Saturday, November 23, 2013

संगीत ज़रिए इलाज - Dr Kamla Goklani

डॉ कमला गोकलानी जे सिंधु दूत में प्रकाशित आलेख मूं चूंडयलि
संगीत ज़रिए इलाज -
अजु माहिर ऐं खोजनीक जंहिं म्यूज़िक थेरेपीअ जी गाल्हि कनि था, उहा सदियूं अगु लोकगीतनि जरिए आम वाहिपे में हुई, जंहिंजो फकत हिकु मिसालु डियां थी - बार खे नंढी माता, वडी माता लाखिड़ो वगैरह थियण ते सजो बदनु गाढ़ो थी वेंदो आहे। फोफीड़ा, दाणा, चुघ थी पवंदा आहिनि। बुखार जा मच हुअण करे छितो थी पवंदो आहे, निंड न ईंदी अथसि, तडहिं माता जा ओराणा -
ठारि माता ठारि पंहिंजे बचनि खे ठारि ।
अमां अगे बि ठारियो थई हाणे बि ठारि ।।
बुधी बार ते जादूअ जहिड़ो असरु थींदो आहे ऐं खेसि मिठिड़ी निंड पंहिंजे आगोश में समेटे वठंदी आहे। सागियो असरु मनो रोगियुनि ते बि थींदो आहे।
‘‘सिंधी लोक गीतनि में अहिड़ो त लुत्फु ऐं सोजु समायलु हूंदो आहे ऐं अहिड़ो त रसु ऐं लइ भरियल हूंदी आहे, जो बुधण वारे जी दिलि ऐं दिमाग तासिर जे अंतहाई गहिरायुनि में गुमु थियो वञनि एं हू पाण खे उन्हीअ घड़ीअ माहौल में तसिवर करण लगंदो आहे, जिते फितिरत पंहिंजे हकीकी ऐं लाफानी लिबास में गाईंदे, नचंदे, टिपंदे ऐं मुस्कराईंदे नजर ईंदी आहे। इन्हनि सभिनी जबलतनि जो कारण ही आहे जो उन्हनि में हिक अजीबु रसु, दिलि मंे उमंग ऐं जजिबा उथारींदड़ तड़फ मौजजनि हूंदी आहे। ’’  - डॉ कमला गोकलानी   

एक दीपक

एक दीपक
समग्र समाज को दीपावली की लाख-लाख बधाइयां। दीपावली हमें एक दीपक जरूर प्रज्वलित करने का संदेश दे रही है। भलेशक आज के जमाने मंे बिजली और जेनरेटर जैसे संसाधन रोशनी के लिए मुहैया हैं। भलेशक प्रत्येक व्यक्ति लखपति-करोड़पति है मगर मानवीयता के लिए जज्बा भी जिंदा रहना जरूरी है। जीवन और प्राणियों के लिए दया भावना हजारों वॉट के बल्वों की रोशनी से अधिक जीवन को रोशन करती है। वक्त आने पर आलीशान अट्टालिकाओं की चमक दमक एक दीपक की रोशनी के आगे फीकी पड़ जाती है।
एक दीपक - आलीशान महल में राजा-रानी का बड़ा और सुसज्जित कक्ष रोशन फानूस से चमक रहा था। फानूस इतरा कर अपने तले में धूल से सने मिट्टी के दीपक को चिढ़ा रहा था। दीपक अपनी चिर परिचित सादगी से अपने तेल और बाती को सदैव मुस्तैद रहने का सबक सिखा और वक्त पर काम आने की हिदायत दे रहा था। बाहर आंधी-बरसात आ रही थी और इस वजह से घुप अंधेरा भी था। रानी ने राजा को कहा - कोई दास-दासी आस पास नहीं है। बुलाने पर भी नहीं आ रहा। मुझे बाहर टंगा हुआ मैना का पिंजरा अंदर मंगवाना है। आप फानूस उठा कर रोशनी में पिंजरा उठा कर ले आओ। फानूस ने राजा के लिए रानी का यह निर्देश सुना तो घमंड से दीपक को दिखा दिखा कर और अधिक मटकने लगा। इतराने लगा। फानूस ने कहा - देख दीपक... मिट्टी के दीपक... मुझे राजा अपने हाथों मंे संभाल कर उठा कर घुमाएगा। तू बेचारा यहां कोने में पड़ा रह। दीपक ने कोई जवाब नहीं दिया मगर तेल-बाती को आश्वस्त करता रहा। दिलासा देता रहा। रानी की फरमाईश सुन राजा फानूस की ओर बढ़ा मगर ये क्या... राजा ने तो फानूस को देखा तक नहीं बल्कि खुद झुक कर दीपक को उठाया और अपने हाथों से झाड़-पोंछ कर हथेली में संभाला। रानी से बोला - इतना भारी फानूस... इसे यहीं पड़ा रहने दो। राजा ने तेल में डूबी बाती को प्रज्वलित किया और दीपक को सहेजता हुआ बाहर जाकर मैना के पिंजरे को उठा लाया। सामने आई मैना से बात कर रानी बहुत प्रसन्न हुई और राजा से बोली - रात गहरा गई है। फानूस को बुझा कर इस रोशन दीपक को मेरे पलंग के सिरहाने की तरफ मैना के पिंजरे के पास संभाल कर रख दीजिए। फानूस की तेज रोशनी हमारी नींद में खलल डालेगी लेकिन दीपक अपनी शांत और सुकून देने वाली रोशनी फैलाता रहेगा। मैना और हम सुख चैन से सकेंगे। 
मैना संसार के भांति भांति के प्राणियों की प्रतिनिधि पात्र है। फानूस आधुनिक संसाधनों का नेतृत्व करता है। राजा-रानी इस संसार के व्यक्तियों के प्रतिरूप है। आंधी-बरसात समय बदलने पर सामने आने वाले हालात हैं। इन सभी से अधिक महत्व रखने वाला है एक दीपक। उठो, जागो तो अपनी इस मातृभूमि को संवारें। एक दीपक प्रज्वलित करने का अर्थ किसी बालक को शिक्षा दिलाना। किसी जरूरतमंद की मदद करना। किसी को प्रोत्साहित कर उसके लक्ष्य की ओर अग्रसर करने में सहयोग करना सहित मानवीयता के लिए कोई भी एक काम कर अपने समाज, अपने शहर, राज्य, राष्ट्र और विश्व के लिए एक दीपक प्रज्वलित करना हो सकता है।
- मोहन थानवी

Friday, September 27, 2013

Bharat me angreji raj ... Lekhak pt sundar lal ji... pt sundar lal ji ki book bahut likhi hui hain or unke prashanshak bhi kafi sankhya me hai A पंडित सुंदरलाल जी के बारे में संध्या नवोदिता जी ने गूगल पर सर्च किया मगर सर्च इंजन वांछत विद्वान के बारे में अनजान रहा। यह इसलिए कि पंडित संुदरलाल जी के बारे में सर्च इंजन पर किसी ने कोई जानकारी डाली ही नहीं होगी। हिंदी या अंग्रेजी में गूंगल ़ और ब्लॉग या अपने या किसी साथी के वेबसाइट पर सामग्री अपलाड करने के बाद वह सामग्री सर्च करने पर उपलब्ध हो जाती है। ऐसा मेरा स्वयं का अनुभव गूगल पर रहा है। उदाहरण के तौर पर संभवतया मेरी यह पोस्ट भी सर्च करने पर सामने आ सकती है। pt sundar lal ji ki book bahut likhi hui hain or unke prashanshak bhi kafi sankhya me hai A

Sunday, July 7, 2013

पहाकनि जी बरसाति

पहाकनि जी बरसाति।
अजु तव्हांखे पहाकनि में बरसाति जी गाल्हियूं था बुधायूं। असांजो मकसद सिन्धु भाषा, बोली ऐं संस्कृतिअ जियूं खासियतूनि खे तव्हां तांई पूजायणो आहे। राय-मशविरा इनि बारे में असांखे मिलन्दी त घणी खुशी थीन्दी। -
 डखिण मींह न वसिणा,
जे वसे त बोेड़े,
काइर धकु न हणिणा,
जे हणे त झोरे।
सिन्धु में घणो करेेे डखण-ओलह खां बरसाति न पवन्दी आहे। पर जे इन तर्फ जी बरसाति पई त चंगी बोड़ बोड़ा करे छडीन्दी आहे। याद रखिण जी गाल्हि आहे, असांजो अजमेर समेत ओलह जो राजस्थान बि इन्हींअ ई भौगोलिक स्थितिअ में वसयलि आहे। खास तौर बीकानेर, जैसलमेर वगैरह।
बुठो त थरु, न त बरु
थरपारकर वारो धणो जिलो वारीअ वारो आहे। हिते आबादीअ जो घणो दारोमदार बरसाति ते आहें थर में जे बरसात पेई त उहो सजो इलाइको सुख्यो सताबो ऐं सुन्दर बणिजी पवन्दो, न त उव्हो रेगिस्तान ई आहे।
वसे त कोहु, न त रोहु
बरसाति में इलाइको सुहिणो, न त सुकलु मुल्क।
सियारे में सीउ पवे, आड़हड़ में आरायूं
सन्धु बिन्हीं में को न को, कंहिं खे साराहियूं!
सिन्धु जे उत्तर में सर्दी ऐं गर्मी बई घणियूं थीन्दियूं आहिनि, जेेके परेशान कन्दड़ आहिनि।
डिठो चेटु, पियो अंबनि में मेठु
चेट जे महीने खां पोइ अंबनि में रसु ऐं मिठासु अची वेन्दी आहे।
 जय झूलेलाल। 

Tuesday, June 11, 2013

अंडा सिखावे बच्चे को चीं-चीं मत कर

अंडा सिखावे बच्चे को चीं-चीं मत कर    

आज नहीं, प्राचीन काल से कहा जाता है, छोटे मुंह बड़ी बात। इसका प्रचलन बने रहना यानी छोटे मुंह बड़ी बात के उदाहरण सामने आते रहना मनुष्य की प्रवृत्ति को दर्शाते हैं। सामाजिक या वाणिज्यिक जीवन में ऐसे चरित्र कम किंतु राजनीति से जुड़े और प्रतिस्पर्द्धात्मक प्रवृत्ति वाले लोगों में इस तरह की बातें सामने आ ही जाती है जब लोग स्वतः कह उठते हैं, अंडा सिखावे बच्चे को कि चीं-चीं मत कर। दरअसल किसी भी वर्ग के कार्यक्षेत्र से जुड़ी शख्सियत के जीवन में टर्निंग पॉइंट प्रायः तब दिखाई देता है जब नवागंतुक साथी उसे पीछे धकेलने को उद्यत होते हैं। राजकीय आश्रय से संचालित कार्यालयों या निजी क्षेत्र,  कारपोरेट जगत में  कामगारों की वरीयता को कनिष्ठ साथी चुनौती देते दिखते हैं। काम कम पारिश्रमिक अधिक, अनुभव और कार्य के प्रति निष्ठा में कमी, ईगो में वरिष्ठ से 21 रहकर खुद को साबित करने की भावना प्रदर्शित करने में तनिक भी देर नहीं करना। ऐसे लोगों की एकाधिकार और शोषण की प्रबल भावना छिपाए नहीं छिपती लेकिन विद्वान कह गए हैं, अंत बुरे का बुरा। आखिरकार निर्णायक घड़ी आ ही जाती है और नया नौ दिन पुराना सौ दिन की बात सिद्ध होकर भावी पीढ़ी को शिक्षित करती है। अंत भला सो भला।

