्रथम है जन्म और जन्मदाता है ब्रह्म जिसका निवास है नाभिकमल -
मनुष्यषरीर में नाभि और उसके नीचे का भाग - प्रजनन तंत्र। गीता में श्रीकृष्ण
कहते हैं ‘मम योनि मद्धब्रह्म तस्मन्गर्भ द्दाम्यहम्’ (14-3)’ ‘तासां ब्रह्म
मध्द्योनिरहं बीजप्रदः पिता (14-4)’।’ ब्रह्मा द्वारा अर्थात प्रजनन प्रणाली
में पुरुष केषुक्राणु (बीज) का स्त्री योनि द्वारा गर्भ में प्रवेष और वहां
जीवांड से मिलन के विस्फोट से नये जीव की रचना होती है। वनस्पतिषास्त्र के
अनुसार भी बीज का पृथ्वी रूपी योनि में प्रवेष से पेड़ पौधों की उत्पत्ति होती
है। यह ही है सृष्टि का आदि जिसका संचालन ब्रह्मा द्वारा नाभि से प्रजनन तंत्र
द्वारा होता है। गर्भस्थषिषु का पोषण भी उसके बाहर आने तक नाभिनाल द्वारा होता
है।
विष्णु का निवास स्थान जल में बताया गया है और मनुष्यषरीर में विष्णु का निवास
हृदय में है। हृदय में जल रक्त के रूप में है। विष्णु का दायित्व है प्राणी के
अस्तित्व को स्थापित करना, जीवन की रक्षा करना, पोषण करना। नाभि के ऊपर से गले
तक का भाग विष्णु का क्षेत्र है। प्राणी जो भी खाद्य वस्तु ग्रहण करता है उसे
पाचन प्रणाली की प्रक्रिया द्वारा सत्व में परिवर्तित किया जाता है। इस प्रणाली
में खाद्य नलिका, जठर, यकृत, आंतें, तथा गुर्दे आते हैं। यह पूरा तंत्र ग्रहण
किये हुए पदार्थाें से सत्व निकालकर उसे रक्त में परिवर्तित करषेष अवांछित
पदार्थों कोषरीर के बाहर निकाल देता है। पाचन तंत्र से रक्त हृदय में पहुंचता
है जहां से फेफड़ों में सेषुद्ध होकर वह पुनः हृदय द्वारा पूरेषरीर में संचारित
होकरषरीर को पुष्ट करता है। ये दोनों प्रणालियां पाचन व रक्त प्रसारण
प्रणालियांषरीर को सत्व प्रदान करती है। जीवन की रक्षा करती हैं और ये
दोनोंषरीर के मध्य भाग में स्थित हैं। अतः इस क्षेत्र को विष्णु के आधिपत्य में
माना जाना चाहिये।
यत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे - 4
- यत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे - ( लेखक श्री सुदर्शन शर्मा "रथांग" मुंबई )
महेश का निवास गगनचुम्बी कैलाष पर अर्थात पृथ्वी के उच्चतम षिखर पर बताया गया
है। मनुष्यषरीर में उच्चतम स्थान है मस्तक का। यहीं मन मस्तिष्क में महेष
बिराजते हैं। महेष, महा ईष्वर के तीन प्रमुख रूप हैं, षिव,षंकर और प्रलयंकर ।
महेष जब समाधिस्थ है,षांत है, स्थिर है तोवह षिव है अर्थात कल्याणकारी है।षरीर
स्वस्थ व नीरोगी रहता है। गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है, ‘ईष्वर सर्वभूतानां
हृद्देरोऽर्जुन तिष्ठति, भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्ररूढानि माद्यया’ (18-61)।
ईष्वरषब्द का प्रयोग अब तो सर्वसाधारणतः भगवान के लिए किया जाता है परन्तु
प्राचीन काल में ईष्वरषब्द महेष, महादेव, षिव के लिए ही प्रयुक्त होता था।
उपरोक्त गीता के ष्लोकानुसार ईष्वर सभी के अन्तस में बैठकर अपनी माया द्वारा
प्राणियों को यन्त्रवत घुमाकर भ्रमित करता है। ईष्वर की यह माया कौन है! मन
मस्तिष्क हृदेष में उपजे काम, लोभ, मद, मोह व अहंकार के भाव। कहते हैं कंकर
कंकर मेंषंकर है। यह महेष काषंकर रूप मनुष्य के मन में काम, लोभ, मोहादि के
कंकर मारता रहता है।षांत सरोवर में कंकर फेंकने से लहरें उत्पन्न होती हैं, जल
में उद्विग्नता आती है। कंकर की तीव्रता पर उद्विग्नता निर्भर करती है। अर्जुन
के मन पर मोह रूपी पाषाण ने ऐसा प्रहार किया कि उसके मुंह से स्वीकारोक्ति
निकली, ‘न च षक्नोम्यवस्थातंु भ्रमतीव च मे मनः’ (1-30) मेरा मन भ्रमित हो रहा
है और मैं खड़े रहने में भी असमर्थ हूं। ईष्वर की इस माया से उत्पन्न
उद्विग्नता, तनाव का प्रभावषरीर की अन्य प्रणालियों पर भी पड़ता है। उनमें दोष
उत्पन्न होते हैं जो विभिन्न रोगों के रूप में प्रकट होते हैं औरषरीर मृत्यु की
ओर अग्रसर होने लगता है। महेष का महाभयंकरषस्त्र है त्रिषूल - क्रोध जिसकी
तुलना अग्नि से की गयी है। जब यह क्रोध का त्रिषूल चलता है तो जैसेषरीर में
