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कहाँ खो गया लोकतंत्र के महापर्व का उल्लास
ना वैसा प्रचार रहा ना वैसी राजनीति
अब सिर्फ छीछालेदर
- मोहन थानवी
आज राजनीतिक चौसर पर पासे चलने के लिए कुछ विपक्षी दलों के नेता अपने आपको एकजुट बताते हुए एक तरफ जा बैठे हैं। जिसे वह गठबंधन कहते हैं। दूसरी ओर सत्ताधारी दल के साथ भी कुछ दलों ने गलबहियाँ जारी रखते हुए अपने डंके की चोट को गुंजायमान कर रहे हैं। जनता तो अपने कीमती वोट के दम के तहत होती कार्यवाही ही देख रही है।
दूसरी ओर, हाईटेक प्रचार को भी वही जनता देख रही है जिसने कुछ बरस पहले तक दीवारें रंगी जाती और तांगों-ऊंटगाड़ों में लगे लाउडस्पीकरों के द्वारा जीतेगा भाई जीतेगा... के नारेबाजी होती देखी है।
यह वही जमाना था जब मजबूत विपक्ष अपने धुआंधार प्रचार से आरोप पर आरोप लगाकर सत्तासीन दल को प्रायः बैकफुट पर ले जाने में कामयाब हो जाता था। कभी सत्ता पक्ष अपनी दलीलों से. वापस फ्रंट फुट पर भी ले आता था।...
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युगपक्ष और कंचन केसरी का आभार
युगपक्ष और कंचन केसरी का आभारयुगपक्ष और कंचन केसरी का आभार
राजनीति की चौसर पर खींचतान...। हाईटेक प्रचार। दोनों स्थितियां एक साथ। और वो भी लोकतंत्र की जननी हमारे भारत में। जी हां। हम आज की राजनीति और यहां प्रचार के नवीनीकरण की ही बात कर रहे हैं। जो हो रहा है वह सब जनता के सामने है। जो बीते समय में हुआ, वह अधिकतर जन के स्मरण में होते हुए भी भूली-बिसरी यादें हैं।
सौ बात की एक बात यह कि आज की युवा पीढ़ी ने ना तो टोलियों को घर घर जाकर लोगों को वोट देने की अपील करते और ना ही शिद्दत से चुनाव चिन्ह वाले बिल्ले बांटते देखा है। टैक्सी या तांगे में प्रचार करते नेताओं को भी देखने से युवा मतदाता वंचित रह गया है। ठीक इसी तर्ज पर कई मर्तबा वोट देकर उंगली पर निशान लगवाने वाले अनुभवी मतदाताओं ने भी आज जैसी राजनीतिक गतिविधियों को इससे पहले कभी नहीं देखा है।
बीते समय में चुनावों में साइकिल और बैलगाड़ी को प्रचार में जुटे कार्यकर्ता इस्तेमाल किया करते थे। प्रत्याशी भी अपने समर्थकों के साथ बैलगाड़ियों या ऊंट गाड़े पर ही गांवों, मोहल्लों में जाते थे। सीधी सी बात है कि बीते जमाने में आधुनिक सुविधाओं का अभाव था।
गांवों के ही नहीं वरन शहरी क्षेत्र के भी बहुत से रास्ते कच्चे होते थे। वहां आज जीप कारें सरपट दौड़ती है और रास्ते पक्के हैं। कुछ प्रत्याशियों को तो हेलीकॉप्टर के माध्यम से भी एक जगह से दूसरी जगह प्रचार करने जाते हुए देखा और सुना है। वह जमाना भी था जब प्रत्याशी पैदल चलकर जनसम्पर्क करते थे।
गांवों और मोहल्लों में लाउडस्पीकर के साथ तांगा या बैलगाड़ी अथवा ऊंट गाड़े पहुंचने पर उनके पीछे बच्चों व किशोरों की टोलियां दौड़ती थी ताकि उनके द्वारा प्रचार के लिए बांटे जाने वाले चुनाव चिन्ह अंकित प्लास्टिक के बिल्ले लें सके। और मजे की बात यह की प्रचार में काम आने वाले ऐसे बिल्ले बच्चे घरों में ले जाते जहां उनमें लगे हुए सेफ्टी पिन निकाल कर काम में ली जाती थी। कांग्रेस का चुनाव चिन्ह गाय का बछड़ा और जनता पार्टी का चुनाव चिन्ह हलधर यानि किसान का हल अंकित ऐसे बिल्ले लेने के लिए बच्चों व किशोरों में मानों होड़ लग जाती थी।
आज चुनाव संबंधित खबरों को सोशल मीडिया और टीवी चैनलों के माध्यम से लाइव देखा सुना व पढ़ा जाने लगा है। जबकि बीते समय में चुनाव संबंधी खबरें जानने के लिए एकमात्र साधन रेडियो ही था। और रेडियो भी पूरे गांव में एक या दो ही हुआ करते थे। शहरी क्षेत्र में मोहल्लों में एक दो घरों में रेडियो होने के कारण समाचार प्रसारित होने के समय वहां आसपास के लोगों का जमावड़ा हो जाता था। जमाना तरक्की करने लगा तो सर्वप्रथम ब्लैक एंड व्हाइट टीवी कुछ जगहों तक पहुंचा जिसके माध्यम से चुनावों से जुड़े कार्यक्रमों को लोग बड़े चाव से देखते थे।
इसी प्रकार दशकों पहले चुनावों में पार्टियों और प्रत्याशियो को प्रचार-प्रसार पर आज की तुलना में खर्च भी न के बराबर करना पड़ता था। आज चुनाव में जनप्रतिनिधियों को लाखों में खर्च करना लगभग अनिवार्य दिखाई देने लगा है। हम यह कह सकते हैं कि उसे बीते समय में सोशल मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आदि का वजूद तक कल्पना मे नहीं था।
आज राजनीतिक चौसर पर पासे चलने के लिए कुछ विपक्षी दलों के नेता अपने आपको एकजुट बताते हुए एक तरफ जा बैठे हैं। जिसे वह गठबंधन कहते हैं। दूसरी ओर सत्ताधारी दल के साथ भी कुछ दलों ने गलबहियाँ जारी रखते हुए अपने डंके की चोट को गुंजायमान कर रहे हैं। जनता तो अपने कीमती वोट के दम के तहत होती कार्यवाही ही देख रही है।
दूसरी ओर, हाईटेक प्रचार को भी वही जनता देख रही है जिसने कुछ बरस पहले तक दीवारें रंगी जाती और तांगों-ऊंटगाड़ों में लगे लाउडस्पीकरों के द्वारा जीतेगा भाई जीतेगा... के नारेबाजी होती देखी है।
यह वही जमाना था जब मजबूत विपक्ष अपने धुआंधार प्रचार से आरोप पर आरोप लगाकर सत्तासीन दल को प्रायः बैकफुट पर ले जाने में कामयाब हो जाता था। कभी सत्ता पक्ष अपनी दलीलों से वापस फ्रंट फुट पर भी ले आता था। आज चुनावी संदेशों से कहीं दीवारें रंगी हुई नहीं दिखाई देती। अपितु राजस्थान की लोक कला रंगोली के माध्यम से मतदान के संदेश अवश्य दिखाई देते हैं। दीवारों पर प्रत्याशियों को अपना कीमती वोट देने के संदेश की बजाय हाथ में थामें मोबाइल की सिल्वर स्क्रीन पर लोग चुनावी चटकारो के साथ-साथ जानकारी परक संदेश पढ़ते भी हैं और फारवर्ड भी करते जाते हैं।








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