Tuesday, May 21, 2013

अच्छी भई, गुड़ सत्तरह सेर


अच्छी भई, गुड़ सत्तरह सेर

आज का युग बाजारवाद से घिरा है। भाव-भंगिमाएं तो बिकती ही रही हैं। यहां भावनाएं भी बिकने लगी हैं। महंगाई के बोझ तले दबे गरीब को महलों के सपने दिखाने का सिलसिला थमता नहीं दिखता... हां... तरीका जरूर बदलता रहता है। आम आदमी भी बाजार की ऐसी चाल को अब समझ गया है और इसी वजह से किसी वस्तु की कीमतें यकायक बढ़ा दिए जाने पर बोल उठता है... बारह रुपए बढ़ाए हैं तीन रुपए कम कर देंगे और कहेंगे अच्छी भई, गुड़ सत्तरह सेर। यानी सस्ताई का जमाना ले आए। गुड़ का प्रचलन भले ही कम हो गया है लेकिन हमारी परंपराओं में, धर्म-संस्कृति में, अनुष्ठानों में और सामाजिक रीति रिवाजों में गुड़ की महत्ता बराबर अपनी गरिमा बनाए हुए है। बधाई में गुड़ आज भी बांटा जाता है। पूजा पाठ में श्रीगणेश जी को गुड़ से प्रसन्न किया जाता है। और... कहावतों में गुरु गुड़ ही रहा चेला शक्कर बन गया भले ही कहा जाता हो लेकिन बाजार में चीनी की कीमतों के मुकाबले गुड़ की कीमत सुर्खियों में रहती है। महंगाई को गुड़ की कीमत की तराजू पर आज नहीं बल्कि 18 वीं शताब्दी के आखिरी दशकों में भी तौला जाता था। कोई वस्तु जब बहुत सस्ती या आसानी से मिल जाए तो आज भी कहा जाता है, अच्छा है खाओ मौज उड़ाओ। 1885 में गुड़ एक रुपए में दस सेर मिलता था इसकी जानकारी कहावत कोष में एस डब्ल्यू फैलन की कलम से मिलती है। उस समय में गुड़ एक रुपए का दस सेर मिलता था और इससे भी सस्ता किसी को मिल जाए तो वाह वाह! बाजारवाद तब नहीं भी होगा तब भी कीमतें बढ़ने घटने का प्रभाव तो समाज पर पड़ता ही था यह तय है और यह भी कि भावनाओं का व्यापार भी होता रहा है। नाट्य विधा के विभिन्न रूपों में भाव-भंगिमाओं का प्रमुख स्थान है और सबसे महत्वपूर्ण है भावना प्रदर्शन। किसी दार्शनिक ने अपने अनुभवों को शब्द दिए - जिंदगी एक नाटक है। बाजार भी इसका एक हिस्सा है और राज के काज या सेठ साहूकारों के निज कार्यों के अलावा बाजार में समर्थ लोग असमर्थ का शोषण भावनाओं की कीमत तय करके ही कर पाते हैं। यदि कोई असमर्थ नहीं है तो कितना भी समर्थ उसका शोषण नहीं कर सकता। महंगाई भी आर्थिक रूप से कमजोर और अधिक आय अर्जित कर पाने में असमर्थ को ही अपनी चपेट में लेती है। इसीलिए श्रमिक संघ और श्रमिक नेता एकता का आह्वान करते हुए मजदूर वर्ग को समर्थ बनने के लिए संघर्ष का संदेश देेते हैं। और यह सर्वविदित है कि जो भावनाओं पर काबू रख सकता है उसके लिए गुड़ सस्ता हो या महंगा, गुड़ तो गुड़ है और गुड़ हमेशा मीठा ही होता है। जय हो ।

Thursday, May 16, 2013

... दूसरे ग्रह के प्राणी इस धरा पर आते थे ? एलियन... ?

... दूसरे ग्रह के प्राणी इस धरा पर आते थे ? एलियन... ? 

दूसरे ग्रह के प्राणी इस धरा पर आते थे ? ? ?  जिन्हें हम आज एलियन संबोधन से जानने का प्रयास कर रहे हैं ! एलियन ऐसा ही पात्र है।    

बीते वर्षों में एलियन के पात्र के साथ सेलोलाइड पर रची गई मायावी रचना देखने वालों के लिए एलियन डरावना नहीं बल्कि मित्र समान बन गया। खास तौर से बच्चों के साथ फिल्माए एलियन पात्र के सीन लोगों में एलियन के प्रति लगाव का भाव जगाने वाले रहे। फिल्म थी कोई मिल गया। आज किसी के लिए एलियन नया शब्द नहीं है। भले ही किसी ने एलियन को देखा या नहीं देखा हो। एक और दुनिया भी है, वैज्ञानिकों की दुनिया। कितने ही  वैज्ञानिक हर बात, हर पात्र, हर चीज को अपने नजरिये से, विभिन्न पहलुओं से देखते और संभावनाएं तलाशते रहते हैं। एलियन के बारे में भी विज्ञान की दुनिया में शोध कार्य चलते रहे हैं। आम आदमी के मन में भी ऐसे अनजान किंतु समाज पर अपना प्रभाव डालने वाले पात्रों के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न होती है। ऐसे ही विचारो के साथ जब लोक कथाओं, पौराणिक कथाओं में कतिपय पात्रों की ओर ध्यान जाता है तो वे इस लोक के नहीं लगते। ऐसी कथाएं याद आ रही हैं जिनमें उड़न खटोले का जिक्र है। बोलने वाले जानवरों, उड़ने वाले मनुष्यों, पलभर में गायब हो जाने वाले पात्रों के कारनामों से भरी ऐसी कथाएं, लोक कथाएं प्राचीन काल में एलियन की संभावनाओं के नजरिये से सुनना, पढ़ना एक अलहदा रोमांच पैदा करती हैं। इस रोमांच में वह जिज्ञासा भी पैदा होती है, जो यह सोचने पर विवश करती है कि क्या ऐसा किसी दूसरे ग्रह के प्राणियों के माध्यम से संभव होता रहा ...। क्या तब दूसरे ग्रह के प्राणी इस धरा पर आते थे जिन्हें हम आज एलियन संबोधन से जानने का प्रयास कर रहे हैं ! ...

Saturday, May 11, 2013

रंगबिरंगी पतंगों से घिरा बीकानेर का आकाश


बीकानेर का आकाश रंगबिरंगी पतंगों से घिरा 

गुनगुनाता है जिसे हर शख्स वो एक गजल है मेरा नगर ...! चंदा महोत्सव का आनंद आज भी उतना ही आया जितना कि बीते सालों में । दो तीन दिन से तो बीकानेर का आकाश रंगबिरंगी पतंगों से घिरा दिखा और अच्छा भी लगा। यादें जो जुड़ी हुई है बीकानेर की पतंगबाजी से। लड़तों से। लड़तें यानी... पतंगों के पेच। यानी पतंग प्रतियोगिता। छह भून की लटाई पक्के डोर की और चार चार पांच पांच लटाइयां सादे डोर की। भूण या भून यानी करीब 900 मीटर की दूरी के धागे का नाप।
Mohan Thanvi 
सादुल स्कूल के आगे जेलवेल तक मांझा सूतने वालों की कतार। आज भी  मार्ग से निकलने पर ऐसा नजारा हुआ तो सुखद लगा। बीते दो तीन दिन तो शाम के समय आकाश में पतंगें  दिखी। आंधी बारिश भी आई और शनिवार का मौसम तो बल्ले बल्ले। किंतु वो समय भी याद आता है जब ऐसा माहौल और ऐसी पतंगबाजी आखातीज से महीना महीना पहले तक से दिखाई देने लगती थी। बीते दो तीन साल से महंगाई ने इस कदर अपना जाल बिछाया है कि आकाश से पतंगों का जाल खत्म - सा होता लगने लगा है।  सच कहूं । पतंगबाजी के लिए जुनून में वो बात नहीं दिखाई देती जो 21 वीं सदी के आगमन तक बरकरार थी।  बचपन से 55 तक के अपने सफर में पतंगबाजी का जुनून शहर में देखा किंतु आज जब आकाश को पतंगों के रंग में रंगा नहीं देख रहा तो ही महंगाई की ओर ध्यान गया है । बीकानेर में जन्मा और बमुश्किल पांच बार नगर स्थापना दिवस के मौके पर शहर से बाहर रहा। दो बार विदेश में तो दो बार जयपुर में । एक बार पंजाब में। जहां तक याद हैए खुद नहीं तो दोस्तों कोए पड़ोसियों को पचास  सौ रुपए से हजार दो हजार रुपए आखातीज पर पतंगों पर खर्चते देखता आया हूं मगर इस साल... बाजार पतंगों और लटाइयों से हर बार की तरह ही अटा हुआ लग रहा है किंतु... दुकानदार मायूस हैं। बिक्री उतनी नहीं हो रही कि रात रात भर दुकान खोल कर रखें और आखातीज के दिन वांछित पतंग या मांझा नहीं मिले। पिछले आठ दस साल से चाइनीज मांझे ने भी अपना जाल फैलाया किंतु इससे जो नुकसान सामने आया उससे लोग भी जागरूक हुए और चाइनीज मांझे का विरोध हुआ। इस बार विरोध के चलते यह मांझा आसानी से तो नहीं ही दिखाई दे रहा किंतु कतिपय लोग इससे पतंग उड़ा भी रहे हैं और कुछ लोगों के इस मांझे से चोटिल होने के समाचार भी अखबारों में पढ़े ही हैं। कागज धागा लटाई यानी चरखी आदि सभी चीजें तो महंगाई की वजह से आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जा रही है। कामना है, परंपरा निर्वहन में अग्रणी मेरा नगर महंगाई को भी धता बनाए।

गुनगुनाता है जिसे हर शख्स वो एक गजल है मेरा नगर

हरेक मकान की दीवारें साझा हर इंसान का है मेरा नगर

सींचकर खेत पसीने से खेजड़ी पीपल पूजता है मेरा नगर

गहराई से निकाल अमृत-जल प्यास बुझाता है मेरा नगर

Saturday, April 27, 2013

प्रलाप

प्रलाप 

 मित्र... अक्सर ख्वाबों में तुम्हें देखने की कोशिश की... कहां थे तुम ... जब नींद मुझे दुनिया से विलग करने का प्रयास करती थी... । अधखुली आंखों से मेरे होंठों पर प्रलाप होता था... तुम्हारे लिए। ... थे कहां तुम...। यूं मुझसे जुदा होने का सबब भी तो होना चाहिए तुम्हारे पास...। पहाड़ों के एक ओर ... जिधर सूर्य होता है.... रोशनी होती है। दूसरी ओर... जिधर रोशनी का इंतजार होता है... लोग होते भी हैं और मैं भी...। तब तुम उधर क्यों होते हो... जिधर रोशनी होती है। ओह... तुम्हें अब भी अंधेरा डराता है...। है न... मित्र । तुम्हें रोशनी पसंद है। सच कहूं... तुम बिन... मुझे भी डर लगता है...। अंधेरों से भी... और... रोशनी से भी। यही वजह है... मुझे रोशनी की बजाय... तुम्हारी जरूरत है.. मित्र।...

