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सुपने जी हत्या मंझ रंगकर्म जी खुशी

सुपने जी हत्या मंझ रंगकर्म जी खुशी

पुस्तक परिचयनाटक -     

हत्या हिक सुपने जी ( Besed on Cross purposes – Albert Camus )

लेखक -     हरिकांत जेठवानी
प्रकाषक -     सुनील जेठवानी,
        राजकोट 360007
        संस्करण 2012

सुपने जी हत्या मंझ रंगकर्म जी खुषी
सिंधी साहित्य जगत मंझ हरिकांत न सिर्फ नाटकनि लाइ बल्कि सिंधु समाज, साहित्य धारा ऐं आखाणी जे संपादन जे करे हमेषह याद रहिण वारो नालो आहे। पहिंजी लंबी हिंदी कविता एक टुकड़ा आकाष समेत हरिकांत हिंदी साहित्य संसार जो बि जातलि सुञातलि लेखक आहे। कविता में नवाचार ऐं पहिंजी कहाणिनि में समाज जी नुमाइंदी कंदड़ चरित्रनि खे बुलंद सिंधी जुबान डिअण वारे हरिकांत जेठवानी जो नवों नाटक हत्या हिक सुपने जी इनि साल 2012 मंझ साया थी आयो आहे। अल्जेरियन-फ्रेंच राइटर अल्बर्ट कैमस ( 1913-1960 ) जी दुनिया भर में चर्चित रचना क्रॉस प्रपोजेज जो उल्थौ कयलि इयो नाटक टाइटल सां भलेषकु हत्या हिक सुपने जी जाहिरु करे थो लेकिन सही माइननि मंझ सिंधी रंगकर्म जे जुझारू रंगकर्मिनि वास्ते इनि नाटक मंझ खुषीयूंनि जो दरियाह वही रह्यो आहे। पंञनि पात्रनि वारे इनि नाटक खे पढ़हंदे वक्ति पाठक जी अखियूंनि अगियूं हरेक सीन जी सनीअ में सनी हिक हिक षइ अची थी वंञें। आधुनिक नाटक लेखन में लेखक निर्देषक खे हिदायतूं डई उनिजे आजाद नजरिये खे कैद कोन कंदा आहिनि ऐं हरिकांत जी ईआ खासियत 1965 में साम्हूं आइलि इनि नाटक जे 21 सदीअ जे बें डहाके जी षुरूआत में साया थिअलि उल्थै में साफतौर सां जाहिरु थी रही आहे। सिंधी भाषा साहित्य में अंतरराष्ट्रीय सतहं ते मषहूरीअ जी पताका फहराइण वारे इनि नाटक जो साया थिअण रंगकर्म में तपस्या कंदड़ अजु जी टेहीअ लाइ वरदानु समान मंञणु गलत न थिंदो छा काण जो लंदन थिएटर समेत इनिजो मंचन तमामु मुल्कनि में कयो ऐं सराहिजी चुक्यो आहे। सिंधी रंगमंच जे अजु जे हालात खे ध्यान में रखी इनि नाटक में संभावनाउंनि जो दरियाह वहिंदो नजर अचे थो। कुल जमा टिनि सीननि वारे इनि नाटक जा पात्र पहिंजे अभिनय ऐं डायलॉग प्रजेंटेषन सां समाजी ऐं दुनियावी झंझावात सहूलाइति सां दर्षकनि तोणी पहुंचाइनि था। सठि साल जीमाउ समेत नाटक जा पात्र नौकर, षारदा, चेतन ऐं सावित्री पहिंजे संवाद ऐं भावनाउंनि जे प्रदर्षन सां दर्षकनि खे षुरूआत में इ बधी था वठनि ऐं नाटक पूरो थिंदे थिंदे ऐतिरियूं उलझनूं, समस्याउं, द्वन्द्व ऐं समाज जी नुमाइंदगी कंदड़ केतरनि इ चरित्रनि जा मुखौटा जाहिरु थिंदा था वञनि। 76 सुफनि वारे इनि नाटक में आषा-निराषा में तरंदड़ - बुडंदड़ पात्रनि जा सुपना हालात जी तरवारु जी धार जी भेंट चढ़हनि था या किन्हनि पात्रनि जी सकारात्मक सोच खटी थी वंञे इनि मिस्ट्रीय खां जुदा नाटक वाचंदड़ पाठक खे सिंधी रंगकर्म में इनि रचना जे मार्फतु संभावनाउंनि जा द्वार खुलंदा जरूर नजरनि था। मूल भावना खे कायम रखंदे नाटक जी आत्मा खे सिंधी भाषा जो वगो पाराइण हरिकांत जी लेखनीअ जो इ कमु थी सघंदो आहे।  ईआ खासियत इ हरिकांत जे इनि नाटक खे खास अहमियत वारो साबित करे थी। नाटक खे पुस्तक रूप में पाठकनि तोणी पहुंचाइण जोे कमु करण लाइ लेखक हरिकांत, प्रकाषक सुनील जेठवानी, कवर डिजाइनर मेहरवान ममतानी ऐं कॉपी राइट रखदंड़ श्रीमती राधा जेठवानी खे साधुवाद। - मोहन थानवी
 

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