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नींद में जागा-जागा- सा...

चांद मुस्कराता रहा...
आधी रात को 
जैसे ही रंगों से घिरे
मुस्कराते चांद को देखा,
कलर रिंग से घिरे चांद को...
देखने के मुबारक मौके पर
इस नजारे से पुलकित 
बार बार
कुछ सवाल भी मन में उठते रहे।
चांद मुस्कराता रहा...
क्या चांद के गिर्द
घिरा यह रंगीन घेरा
खुषहाली का संदेष देता है!
क्या यह पर्यावरण प्रदूषण से कुपित
आकाष की चेतावनी भरा संदेष है!
क्या पृथ्वी और चांद पर
किसी और रंगीन दुनिया की नजर है!
ऐसे कितने ही सवालों के जवाब
ढूंढ़ते हुए रात बीत गई
और
मुस्कराता रहा
कलररिंग में घिरा
खूबसूरत चांद।
ज्योतिष के नजरिये से
क्या यह किसी संकट के
टल जाने का संकेत था
जो अंतरिक्ष के राजा
चांद की दुनिया के माध्यम से
पृथ्वीवासियों को बता रहे थे!
सितारों की दुनिया
यानी
ज्योतिष के जानकार
इस बारे में क्या सोचते हैं!
ग्रह-नक्षत्र इस बारे में क्या संकेत देते हैं!
षुक्रवार का दिन
मार्गषीर्षषुक्ल पक्ष की दषमी,
वि सं 2006,षाके 1931,
तदनुसार 27 नवंबर 2009
मगर
अंग्रेजी तारीख के
बदलने के समय के अनुसार
रात 12 बजे बाद
28 नवंबर हो गया।
एकादषी तिथि प्रारंभ हो चुकी थी सायंकाल 7.01 से।
अंत रात्रि तक था उत्तरा भाद्रपद धु्रव
व ऊर्ध्वमुख संज्ञक नक्षत्र,
तनन्तर रेवती मृदु नक्षत्र रहा।
सायं 7.01 तक गर, तदन्तर
वणिज नामकरण तथा
चंद्रमा सम्पूर्ण दिवारात्रि
मीन राषि में रहा।
इसके अलावा
सूर्योदय से अंत रात्रि 4.50 तक
रवियोग नामक कुयोगों की
अषुभताओं का नाषकषक्तिषालीषुभ योग

इसके बाद अमृत-सर्वार्थसिद्धि
नामक षुभ योग रहा।
इन सब के बीच
आषंकाएं भी पनपती हैं कि
मानसून के दिनों में
चांद के ईर्दगिर्द वलय बनने से
होती है
भारी बारिष!
तो क्या मार्गषीर्ष की एकादषी की
प्रारंभिक रात्रि में
चंद्रदेव के चारों ओर बने
रंगीन घेरे से
यह संकेत भी मिलता है कि
बेमौसम बारिष हो सकती है!
क्या सुदूर उत्तरी इलाकों में
बर्फबारी होगी!
क्या मानसून की बेरुखी से
प्यासी रही सम्पूर्ण भारत की भूमि
सर्दियों की बारिष से तर होगी!
इन सब सवालों के जवाब
चांद के चारों ओर बने
रंगीन घरे में हैं।
कौन खगोलषास्त्री इसे पढ़ पाएगा!
कौन ज्योतिषी इसे बांच पाएगा!
चांद मुस्कराता रहा!

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