Tuesday, April 2, 2013

सुनहरा महल : कथा अंश

सुनहरा महल :  कथा अंश

अचानक सामने जो देखा, यकीन नहीं हुआ। तसव्वुर में जरूर ऐसे नजारे किए लेकिन सामने... यथार्थ में... आश्चर्य ! कैसे तो ख्वाब आया ओर कैसे ख्वाब में ये नजारा आया फिर कैसे सामने हकीकत में देख कर आंखें चुंधिया रही हैं...! स्वप्न...! जरूर स्वप्न ही है ! बाहं पर चिकोटी काटी... उई...! जागते का नजारा है ये तो! वाह...! वाह...! सामने सुनहरा महल। महल के इर्द गिर्द खजूर के लंबी परछाइयों वाले पेड़। लंबी परछाइयां... वक्त सुबह का है या संध्या का... जानने का कोई साधन पास में नहीं ! यकबयक मंदिर की घंटियां सुनाई दी... संध्या... नहीं... नहीं... अलसभोर...। नहीं... निश्चित रूप से संध्या का समय है। मन ने कहा, अलसभोर हो तो पेड़ों की परछाइयां नहीं होती... सूर्य चमकने के बाद ही तो परछाइयों को पांव पसारने का मौका मिलता है। जरूर संध्या का समय है। सूर्यास्त के बाद परछाइयां सिमट जाएंगी। अपने आप में। आस पास के लोगों की तरह। ये सुनहरा महल भी दिखाई देना बंद हो जाएगा। आंख से ओझल हो जाएगा सब कुछ। लेकिन ये महल... इसका तो फकत तसव्वुर ही किया था कभी... साक्षात सामने कैसे आ खड़ा हुआ। अभी असमंजस के सागर में गोते लगाता कि बिजली की तेज चमक के साथ ठंडी हवा का झोंका बालों को सहला गया। पल दो पल बीते न बीते... जोर से बादलों की गर्जना भी कानों में पड़ी। बरसात... हां बरसात आएगी... लेकिन ये महल... सुनहरा महल... ! ख्वाबों ख्यालों में देखा महल... ! ओह...! सर दर्द से फटा जा रहा है... ! शरीर थकान से अकड़ा हुआ लग रहा है। जरूर ये दो दिन की लंगी रेलयात्रा का परिणाम है। रेलयात्रा... चिहुंक कर गर्दन उठाई... ये क्या...!! अपने ही घर में अपने ही कमरे में हूं...। टीवी चैनल पर कोई सीरियल चल रहा है... उसीमें सुनहरा महल देख हैरान हूं...। नींद में हूं जागा जागा...हूं ! तभी खिड़की से बिजली की तेज चमक फिर दिखाई दी... बादल भी गरजे। ओह...! मौसम फिर पलट गया है... पश्चिमी विक्षोभ की वजह से बारिश हुई है। ( कथा अंश )

सुनहरा महल : कथा अंश

सुनहरा महल :  कथा अंश

अचानक सामने जो देखा, यकीन नहीं हुआ। तसव्वुर में जरूर ऐसे नजारे किए लेकिन सामने... यथार्थ में... आश्चर्य ! कैसे तो ख्वाब आया ओर कैसे ख्वाब में ये नजारा आया फिर कैसे सामने हकीकत में देख कर आंखें चुंधिया रही हैं...! स्वप्न...! जरूर स्वप्न ही है ! बाहं पर चिकोटी काटी... उई...! जागते का नजारा है ये तो! वाह...! वाह...! सामने सुनहरा महल। महल के इर्द गिर्द खजूर के लंबी परछाइयों वाले पेड़। लंबी परछाइयां... वक्त सुबह का है या संध्या का... जानने का कोई साधन पास में नहीं ! यकबयक मंदिर की घंटियां सुनाई दी... संध्या... नहीं... नहीं... अलसभोर...। नहीं... निश्चित रूप से संध्या का समय है। मन ने कहा, अलसभोर हो तो पेड़ों की परछाइयां नहीं होती... सूर्य चमकने के बाद ही तो परछाइयों को पांव पसारने का मौका मिलता है। जरूर संध्या का समय है। सूर्यास्त के बाद परछाइयां सिमट जाएंगी। अपने आप में। आस पास के लोगों की तरह। ये सुनहरा महल भी दिखाई देना बंद हो जाएगा। आंख से ओझल हो जाएगा सब कुछ। लेकिन ये महल... इसका तो फकत तसव्वुर ही किया था कभी... साक्षात सामने कैसे आ खड़ा हुआ। अभी असमंजस के सागर में गोते लगाता कि बिजली की तेज चमक के साथ ठंडी हवा का झोंका बालों को सहला गया। पल दो पल बीते न बीते... जोर से बादलों की गर्जना भी कानों में पड़ी। बरसात... हां बरसात आएगी... लेकिन ये महल... सुनहरा महल... ! ख्वाबों ख्यालों में देखा महल... ! ओह...! सर दर्द से फटा जा रहा है... ! शरीर थकान से अकड़ा हुआ लग रहा है। जरूर ये दो दिन की लंगी रेलयात्रा का परिणाम है। रेलयात्रा... चिहुंक कर गर्दन उठाई... ये क्या...!! अपने ही घर में अपने ही कमरे में हूं...। टीवी चैनल पर कोई सीरियल चल रहा है... उसीमें सुनहरा महल देख हैरान हूं...। नींद में हूं जागा जागा...हूं ! तभी खिड़की से बिजली की तेज चमक फिर दिखाई दी... बादल भी गरजे। ओह...! मौसम फिर पलट गया है... पश्चिमी विक्षोभ की वजह से बारिश हुई है। ( कथा अंश )

Saturday, March 16, 2013

किताब के खुले पन्ने...


किताब के खुले पन्ने...



किताब के खुले पन्ने
फड़फड़ाते पन्ने
कितनी कथाएं
कितने काव्य
कितने नाटक
अपने में सहेजे हुए हैं
इन्हीं पन्नों में कहीं
तुम्हारे संग
मेरा भी अक्स
उभर आता है
कभी कभी
जब
हवा थम जाती है
और
किताबों के पन्ने
गहरी खामोशी अख्तियार कर लेते हैं
तब
मेरे तुम्हारे अक्सों में
बहुतेरे और अक्स
गडमड हो जाते हैं
हवा को थामने वाला
फिर हवा चला नहीं पाता
चला पाता तो
कुछ कर पाता तो...
जरूर करता
पेड़ों को भंभोड़ता
पत्तों को अपनी सांसों से गति देता
ताकि
हवा चले
किताबों के पन्ने फड़फड़ाएं
अक्स
मुस्कराएं



Wednesday, March 13, 2013

बर्फ पिघल गई...


बर्फ   पिघल  गई...

धूप ने  दीवार  को  सहलाया  ...
उसे  मिली  राहत  ...
गौरैया  के  घोंसले  पे
जमी  बर्फ  भी  पिघल  गई  ...
मतवाली  हुई  हवा ...
आशा  के  गीत  गूंज  उठे
... दूर  हुआ  निराशा  का  साया ...!

Saturday, March 2, 2013

असबाब में असबाब, एक चंग एक रबाब
आपके सान्निध्य में मन की बातें खुद ब खुद कलम से कागज पर उतरने लगती है। बड़ों ने अपने अनुभवों के इशारों में सच ही कहा है, पुस्तक सदृश्य और कोई मित्र नहीं। इसी तर्ज पर पाठक भी उसी श्रेणी के मित्र हैं जिस श्रेणी में पुस्तक को मित्र माना गया है। मित्रों में दिल की बात तो जुबां पर आती ही है। यहां माध्यम कलम है। बात कागज पर उतरती है। कलाकार, कलमकार की पूंजी और होती ही क्या है ! असबाब में असबाब, एक चंग एक रबाब। बस। हमारा यही संसार है। यही दौलत। कलम। कागज। दवात। यूं चंग डफ सदृश्य मंजीरा लगा हुआ वाद्य होता है। रबाब ऐसा वाद्य होता है जो सारंगी जैसा लगता है। इस साजोसामान से कलाकार, साहित्यकार आपसे, पाठकों से मित्रता का दम भरता है। पाठक भी बखूबी मित्र धर्म निर्वहन करते हैं। संबल प्रदान करते हैं। दिल की बात कागज के माध्यम से पाठक मित्रों तक पहुंचाने की बेमिसाल बानगी हमारे सामने ही है। सूचना और जनसंपर्क विभाग से सेवानिवृत्त अधिकारी एवं संपादक श्री मनोहर चावला जी ने भी दिल की बातें यहां साझा की है। चार फरवरी 2013 के अंक में भी। उन्होंने पत्रकारिता और सेवा अवधि सहित अपने दाम्पत्य जीवन के सफल 44 से अधिक वर्षों में कदम कदम पर साथ निभाने वाली आदरणीय भाभी जी ( श्री चावला जी की धर्म पत्नी ) को वह सम्मान प्रदान किया है जिसकी वे हकदार हैं। बड़ों के यही आदर्श, ऐसी ही विनम्रता, असीम धैर्य ही तो युवा पीढ़ी को संस्कारित करते हैं। संस्कार ही हमारी असल संपत्ति है। परंपराएं वाहक। और हमारे बीकाणा की साहित्य-संस्कृति ने सदैव नव पल्लव पुष्पित किए हैं। परंपराओं से युवा पीढ़ी का मार्ग प्रशस्त किया है। नगर में पत्रकारिता का इतिहास भी गौरवशाली है। बीती सदी में एक समाचार के प्रकाशन मात्र से पत्रकारिता के क्षेत्र में हुक्मरानों की दखलअंदाजी का हवाला श्री चावला जी की कलम से मिला। तत्कालीन जिला कलेक्टर और प्रशासनिक अमले के जोर जबर संबंधी इस घटना की जानकारी युवा पीढ़ी समेत कई अनुभवी कलमकारों को भी पहले से हो, इसमें संशय है। संशय इसमें भी कि स्वतंत्रता संग्राम में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पत्रकारों की जानकारी भी दूसरी, तीसरी और चौथी पीढ़ी को है। क्योंकि किसी पाठ्यक्रम में भी शामिल नहीं है। इस विषय पर स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के अलावा शायद ही कभी चर्चा होती हो। हमारा असबाब में असबाब यही गौरवशाली इतिहास ही तो है। इसका संरक्षण हमारा दायित्व। असबाब कायम रहे। इसमें वृद्धि होती रहे। ऐसे प्रयासों के लिए अभिलेखागार की सराहना लाजिमी है। अभिलेखागार की ऐसी योजनाओं को अमलीजामा पहनाने के लिए निदेशक डा महेंद्र खड़गावत को साधुवाद।

पेड़ फिर शाखाहीन होने लगा है....


पेड़ फिर शाखाहीन होने लगा है....


देखते हैं चुपचाप हालात
.... पेड़ फिर शाखाहीन होने लगा है....

जिसे ठूंठ समझते हैं ...
बहते हैं उस कोटर के आंसू ...
देखते हैं चुपचाप हालात
.... पेड़ फिर शाखाहीन होने लगा है....
...
पत्ते तेज हवाओ से झड़ गए हैं ....
नभचरों ने बुन लिया है....
फिर दूर कही एक नीड़...
किसी हरे भरे बरगद क़ी...घनी
कौंपलों के बीच ....
चील कौंवो से बचने के लिए ...
वे भी साक्षी हैं ...
जानते हैं ....

देखते हैं चुपचाप हालात
.... पेड़ फिर शाखाहीन होने लगा है....

