Tuesday, September 1, 2015

रोने से रोजी नहीं बढ़ती

रोने से रोज़ी नहीं बढ़ती  

अनथक कर्म करने के बावजूद वांछित प्रतिफल नहीं मिलने की शिकायत करने वाले बहुतेरे होंगे लेकिन कोई उनसे पूछे क्या रोना रोने से रोज़ी बढ़ती है ! दरअसल मैनेजमेंट कोर्स, अध्यात्म और व्यक्तित्व विकास जैसे प्रशिक्षणों में सकारात्मक विचारों की महत्ता बताई ही जाती है। ये सकारात्मक विचार-पाठ कोई आज के ईजाद पाठ्यक्रमों में प्रयुक्त नहीं होते बल्कि ‘‘उस्ताद-शागिर्द’’ काल से भी बहुत - बहुत पहले ‘‘गुरु-शिष्य’’ युग से सकारात्मकता को महत्व मिला हुआ है। पुराण कथाओं, ऐतिहासिक एवं लोककथाओं में भी सकारात्मक विचार अपनाने संबंधी सीख देने वाले उद्धहरण भरे पड़े हैं। आज का युग कल कारखानों में सिक्के ढालता है तो कभी श्रमिक वर्ग को खेत खलिहान में पसीना बहाकर या व्यापार के लिए दुरूह यात्राएं कर सेठ साहूकारों के लिए ‘‘गिन्नियों की थैलियां’’ भर लानी होती थी। श्रमिक वर्ग तब भी वांछित लाभ से वंचित रहता और आज भी कमोबेस ऐसा होता है। साथ ही यह भी तय है कि जगह जगह ऐसा रोना रोने वाले को लाभ भी बढ़ा हुआ नहीं मिलता। अर्थात युग और काम का रूप बदल गया लेकिन व्यवस्था ले देकर वहीं की वहीं रही ! प्रवृत्ति भी नहीं बदली ! हां, जमाने ने अनथक परिश्रम करने वालों को शिखर पहुंचते जरूर देखा है।

Tuesday, August 25, 2015

इनामी सिंधी नाटकनि जा किताब छपजणु खपनि

इनामी सिंधी नाटकनि जा किताब छपजणु खपनि

associate
बीकानेर।


 जातल-सुंञातल सिंधी साहित्यकार, आलोचक अहमदबाद जे जेठो लालवानी चयो त राजस्थान सिंधी अकादमी जयपुर सां गडोगडु तमाम संस्थाउंनि पारां मेड़यल चटाभेटीअ में इनाम खट्यल सिंधी नाटकनि खे किताबी शिक्ल में पाठकनि ऐं रंगजगत जे साम्हूं आनणु खपे। ईआ जिम्मेदारी नाटकनि सां बावस्ता सभिनी लेखकनि, कलाकारनि जी आहे। जेठो लालवानी राजस्थान सिंधी नाटक सब्जैक्ट ते साहित्य अकादमी मुंबई, विशाल सिंध समाज सांस्कृतिक मंच बीकानेर ऐं सुजाग सिंधी मासिक जे गड्यल आयोजन जे समापन सत्र जी अध्यक्षता कंदे मौजूद रंग-प्रेमिनी खे संबोधित कनि पया। आयोजन बाबत पहिंजो रायो रखंदे वरिष्ठ साहित्यकार भगवान अटलानीअ चयो त हालात मुजिबु सभिनी खां अगु पहिंजी भाषा, कला, साहित्य ऐं संस्कृतिअ खे बचाइण लाइ कदम खणण जरूरी आहिनि। नाटक नवीस ऐं लेखक भाषा जी गरिमा जो बि ध्यानु रखंदे लिखनि ऐं नईं टेहीअ खे सिंधु संस्कृतिअ जे सुहिणनि रंगनि सां वाकिफु कराइनि। छह नाटकनि जो वाचन कयो वियो ऐं बाहिरियूं आयलि सिंधी साहित्यकारनि पहिंजा परचा पेश कया। परचनि जे आलोचनात्मक चर्चा कई वई। इनि खां अगु उद्घाटन सत्र में चिंतक ऐं साहित्यकार श्रीलाल मोहता, लालवानी, टैक्स सलाहकार एस एल हर्ष, अकादमी जे क्षेत्रीय सचिव कृष्णा किम्बहुने वगैरह मेहमाननि झूलेलाल जी तस्वीर अगियां जोत प्रज्वलित करे सिम्पोजियम शुरू कयो। मोहता चयो त विरहांङे बैद जुदा जुदा सूबनि में वसी करे बि सिंधी समाज पहिंजी संस्कृति खे सांभे रखण जो कमु कयो आहे। लालवानीअ 1880 ई खां वठी अजु सुधी जे नाटकनि जे सफर बाबत तफसील सां बुधायो। अकादमी जे किम्बहुने स्वागत भाषण डिंदे अकादमी जो ऐमु सिंधी भाषा साहित्य जे विकास बुधायो। टैक्स सलाहकार हर्ष सिंधी भाषा जे इतिहास ऐं उनिजे पुष्करणा ब्राह्मण समाज सां बाबस्ता रखंदड़ खास खास गाल्हियुनि जी जाण डिनी। सुजागु सिंधी मासिक जे देवीचंद खत्री बीकानेर जे रंगकर्म बाबत खास गाल्हियूं बुधायंू। सिम्पोजियम में कुल चार सत्र थिआ जिनन में जयपुर जे अटलानी, लक्ष्मण भंभाणी, सुरेश सिंधु, जोधपुर जे हरीश देवनानी, अजमेर जे सुरेश बबलानी, अहमदबाद जे लालवानी बीकानेर जे सुरेश हिंदुस्तानी पहिंजे नाटक जो वाचन कयो। मंच जे पवन देवानी धन्यवाद ज्ञापन डिनो।
मोहन थानवी

