Skip to main content

Posts

Showing posts from 2012

स्वागत... नववर्ष का स्वागत करने को अब दिल नहीं करता

स्वागत !!! ( Old Poem )
नववर्ष का स्वागत करने को अब दिल नहीं करता
क्योंकि
कुछ लोग ऊपर से नजर आते हैं गांधी, कुछ नेहरू
मगर कोई बोस नहीं दिखता
इन सभी का जो सच्चा अवतार आ जाता
पता नहीं क्या से क्या हो जाता
कुछ लोग रावण हैं हर बार एक और चेहरा लगा लेते हैं
परन्तु रावण का चेहरा  नया हो या पुराना
देखकर रावण ही याद आता है
क्योंकि बदल लेने पर भी चेहरा
राम वो बन नहीं पाता इसलिए
स्वागत करने को अब दिल नहीं करता
क्योंकि
वर्ष नया हो या पुराना दिल के घाव नहीं भरता
पूरब को पश्चिम से नहीं जोड़ता
एषिया को यूरोप से नहीं मोड़ता
हिंसा, जो थी महाभारत काल में
या थी जो प्रभु यीशु के समक्ष
या उस समय जब गिराए गए परमाणु बम
वहीं हिंसा कारगिल की ऊंची पहाड़ी में छिपी
अपहृत हुए कंधार पहुंचे विमान में दिखी
इस हिंसा को कोई वर्श अहिंसा में नहीं बदलता
नववर्ष का स्वागत करने को अब दिल नहीं करता

फिर सो ना जाना

फिर सो ना जानाकह रही है
सितारों से झाँकती वो आंखें
हर घर हर बेटी बन
देखती रहूंगी
जाग्रत रहना
फिर सो ना जाना

Gidwani's "March of the Aryans" along with his earlier book, Return of the Aryans"

Gidwani's "March of the Aryans" along  with his earlier book, Return of the Aryans"  सम्माननीय भगवान गिदवानी जी की सद्य प्रकाशित पुस्तक के बारे में ईमेल प्राप्त हुआ। अमूमन अनजाने स्रोत से प्राप्त ईमेल पढ़ने से गुरेज करता हूं किंतु श्री गिदवानी जी का नाम और प्रेषक  के बारे में अल्प जानकारी पर मेल पढ़ा और नायाब पुस्तक के बारे में जिज्ञासा बढ़ गई। प्राप्त मेल के अंश साझा कर रहा हूं...
...   Gidwani also explains how the country, with  far-flung frontiers, and thrice the size  of present-day India, came to be known as Bharat Varsha.

 All literature on India begins with the Vedic Age. Gidwani's "March of the Aryans" along  with his earlier book, Return of the Aryans"  are  the only books which trace India's drama far back to pre-Vedic roots. Its appeal is, therefore, powerful and enduring to those in search of India's pre-ancient cultural, philosophic, spiritual and material heritage. Also, it fulfils a long-felt need to keep alive, for younger…

समकालीन चूहे और लोहे की तराजू

समकालीन चूहे और लोहे की तराजू भेड़िया आया, रँगा सियार जैसी कहानियाँ हमेशा राह दिखाती हैँ।डरने और डराने वालोँ को। दोनों को । सभी को । आखिर लोहे की तुला और चूहे भी तो खत्म ना होवै ...। चूहे और तराजू किसके प्रतीक हैं, कथा में यह समझना उत्तर आधुनिक काल में साहित्यिक जगत में कोलाज की मीमांसा करने जैसा है । जिसे जैसा अनुभूत हो वैसा अर्थ अभिव्यक्त करे ।  जमाना चाहे कोई हो, अमर सँस्कृत साहित्य की कथाएँ जीवन के हर क्षेत्र मेँ प्रासँगिक लगती हैँ। समसामयिक परिप्रेक्ष्य मेँ जीवँत होती दिखती हैँ। छल कपट से भरे पात्रोँ के नकाब उतारने के अलावा ऐसी कहानियाँ मलिन विचारोँ वाले धूर्त पाखँडी लोगोँ की पहचान कराने मेँ भी सहायक हैँ। बड़े बुजुर्गोँ ऋषि मुनि व विषय विशेषज्ञ विद्वानोँ ने सुखी और सफल जीवन जीने के मँत्र साहित्य के जरिये सुरक्षित सँरक्षित रखे हैँ। पँचतँत्र, हितोपदेश लोक कथाएँ , कहावतेँ मुहावरे, लोकोक्तियाँ , लोकगीत , जनश्रुतियोँ मेँ ऐसे "मँत्र" भरे पड़े हैँ।