...
ठूंठ बनते जा रहे पेड़ के पास ...
तने से निकलते आंसुवो के सिवाय ...
कुछ नहीं बचा ...
आंसू भी निर्दयी लकड़हारा...
गोंद समझकर ले जा रहा है...
..देखते हैं चुपचाप हालात
.... पेड़ फिर शाखाहीन होने लगा है....

Friday, February 15, 2013

तस्वीर

Mohan Thanvi
Shri Alam Husain Sindhi 
 फोटोग्राफी आज मीडिया का प्रमुख अंग है। कहते हैं तस्वीर  टैक्स्ट न्यूज से भी अधिक प्रभावी होती है। मेरे मित्र श्री मनीष पारीक और श्री आलम हुसैन सिंधी
के खींचे हुए फोटो कई पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं। यहां मित्र श्री आलम हुसैन सिंधी और मेरा फोटो   ... ये हमने एक दूसरे के खींचे हैं...

Thursday, February 7, 2013

फिर से बचपन पा जाना...


फिर से बचपन पा जाना...

फिर से बचपन पा जाना...
होंठों पर टपकी
बरसात की बूंदों को
अपने में
समेट लेना
बादल
संग उड़कर
दामिनी संग
नृत्य करना
पंछियों के पंख
उधार
मांग कर
हवाओं का ऋण
चुकाना
कागज़ की नाव को
सड़क किनारे
उफनती सरिता की
लहरों पर छोड़ना
धोरों के बीच
*रेशम - सी लाल डोकरी*
खोजना
और
हथेली में
सहेज कर
स्कूल में
*धाक*
जमाना...
कितना अच्छा
लगता है / फिर से बचपन पा जाना...

Wednesday, February 6, 2013

दीर्घकालिक यात्रा को सूक्ष्म बना देने वाली शक्ति का अस्तित्व


 दीर्घकालिक यात्रा को सूक्ष्म बना देने वाली शक्ति का अस्तित्व 

अनचाहे, अनहोनी, अकस्मात आदि क्या है! ये भी कर्म से जुड़े हैं या माया का एक
रूप है...। अनचाहे ही सही, कर्मफल अवष्य मिलता है कथन को विचारते हैं तो फिर फल
की चिंता किए बिना कर्म करने के संदेष को किस रूप में ग्रणह करें...! इसे माया
कहें...! या... मंथन करें...! अनहोनी ही होगा जब किसी कर्म का फल नहीं मिलेगा।
यह भी सच है कि कर्म चाहे कितना ही सोच विचार कर किया जाए और फल मिलना भी चाहे
तय हो जैसा कि गणित में होता है, दो और दो चार और सीधा लिखने पर 22 तथा भाग
चिह्न के साथ लिखने पर भागफल एक मिलेगा ही लेकिन फिर भी अप्रत्याषित रूप से भी
कर्म-फल मिलते हैं। जीवन में ऐसे पल भी आते हैं जब किसी मुष्किल घड़ी में
अकस्मात ही कोई अनजान मददगार सामने आ खड़ा होता है। धर्म और अध्यात्म के नजरिये
से आस्थावान के लिए ऐसी अनचाहे, अकस्मात, अनहोनी ग्राह्य होती है और अच्छा होने
पर प्राणी खुष तथा वांछित न होने पर दुखी होता है। यह प्रवृत्ति है। विद्वजन
सुसंस्कार एवं भली प्रवृत्ति के लिए भगवत भजन का मार्ग श्रेष्ठ बताते हैं और यह
सही भी है। जिज्ञासा फिर यही कि भगवत भजन में रत रहकर स्वयं को प्रभु को
समर्पित करना है और इसे कहा जाता है तेरा तुझको अर्पण...। स्वयं को समझना,
जानना और प्रभु को अर्पित हो जाना। हालांकि विद्वजनों ने कर्म, प्रवृत्ति और
वांछित - अवांछित आदि प्रत्येक पहलू पर विस्तृत अध्ययन-मनन कर अपने अपने मत रखे
हैं जो अपने आप में अलग अलग परिस्थितियों में उचित प्रतीत होते हैं। यहां
मीमांसा या समीक्षा करना मकसद नहीं वरन् जिज्ञासा है, अध्यात्म, प्रबंधन, कर्म
और फल के प्रति। जिज्ञासा होना भी कर्मजनित हो सकता है। धार्मिक कार्यों को
क्रियान्विति देने वाले और व्यापारिक कार्य करने वाले मनुष्य की प्रवृत्ति सभी
विषयों में समान हो भी सकती है और नहीं भी। इसे पूर्व कर्मों या जन्मों में किए
कर्मों का असर या फल मिलना भी कह सकते हैं जो ईष्वरीय षक्ति के प्रबंधन के
सम्मुख न तो अनचाहे होता है, न ही यह अनहोनी है और न ही ऐसा अकस्मात ही होता
है। इसे प्रारब्ध से जोड़ कर देखता हूं तो पौराणिक काल से रामायण काल और फिर
महाभारत काल के बाद आज के आधुनिक काल तक की वैचारिक यात्रा पल के भी सूक्ष्मतम
भाग में सम्पन्न हो इस वक्त संपादित हो रहे कर्म - बिन्दू तक आ पहुंचती है।
इतनी दीर्घकालिक यात्रा को सूक्ष्म बना देने वाली षक्ति आखिर अपना अस्तित्व
कहीं तो प्रकट करेगी। पौराणिक काल से अब तक काल गणना को बहुत ही सूक्ष्म और
बहुत ही विषाल बिन्दू तक विद्वजनों ने समेटा है और ज्योतिष सहित विभिन्न
ग्रंथों में इसका उपयोग किया है। यहां उल्लेख आवष्यक है कि समय पबंधन के नजरिये
से ईष्वरीय षक्ति के प्रबंधन में ब्रह्माजी का एक दिन धरा के न जाने कितने
दिन-रात पूरे होने पर बीतता है। संख्यात्मक विवरण की नहीं बात है जिज्ञासा की
कि जिन ब्रह्माजी के एक दिन को विद्वजनों ने इतना विषाल बताया है उन्हीं
ब्रह्माजी और उनके समकालीन अथवा व्यतीत कालों के देवाधिदेवों संबंधी काल गणना
अथवा पौराणिक कथा-क्रम के बारे में अब तक भ्रम भी कायम है कि कितने वर्ष पूर्व
ऐसा हुआ होगा। यकायक ऐसी अनुभूति होने को चमत्कार नहीं बल्कि अज्ञानता की
श्रेणी में पाता हूं। अर्थात मेरी यह षब्द-यात्रा अज्ञानता को दूर करने के लिए
ज्ञान की ओर बढ़ने का उपक्रम मात्र है। ऐसा क्यों है...! क्या यह कर्म के लिए
प्रारब्ध के प्रबंधन के तहत है जो ईष्वरीय षक्ति संचालित कर रही है!!! हो सकता
है जिज्ञासा को सही रूप से व्यक्त भी न कर पा सका हूं, बल्कि ऐसा ही है तब भी
यह विचार प्रष्न की तरह घुमड़ता रहता है कि ब्रह्मा-विष्णु-महेष आदि ईष्वरीय
षक्तियों का प्रबंधन कितना व्यवस्थित और सुदृढ़ है। अध्यात्म के विभिन्न पक्षों
को जिस दृष्टि से देखता हूं गहराई तक केवल किसी एक ही पक्ष के भी किसी मात्र एक
ही बिन्दू को समझने में ही असंख्य योनियों की यात्रा हो जाती है लेकिन निष्कर्ष
से फिर भी वंचित रहता हूं। बावजूद इसके... अद्भुत अनुभूति जरूर होती
है...संतुष्टि और सुख की। यही कर्म है तो फिर इसके प्रबंधन के अनुसार ऐसा ही
विचारों को परिष्कृत कर देने वाला फल भी है लेकिन यात्रा जारी है और रहेगी...
क्योंकि यह अनंत यात्रा है।

मानता नहीं दिल । सच ।


मानता नहीं दिल । सच । 

सच । दिल दिल्ली पुस्तक मेले में है। हम अपने को वहां नहीं ले जा सके । गढ़ने को बहाने चार छह हैं । घर के काम । शादियों का मौसम । मौसम का पलटवार । ऑफिस से छुट्टी नहीं । आर्थिक समस्या । बस। काफी है । नहीं जा पाने के ये कारण । सच । ये भी सच । जाना ही होता तो वहीं होते। सच । क्योंकि । जो "हमकलम" दिल्ली पहुंचे उनके पास भी ज्यादा नहीं तो इतने कारण तो होते ही । सच । ये कि हममें वो ललक नहीं । जो उनमें है । सच । जिले-तहसील के तो दूर हम तो शहर के अनुष्ठानों से भी वंचित रह जाते हैं । सच । जबकि दुनियादारी के अधिकांश काम करने से हम चूकते नहीं । मानता नहीं दिल । सच । हम वहीं नहीं जा पाते जहां दिल मानता नहीं । दिल से प्रयास नहीं करते । फिर भी सच । नहीं जा पाने का मलाल तो होता ही है । पुस्तक मेले की सफलता के लिए दिल से शुभ मंगल कामनाएं । सच ।
*!""शुभ मँगल'"!*
*! .+""+.+""+. !*
*! +  HAPPY + !*
*! "+.       .+" "!*
*!      "+"        !*
       *Day!*
   .ॐशुभ मँगलॐ

Tuesday, February 5, 2013

इसे माया कहें...! या... मंथन करें...!!


इसे माया कहें...! या... मंथन करें...!!!

भीतर के द्वन्द्व और उमड़ते विचारों को षब्दाकार देना अज्ञान को दूर करने के लिए
ज्ञान की खोज में षब्दयात्रा है। यह भी कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भले ही हो
लेकिन विचारों से किसी को ठेस पहुंचती हो तो अग्रिम क्षमायाचना। हां, विद्वानों
का मार्गदर्षन मिल जाए तो जीवन सफल हो जाए।
भारतीय संस्कृति में जीवन की सफलता की खोज अध्यात्म के माध्यम से की जाती रही
है। अध्यात्म में भी कुषल प्रबंधन को  महसूस किया है तो इसके लिए कर्म
किया जाना भी अनिवार्य लगा है। अध्यात्म में कर्म है ज्ञान प्राप्ति का
प्रयास।  और जीवन की सफलता को फल कह सकते है।
जीवन प्रबंधन से ही व्यवस्थित और सुखमय हो सकता है। बिना प्रबंधन के तो चींटी
भी नहीं जीती। चींटी ही क्यों, प्रत्येक प्राणी को समूह में जीते ही हम देखते
हैं। ऐसा कोई प्राणी नहीं जो अकेला जीता हो या आज तक जीया हो। पेड़-पौधों को भी
समूह में लहलहाना अच्छा लगता है क्योंकि वे भी बीज रूप से प्रस्फुटित होने से
लेकर मुरझाने तक एक कुषल प्रबंधन प्रणाली से विकसित होते हैं, फल देते हैं।
जीवन का मकसद ही फल देना है। गीता का संदेष है, कर्म किए जाओ फल की इच्छा मत
करो... साथ ही यह भी कोई भी कर्म बिना फल का नहीं होता। जीवन का यही प्रबंधन
है। विचार भी कर्म है। अच्छा विचारने से अच्छे की प्राप्ति होती है। मैनेजमेंट
गुरु आज भी यही कहते हैं, सदियों पूर्व वेद-षास्त्र रचे जाने से पहले भी भारतीय
संस्कृति के महर्षि ऐसा ही कहते रहे हैं। मूलमं़त्र ही यह है तो फिर भले ही
दूसरे मंत्रों को रटते रहें, असर तो मूल को सिद्ध करने पर ही होगा। जिस प्रकार
मंत्र सिद्धि के लिए ज्योतिष-योग-षास्त्र बीज मंत्रोच्चार को प्रथम सोपान मानता
है उसी प्रकार अंक गणित, बीज गणित और रेखा गणित के भी मूल सिद्धांत हैं जिनके
अनुसार प्रष्न हल न करने पर जवाब गलत ही मिलता है। प्रबंधन में बीजाक्षर है
अनुषासन और आत्म विष्वास। हम जितना प्रयत्न करेंगे हमें उतना प्रतिफल मिलेगा।
एक खेत में एक बोरी बीज बोने से यदि दो सौ बोरी अनाज पैदा हो सकता है तो चार सौ
बोरी नहीं होगा और यह भी कि यदि अनुषासन से कृषि कार्य नहीं किया तो दो सौ बोरी
भी उत्पादन नहीं होगा, हो सकता है बिल्कुल ही न हो लेकिन यहां भी गीता का संदेष
याद आता है, कर्म किया है तो फल भी मिलेगा... यहां इस खेत के उदाहरण में वो फल
खरतपवार, घास-फूस भी हो सकता है। अनुषासन, परिश्रम, आत्म विष्वास के माध्यम से
लक्षित फल प्राप्ति में सफलता मिलती है लेकिन सवाल यह है कि कर्म किए जाओ फल की
इच्छा मत करो... संदेष का क्या मतलब हुआ...! यदि फल की इच्छा ही नहीं करेंगे तो
लक्षित फल प्राप्ति के लिए विचार करना भी गलत सिद्ध होता है। और यदि कर्मफल
अवष्य मिलता है कथन को विचारते हैं तो फिर फल की चिंता किए बिना कर्म करने के
संदेष को किस रूप में ग्रणह करें...! इसे माया कहें...! या... मंथन करें...!!!

