Tuesday, April 2, 2013

सुनहरा महल : कथा अंश

सुनहरा महल :  कथा अंश

अचानक सामने जो देखा, यकीन नहीं हुआ। तसव्वुर में जरूर ऐसे नजारे किए लेकिन सामने... यथार्थ में... आश्चर्य ! कैसे तो ख्वाब आया ओर कैसे ख्वाब में ये नजारा आया फिर कैसे सामने हकीकत में देख कर आंखें चुंधिया रही हैं...! स्वप्न...! जरूर स्वप्न ही है ! बाहं पर चिकोटी काटी... उई...! जागते का नजारा है ये तो! वाह...! वाह...! सामने सुनहरा महल। महल के इर्द गिर्द खजूर के लंबी परछाइयों वाले पेड़। लंबी परछाइयां... वक्त सुबह का है या संध्या का... जानने का कोई साधन पास में नहीं ! यकबयक मंदिर की घंटियां सुनाई दी... संध्या... नहीं... नहीं... अलसभोर...। नहीं... निश्चित रूप से संध्या का समय है। मन ने कहा, अलसभोर हो तो पेड़ों की परछाइयां नहीं होती... सूर्य चमकने के बाद ही तो परछाइयों को पांव पसारने का मौका मिलता है। जरूर संध्या का समय है। सूर्यास्त के बाद परछाइयां सिमट जाएंगी। अपने आप में। आस पास के लोगों की तरह। ये सुनहरा महल भी दिखाई देना बंद हो जाएगा। आंख से ओझल हो जाएगा सब कुछ। लेकिन ये महल... इसका तो फकत तसव्वुर ही किया था कभी... साक्षात सामने कैसे आ खड़ा हुआ। अभी असमंजस के सागर में गोते लगाता कि बिजली की तेज चमक के साथ ठंडी हवा का झोंका बालों को सहला गया। पल दो पल बीते न बीते... जोर से बादलों की गर्जना भी कानों में पड़ी। बरसात... हां बरसात आएगी... लेकिन ये महल... सुनहरा महल... ! ख्वाबों ख्यालों में देखा महल... ! ओह...! सर दर्द से फटा जा रहा है... ! शरीर थकान से अकड़ा हुआ लग रहा है। जरूर ये दो दिन की लंगी रेलयात्रा का परिणाम है। रेलयात्रा... चिहुंक कर गर्दन उठाई... ये क्या...!! अपने ही घर में अपने ही कमरे में हूं...। टीवी चैनल पर कोई सीरियल चल रहा है... उसीमें सुनहरा महल देख हैरान हूं...। नींद में हूं जागा जागा...हूं ! तभी खिड़की से बिजली की तेज चमक फिर दिखाई दी... बादल भी गरजे। ओह...! मौसम फिर पलट गया है... पश्चिमी विक्षोभ की वजह से बारिश हुई है। ( कथा अंश )