साजिश और सादगी

साजिश और सादगी  साजिश  में  मशगूल /
साजिशी  को  फुर्सत  नहीं  थी /
सज्जन  साजगिरी  गुंजाता /
सादगी  से  'पार ' पहुँच  गया...
......( दूसरो को भटकाने वाला अपने ही
लक्ष्य से भटक जाता है और  कभी मंजिल तक नहीं पहुचता जबकि अपने काम से काम रखते
हुव़े लगातार लक्ष्य की ओर बढ़ने वाले को निश्चय ही मंजिल मिल जाती है...)

रोने से रोज़ी नहीं बढ़ती

रोने से रोज़ी नहीं बढ़ती अनथक कर्म करने के बावजूद वांछित प्रतिफल नहीं मिलने की षिकायत करने वाले बहुतेरे होंगे लेकिन कोई उनसे पूछे क्या रोना रोने से रोज़ी बढ़ती है ! दरअसल मैनेजमेंट कोर्स, अध्यात्म और व्यक्तित्व विकास जैसे प्रषिक्षणों में सकारात्मक विचारों की महत्ता बताई ही जाती है। ये सकारात्मक विचार-पाठ कोई आज के ईजाद पाठ्यक्रमों में प्रयुक्त नहीं होते बल्कि ‘‘उस्ताद-षागिर्द’’ काल से भी बहुत - बहुत पहले ‘‘गुरु-षिश्य’’ युग से सकारात्मकता को महत्व मिला हुआ है। पुराण कथाओं, ऐतिहासिक एवं लोककथाओं में भी सकारात्मक विचार अपनाने संबंधी सीख देने वाले उद्धहरण भरे पड़े हैं। आज का युग कल कारखानों में सिक्के ढालता है तो कभी श्रमिक वर्ग को खेत खलिहान में पसीना बहाकर या व्यापार के लिए दुरूह यात्राएं कर सेठ साहूकारों के लिए ‘‘गिन्नियों की थैलियां’’ भर लानी होती थी। श्रमिक वर्ग तब भी वांछित लाभ से वंचित रहता और आज भी कमोबेस ऐसा होता है। साथ ही यह भी तय है कि जगह जगह ऐसा रोना रोने वाले को लाभ भी बढ़ा हुआ नहीं मिलता। अर्थात युग और काम का रूप बदल गया लेकिन व्यवस्था ले देकर वहीं की वहीं रही ! प्रवष्त्ति भी नह…
पल पल
विश्वास मुस्करा रहा
पल पल
आओ करें
आने वाले नए पल का स्वागत
पल पल
बीत रहा
पल पल
जी रहा
पल पल
मुस्काना
सिखा रहा
पल पल
पास बुला रहा
पल पल
विश्वास बढ़ा रहा
पल पल
पल पल
अंधेरा दूर भाग रहा
पल पल
उजाला बढ़ा रहा
पल पल
आओ करें
आने वाले नए पल का स्वागत

मचलना हवाओं से सीख
संग चलना लहरों से सीख
जीना जिंदादिलों से सीख
हर खुशी हऱ दर्द से सीख
भीड़ में अलग दिखना सीख


कूचु ऐं शिकस्त...1300 साल पहले...

पंजाब केसरी राजस्थान संस्करण में ...  18 Dec 2012   (श्री राजेंद्र सैन)  ऐतिहासिक उपन्यास कूचु ऐं शिकस्त...1300 साल पहले का कथानक 

1300 साल पहले का कथानक ...