Wednesday, January 30, 2013

कुछ बहुत, कुछ - कुछ; कुछ बहुत कुछ, बहुत - कुछ

कुछ बहुत कुछ कहते हैं... बहुत कुछ कुछ नहीं कहते...!!!...कुछ लोग कुछ विशेष 
कार्य न करके भी कुछ न कुछ खासियत जोड़ कर कुछ न कुछ अपने ही बारे में बहुत 
लोगो को  कुछ बताते रहते हैं !!!.. जबकि ... बहुत लोग बहुत कुछ उल्लेखनीय कार्य 
करने के बाद भी कुछ लोगो को भी कुछ नहीं बताते...!!! कुछ बहुत कुछ में से 
निकालने के लिए कुछ बहुत कुछ कुछ कार्य करते हैं...कुछ बहुत कुछ कार्य होते 
हुवे भी कुछ नहीं करते...

Tuesday, January 29, 2013

camel fastival :- बर्फानी ओढणी सूं बारै आ पूग्या मरुधरा रौ जहाज देखण नै


photo - Aalam Husain Sindhi BKN
photo - Aalam Husain Sindhi BKN

बर्फानी ओढणी सूं बारै आ पूग्या मरुधरा रौ जहाज देखण नै

बीकानेर।  अंतरराष्ट्रीय ऊंट उत्सव मांय राजस्थानी, खास
तौर सूं मरुनगरी रा लोक रंग मांय देश विदेश रै पावणां नै आपणोपण दिस्यौ।
लोकवाद्यों री ताण सुकून दिरायो। बाळू रा लहरदार धोरां माथै दिन भर
मुळकती धूप अ‘र  ठंडी टीर रात्यां मांय इनै सूं बिनै थिरकती चांदनी।
फेस्टीवल रौ आखिरी दिन स्टेडियम में परंपरागत रूप सूं सज्योड़ा धज्योड़ा
ऊंट। उमंग-उल्लास अ‘र उत्साह सूं गावंता नाचता लोक कलाकार। इण सब रौ
हिवड़ै तांईं खुशी भरियोड़ा आनंद सूं निहारता सैलानियों रा झुंड। रेत रै
इण समन्दर बिचाळै बस्योड़ो बीकाणे रौ ओ रूप ही तो सावन बीकानेर री
लोकोक्ति पछै अबै पूस री रात बीकानेर री नूवीं नकोर-उक्ति रच रैयो है।
मरुनगरी बीकानेर। राव बीकाजी रौ बीकाणो। अठै सावन मांय  प्रवासी तो पूगणा
तय ही है। अबै नूवां आयाम स्थापित कर रैया है देश विदेश रा सैलानी। सावन
नीं पण पूस री रात बितावणनै। हां जी। विगत मंे कुछ बरसां सूं अठै  पौष
मास में यानी जनवरी महीने में अंतरराष्ट्रीय ऊंट उत्सव (camel fastival)
मनायो जावै । चांदनी रात्यां में लाडेरा रा चिमकता धोरां अ‘र शहर रै
विशाल डा करणी सिंह स्टेडियम में तीन दिनां रौ ऊंट उत्सव मनाइजै। इण रै
ठोड़ लोकरंगा नै साकार होवता देखण रा शौकीन जवानां रौ वर्ग तो आकरसन में
बंध्यो इज है। विदेशी पर्यटक भी खूब पहुंचै।
बर्फ री चादर सूं ढक्योड़ी जमीन नै देखणिया विदेशी पर्यटकां नै अठे रेत
रै टीबां माथै भागता दौड़ता ऊंटां रा टोळा अ‘र उणारी कलाबाजियां सूं
भरयोड़ा करतब
देखणै रौ अनुभव रोमांचित तो करै इ है। ओ इ रोमांच लगोलग सालोसाल पर्यटकों
री गिणती बढ़ावण में सैयोग करै। फेस्टीवल मायं फगत ऊंटों रा टोळा इ नीं
पण मरु भूमि रै लोक जीवन रौ भी आकरसण है। विदेशी युवतियों खातिर पर्यटन
विभाग अबकी साल मिस मरवण होडाहोड राखी जिकी खास आकरसण रैयी।  26  जनवरी
2013 से 28 जनवरी 13 तांई रो तीन दिनां रौ केमल फेस्टीवल पैलीपोत रा दो
दिन कन्नै रै गांव लाडेरा रै धोरा माथै धमाल सूं मनायो गयो। आखिरी अंतिम
सोमवार नै स्टेडियम में लोक संगीत और परंपरागत पहरावे में कलाकारां री
रंगारंग प्रस्तुतियां सूं पर्यटक मंत्रमुग्ध होया। जय बीकाणा।

Monday, January 21, 2013

गढ़ों में गुमटियां ज्यों प्रहरियों की यारों

गढ़ों में गुमटियां
ज्यों प्रहरियों की यारों  
 जलसों में गुटबंदी  
त्यों  
रहबरों की यारों        
जख्मे जिगर कह रहे थे
शहर पनाह पे
चिल्ला के
नजराना शय ही ऐसी है
सनद रहे यारों 

हर दफतर में, नांगनि सां बिर भरियल आहिनि

हर दफतर में, नांगनि सां बिर भरियल आहिनि  *

पंध परे जा   *
** पुस्तक परिचय
शाइरु -             मुरली गोविंदाणी
प्रकाषक -     ेंग 34 आदिपुर 370205 कछ गुजरात
        टेलीफोन 0236 261150
संस्करण -        2012

पंध परे जा
असां कीअं सडायूं त सिंधी आहियूं / न असां खे मिलियो सिंधु देश जो टुकरो / न रहियो आ असां जो वेसु को हिकड़ो / असां त हर देश जा पांधी आहियूं /असां कीअं सडायूं त सिंधी आहियूं ।
इनि पंजकिड़े मंझ सिंधी समाज जो उवो सूरु साम्हूं अचे थो जेको विरहांङे बैद वधंदो इ रहियो आहे। तकरीबनि 66 वरिहयह अगु जेको सूरु दिल डुखाइंदो रहियो आहे उनिजो को इलाजु बि को हकीमु वैदु कोन करे सघंदो। सिंधी साहित्यकारनि इनि सूरु खे पहिंजे रचनाकर्म में साम्हूं आनियो आहे ऐं सिलसिलो 2012 में बि जारी रहियो। शाइरीअ जे करे जातलि सुञातलि नालो आहे मुरली गोविंदाणी। मुरली गोविंदाणी जो नवों किताबु पंध परे जा मंझ बारनि जीयूं भावनाउं बि खुली करे साम्हूं अचनि थियूं। इनिमें गीत आहिनि, बाल गीत बि आहिनि। आजाद कविता में शाइरु आधुनिक जमाने में थिंदड़ अप्राकृतिक गाल्हिनि ऐं हादसनि ते चिंता जाहिरु कंदे चवे थो - भगवान कडहिं / सोचियो बि न हूंदो /त बिना आदम ऐं हवा /को पैदा थी सघे थो /ऐं बिना काल को मरी सघे थो। इनि संग्रह में अगिते तन्हा बि आहिनि जहिमें अजु समाज खे चकु पाइंदड़ भ्रष्टाचार खे कविअ ईअं जाहिरु कयो आहे - हर दफतर में, नांगनि सां बिर भरियल आहिनि। जापान जी मशहूर विधा आहे हाइकू। कविअ पहिंजे इनि संग्रह में हाइकू सां बि पहिंजो प्रेमु जाहिरु कयो आहे ऐं वधंदड़ आविरजा जी चिंता बारनि सदके ईअं बुधाई अथाईं - कन मथां अछा वार /लिकी लिकी कारा कया / डिसी न वठनि बार। संग्रह नई टेहीअ लाइ बि चंङनि कविताउंनि सां भरियलि आहे। इनि में कतआ, पंजकिड़ा, तराईल बि दिल ते लगनि ता ऐं दोहा त बरोबरु हालात ते तब्सरो करण में कामयाबु आहिनि। इनिसां गडोगडु कबीर जा दोहा (साखियूं )बि संग्रह खे समूरो हिकई बैठक में पढ़ही पूरो करण लाइ पाण डे छिकनि था। सुठे ऐं समाज जी लाइब्रेरीनि में संग्रह करण लाइकु इनि किताब लाइ कवि मुरली गोविंदाणी खे साधुवाद। 
 - मोहन थानवी 

Sunday, January 20, 2013

तारीख भी क्या कमाल करती...रोशन राहों पे ला सजा देती है...

