Saturday, April 27, 2013

प्रलाप

प्रलाप 

 मित्र... अक्सर ख्वाबों में तुम्हें देखने की कोशिश की... कहां थे तुम ... जब नींद मुझे दुनिया से विलग करने का प्रयास करती थी... । अधखुली आंखों से मेरे होंठों पर प्रलाप होता था... तुम्हारे लिए। ... थे कहां तुम...। यूं मुझसे जुदा होने का सबब भी तो होना चाहिए तुम्हारे पास...। पहाड़ों के एक ओर ... जिधर सूर्य होता है.... रोशनी होती है। दूसरी ओर... जिधर रोशनी का इंतजार होता है... लोग होते भी हैं और मैं भी...। तब तुम उधर क्यों होते हो... जिधर रोशनी होती है। ओह... तुम्हें अब भी अंधेरा डराता है...। है न... मित्र । तुम्हें रोशनी पसंद है। सच कहूं... तुम बिन... मुझे भी डर लगता है...। अंधेरों से भी... और... रोशनी से भी। यही वजह है... मुझे रोशनी की बजाय... तुम्हारी जरूरत है.. मित्र।...