प्रलयंकारी अग्नि प्रज्वलित हो उठती है। मस्तक में स्थापित सारे अवयव मानो आग
उगलने लगते हैं। आंखें लाल, नथुने फूली हुई, उनसे गर्म सांसें निकलती रहती हैं,
कानों सेजैसे धुआं निकल रहा हो, मंुह से लार टपकने लगती है। यह महेष का
प्रलयंकर स्वरूप है जिसका परिणाम नाष है, संहार है। इस अवस्था में मनुष्य या तो
दूसरों पर आधात करता है या स्वयं पर। दोनों स्थितियों में मृत्यु की संभावना
प्रबल होती है।
मनुष्य अधिकतर महेष के इस प्रलयंकारी स्वरूप से डरकर उसका पूजन करता है। मृत्यु
जीवन का सत्य है परन्तु लोग जितना हो सके उसे टालने का प्रयास करते हैं। उसके
लिए महामृत्युञ््य जपादि भी करते हैं।इसके दो कारण हैं, मोह और भय। जीवन में जो
कुछ कमाया, रिष्ते नाते, धनादि, उन्हें मोह के कारण छोड़ने को मन नहीं करता।
मृत्यु के बाद क्या! दुर्गति का भय भी रहता है। एक विद्वान मनीषी ने मृत्युपर
पुस्तक लिखी है जिसमें मृत्यु की बड़ी प्रषंसा की गयी है। मृत्यु के साथ
विस्मृति जुड़ी रहती है। भारतीय समाज, विषेषतः हिन्दू समाज पुनर्जन्म में
विष्वास करता है। इस पुनर्जन्म की कितनी कथाएं पौराणिकषास्त्रों में देखी जा
सकती हैं। स्वयं श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि उनके तथा अर्जुन के बहुत से
जन्म हो गये हैं, श्रीकृष्ण को तो उनके गत जन्मों की जानकारी है परन्तु अर्जुन
को उसके जन्मों की नहीं। बहूनि में व्यतीतानि जन्मानि तव यार्जुन। तान्यहं वेद
सर्वाणि न त्वं वेत्ध परन्तप (4-5)। मनुष्य केे एक जन्म में ही इतने दुख सुखादि
होते हैं और यदि मृत्यु के साथ पूर्वजन्म की स्मृति बनी रहती है तो कैसी
विचित्र स्थिति पैदा होती। पूर्वजन्मों के दुखों की पीड़ा से इस जन्म में मन
व्याकुल रहता। पूर्वजन्मों के सभीषत्रु मनुष्य, पषु पक्षी आदि एक साथ इस जन्म
में सामने आकर खड़े हो जाते तो बचना कठिन हो जाता। इन सभी दुखों से छुटकारे का
प्रकृति ने एकही रामबाण औषधि प्रदान कर दी - विस्मृति। मृत्यु हुई कि अगले जन्म
में पुनष्च हरिओम्।
ये तो हुई प्रकृति की बातें। पुरुष का, परब्रह्म का सरनामा! प्रारंभ में कहा
गया कि परमात्मा को समझने के लिए उनकी उपमा आकाष से की गयी है, निरभ्र स्वच्छ
आकाष। पंचमहाभूतों में मूल तत्व आकाष से मनुष्य का अन्तःकरण बना है। इस
अन्तःकरण का एक भाग है चित्त। इसे चिदाकाष भी कहा गया है। जब तक बाह्य
प्राकृतिक आकाष में बादल छाये रहते हैं, हमें आकाष दिखाई नहीं देता। उसी प्रकार
यह चिदाकाष जब तक स्मृतियों से अर्थात भौतिक प्रतिबिंबों से मुक्त नहीं होता
उसमें परमात्मा के दर्षन नहीं होते। मनुष्य कोे अभ्यास द्वारा धीरे धीरे चित्त
से इन बाह्य पदार्थों के बिंबों तथा मानसिक भावों को निकाल इसे रिक्त करना
होगा। यह रिक्तषांत चित्त ही पुरुष है। परमात्मा है जिसे ही सत् चित् आनंद कहा
गया है। ऐसे कहा गया है कि सर्वप्रथम नाद ब्रह्म की अउम के स्वरूप में उत्पत्ति
हुई।इसमें से अ से ब्रह्मा, ऊं से विष्णु तथा म से महेष षिव की उत्पत्ति मानी
गयी। अउम का जप करते समय अ के उच्चारण से नाभिकमल जो ब्रह्मा का स्थान है वह
प्रभावित होता है। यहां से ही कुण्डलिनिषक्ति का उद्गम बताया गया है। ऊ ंके
उच्चारण से हृदय चक्र जो विष्णु का स्थान है, वह प्रभावित होता है।
कुण्डलिनिषक्ति यहां से होती हुई ऊर्ध्वगामी होती है। म -षब्द से मस्तिष्क
झंकृत होता है, यह षिव का स्थान है। यहांषक्ति का षिव से समागम होता है। अउम
द्वारा ब्रह्मा, विष्णु और महेष तीनों का संगम एक रूप प्रकृति की पुरुष में
विलीनता,षक्ति षिव में समा गयी। द्वैत समाप्त, अद्वैतषांति। इस स्थिति में आकर
आदिषंकराचार्य के मुख से निकला ‘चिदानन्द रूप षिवोऽहम् षिवोऽहम्’।
इस प्रकार ऋषियों की उक्ति सिद्ध हुई, यत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे।
writer - सुदर्शन शर्मा ‘रथांग’ मुंबई
prastuti --- Mohan Thanvi  - विश्वास वाचनालय बीकानेर

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