Friday, January 4, 2013

किस्सा-ए-प्रस्तर उद्धारक

किस्सा-ए-प्रस्तर उद्धारक

‘लंबी कविता’
अक्सर तुम्हारा चेहरा आईने में देखता हूं
मक्कारी से भरा कुटिल मुस्कान वाला शख्स मैं तो नहीं
आईना झूठ नहीं बोलता किसी भी घर में लगा हो
तुम्हारे घर शायद कोई आईना नहीं वरना मेरी शक्ल देख लेते
अब भूल जाओ अपने पापों को प्रस्तर बनने के शापित हो तुम
प्रस्तर उद्धारकों को तो पूजा जाता है, हे पापी इसे भूलना नहीं
द्रोणाचार्य मांगते हैं आज भी मगर एकलव्य देते नहीं दिखाते हैं अंगूठा
दधिचि अब ढूंढे़ नहीं मिलते मगर बस्तियों में लगे हैं हड््िडयों के ढेर
अक्सर ऐसे ढेर पर बिखरा-बिखरा तुम्हारा चेहरा देखता हूं
खाल विहीन रक्त-पिपासु इस दुनिया में कोई दूसरा तो है नहीं    
याद रखो भूलो मत हरिष्चद्र की संतान कोई जीवित नहीं
आघात बड़ा है कफन न होने का, वक्त जाता है ठाठ-वैभव को चाट
संवाद तंत्र पंचतंत्र से सीख और साध हित हितोपदेष से
अतीत के अंधे-सागर में लगा डुबकी पुराण सुना और बटोर दक्षिणा
प्रस्तर उद्धारकों के ही प्रस्तर पूज और पापियों को बदल डाल प्रस्तरों में
खड़ा कर दो चौराहों पर नगर-रखवालों को, खाली करवा दो नगर
अक्सर तुम्हारे जैसे चेहरे वालों को नगर में घूमते देखता हूं
बाणभट्ट तो एक हुआ मगर किस्से आज भी अधूरे हैं बेषुमार
दिन व्यतीत करते हो रात के इंतजार में फिर डूब जाना अंधेरे में
सड़कों के बीच और किनारे चमकते प्रस्तरों से ज्ञात करना राह
यूं ही गुजार देना युग मगर चेहरा न बदलना मुखौटा लगाकर
चेहरा तुम्हारा है इतना लावा उगलता कि मुखौटा पिघल जाएगा
छिप न सकेगा रावण अगर छिपकर राम बनना चाहेगा
षहरभर में तुम्हारा चेहरा घर-घर से निकलता देखता हूं रोज
पसीने से लथपथ कंधे पर थैला दायित्वों के बोझ से होता है भरा
एक चरित्र हो तो नायक बन खलनायक को दे हर रात षिकस्त
कितने ही चरित्र समाज में पापों के हर सुबह उनींदे और दिखते हैं पस्त
अक्सर ऐसे में दिख जाता है फिर तुम्हारा चेहरा बंसरी बजाता
अधरों से प्रस्फुटित होते हैं षब्द ‘आर्तनाद’ गूंजता है दबा-दबा
फिर दिन बीता उमस भरा
कहानी रचते रहे लोग
रात यूं ही गुजर जाएगी 
सुबह होते ही नये पात्र करेंगे
सूरज का स्वागत ऐसे ही
कथा-नायक पूज-पूज कर
उमसभरे दिन छोटे करने के लिए
प्रस्तरों में बदल-बदलकर प्रस्तर-उद्धारकों को
किस्सा-ए-प्रस्तर उद्धारक का अंत कभी होगा नहीं
हर बार सामने आएगा तुम्हारा चेहरा आईने में
जब भी जी चाहे देखेंगे लोग अपने गिरहबान में झांककर
कुछ तारीखें प्रस्तर बन जाएंगी कुछ बह जाएंगी समय-धार में
आतंक के साये गहरायेंगे प्रतोद1 हो न सकेगा निरंकुष पर
प्रतिहंता2 खुद घोटेगा ग्रीवा प्रजा की बैठ खूनी तख्त पर
कहलाएगा फिर भी उद्धारक वह जो प्रस्तरों को तैरायेगा
तरा दे तू, उठ चल साथ मेरे धुआं उगलते मरघट पर
सुन किस्सा उस तपस्वी3 का ए जमाने रो न देना जार-जार
जिसका उद्धार उसकी मां ने किया गुरु से बढ़कर है मां कहकर
चित्र-लिखित हो संसार से भागे फिरते, गुरु क्या भगवान से मिलाएगा
अपनी सहधर्मिणी को भी स्वर्ग की चाह में तजने वाले
अक्सर तुम्हारा चेहरा अपने चेहरे पर महसूस करता हूं
तुम भले हो दस्यु मगर मैं नहीं तुम्हारे दस्युदल में षामिल  
मारकाट से तुम्हें मिलता होगा जीवन, रक्त-पिपासु हो तुम मैं नहीं
प्रभावती4 को भूलने वाले, मां को गुरु से बढ़कर मान, थाम हाथ संगिनी का