तारीख भी क्या कमाल करती है 

तारीख भी क्या कमाल करती है
चेहरे पे चेहरे लगा
औरों को
मोहरा बनाने वालों को
स्याह कोठरी से निकाल
रोशन राहों पे ला सजा देती है
तारीख भी क्या कमाल करती है
कैलेंडर के पन्नों में खुद बदल जाती
दुनिया में इतिहास बदल देती है
घंटे पहले डुबो देती सूरज
और छह घंटे बाद
फिर
सूरज उगा देती है
तारीख भी क्या कमाल करती है
चेहरे पे चेहरे लगा
औरों को मोहरा बनाने वालों को
स्याह कोठरी से निकाल
रोशन राहों पे ला सजा देती है

Friday, January 18, 2013

हजार हवेलियों का शहर के रचनाकार श्री उपध्यानचंद्र कोचर

Shri U C Kochar - Bikaner Raj.                                                                                                                                                                                                                                                                                                                            कविता संग्रह मैं और मेरी कविता **            

मैं उसे रोक नहीं सकता
गलत रास्ते पर जाने से
वह इक्कीस साल का हो चुका है
कहेगा कि आपका रास्ता गलत है
मैं तो न समय
को समझ पाया हूं
न उसको
बुढ़ापे में सचमुच
मति भ्रमित हो जाती है ।

बीकानेर में हजार हवेलियों का शहर पुस्तक के रचनाकार और पर्यटन लेखक संघ के अध्यक्ष एडवाकेट श्री उपध्यानचंद्र कोचर की लेखनी से सभी परिचित हैं। श्री कोचर युवावस्था से ही नामचीन कवियों और अपने अपने क्षेत्र के विख्यात शख्सियतों का सान्निध्य प्राप्त करने वाले रहे हैं और इसका जिक्र उन्होंने अपने स़ प्रकाशित और लोकार्पित पहले कविता संग्रह मैं और मेरी कविता में किया भी है।  80 वर्षी श्री कोचर ने दुनियादारी के बहुत से उतार चढ़ाव देखे हैं। उनकी कविताओं में अनुभव के इशारे तो हैं ही, समाज को अपने नजरिये से देखने के साथ साथ समाज का व्यक्ति को देखने का दृष्टिकोण भी सामने आता है।
श्री कोचर के कविता संग्रह के पेज 27 पर छपी कविता का सिंधी अनुवाद भाई राजकुमार थानवी ने समारोह में वाचन किया था। समारोह में श्री कोचर की कविताओं का बंगाली, उर्दू, अंग्रेजी, पंजाबी आदि कुल आठ भाषाओं में अनुवाद वाचन हुआ था। यहां सिंधी अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूं।
युवा वर्ग के चहेते श्री कोचर ने मेरे पहले सिंधी उपन्यास करतार सिंह का लोकार्पण 2005 में किया था और इसके कथानक बुना हुआ जवाहर कला केंद्र से पुरस्कृत नाटक अपना अपना नाम करतार सिंह का मंचन उन्हीं के हैरिटेज होटल मरुधर के विनायक सभागार में 2008 में मेरे पूर्णावधि नाटक पुस्तक कोलाहल से दूर के लोकार्पण समारोह में सुरेश हिंदुस्तानी के निर्देशन में किया गया था। वह अवसर उपलब्ध कराया था वरिष्ठ रंगकर्मी और संपादक श्री मधु आचार्य आशावादी ने। समारोह भाई हरीश बी शर्मा के संचालन में हुआ था। प्रसन्नता की बात यह है कि (14 Jan 2013) श्री कोचर के पुस्तक लोकार्पण समारोह में राजस्थान संगीत नाटक अकादमी का सदस्य मनोनीत होने पर श्री मधु आचार्य आशावादी सहित अन्य अकादमी सदस्यों का सम्मान भी सारे शहर ने किया।
* ( श्री उपध्यानचंद्र कोचर जी कविता जो अनुवाद उननि जे कविता संग्रह मैं और मेरी कविता मंझु । संग्रह जो लोकार्पण 14 जनवरी 2013 शाम जो थिओ जहिं जलसे में इनि कविता जो अनुवाद वाचन राजकुमार थानवी कयो। संग्रह मूं कुल अठनि कविताउंनि जो अनुवाद जुदा जुदा भाषाउंनि में बीकानेर जे कवि गणनि कयो हुओ। )

मां उनिखे झलण में नाकामु आह्यां
खोटे दग ते वंञी रह्यो आहे
हू इकवीहें जो थी चुक्यो आहे
इकवीहें जो
चवंदो, तव्हां जो दगु खोटो आहे
मां, न त वक्ति खे समझी सघयुसि
न उनिखे
बुढापे मंझु सचपचु
मति मारिजी वेई आहे
बुद्धि अमंूझजी वई आहे।   
                             ( translater - राज कुमार थानवी )
                                    

Tuesday, January 15, 2013

ये प्यास है ही बड़ी ... आब की बात है प्यास की बात है

प्यास
प्रेम की हो
या
सूखे कंठ की

ऋतु हो सर्द

या

बासंतिक चले हवा

ऋतु हो परिवर्तन दौर में

या

हिम सा ठंडा हो प्रांगण

चलती जब हवा गर्म

इसी प्यास के  बहाने

पिघलते हिमालय के दहाने

ये प्यास है ही बड़ी ...

आब की बात है

प्यास की बात है

Monday, January 14, 2013

When life does not find a singer... उथो जागो त पहिंजी इन्हींअ सिंधु खे ठाह्यूं


  • When life does not find a singer to sing her heart, she produces a philosopher to speak her mind.          –KHALIL GIBRAN (1883-1931) 
  • नई टेहीअ खे बि सिंधु संस्कृति ऐं सिंधीयत जी अहमियत जी जाण बखूबी आहे ऐं हिमथायो व´े त कहिं शक जी गाल्हि कोन आहे कि अचण वारे वक्ति में सिंधु संस्कृति जी जोत दुनिया जी कुंड कुड़झ में वरी उवांई भभके जीअं हजार वरियह अगु चिमकंदी हुई। उथो जागो त पहिंजी इन्हींअ सिंधु खे ठाह्यूं ... उथो जागो त-
    उथो जागो त पहिंजी इन्हींअ सिंधु खे ठाह्यूं
    अजमेर इन्दौर न उल्हास नगर
    हिन्द सजी सिंधु समझयूं असां सभई भाउर
    विकणी सभु बुराइयूं पहिज्यूं, चंङाई ठाह्यूं
    सच्चा व्यापारी चवायूं सिंधी
    हिन्दु जी कुण्ड-कुड़छ में जोति जगायूं सिंधी
    उथो जागो त पहिंजी इन्हींअ सिंधु खे ठाह्यूं
    जेका विसामिजण ते आहे
    सिंधियतजी उवाई वडी जोति भभिकायूं
    पहिंजे बारनि जे- जीवन खेत में खोटयूं
    कर्म जो दरिया
    वाह्यूं पसीनो थे खीरु मिठ्ठो
    खारायूं पहिंजे बारनि खे
    व्यापार जो गुण साणु पहिंजियूं रितियूं
    उथो जागो त पहिंजी इन्हींअ सिंधु खे ठाह्यूं 

Friday, January 11, 2013

सुपने जी हत्या मंझ रंगकर्म जी खुशी

सुपने जी हत्या मंझ रंगकर्म जी खुशी

पुस्तक परिचयनाटक -     

हत्या हिक सुपने जी ( Besed on Cross purposes – Albert Camus )

लेखक -     हरिकांत जेठवानी
प्रकाषक -     सुनील जेठवानी,
        राजकोट 360007
        संस्करण 2012

सुपने जी हत्या मंझ रंगकर्म जी खुषी
सिंधी साहित्य जगत मंझ हरिकांत न सिर्फ नाटकनि लाइ बल्कि सिंधु समाज, साहित्य धारा ऐं आखाणी जे संपादन जे करे हमेषह याद रहिण वारो नालो आहे। पहिंजी लंबी हिंदी कविता एक टुकड़ा आकाष समेत हरिकांत हिंदी साहित्य संसार जो बि जातलि सुञातलि लेखक आहे। कविता में नवाचार ऐं पहिंजी कहाणिनि में समाज जी नुमाइंदी कंदड़ चरित्रनि खे बुलंद सिंधी जुबान डिअण वारे हरिकांत जेठवानी जो नवों नाटक हत्या हिक सुपने जी इनि साल 2012 मंझ साया थी आयो आहे। अल्जेरियन-फ्रेंच राइटर अल्बर्ट कैमस ( 1913-1960 ) जी दुनिया भर में चर्चित रचना क्रॉस प्रपोजेज जो उल्थौ कयलि इयो नाटक टाइटल सां भलेषकु हत्या हिक सुपने जी जाहिरु करे थो लेकिन सही माइननि मंझ सिंधी रंगकर्म जे जुझारू रंगकर्मिनि वास्ते इनि नाटक मंझ खुषीयूंनि जो दरियाह वही रह्यो आहे। पंञनि पात्रनि वारे इनि नाटक खे पढ़हंदे वक्ति पाठक जी अखियूंनि अगियूं हरेक सीन जी सनीअ में सनी हिक हिक षइ अची थी वंञें। आधुनिक नाटक लेखन में लेखक निर्देषक खे हिदायतूं डई उनिजे आजाद नजरिये खे कैद कोन कंदा आहिनि ऐं हरिकांत जी ईआ खासियत 1965 में साम्हूं आइलि इनि नाटक जे 21 सदीअ जे बें डहाके जी षुरूआत में साया थिअलि उल्थै में साफतौर सां जाहिरु थी रही आहे। सिंधी भाषा साहित्य में अंतरराष्ट्रीय सतहं ते मषहूरीअ जी पताका फहराइण वारे इनि नाटक जो साया थिअण रंगकर्म में तपस्या कंदड़ अजु जी टेहीअ लाइ वरदानु समान मंञणु गलत न थिंदो छा काण जो लंदन थिएटर समेत इनिजो मंचन तमामु मुल्कनि में कयो ऐं सराहिजी चुक्यो आहे। सिंधी रंगमंच जे अजु जे हालात खे ध्यान में रखी इनि नाटक में संभावनाउंनि जो दरियाह वहिंदो नजर अचे थो। कुल जमा टिनि सीननि वारे इनि नाटक जा पात्र पहिंजे अभिनय ऐं डायलॉग प्रजेंटेषन सां समाजी ऐं दुनियावी झंझावात सहूलाइति सां दर्षकनि तोणी पहुंचाइनि था। सठि साल जीमाउ समेत नाटक जा पात्र नौकर, षारदा, चेतन ऐं सावित्री पहिंजे संवाद ऐं भावनाउंनि जे प्रदर्षन सां दर्षकनि खे षुरूआत में इ बधी था वठनि ऐं नाटक पूरो थिंदे थिंदे ऐतिरियूं उलझनूं, समस्याउं, द्वन्द्व ऐं समाज जी नुमाइंदगी कंदड़ केतरनि इ चरित्रनि जा मुखौटा जाहिरु थिंदा था वञनि। 76 सुफनि वारे इनि नाटक में आषा-निराषा में तरंदड़ - बुडंदड़ पात्रनि जा सुपना हालात जी तरवारु जी धार जी भेंट चढ़हनि था या किन्हनि पात्रनि जी सकारात्मक सोच खटी थी वंञे इनि मिस्ट्रीय खां जुदा नाटक वाचंदड़ पाठक खे सिंधी रंगकर्म में इनि रचना जे मार्फतु संभावनाउंनि जा द्वार खुलंदा जरूर नजरनि था। मूल भावना खे कायम रखंदे नाटक जी आत्मा खे सिंधी भाषा जो वगो पाराइण हरिकांत जी लेखनीअ जो इ कमु थी सघंदो आहे।  ईआ खासियत इ हरिकांत जे इनि नाटक खे खास अहमियत वारो साबित करे थी। नाटक खे पुस्तक रूप में पाठकनि तोणी पहुंचाइण जोे कमु करण लाइ लेखक हरिकांत, प्रकाषक सुनील जेठवानी, कवर डिजाइनर मेहरवान ममतानी ऐं कॉपी राइट रखदंड़ श्रीमती राधा जेठवानी खे साधुवाद। - मोहन थानवी
 