ऐतिहासिक उपन्यास कूचु ऐं शिकस्त...1300 साल पहले का कथानक 

... सौदा कर नफा हो

... सौदा कर नफा हो    अनोखे काम करने वाले को प्रसिद्धि मिलती है लेकिन ऐसे ‘‘अनोखे लाल’’ बहुत कम होते हैं। कम ही जगहों पर होते हैं। लेकिन सामाजिक जीवन में ही नहीं बल्कि हर क्षेत्र में एक बात बहुत ही विश्वास के साथ कही जाती है, भला कर भला हो । साधु संत या फकीर ही नहीं बल्कि साधारण गृहस्थ भी इस मंत्र को मानता और जपता है। सभी इसे क्रियान्वित भी करते हैं। जमाना आधुनिक है तो विचारों में भी नयापन आना ही है सो भला कर भला हो के साथ कहा जाने लगा सौदा कर नफा हो। यह कोई ताना मार कर कही जाने वाली बात नहीं बल्कि हकीकत की तरफ इशारा है। कहते हैं हर बात के एकाधिक अर्थ होते हैं। कभी किसी फकीर ने इसका मर्म समझा और कहा। क्योंकि जब भला करने पर भी भले की चाह हो तो इसे सर्वशक्तिमान से सौदा नहीं माना जाएगा क्या ! दूसरे अर्थ में व्यापारिक सौदे में भला करने से तो नफा हाथ आएगा नहीं लेकिन भलेमन यानी ईमानदारी से सौदा करने वाला नफे से वंचित भी नहीं रहता।

रब वसदा उस घर ...

निक्की जई कुड़ी    रब वसदा उस घर
जिस घर विच होवे
 इक निक्की जई कुड़ी
जेड़े वेले वेखो
खेडदी कुडदी
खिलदी खिलाँदी
 रोन्दी पर
 रोण नीँ डेन्दी
वडे वडाँ वास्ते
तकलीफाँ दूर करण लई
इक इ दवा दी पुड़ी
 इक निक्की जई कुड़ी
 जेठ विच जदोँ तपदी दुपैरी
  झल झल पखा
थक जान्दी दादी
 राणी जगदी
सोन्दी बान्दी
 वेड़े विच खेडदी
नचदी टपदी
बण आन्दी ठँडी हवा
 दे जान्दी निन्दर दा झोँका
इक निक्की जई कुड़ी
 निक्के काके दी हँसी
पापे दी खुशी
माँ दी लाड़ली
भरावाँ दी अखाँ दा तारा
बुआ लई गुड्डे दी गुड्डी
 इक निक्की जई कुड़ी
ताँ ई ताँ केन्देन साडे बाबा
रब वसदा उस घर
जिस घर विच होवे
इक निक्की जई कुड़ी

सिन्धु जे करे... sindhi story - sindhu je kare....

सिन्धु जे करे...  Sindhi story सिंधी कहानी - मोहन थानवी
..........................................
बेबी - पचाइणि जे लाय अटो कोने। तव्हां था चवो दिकीय ते दियो बार। मटि वटि दियो बार।
शामो - पुटि, चांवर त रंध्या अथई। उननि जो पिण्डु ठाहे करे ब दिया बारे वठि।
बेबी - बाबा...खाइणि जो घीयु-तेल बि कोने। कवड़ो तेल प्यो आहे। दियनि में उवो विझां...।
शामो - हा...हा पुटि, अजु चण्डरात आहे। दियो बारनि जरूरी आहे।
गाल्हि-बोल्हि कन्दे बेबीअ दिया ठाहे-बारे वड़ता। 12वरहें जी बेबीअ खे याद आहे, साल अगि ताईं उनजी माउ, सखीबाई चण्डरात जे दिहं दियो जरूर बारदी हुई। उनजे बीमार थिहणि खां पोय बाबा बि दियो जरूर बारदो आहे। अजु बाबा चाक कोने। सखीबाई इस्पाताल में आहे। घर जो सजो कमुकारु बेबीअ जे कंधनि ते अची वियो आहे। पैसे जी सोड़, दवा-दारूअ जी घुरज। बाबा जी 1500रुप्यनि जी प्राइवेट नौकरी। इन सभिनी गाल्हिनि बेबीअ खे जल्दी वदो करे छजो आहे। उन बाबा खूं पूछो - चण्डरात ते दियो छो बारदा आह्यो।
शामो - पुटि, दरियाशाह जी मेहर कदंहि थे, कुझ खबरु कोने। उदेरेलालजी खुशी एं पंहिंजी सिन्धु जी रीति, पंहिंजा दिहं-त्योहार मनाइणि में सभि…

