Friday, August 3, 2012

करतार सिंह / सिन्ध ही नहीं पूरे हिन्दुस्तान के बाल-गोपालों के बचपन के दिन अभी खत्म भी नहीं हुए थे कि उन पर जिन्दगी की जिम्मेवारियों का पहाड़ लाद दिया गया

करतार सिंह / सिंधी से अनूदित उपन्यास का अंश
करतार सिंह : हां यह सच है यार। मेरे जन्म से भी 10-12 साल पहले जन्मा षहीद हेमू कालाणी सन् 1942 में आजादी के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गया था। उन्हीं की देषभक्ति की बातें सुन-सुन कर ही तो मेरे और तुम्हारे मन में अंगरेजों के विरुद्ध विचारधारा पुख्ता हुई थी।
रोहित: अच्छा दोस्त, अपन बीस साल पहले भी दिल्ली में मिले थे लेकिन तूने यह नहीं बताया था कि तुम्हारा नाम कैसे बदल गया। यार यह तो बता ही डालो मुझे। मेरे मन में यह बात जानने की बहुत उत्कंठा है।
करतार सिंह: छोड़ो यार इस बात को...
रोहित: नहीं यार ऐसे मत कर, बताओ तो सही, देखो जब तक यह बात तुम्हारे मन में दबी रहेगी तब तक तुम भी मन में दुखी होते रहोगे।
करतार सिंह: हां सच कहते हो यार तुम। सुनो, मैं अपना नाम किस तरह गुमा बैठा। कैसे मेरी जिन्दगी को बचाने के लिए एक मुसलमान ने मुझे सलाह दी कि मैं गुरुद्वारे में जाउं और वहां लाहौर के अच्छे माहौल में हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के तूफानी दौर में भी सुरक्षित रहूं।
रोहित: यार तुम तो ऐसी बात कर रहे हो जिसमें हिन्दू-मुस्लिम, दोनों का प्रेम जाहिर होता है। भले ही इसके एक पहलू को देखने पर खूनखराबा भी नजर आता है लेकिन असल में तो आपसी प्रेम, भाईचारा अैर सौहार्द अधिक दिखाई देने लगा है मुझे। यार यह बात तो विस्तार से ही बता दे।
करतार सिंह: हां, दोनों तरफ के लोगों की प्रेमगाथा कह सकते हो मेरे नए नामकरण को।
करतार सिंह रोहित को अपनी जिन्दगी के वह पन्ने बताने लगा जिनमें उसका नाम बदल गया था। उसने रोहित को बताया कि वह लारकाणे की जेल से निकल कर सक्खर पहुंचा तो वहां के हालात देख उसका मन कांप गया। वह घबरा गया।
करतार सिंह मानो रोहित को अपने नाम बदलने की बात बताते-बताते लाहौर जा पहुंचा।
विचारों की आंधी चल रही थी। करतार ंिसंह सोच रहा था कि उसके हरिप्रसाद नाम वाले करतार सिंह का समय अब पूरा होने को है। बुढ़ापा आ चुका है। ष्यामला भी पांच साल पहले मुझे इस बेदर्दी दुनिया में छोड़ गई। ष्यामला और दोस्तों के साथ रोहिड़ी-सक्खर व लारकाणे में बिताए वे दिन अब लौट सकते हैं क्या? उस समय सिन्ध ही नहीं पूरे हिन्दुस्तान के बाल-गोपालों के बचपन के दिन अभी खत्म भी नहीं हुए थे कि उन पर जिन्दगी की जिम्मेवारियों का पहाड़ लाद दिया गया। आजादी की जंग में किषोरवय 14 साल के हरिप्रसाद यानी करतार सिंह को अंगरेजों ने जेल में डाल दिया। करांची की जेल में उसे देष के आजाद होने तक रहना पड़ा। इसके बाद समूचे भारत में रोजगार की तलाष में मारे-मारे घूमते नौजवान ही नहीं लगभग हर उम्र के लोगों के झुण्ड अपने भविश्य के प्रति आषंकित हो उठे थे। जात-पांत की दीवारें खड़ी हो रही थी। हिन्दू-मुसलमान के नाम पर आदमी-आदमी को मार रहा था, जला रहा था। सारे देष में हड़ताल, लाठीचार्च, जेल... बंगाल के जादू की हवा चल रही थी। मन में एक-दूसरे के प्रति नफरत का मुलम्मा चढ़ा दिया गया था। ऐसे माहौल में करांची की जेल से बाहर आकर वह लारकाणे पहुंचा तो सबसे पहले ष्यामला के घर गया। वहां पता चला कि ष्यामला का परिवार भारत चला गया है। हरिप्रसाद वहां से रोहिड़ी-सक्खर आया तो उसके पड़ोसी मुसलमानों की सूरत और सीरत बदली हुई थी। उसके बड़े भाई, माता-पिता, छोटे भाई और बहिन का कोई अता-पता नहीं था। जान-पहचान वाले लोग भी हरिप्रसाद से मिले लेकिन वे भी उसे उसके परिवार के सदस्यों की कोई जानकारी नहीं दे सके।