सूर्यपत्नी है प्रभावती तो षिव के एक गण की वीणा-सी झंकार भी है
मत भूल संसार में अंग-देष5 भी है एक और राजा-चित्ररथ6 की रानी है प्रभावती
प्रस्तर-चित्र बनना है अगर तो सूर्य-चित्र का प्रत्यंकन7 कर जीवन में
चित्र-मंडित हो मूक रहे जो वह मेरा जीवन नहीं, जीने की कला का प्रत्यंकन होता नही
बंदूकों के साये और बमों के धमाके में खुलते नहीं फाटक सुख-महल8 के
बंद फाटकों में तो रंभाते हैं गोवंष भी, पीड़ा व्यक्त कर पाते नहीं
अजगर लिपटा रहता है चंदन से जो महकता है
फूत्कार जहरीली फिर भी अजगर की, उसकी वृत्ति बनी रहेगी
हंतक खुषियों के तुमसे और क्या आषाएं रख सकता है जमाना
अजगर के फूत्कार से भी तप्त वायु और क्या होगा तेरी सांसों के सिवाय
प्रस्तर फिर भी पिघल सकता नहीं, ज्वालामुखी का लावा चाहिये
उद्धारक आयेगा जरूर बदलकर चेहरा तुम्हारा या कि मेरा
अक्सर प्रस्तर-उद्धारक का किस्सा याद दिला देता है चेहरा तुम्हारा
अधरों की प्रत्यंचा पर स्मित जीवन-स्वर प्रस्फुटित होता है
सच, ‘सारसों की क्रेंकार’9 घुंघरुओं की मधुर ध्वनि तो नहीं
हां, नीरव वनांचल में जल और जीवन होने का विष्वास तो है
अतिथि बन पहुंचा हूं इस ‘बन’ में पसरा है जहां तुम्हारा चेहरा
‘चार भांज का पत्र’1॰ है मालिक का लिखा तुम्हारे नाम
जानते ही हो ऐसा पत्र अधीनस्थों को संबोधित होता है
ताम्बूल वीटक11 की आस नहीं तुमसे स्वागत में मुस्कान चाहिये
अक्सर मुस्कराहट गमगमा देती है निस्तेज तुम्हारा चेहरा
जीवन की अतिथिषाला का फाटक है मुस्कान उसी की दरकार है
पंचभंजी पत्रिका12 लिख दो अपने पापों के प्रायष्चित में
प्रस्तर उद्धारक से मित्रता स्थापित करने का साधन मुस्कान है
अरे हर्ष-भंजक नहीं जानते तुम अपने कर्मों से जीवन-खंडित करने पर तुले हो
यह कोई समाज-सुधार या मातृभूमि की स्वतंत्रता संग्राम की बेला नहीं
जन्म-जन्मान्तर के बंधन से मोक्ष का काल उपस्थित है हर्षो जरा
किंकर्तव्यमूढ़ से निहारते रहोगे तो विकृत ही होता जायेगा तुम्हारा चेहरा
कंकण-वलय13 तुम्हारे कर-कमलों में षोभित नहीं, ये तो नारी का शृंगार है
उठो और परषुराम-प्रतिरूप उपस्थित हो रणभूमि की पुकार है
अरे सिंह-नादी बड़ा कायर है रे तेरा मन, भीड़ में अकेला बेचारा
आतंकी तू अपने स्वार्थ की खातिर नरसंहार को आतुर
नीरवता में ही नहीं भरी बस्ती में भी नितांत अकेला चेहरा तुम्हारा
आततायी के हिमायती दुंदुभियों का वादक बन डराता है
कायर इतना कि गली में कुत्तों को रोते सुन तेरा कलेजा कांप जाता है
जिसके अंक में पला-बढ़ा उसी मातृभूमि पर दानव तू रक्त बहाता है
अक्सर ऐसा एक तुम्हारा चेहरा प्रस्तर उद्धारक के आगे झुक जाता है
आं... वह चेहरा आईने में आंसुओं से भीगा भी देखता हूं
तुम्हारे घर कोई आईना नहीं वरना मुझे रोता हुआ देख लेते
मानवता को दानवता के षिकंजे से छुड़ाने का संकल्प कर लेते
आंक14 ले जीवन में मृत्यु के षाष्वत सत्य को प्रस्तर मत बना
आंसुओं को व्यर्थ मत बहा, मन की कालिख घोल और इंक बना ले
रच ले एक इंग-इतिहास15 और प्रस्तरों में अहिल्या के प्राण फूंक
प्रस्तर उद्धारकों का ऐसा ही कृत्य रावण के अट्टहास को दबायेगा
अहिल्या बनी प्रजा में आत्म-ज्योति प्रज्वलित कर फिर तू इतरायेगा
ईंखन16 करना सावन के झूलों पर, उंकुण17 की भांति खून चूसने को भूल जा
ऊंघता है मानव सिर्फ जड़ वृक्ष हमेषा जागता अक्सर देखता हूं
घिरी है हमारी ईद-होली-दिवाली आतंकी ऋंजनान18 एक से