काटा और उलट गया

काटा और उलट गया   आज कतिपय लोग अपनी बात से, अपने द्वारा किए गए काम से, अपने बयान से, अपने वक्तव्य से, अपने वादों से मुकर जाते हैं। दरअसल ऐसी प्रवष्त्ति नई नई पैदा नहीं हुई है। प्राचीन काल से ऐसे लोग समाज और राज में रहे हैं। मैंने ऐसा तो नहीं कहा था, ... कहने में देर नहीं लगाते। फिर आज तो मीडिया द्वारा प्रचार प्रसार का जमाना है और ऐसे में कोई बात पलभर में दुनिया भर में चर्चा का विषय बन जाती है। तुर्रा यह कि अधिकांश विवादित मामलों में संबंधित पक्ष यह कह कर पल्ला झाड़ने का प्रयास करता है कि मेरे या हमारे कहने का गलत अर्थ लगाया गया है। हमारे कहे को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया है। बड़े बुजुर्गों की बात याद करें तो ‘‘काटा और उलट गया’’ के माइने समझ में आते हैं। बुजुर्ग कह गए हैं, काटा और उलट गया। उलट या पलट जाने के माइना भी हर बात की तरह एकाधिक हैं। उलट जाना यानी सर्प की तरह काट कर उलट जाना । किसी काम को करके मुकर जाना। अपने अनुभवों के इशारों से बुजुर्गों ने ऐसे लोगों से सचेत रहने की नसीहत दी है।

आप से गया तो जहान से गया

आप से गया तो जहान से गया    आज की बात नहीं बल्कि प्राचीन काल से हमारी संस्कष्ति, हमारे संस्कार और परंपराएं हमें सामाजिक जीवन में आगे बढ़ने में सहयोगी रहे हैं। हम किसी भी धर्म में आस्था रखते हों, किसी भी समुदाय से जुड़े हों हमंे अपने जमीर, अपनी अंतरआत्मा की आवाज को वरीयता देने की सीख मिली है। पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जी ने भी अंतरआत्मा की बात कही थी। दरअसल अध्यात्म में अपने विवेक को जगाने की शक्ति है और जो खुद उच्च विचारों वाला और मानसिक - बौद्धिक रूप से शक्तिशाली होता है उसे खुदा किसी भी क्षेत्र में कभी भी कमजोर नहीं होने देता। सूफी संतों ने भी कुछ ऐसा ही संदेश दिया है। मन की शक्ति बढ़ाने की बात कही है। यही कारण है कि हमारे बुजुर्ग कहते रहे हैं, आपसे गया तो जहान से गया। सच भी तो है, जो अपने काम से खुद संतुष्ट नहीं, वह आसानी से समझ जाता है, दूसरे लोग भी उसके काम से संतुष्ट नहीं हैं। जो जाने अनजाने खुद से हुए कुकष्त्यों को जान समझ कर भी पश्चाताप नहीं करता, उसे अंततः ग्लानि तो होती ही है और ऐसा व्यक्ति अपनी ही नजरों में गिर जाता है। यह तो जाहिर बात है कि जो खुद अपनी नजर म…

शब्द तेरे लिए हैं अपने मायना खुद लगा मेरे या किसी और के अर्थ किताबों से बाहर आ भी जाएं तो क्या तेरे लिए तो वो तब तक शब्द ही होंगे जब तक तेरे मायना न होंगे

शब्द तेरे लिए हैं
अपने मायना खुद लगा
मेरे
या
किसी और के अर्थ
किताबों से बाहर
आ भी जाएं तो क्या
तेरे लिए तो वो
तब तक शब्द ही होंगे
जब तक
तेरे मायना न होंगे

