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21वीं सदी के साहित्यकार मंच पर हुआ अनूठा प्रयोग
तूलिका और शब्दों की सजीव जुगलबंदी से सजी संगोष्ठी
दिल्ली/जयपुर . देश के लब्ध प्रतिष्ठ चित्रकार आदित्य देव शर्मा और विभिन्न शहरों से वर्चुअल जुड़े साहित्यकारों,कवियों के बीच रविवार की देर शाम सजीव चित्रांकन और आशु कविता की जुगलबंदी हुई. 21वीं सदी के साहित्यकार समूह के तत्त्वावधान में इंडिया नेटबुक्स, नोएडा के सहयोग से आयोजित संगोष्ठी को यादगार बना दिया .
ज़ूम के माध्यम से चित्रकार आदित्य देव शर्मा ने केनवास पर पहले अपने मन से और फिर साहित्यकारों के भावों पर सजीव चित्र उकेरे . इसके बाद कवियों ने इन चित्रों पर मौके पर ही कविताएँ रचकर सुनाई . पहलीबार इस मंच पर तूलिका और शब्दों की इस जुगलबंदी ने आयोजन को नए आयाम दिए . कार्यक्रम का सफल सञ्चालन लखनऊ के व्यंग्यकार परवेश जैन ने किया . उन्होंने चित्रकार से साक्षात्कार करते हुए उनके व्यक्त्तित्व और कृत्तित्व पर चर्चा भी की .
इस अवसर पर सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार,कवि डॉ लालित्य ललित ने कहा कि चित्रकार कलात्मक शक्ति को चित्रों के माध्यम से अभिव्यक्त करते हैं . वह विषय के सूत्र पकड़कर केनवास पर कुछ ऐसा रच देते हैं जो चित्ताकर्षक होता है . उन्होंने आदित्य देव के साथ अपने संबंधों का ज़िक्र करते हुए चित्रकार की खूबियों को रेखांकित किया .
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए सुपरिचित व्यंग्यकार ,भाषाविद डॉ राजेश कुमार ने कहा कि चित्रकार के चित्रों को देखकर मन और शरीर जब एकाकार हो जाते हैं तब सारी बेचैनी दूर हो जाती है. ऐसे में देखने वाले आनंद की अनुभूति से सराबोर हो जाते हैं. उन्होंने कहा कि आज के कार्यक्रम में चित्रों को देखकर उपस्थित कवियों ने चित्रकार के भावों को कविता में पिरोते हुए आयोजन को गरिमा प्रदान की .
इस अवसर पर चित्रकार आदित्य देव ने पहले प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ स्त्री के मनोभावों को तूलिका से उकेरा . उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए समकालीन चित्रकारी की विभिन्न धाराओं की जानकारी देते हुए बताया कि चित्रकला आज की आपाधापी के दौर में मन की बेचैनी से अलग हटकर मन और शरीर को एक जगह एकाकार करती है. उन्होंने कोरोना से उपजे हालातों व अन्य कारणों से बदलते परिदृश्य पर विचार प्रकट करते हुए कहा कि आज सामाजिक और वैश्विक स्तर पर दिखाई देती बेचैनी ने मनुष्य को प्रकृति से दूर किया है . चित्रकारी उसी मन को एक जगह ले आती है. उन्होंने कहा कि जीवन और चित्रकला की यात्रा एक सी है जहाँ प्रारम्भ भी है और अंत भी होता है . चित्रकला अपने आप को जानने की कला है .
इस अवसर पर उज्जैन के वरिष्ठ पत्रकार व कवि डॉ देवेन्द्र जोशी,दिल्ली से कवयित्री सुनीता शानू, बनारस के सूर्यदीप कुशवाह ,जबलपुर से विवेक रंजन श्रीवास्तव ,बेंगलोर से मेधा झा ,दीपा स्वामीनाथन ,दुबई से स्नेह देव और इंदौर से सुषमा व्यास राजनिधि , हैदराबाद से डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ने आदित्य देव के सजीव बनाए गए चित्रों पर मौके पर ही कविताएँ रचकर सुनाईं.
कार्यक्रम में जयपुर के व्यंग्यकार प्रभात गोस्वामी ने चित्रकार का परिचय दिया .अमेरिका से इंडिया नेटबुक्स के निदेशक डॉ संजीव कुमार उपस्थित रहे। सभी आभार व्यंग्यकार डॉ सुरेश मिश्रा ने प्रकट किया .
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