*BAHUBHASHI*
*खबरों में बीकानेर*🎤 🌐
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🙏 मोहन थानवी 🙏
Khabron Me Bikaner 🎤
सच्चाई पढ़ें । सकारात्मक रहें । संभावनाएं तलाशें ।
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अस्ताचलगामी
कहानी
- मोहन थानवी
आज कुछ खास बात को लेकर रमेश जी प्रसन्न हैं। वे कोई 1 वर्ष बाद अपने आफिस आए हैं। अपना आफिस। हां, जहां उन्होंने अपने जीवन के 35 वर्ष तक सेवाएं दी, वह उनका अपना ही आफिस तो है। वे 1 बरस पहले सेवानिवृत्त हो गए तो क्या हुआ, सेवाएं देने की कूव्वत तो अभी भी उनमें बरकरार है। दरअसल रमेश जी सेवानिवृत्ति के बाद अपना पूरा समय कॉलोनी विकास समिति को देते रहे और परिणाम स्वरूप कॉलोनी में वाचनालय, मंदिर, पार्क, सहकारी बैंक, डिस्पेंसरी, सरकारी प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक स्कूल, खेल मैदान और एक सामुदायिक भवन आदि कॉलोनीवासियों की जरूरतें पूरी करने में लोग साथ जुड़ते रहे हैं। साथ ही वे कॉलोनी के बच्चों के समग्र विकास में सहायक आयोजन भी करते हैं। रमेश जी की कॉलोनी सारे शहर में पहले से प्रसिद्ध है और इसके श्रेय के हकदार सभी हैं। विकास में सभी की सहभागिता रही हैं। हां, तो रमेश जी आज प्रसन्न मुद्रा में अपने आफिस पहुंचे हैं । वैसे भी वे पिछले तीन चार महीने वे अस्वस्थ थे सो कहीं आ जा नहीं सके थे। आज रमेश जी पेंशन के काम से नहीं बल्कि अपनी सेवाएं देने की मंशा के साथ आफिस आए हैं। यूं भी पेंशनर्श को बैंक खाते के माध्यम से ही भुगतान होता है। सो, आफिस क्यों जाएं। रमेश जी ने आज सुबह अखबारों में एक समाचार पढ़ा, रिटायर्ड इंजीनियर्स की सेवाएं लेगा विकास संस्थान। यह खबर पढ़कर तो रमेश जी उत्साह से भर उठे। उनका पोता मोनू उन्हें अखबार पढ़ते देख रहा था। उसने देखा, दादाजी ने अपनी ऐनक उतार कर बहुत ही नफासत के साथ उसके शीशे साफ किए। आंखों पर लगाई और फिर से वही समाचार पढ़ा। घनी मूंछों में भी उनके होठ चौड़े होते दिख गए, वे मुस्करा जो रहे थे। मोनू ने उनसे पूछा, - दादाजी, आज तो आप खुश लग रहे हो। रमेश जी का जवाब था - बेटा सोनू। हम तो हमेशा खुश रहते हैं। मोनू ने कहा - हां, वह तो मैं देख ही रहा हूं। पिछले तीन महीने से आप बहुत बीमार थे लेकिन सुबह पार्क में सभी को कहकहे लगाने पर मजबूर कर देते थे। रमेश जी फिर मुस्कराये। बोले - बेटा, कहकहे लगाना या कि प्रसन्नचित्त रहना ही सेहत के लिए हितकर है। मोनू ने फिर अखबार की बात छेड़ी - आप अखबार में खबर पढ़कर प्रसन्न हो गए, ऐसा क्या है आज अखबार में। रमेश जी ने अपने पोते को बताया कि वे अब फिर से सरकार को सेवाएं देंगे। रमेश जी की यह बात कमरे में प्रवेश करते उनके लड़के सुधीर ने सुनी तो कहे बगैर नहीं रह सका वह - पिताजी, कल की घटना अब भी आपके जेहन में छाई हुई है... रजनी की तो आदत ही ऐसी है...। फिर मुझे भी तो उसे राजी रखना पड़ता है न...। मैं उसके आगे लाचार हो जाता हूं आप अब भी ऐसा सोचते हैं। लेकिन पिताजी आप निश्चिंत रहिये। रजनी जैसा कहे करते रहें बस... फिर समिति की मार्फत कॉलोनीवासियों की सेवा भी कीजिये। आफिस वाफिस का चक्कर मत पालिये। लेकिन रमेश जी कहां मानने वाले थे। वे कहते भी थे - जो संघर्षमय जीवन जीते हुए सदैव कर्म को अपना धर्म मानता है वह भला काम कर दिखाने का कोई अवसर चूक सकता है! नहीं, कदापि नहीं। अपने कथन पर वे खरे थे। सो रमेश जी भी ऐसे ही स्वभाव के हैं और परिणाम स्वरूप पहुंच गए हैं आफिस में। सेवाएं देने बाबत जानकारी लेने। सोने पर सुहागा यह कि रमेश जी के कार्यकाल में उनका सहयोगी रहा मधुप ही आज आफिसर के रूप में कैबिन में बैठा था। मधुप ने जैसे ही रमेश जी को देखा, अपनी कुर्सी से उठकर उनके चरण छूने गेट पर ही आ गया। कैबिन में बैठे लोग अचंभित थे। उनका अचंभा अभी दूर भी नहीं