आगे चलते हैं पीछे की खबर नहीं

आगे चलते हैं पीछे की खबर नहीं      
अकस्मात तो कुछ भी हो सकता है। जागरूक हो कर चलने वाले को कभी परेषानी का सामना नहीं करना पड़ता। वरना - आगे चलते हैं पीछे की खबर नहीं की तर्ज पर भविश्य प्रभावित हो सकता है। खासतौर से नव धनिकों को आज के ‘‘सेंसेक्स लाइन’’ पर दौड़ते युग में सोच विचार कर ही दांव लगाने चाहिए। बड़े बुजुर्गों ने अपने अनुभवों से ऐसी बातें कही हैं जो व्यक्ति को व्यवहार कुषल बनने में सहयोगी बनती हैं। मैनेजमेंट और व्यक्तित्व विकास के पाठ्यक्रमों में भी ऐसी बातें आज की आवष्यकता के अनुसार नए रंग रूप में ढाल कर षामिल की गई हैं। पैसा और रुतबा कमाने के लिए एक उम्र गुजार दी जाती है किंतु आसानी से धनिक बनने वाली नई पीढ़ी बेखबर रहकर धन राषि खर्चने के लिए कदम उठाती है तो लगता है बस चले जा रहे हैं, कहां पहुंचेंगे खबर नहीं। याद रखना जरूरी है, अकस्मात धन आने के रास्ते खुले है तो जाने के रास्ते बंद करने की जिम्मेवारी भी सामने है।

sindhi paheli = कारे बन में कारो जीवु खून पीअण वारो आ हीउ = जूं+ सिर के काले बालों में जूं

sindhi paheli = कारे बन में कारो जीवु
खून पीअण वारो आ हीउ = जूं+सिर के काले बालों में जूं

तिनके की चटाई नौ बीघा फैलाई

तिनके की चटाई नौ बीघा फैलाई आदमी का स्वभाव वक्त बीतने के साथ बदलता है और हम कहते हैं वक्त बदल गया। लेकिन आदमी का दिखावा करने का स्वभाव कितना ही वक्त बीत जाएए बदलने का नाम ही नहीं लेता। कोई न कोई कहीं न कहीं किसी न किसी बात पर दिखावा कर ही लेता है। किसी काम को बढ़ा चढ़ा कर भी पेष किया जाता है। तिनके की चटाईए नौ बीघा फैलाई। काम से अधिक प्रचारित करना। गंभीरता से किए जाने वाले कामों का भी ऐसा हश्र होता देख जानकार आदमी अफसोस जताता है। अक्सर सरकारी योजनाओं के प्रचार प्रसार में ऐसा होता है। कुछ निजी क्षेत्र की कपनियां भी अपने लाभ को बढ़ाने के लिए अपने कामों को बढ़ा चढ़ा कर प्रचारित करती हैं। ऐसी ही प्रवष्त्ति किसी व्यक्ति में भी दिख जाती है। बिजनेस के लिए प्रचार करना तो फिर भी समझ में आता है जैसे कि किसी सिनेमा के रिलीज होने के तीन चार महीने पहले से ही प्रतिदिन टीवी चैनल और अखबारों में रोजाना आठ दस बार प्रोमो दिखाना। इस तरह जितनी संख्या में प्रोमो दिखाया जाता है कुल उतने दिनों तक कोई फिल्म सुनहरे पर्दे पर टिकती भी है। इसकी जानकारी हो भी तो फर्क क्या पड़ेगा। हांए सीधा समाज और लोगों के हित से जुड़े…