क्रिसमस पर समृद्धि की ऐषणाएं19 भी हमारी कम नहीं जानते हो
प्रस्तरों के ओझर2॰ नहीं होता और उद्धारकों का ओझर-ओसार21 समान
औदार्यता22 बढ़ती गई पेड़ों की औझड़23 उद्धारक बढ़े और प्रस्तर बुतों में बदले
भीग रहे हैं चौराहों पर पावस में और झुलसते मई-जून में बिता रहे जून
ऐसे उद्धारकों के मानव-हित के किस्से अब यूं ही बस सुनाये जाते रहेंगे
आतंक के साये में इनके हाथ-पांव टोपी चष्मा खंडित करने को उठेंगे हाथ
अक्सर ऐसे वाकिओं पर हंसता दिख जाता है भीड़ में चेहरा तुम्हारा
संषय यह कि कहीं तुम्हारा चेहरा मेरा तो नहीं आईने में दिखता
तुममें और मुझमें यही तो सेतु है, जैसा तुम्हारा वैसा ही है मेरा चेहरा
दोनों प्रस्तर उद्धारकों के पुजारी और प्राणवानों के षत्रु तो कदापि नहीं
दिषा-वास्तु, नक्षत्र-मुहूर्त और मंत्र-ऋचाओं से प्रतिष्ठित देव हैं
सुर-असुर हमारी पुराण कथाओं-से हम नायक-खलनायक मरे नहीं
सेतु-दर-सेतु पार करने को समन्दर अपने-अपने गढ़ते हैं प्रस्तर
जीवन नैया पार लगाने को रहते आतुर नहीं जानते मंझधार अपार है
मुखौटों मंे छिपाये स्वयं को कंस और रावण देखो जिधर उस ओर है
कसमसा कर रह जाते ऐसे व्यक्तित्व भी कदम-कदम पर दिख जाते
प्रस्तर उद्धारक बनने को लालायित उनमें एक षामिल है तुम्हारा चेहरा
मंदिर-मस्जिद-चर्च-गुरुद्वारों से अक्सर दूर नहीं दिखता देव-रूप
प्रस्तरों की आत्मा को भी सिहराता मगर विभत्स-आतंकी तुम्हारा चेहरा
जीवन को जीना नहीं सीखा रे तुमने मिटाना ही जानते हो
इतराओ मत मानवता के दुष्मन नीरव नहीं षूरवीरों से मेरा षहर
यहां दधिचि भी मौन उत्सर्ग को तत्पर सुन आतंकी है तू बेसहारा
ईद-दिवाली साथ मनायेंगे, है यह इस भारत-भूमि की परम्परा
डरा नहीं सकता तू मानवता को क्रूर, उत्तेजित है मेरा चेहरा
मानुष है इस कारण भ्रमित रहा लेकिन मेरे जैसा नहीं तुम्हारा चेहरा
सप्त-द्वीपों पर मुस्करा रहा देख मेरा चेहरा प्रस्तरों को तराष कर
पाप और पुण्य में जो अंतर वही तुझ और मुझमें है
मैं मानव मानवता का पुजारी, तू विधर्मी प्रस्तरांे में कैद है
भ्रम में थे जो अब तक तू ब्रह्मा की रचना मानवों को डराता रहा
जान गया है अब हर मानव तेरी करतूतें, हममें अब छिप न सकेगा तू
अक्सर तुम्हारा चेहरा आईने में देखता हूं
मक्कारी से भरा कुटिल मुस्कान वाला शख्स मैं तो नहीं
*****-अंकुष, 2-रोकने वाला, 3- डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के उपन्यास बाणभट्ट का एक पात्र, जो अपनी मां और पत्नी को छोड़कर संन्यासी बनने चला गया और अंतराल के बाद संयोगवष मिलन होने पर मां को पहचानने के बाद भी मां कहने से कतराने लगा, परिस्थितिवष मरणासन्न मां की इच्छा पूरी करने तथा आज्ञा मानने के लिए भी गुरु की आज्ञा ले आने को उद्यत हुआ तब मां ने उसे गुरु और मां की महत्ता बताई, 4-प्रभावषाली/मां, 5-काया, 6-वाणी/जीवन/मन, 7-प्रतिलिपि/नकल, 8-वर्ल्ड ट्रेड सेंटर, 9-सफेदपोष लोगों की भ्रमित करने वाली बातें, 10-अधीनस्थों को लिखा जाने वाला पत्र, संदर्भ डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी-बाणभट्ट की आत्मकथा, 11-पान, 12-मित्रता स्थापित करने के लिए लिखा जाने वाला पत्र, 13-चूड़ियां, 14-निष्चय, 15-आष्चर्यजनक, 16- झूलना, 17-खटमल, 18-बादल, 19-इच्छाएं/चाहनाएं, 20-पेट, 21-बारामदे-सा पेट, 22-उदारता, 23-निरंतर
- मोहन थानवी