Thursday, July 23, 2015

अंजाम

धैर्यवान काठ की हाँडी बार बार खुद को आग से परे रहकर जलने से बचती और खिचड़ी पकाकर स्वार्थी को देती रही। एक दिन उसे लोगोँ को बेवकूफ बनाने वाले स्वार्थी पर हँसी आ गई। उसने स्वार्थी की खिचड़ी नष्ट कर अपनी महत्ता बताकर ख्याति पाने की गरज से आग से दूरी घटा ली। वो अधिक देर मुस्करा न सकी और जल गई।
अट्टृ – काठ की हाँडी क्योँ मुस्कराई?
पट्टृ – स्वार्थी को हदेँ पार करने मेँ लाज न आती देख।
अट्टृ – फिर जली क्योँ?
पट्टृ – खुद भी स्वार्थी होकर।
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अट्टू बीमार पत्नी पट्टू की तीमारदारी करते करते खुद बीमार हो गया। सेवा की बारी पत्नी की थी। पट्टू – ऐ जी उठो, नीँद की गोली खाए बिना ही सो गए।

Monday, July 13, 2015


बालू की चिट्ठी - मेघ के नाम
इस तरह
बूंद बूंद रिसते
बरसते पर
उमस करते हो ?
मेघ
तुम
थार के जीवन पर
कुठाराघात करते हो ?
आशाओं की पैदावार के बीज
बालू-कणों में फूटने से पहले
तेज नागौरण के वेग से
इधर के उधर पहुंच जाते
और तुम मेघ...
तेजी से उन्हीं के साथ
थार पर मंडराते
कहीं के कहीं
क्यों
निकल जाते ?
है तो यह अन्याय तुम्हारा
तुम्हारी निष्ठुरता से
यहां का ‘‘धन’’ प्यासा रह जाता
धन का अमृत बना दिया जाता मावा
लकड़ियां और टहनयिां झाड़ियां
फोग भी भेंट
भट्टियों के हो जाते
चूल्हा धुंआता न धुंआता
मरुस्थल की हवा धुआं जाती
मेघ तुम जब
धुआं बन जाते
इस अफसोस में
हळधर की आंख भी धुआं जाती
सावन-भादौ की गोठें जब
यहां पुकारती प्रवासियों को
मेघ तुम क्यूं नहीं गरजते
सचमुच मेघ...
तुम जब बरसते हो
गांव-गांव
औ’र
शहर शहर एक चमन-सा
बन
इसी मिट्टी में फनां हो जाने को उकसाते
सचमुच ! मेघ ! किंतु तुम निष्ठुर हो
नहीं बरसते तो नहीं बरसते
रिसते तो फकत रिसते हो
इस तरह
बूंद बूंद रिसते
बरसते पर
उमस करते हो ?
मेघ
तुम
थार के जीवन पर
कुठाराघात करते हो ?

Monday, June 15, 2015

ओला गोला 
मीठा शोला

Saturday, June 13, 2015

वरिष्ठ साहित्यकार श्री राधाकिशन चांदवानी

Thursday, June 11, 2015


712 ई मेँ सिँध की नारीशक्ति का सँघर्ष

जब ब्राह्मण राजा दाहर युद्ध के मैदान मेँ था तब सिँध के क्या हालात थे…? अलोर सिँध का किला 1300 साल बीतने के बाद भी अपने आप मेँ कई रहस्य समाए है। क्या किले मेँ सुरँग भी है? हिँगलाज माता व नृसिँह जी का मँदिर है। सिँधु सँस्कृति मेँ नारी को महान दर्जा प्राप्त है। नारीशक्ति ने अपने राष्ट्र के लिए दुश्मन का सामना कैसे किया कि आज भी उसे याद कर सलाम किया जाता है। पूजा जाता है। इन सब के साथ 712 ई मेँ सिँध की नारीशक्ति का सँघर्ष राजमाता सुहँदी महारानी लाड़ी माई पदमा का द्वन्द्व शामिल है Sindhi Novel Kooch Ain Shikast मेँ। -  मोहन थानवी

Wednesday, January 7, 2015

रेत का जीवन

रेत का जीवन
रेत का भी जीवन है
अपना संसार है
समाई धूप की गर्मी है
आसपास बिखरे कांटे हैं
कहीं रेत पर गुलिस्तां बने
कहीं ताल तलैया खुदे
कहीं गगनचुंबी इमारतें हैं
खेत किनारे रेललाइन है
इसी रेत में पनपे पेड़ हैं
मंदिर इसी पर खड़े
मस्जिद इस पर बनी
गुरुद्वारे-चर्च भी रेत पर
घर भी बनाये हैं लोगों ने रेत पर
सपने भी बुने हैं लोगों ने रेत पर
हवा जब बहती है तेज रेत भी उड़ती है
रेत पर लहराता जीवन संवरता रहता
नश्वर यह संसार रेत में ही मिल जाता
रेत का ही जीवन है