Wednesday, February 26, 2014

शिव पर वैज्ञानिक-शोध ! शिव ही सत्य है... !

शिव पर वैज्ञानिक-शोध !
शिव ही सत्य है... !
शिवजी का डमरू और त्रिशूल। शिवजी की जटाओं से निकलती गंगा। शिवजी का तीसरा नेत्र। नटराज रूप। शिवजी का तांडव नृत्य। और... और... और... अनेकानेक प्रसंग। जिन पौराणिक कथाओं को कुछ लोग कपोलकल्पित करार देने में पल भर भी नहीं लगाते, उन्हीं कथाओं के लघु से लघु प्रसंगों पर कतिपय वैज्ञानिक गहन शोध कार्य भी कर रहे हैं। सभी शोध-परिणाम सार्वजनिक भी नहीं किए जा रहे। क्यों? खासतौर से सिंधु सभ्यता, सिंधु संस्कृति, धार्मिक मान्यताओं पर किए जाने वाले शोधों की जानकारी, उनके परिणाम के बारे में हिंदी भाषी क्षेत्र के लोग तो लगभग अनजान ही रह जाते हैं। क्यों ? शिवजी संबंधी ही नहीं बल्कि सभी देवी-देवताओं और संसार भर में देवतुल्य अथवा मानव जीवन से श्रेष्ठ माने जाने वाले चरित्रों और उनसे जुड़ी वस्तुओं पर ऐसे शोध आज से नहीं बल्कि बीती सदियों से जारी हैं। यह अलग बाल है है कि कतिपय वैज्ञानिकों ने ऐसी रोमांचक, अद्भुत और अचंभित कर देने वाली बातों, चीजों, जीवों को एलियन से भी जोड़ा है, जो कि इस तरह के वैज्ञानिक शोधों के कोटि कोटि पहलुओं में से एक है। ऐसे शोधों में इस तरह के पहलू होना अनिवार्य भी है। वैज्ञानिक नहीं रहते लेकिन उनके शोध कार्य को जारी रखा जाता है। ऐसी शोध-यात्रा अनवरत जारी है। इसमें भूगर्भ से खोजे गए हजारों साल पुराने जीवन के अवशेष और शिलाओं पर उकेरे गए ज्ञात अज्ञात लिपियों तथा अनजान संकेत भी शामिल हैं। यात्रा - यात्रा जारी है। श्वांस आने-जाने तक। हां... ? अनुभूति भी यात्रा है..? हां ! जीवन ... अनुभूति की यात्रा ही तो है । अनुभूति और जीवन क्या एक दूसरे के पर्याय नहीं ? मृतक को किसी प्रकार की कोई अनुभूति होती हो, ऐसा संभव नहीं। किसी से सुना भी नहीं, कहीं पढ़ा भी नहीं। जीवितावस्था ही अनुभूति कराती है। चराचर जगत में पेड़-पहाड़ भी प्राणवान है और यह तो सभी ने सुना ही है... गीत गाया पत्थरों ने...!!! शिवलिंग को आप क्या कहेंगे ! शिवलिंग ही तो कहेंगे। किंतु शिवलिंग के रूप में देखने से पूर्व उसे कीमती शिलाखंड भी माना जा सकता है। शिवलिंग भी कितने ही प्रकार के हैं। संसारभर के वैज्ञानिकों को शिवजी के त्रिशूल पर एक वैपन, यानी हथियार के नजरिये से देखने के लिए किसने प्रेरित किया! संभवतः शोध कार्य को हर पहलू से करने के नजरिये ने ही त्रिशूल और ऐसे अन्य चिन्हों को हथियार अथवा किसी विशेष प्रयोजन से जांचने परखने की आवश्यकता उत्पन्न की। बहरहाल, भारतीय संस्कृति में, सिंधु संस्कृति में शिव को ही सत्य कहा गया है। शिव में ही इस दुनिया, चराचर जगत के रहस्य छिपे हैं। हमें उन्हें जानना होगा। शिव को जानने का अर्थ सत्य को जानना है। शिव ही सत्य है।