Monday, January 7, 2013

कार्य फल तय है, जय हो

अनचाहे किया जाने वाला कोई काम पूर्णता को प्राप्त नहीं हो सकता। कोई न कोई कसर रह ही जाती है। हां, शनै शनै कार्य का आनंद आने पर यदि कर्ता अनचाहे शुरू किए गए कार्य से दिल लगा लेता है तो उसे शिखर छूने का अवसर भी मिल जाता है। महापुरुषों से संबंधित बहुत से ऐसे उदाहरण हम आप गाहेबगाहे पढ़ चुके हैं। ख्याति-सीमा के मध्यनजर भी बहुत सी शख्सियतों के ऐसे वक्तव्य पत्र पत्रिकाओं में पढ़ने को मिल जाते हैं। इसीलिए अनुभवी, ज्ञानी, बुजुग कहते हैं कि काम कोई भी हो, मन लगा कर, आनंद लेकर, काम को पूजा मान कर करने वाले को सफल होने से कोई रोक नहीं सकता। अनचाहे, अनमना हो कर कोई काम शुरू कर ही दिया हो तो उसे अभी से आनंदित होकर कीजिए। काम अनचाहा नहीं रहेगा, आप भी स्वयं को अनमना नहीं पाएंगे। तय है। जय हो।

Saturday, January 5, 2013

भीड़ में तनहा यात्रिक


भीड़ में तनहा यात्रिक

खो गया है आदमी
भीड़ में
तनहा हो गया है आदमी
यात्रिक है मगर सोया हुआ है आदमी
यात्रा के हर पड़ाव पर
अपने आपको ढूंढ़ता है आदमी

Friday, January 4, 2013

किस्सा-ए-प्रस्तर उद्धारक

किस्सा-ए-प्रस्तर उद्धारक

‘लंबी कविता’
अक्सर तुम्हारा चेहरा आईने में देखता हूं
मक्कारी से भरा कुटिल मुस्कान वाला शख्स मैं तो नहीं
आईना झूठ नहीं बोलता किसी भी घर में लगा हो
तुम्हारे घर शायद कोई आईना नहीं वरना मेरी शक्ल देख लेते
अब भूल जाओ अपने पापों को प्रस्तर बनने के शापित हो तुम
प्रस्तर उद्धारकों को तो पूजा जाता है, हे पापी इसे भूलना नहीं
द्रोणाचार्य मांगते हैं आज भी मगर एकलव्य देते नहीं दिखाते हैं अंगूठा
दधिचि अब ढूंढे़ नहीं मिलते मगर बस्तियों में लगे हैं हड््िडयों के ढेर
अक्सर ऐसे ढेर पर बिखरा-बिखरा तुम्हारा चेहरा देखता हूं
खाल विहीन रक्त-पिपासु इस दुनिया में कोई दूसरा तो है नहीं    
याद रखो भूलो मत हरिष्चद्र की संतान कोई जीवित नहीं
आघात बड़ा है कफन न होने का, वक्त जाता है ठाठ-वैभव को चाट
संवाद तंत्र पंचतंत्र से सीख और साध हित हितोपदेष से
अतीत के अंधे-सागर में लगा डुबकी पुराण सुना और बटोर दक्षिणा
प्रस्तर उद्धारकों के ही प्रस्तर पूज और पापियों को बदल डाल प्रस्तरों में
खड़ा कर दो चौराहों पर नगर-रखवालों को, खाली करवा दो नगर
अक्सर तुम्हारे जैसे चेहरे वालों को नगर में घूमते देखता हूं
बाणभट्ट तो एक हुआ मगर किस्से आज भी अधूरे हैं बेषुमार
दिन व्यतीत करते हो रात के इंतजार में फिर डूब जाना अंधेरे में
सड़कों के बीच और किनारे चमकते प्रस्तरों से ज्ञात करना राह
यूं ही गुजार देना युग मगर चेहरा न बदलना मुखौटा लगाकर
चेहरा तुम्हारा है इतना लावा उगलता कि मुखौटा पिघल जाएगा
छिप न सकेगा रावण अगर छिपकर राम बनना चाहेगा
षहरभर में तुम्हारा चेहरा घर-घर से निकलता देखता हूं रोज
पसीने से लथपथ कंधे पर थैला दायित्वों के बोझ से होता है भरा
एक चरित्र हो तो नायक बन खलनायक को दे हर रात षिकस्त
कितने ही चरित्र समाज में पापों के हर सुबह उनींदे और दिखते हैं पस्त
अक्सर ऐसे में दिख जाता है फिर तुम्हारा चेहरा बंसरी बजाता
अधरों से प्रस्फुटित होते हैं षब्द ‘आर्तनाद’ गूंजता है दबा-दबा
फिर दिन बीता उमस भरा
कहानी रचते रहे लोग
रात यूं ही गुजर जाएगी 
सुबह होते ही नये पात्र करेंगे
सूरज का स्वागत ऐसे ही
कथा-नायक पूज-पूज कर
उमसभरे दिन छोटे करने के लिए
प्रस्तरों में बदल-बदलकर प्रस्तर-उद्धारकों को
किस्सा-ए-प्रस्तर उद्धारक का अंत कभी होगा नहीं
हर बार सामने आएगा तुम्हारा चेहरा आईने में
जब भी जी चाहे देखेंगे लोग अपने गिरहबान में झांककर
कुछ तारीखें प्रस्तर बन जाएंगी कुछ बह जाएंगी समय-धार में
आतंक के साये गहरायेंगे प्रतोद1 हो न सकेगा निरंकुष पर
प्रतिहंता2 खुद घोटेगा ग्रीवा प्रजा की बैठ खूनी तख्त पर
कहलाएगा फिर भी उद्धारक वह जो प्रस्तरों को तैरायेगा
तरा दे तू, उठ चल साथ मेरे धुआं उगलते मरघट पर
सुन किस्सा उस तपस्वी3 का ए जमाने रो न देना जार-जार
जिसका उद्धार उसकी मां ने किया गुरु से बढ़कर है मां कहकर
चित्र-लिखित हो संसार से भागे फिरते, गुरु क्या भगवान से मिलाएगा
अपनी सहधर्मिणी को भी स्वर्ग की चाह में तजने वाले
अक्सर तुम्हारा चेहरा अपने चेहरे पर महसूस करता हूं
तुम भले हो दस्यु मगर मैं नहीं तुम्हारे दस्युदल में षामिल  
मारकाट से तुम्हें मिलता होगा जीवन, रक्त-पिपासु हो तुम मैं नहीं
प्रभावती4 को भूलने वाले, मां को गुरु से बढ़कर मान, थाम हाथ संगिनी का
सूर्यपत्नी है प्रभावती तो षिव के एक गण की वीणा-सी झंकार भी है
मत भूल संसार में अंग-देष5 भी है एक और राजा-चित्ररथ6 की रानी है प्रभावती
प्रस्तर-चित्र बनना है अगर तो सूर्य-चित्र का प्रत्यंकन7 कर जीवन में
चित्र-मंडित हो मूक रहे जो वह मेरा जीवन नहीं, जीने की कला का प्रत्यंकन होता नही
बंदूकों के साये और बमों के धमाके में खुलते नहीं फाटक सुख-महल8 के
बंद फाटकों में तो रंभाते हैं गोवंष भी, पीड़ा व्यक्त कर पाते नहीं
अजगर लिपटा रहता है चंदन से जो महकता है
फूत्कार जहरीली फिर भी अजगर की, उसकी वृत्ति बनी रहेगी
हंतक खुषियों के तुमसे और क्या आषाएं रख सकता है जमाना
अजगर के फूत्कार से भी तप्त वायु और क्या होगा तेरी सांसों के सिवाय
प्रस्तर फिर भी पिघल सकता नहीं, ज्वालामुखी का लावा चाहिये
उद्धारक आयेगा जरूर बदलकर चेहरा तुम्हारा या कि मेरा
अक्सर प्रस्तर-उद्धारक का किस्सा याद दिला देता है चेहरा तुम्हारा
अधरों की प्रत्यंचा पर स्मित जीवन-स्वर प्रस्फुटित होता है
सच, ‘सारसों की क्रेंकार’9 घुंघरुओं की मधुर ध्वनि तो नहीं
हां, नीरव वनांचल में जल और जीवन होने का विष्वास तो है
अतिथि बन पहुंचा हूं इस ‘बन’ में पसरा है जहां तुम्हारा चेहरा
‘चार भांज का पत्र’1॰ है मालिक का लिखा तुम्हारे नाम
जानते ही हो ऐसा पत्र अधीनस्थों को संबोधित होता है
ताम्बूल वीटक11 की आस नहीं तुमसे स्वागत में मुस्कान चाहिये
अक्सर मुस्कराहट गमगमा देती है निस्तेज तुम्हारा चेहरा
जीवन की अतिथिषाला का फाटक है मुस्कान उसी की दरकार है
पंचभंजी पत्रिका12 लिख दो अपने पापों के प्रायष्चित में
प्रस्तर उद्धारक से मित्रता स्थापित करने का साधन मुस्कान है
अरे हर्ष-भंजक नहीं जानते तुम अपने कर्मों से जीवन-खंडित करने पर तुले हो
यह कोई समाज-सुधार या मातृभूमि की स्वतंत्रता संग्राम की बेला नहीं
जन्म-जन्मान्तर के बंधन से मोक्ष का काल उपस्थित है हर्षो जरा
किंकर्तव्यमूढ़ से निहारते रहोगे तो विकृत ही होता जायेगा तुम्हारा चेहरा
कंकण-वलय13 तुम्हारे कर-कमलों में षोभित नहीं, ये तो नारी का शृंगार है
उठो और परषुराम-प्रतिरूप उपस्थित हो रणभूमि की पुकार है
अरे सिंह-नादी बड़ा कायर है रे तेरा मन, भीड़ में अकेला बेचारा
आतंकी तू अपने स्वार्थ की खातिर नरसंहार को आतुर
नीरवता में ही नहीं भरी बस्ती में भी नितांत अकेला चेहरा तुम्हारा
आततायी के हिमायती दुंदुभियों का वादक बन डराता है
कायर इतना कि गली में कुत्तों को रोते सुन तेरा कलेजा कांप जाता है
जिसके अंक में पला-बढ़ा उसी मातृभूमि पर दानव तू रक्त बहाता है
अक्सर ऐसा एक तुम्हारा चेहरा प्रस्तर उद्धारक के आगे झुक जाता है
आं... वह चेहरा आईने में आंसुओं से भीगा भी देखता हूं
तुम्हारे घर कोई आईना नहीं वरना मुझे रोता हुआ देख लेते
मानवता को दानवता के षिकंजे से छुड़ाने का संकल्प कर लेते
आंक14 ले जीवन में मृत्यु के षाष्वत सत्य को प्रस्तर मत बना
आंसुओं को व्यर्थ मत बहा, मन की कालिख घोल और इंक बना ले
रच ले एक इंग-इतिहास15 और प्रस्तरों में अहिल्या के प्राण फूंक
प्रस्तर उद्धारकों का ऐसा ही कृत्य रावण के अट्टहास को दबायेगा
अहिल्या बनी प्रजा में आत्म-ज्योति प्रज्वलित कर फिर तू इतरायेगा
ईंखन16 करना सावन के झूलों पर, उंकुण17 की भांति खून चूसने को भूल जा
ऊंघता है मानव सिर्फ जड़ वृक्ष हमेषा जागता अक्सर देखता हूं
घिरी है हमारी ईद-होली-दिवाली आतंकी ऋंजनान18 एक से
क्रिसमस पर समृद्धि की ऐषणाएं19 भी हमारी कम नहीं जानते हो
प्रस्तरों के ओझर2॰ नहीं होता और उद्धारकों का ओझर-ओसार21 समान
औदार्यता22 बढ़ती गई पेड़ों की औझड़23 उद्धारक बढ़े और प्रस्तर बुतों में बदले
भीग रहे हैं चौराहों पर पावस में और झुलसते मई-जून में बिता रहे जून
ऐसे उद्धारकों के मानव-हित के किस्से अब यूं ही बस सुनाये जाते रहेंगे
आतंक के साये में इनके हाथ-पांव टोपी चष्मा खंडित करने को उठेंगे हाथ
अक्सर ऐसे वाकिओं पर हंसता दिख जाता है भीड़ में चेहरा तुम्हारा
संषय यह कि कहीं तुम्हारा चेहरा मेरा तो नहीं आईने में दिखता
तुममें और मुझमें यही तो सेतु है, जैसा तुम्हारा वैसा ही है मेरा चेहरा
दोनों प्रस्तर उद्धारकों के पुजारी और प्राणवानों के षत्रु तो कदापि नहीं
दिषा-वास्तु, नक्षत्र-मुहूर्त और मंत्र-ऋचाओं से प्रतिष्ठित देव हैं
सुर-असुर हमारी पुराण कथाओं-से हम नायक-खलनायक मरे नहीं
सेतु-दर-सेतु पार करने को समन्दर अपने-अपने गढ़ते हैं प्रस्तर
जीवन नैया पार लगाने को रहते आतुर नहीं जानते मंझधार अपार है
मुखौटों मंे छिपाये स्वयं को कंस और रावण देखो जिधर उस ओर है
कसमसा कर रह जाते ऐसे व्यक्तित्व भी कदम-कदम पर दिख जाते
प्रस्तर उद्धारक बनने को लालायित उनमें एक षामिल है तुम्हारा चेहरा
मंदिर-मस्जिद-चर्च-गुरुद्वारों से अक्सर दूर नहीं दिखता देव-रूप
प्रस्तरों की आत्मा को भी सिहराता मगर विभत्स-आतंकी तुम्हारा चेहरा
जीवन को जीना नहीं सीखा रे तुमने मिटाना ही जानते हो
इतराओ मत मानवता के दुष्मन नीरव नहीं षूरवीरों से मेरा षहर
यहां दधिचि भी मौन उत्सर्ग को तत्पर सुन आतंकी है तू बेसहारा
ईद-दिवाली साथ मनायेंगे, है यह इस भारत-भूमि की परम्परा
डरा नहीं सकता तू मानवता को क्रूर, उत्तेजित है मेरा चेहरा
मानुष है इस कारण भ्रमित रहा लेकिन मेरे जैसा नहीं तुम्हारा चेहरा
सप्त-द्वीपों पर मुस्करा रहा देख मेरा चेहरा प्रस्तरों को तराष कर
पाप और पुण्य में जो अंतर वही तुझ और मुझमें है
मैं मानव मानवता का पुजारी, तू विधर्मी प्रस्तरांे में कैद है
भ्रम में थे जो अब तक तू ब्रह्मा की रचना मानवों को डराता रहा
जान गया है अब हर मानव तेरी करतूतें, हममें अब छिप न सकेगा तू
अक्सर तुम्हारा चेहरा आईने में देखता हूं
मक्कारी से भरा कुटिल मुस्कान वाला शख्स मैं तो नहीं
*****-अंकुष, 2-रोकने वाला, 3- डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के उपन्यास बाणभट्ट का एक पात्र, जो अपनी मां और पत्नी को छोड़कर संन्यासी बनने चला गया और अंतराल के बाद संयोगवष मिलन होने पर मां को पहचानने के बाद भी मां कहने से कतराने लगा, परिस्थितिवष मरणासन्न मां की इच्छा पूरी करने तथा आज्ञा मानने के लिए भी गुरु की आज्ञा ले आने को उद्यत हुआ तब मां ने उसे गुरु और मां की महत्ता बताई, 4-प्रभावषाली/मां, 5-काया, 6-वाणी/जीवन/मन, 7-प्रतिलिपि/नकल, 8-वर्ल्ड ट्रेड सेंटर, 9-सफेदपोष लोगों की भ्रमित करने वाली बातें, 10-अधीनस्थों को लिखा जाने वाला पत्र, संदर्भ डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी-बाणभट्ट की आत्मकथा, 11-पान, 12-मित्रता स्थापित करने के लिए लिखा जाने वाला पत्र, 13-चूड़ियां, 14-निष्चय, 15-आष्चर्यजनक, 16- झूलना, 17-खटमल, 18-बादल, 19-इच्छाएं/चाहनाएं, 20-पेट, 21-बारामदे-सा पेट, 22-उदारता, 23-निरंतर
- मोहन थानवी