हुआ था कि मधुप ने रमेश जी को अपनी कुर्सी पर बैठाते हुए कहा - सर, आपके आशीर्वाद से चार साल हुए इस कुर्सी पर बैठा हूं। तब से आपका ही इंतजार कर रहा था, कब आप आएं और कब मैं आपकी अमानत आपको सौंपू। रमेश जी और प्रसन्न हो उठे लेकिन आफिस की कार्यविधि से परिचित थे सो कुर्सी पर बड़े ही स्नेह से मधुप को ही बैठाया और खुद सामने बैठे तीन युवकों के पास कुर्सी पर जम गए। तीनों युवक अपने किसी टेंडर के बारे में जानकारी लेने मधुप के पास आए थे। उनमें घनिष्ठता थी, सो एक युवक ने मधुप से पूछा, आपके अंकल हैं क्या! मधुप हंसा, बोला - नहीं भाई रमजान, आप रमेश जी हैं मेरे बॉस। रमजान समेत तीनों युवक फिर अचंभित हो उठे। बॉस! ऐसा कैसे हो सकता है, वे सालभर से ठेकेदारी कर रहे थे और उन्होंने आफिस में बड़े से बड़ा आफिसर मधुप को ही पाया था। मधुप ने उनकी हैरानी को शांत किया, बोला - भाई आपने मुझे आफिस के काम काज में पारंगत किया है। सरकारी नियमों के अनुसार अब रिटायर्ड हो गए हैं तो क्या हुआ मेरे लिए तो अब भी बॉस हैं। रमेश जी आज की युवा पीढ़ी के प्रतिनिधि मधुप में ऐसे संस्कार देख गदगद हो उठे। औपचारिक बातचीत के बाद रमजान सहित वे तीनों युवक जाने लगे तब रमेश जी ने मधुप को कहा, बेटा आज अखबारों में छपा समाचार पढ़कर आया था। मधुप समझ गया, नजरें चुराते हुए उसने कहा, सर, आप निचिंत रहिये। जैसे ही आर्डर आएंगे सबसे पहले मैं खुद आपको फोन करके बुलवा लूंगा। मधुप से हाथ मिलाकर कैबिन से बाहर जाता रमजान एकाएक रुक गया। उसने दिलचस्पी से पूछा, सर, क्या समाचार पढ़कर आए आप! रमेश ने उसे जवाब दिया - विभाग सेवानिवृत्त इंजीनियरों की सेवाएं लेगा। रमजान तो चुप रहा लेकिन उसके साथ आया दिलीप सहसा ही कह उठा - सर, आप इस बुढ़ापे में भी काम करेंगे--! बुढ़ापा शब्द की व्याख्या रमेश जी ने कभी मधुप के सम्मुख की थी, सो वह अपनी जगह सकपका गया। रमेश जी बुढ़ापा शब्द से कोसों दूर रहने वाले आदरणीय व्यक्ति हैं। उन्हें कोई बूढ़ा कह दे तो वे जरूर नाराज हो जाएंगे। लेकिन नहीं-- यह क्या, रमेश जी खुद को बूढ़ा कहने वाले दिलीप पर नाराज होने की बजाय उसे दुलारते और कनखियों से मधुप की ओर देखते हुए कह रहे थे - बेटा। बुढ़ापा क्या होता है! बुढ़ापा होता है अनुभवों का खजाना। बुढ़ापा होता है पारस, जिसे छूकर बचपन और जवानी सोना हो जाती है। काम के मामले में भला बुढ़ापा कहां बाधा डालता है। दिलीप तर्क वितर्क करने की स्थिति में नहीं रहा। उसे पछतावा हुआ, एक कर्मठ व्यक्तित्व को वह अनजाने में नापसंद शब्द कह बैठा। रमेश जी उसकी मनोदशा से अपरिचित नहीं थे। उन्होंने माहौल को फिर से खुशमय बनाते हुए कहा, बेटा, अपने अपने एक्सपीरियेंस के खजाने से भरी भारी बोरी के बोझ तले लोग दबते चले जाते हैं और उनका शरीर अपने ही अनुभवों को उठाये नहीं रह पाता और लोग उन्हें बूढ़ा कहते हैं। अब अंदाज लगाओ, यदि हम अपने इस बोझ को बांट कर कम दें तो क्या फिर भी कोई बूढ़ा कहेगा! नहीं, कभी नहीं। मन में उमंग और कर्म को धर्म मानेंगे तो सभी कहेंगे, मन से कोई बूढ़ा नहीं होता, फिर मधुप की ओर मुड़ कर उससे पूछ बैठे - क्यों मधुप, सही बात है न। मधुप सकपका गया और समझ भी गया कि रमेश जी सब भांप गए हैं। मधुप के दोस्त चले गए... कैबिन में रह गए सिर्फ रमेश जी और मधुप...। रमेश जी ने एक लम्बी सांस भरी और मधुप से नजरें चुराते हुए बोले... बेटा... हालात बदल गए हैं... ध्यान रखना...। मधुप असंमजस में पड़ गया... पूछ बैठा ... सर ऐसा क्या हुआ... । रमेश जी ने लम्बी सांस ली और उठकर जाते हुए बुदबुदाए... बूढ़ा हो गया... नहीं... नहीं... अब बेटा जवान हो गया है ... बहू कहेगी सो ही तो करेगा...। मधुप ने महसूस किया ...रोशनी की किरण शनैः शनैः अंधेरे का अंग बनती जा रही है।
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