Wednesday, January 2, 2013

अट्टू-पट्टू की उधारी


अट्टू-पट्टू की उधारी 

 (हास्य  -- सिन्धी से अनुवादित) --- (अरबी सिन्धी मे ये
श्रंखला हिन्दू डेली अजमेर से २०१० में पब्लिश  हो चुकी है  ).................................
बीमारी की बदकिस्मती। बरसात के मौसम में वह अट्टू को जा लगी। बदन दर्द, सर्दी,
खांसी, जुकाम हां भाई हां ये सब।
मौसम को कोसते हुए अट्टू साहिब ने दो दिन में तीन डॉक्टर बदल लिये। इन
बीमारियों में से एक भी कम नहीं हुई बल्कि थकान की बीमारी और बढ़ गई। चाइनाराम
सिन्धी हलवाई की सिन्धी मिठाई सिन्धी हलवा के टीन के एक डिब्बे में अट्टू साहिब
ने ठूंस ठूंस कर टेबलेट्स की स्ट्रिप्स रखी। साथ में इनव्हेलर, बाम और एक
थर्मामीटर भी सहेजा। चार दिन बाद तो उन्हंे आफिस से भी फोन आने लगे - आफिस आ
जाओ भैया वरना विदाउट पे माने जाओगे। अट्टू साहिब भला ऐसा कैसे होने देते, सो
पांचवें दिन जा पहुंचे आफिस।
पिऑन से लेकर बड़े साहब तक सबसे पहले उन्होंने ‘जय हो’ से दुआ-सलाम की। फिर अपनी
सीट पर बैठे तो पूछापाछी के लिए साथियों ने तांता लगा दिया। चार दिन में अलग
अलग डॉक्टरों का अनुभव लेने वाले अट्टू साहिब भला ऐसा मौका कैसे चूक सकते थे।
सो वे अपनी बीमारी को भूल गए। खांसी-जुकाम, सिरदर्द यूं भी स्वाभाविक रूप से
चार-पांच दिन बाद आदमी का पीछा छोड़ देते हैं।ऐसा ही अट्टू साहब के साथ हुआ मगर
अच्छा हुआ। वे खुद को हकीम लुकमान का रिश्तेदार समझने लगे।
माथुर साहब ने उनसे पूछा - कौनसी दवा ली आपने, जल्दी असर कर गई। देखो न सुबह से
मुझे भी सरदर्द हो रहा है।
खांसी भी है क्या! अट्टू साहब ने अपनी डॉक्टरी चलाई।
हां हां साहब, जुकाम भी है।
बदन दर्द भी कर रहा होगा!
हां भाई हां!
तो समझो तुम्हारा रोग मैंने दूर कर दिया। ये लो दो गोली।
कैसे लूं।
कैसे... अरे भाई दो चाय मंगवाओ। एक तुम पिओ, एक मैं पी लूंगा।
इससे मेरी बीमारी दूर हो जाएगी!
अरे क्या बात करते हो! चुटकियों में...
साहब, पिछले चार घंटे से परेशान हूं...
चिंता मत करो। जैसा कहूं वैसा करते जाओ।
आप कहते हैं तो यकीन करना पड़ रहा है वरना...
फिर वही निराशावादी बातें। भैया आशावादी बनो...आशावादी
लेकिन जब नाक बहती रहेगी तो आशाएं रह कहां जाएंगी साहब...
अच्छा, टेंशन भी बहुत है तुम्हंे... ये लो, एक टेबलेट और...
मर गया! अरे साहब आप चाहेें तो समोसे भी चाय के साथ मंगवा देता हूं। बस और दवाई
न दें साहब
ऐसे कैसे हो सकता है। दवा खाए बगैर तुम्हें आराम कैसे मिलेगा भैया
मेरी हालत पर तरस खाएं...
तुम दवाइयां खाओ भैया। मैं तरस खाउं या सरस...इसकी चिंता मत करो। और अब
तुम्हारा समय खत्म...प्लीज अब शर्माजी को आने दो। बहुत देर से अपनी सीट पर पहलू
बदल रहे हैं। और हां भैया, कल चैकअप करवाने जरूर आना।
शर्माजी वास्तव में अट्टू साहिब से मिलने को बेचैन थे। माथुर के जाते ही वे
अट्टू साहब के केबिन में जा घुसे। पहले खंखारे, फिर मुस्कराये। कुर्सी को जरा
पीछे खिसकाया और बड़ी अदा से उस पर बैठ गए। अट्टू साहिब अपनी डॉक्टरी के नशे
में... क्षमा कीजिये... कुछ देर पहले खाई दवा की खुमारी में थे। अधखुली आंखों
से उन्होंने शर्माजी को देखा, कुछ सजग हुए और बोले - तो शर्माजी आपको भी कब्ज
हो गई।
शर्माजी हैरान! यह राज की बात अट्टू साहिब को कैसे मालूम हुई! खैर उन्होंने मन
ही मन तय किया और फिर खंखारते हुए बोलने को उद्यत हुए - अट्टू साहब, बात दरअसल
ये....
अट्टू साहब ने उनकी बात लपक ली - छोड़ो भी शर्माना, शर्माजी मैं आपकी समस्या दस
मिनट में दूर कर दूंगा...
सच साहब...
हां भाई हां!
ओ... फिर तो मैं पट्टू से भी शर्त जीत जाउंगा...।
शर्त... कैसी शर्त... खैर छोड़ो... ये लो, इसे गर्म पानी के साथ ले लो।
नहीं नहीं मैं ये नहीं लूंगा मैं तो आपसे....
कैसे नहीं लोगे... मुझे जानते नहीं! मैं देकर ही दम लूंगा।
अट्टू साहिब... आपने छह महीने पहले मुझसे पांच सौ रुपये लिये थे वही दे
दीजिये... प्लीज
हें... क्या ... अट्टू साहिब की जुबान मानो अकड़ गई।
हां साहब। शर्माजी बोले - मैं तो आपसे वे रुपये लेने ही आया था। पट्टू ने भी
मुझसे शर्त लगाई है, यदि आपने रुपये लौटा दिये तो वह मुझे सौ रुपये अतिरिक्त
देगा।
अट्टू साहब को इतनी देर बाद फिर से सर्दी-जुकाम, खांसी-सरदर्द ने घेर लिया। वे
अपने दवाइयों के जखीरे से टेबलेट निकाल कर सामने रखने लगे। शर्माजी से नजरें
मिलाने से पहले वे ब्लड प्रेशर की टेबलेट ले चुके थे। - मोहन थानवी (अरबी
सिन्धी मे ये श्रंखला हिन्दू डेली अजमेर से २०१० में पब्लिश  हो चुकी है  )

Tuesday, January 1, 2013

फैला पंख और भर उड़ान...


उड़ान..

आकाश असीम और खुला है
फैला पंख और भर उड़ान
गा नवगीत और स्थापित कर नव आयाम