सिंधी नाटक कृपालु संत साधु वासवाणी

सिंधी नाटक कृपालु संत जे पहिरियें सीन जो आखिरी भांङों पेशु आहे -- ( इयो नाटक हिंदू अजमेर में अरबी सिंधीअ में साया थिअलि आहे ) ... दादा साहिब चवनि था, डिसो। जहिं संत माण्हूंनि खे इ न बल्कि हरेकु प्राणीअ खे हिकु जेहिड़ो भगवान जो सृजन बुधायो हो, उन्हींअ इ संत लाइ झूनी ऐं नई टहीअ में तकरार जी गाल्हि बुधी मूखे खिल इ त इन्दी।
माण्हूं चवनि था, दादा तव्हां असांखे साधु वासवाणी साहिब बाबत जाण ड्यो।
दादा जे पी वासवानी साहिब चवनि था, - संत साधु वासवानी त पाण चवन्दा हुआ, जीव मात्र में फर्कु न कजे। ऐं तव्हां उननि इ संतनि जी गाल्हियूंनि खे दरकिनार करे जीव मात्र इ न बल्कि खुद उननि संतनि जे नाले ते बि झेड़ो था कयो। इननि संतनि त पहिंजी सजी हयाती तप करे भगवान खां माण्हूनि जो भलो घुर्यो।
माण्हुनि जे वरी जोर डिहण ते दादा साहिब कृपालु संत साधु वासवानी जी हयाती ऐं उननि जे उपदेशनि बाबत तफसील सां गाल्हियूं बुधाइनि था। इनि वक्ति इ पार्टी में दादा श्याम जो भजन गूंजे थो, -
अलख धाम मां

नाल्हे मौत तिनि लाइ, अंखियूंनि जिनि जूं निहारनि,
पहाड़नि त तिनि डे, जीअं प्यारनि खे पुकारनि!
रहनि रहम में से त आल्यिूंनि अंख्यिूंनि,
सब…

अजब कीमियासाज ...

अजब कीमियासाज हैं 'वे' लोग । मिट्टी को सोना बताते हैं ...  । लेकिन इससे नुकसान न सोने को होता न मिट्टी को । क्योंकि तिजारत पसंद हैं बाकी लोग... अपने मिट्टी के ढेलों की भी कीमत  कीमियासाजों  से ही सोने के भाव वसूल लेते हैं ।  = आखिर नुकसान कीमियासाज को ही होता है ।
प्रकृति पहले स्वयं बदलती है फिर हमें बदलना ही पड़ता है।

प्रकृति पहले स्वयं बदलती है फिर हमें बदलना ही पड़ता है।

पांच रुपए की दीर्घ कथा

पांच रुपए की दीर्घ कथा-   बाबूजी साग वाले से बोले -  बेटा चार टाइम के लिए 2-2 रुपए की मिर्च धनियां अदरक और 5-5रुपए की पालक मैथी मूली तोल दोगे या ज्यादा का लूँ ? साग वाले ने कहा काफी है बाबूजी । आपको न दूंगा तो जीवन कैसे सुधारूंगा । और एक रुपया खुला न हो तो 20 रुपए ही दे देना । रुपए चुका कर साग से भरा थैला संभाल बाबूजी बोले - महंगाई को तो पंख लगे हैं । वृद्धावस्था पेंशन के हम दोनों को मिलने वाले 500 रुपए से हम दोनों का गुजारा नहीं होता बेटा । जाने लगे कि एक बच्चे ने साग वाले की पीठ पर चढ़ते हुए कहा , बाबा स्कूल जा रहा हूं खर्ची दो । साग वाले ने उसे लाड़ करते हुए 5 रुपए दिए । बच्चा तुनक कर बोला - ये क्या बाबा, 5 रुपए की तो मिर्ची भी नहीं आती और मुझे लेनी है चॉकलेट। कम से कम 50 रुपए लूंगा । साग वाले ने बाबूजी से नजरें चुराते हुए 50 रुपए देकर बच्चे को विदा किया । बाबूजी भी रुके नहीं । साग वाला मुझसे बोला - देख लो मास्टर जी । चॉकलेट 50 और साग 5 का, इसलिए महंगाई तो बढ़ेगी ही ।

गीत जीत रा गावां ला जी... करणी माता जावांला...

गीत जीत रा गावां ला जी... करणी माता जावांला...
देशनोक में करणीमाता जी के भी दर्शन किए तो अहमदबाद से आए भतीजे पिंटू ने काबा के दर्शनार्थ बहुत जतन किए... श्वेत काबा को तो कैमरे में नहीं ला सके...

गीत जीत रा गावां ला जी... करणी माता जावांला...

गीत जीत रा गावां ला जी... करणी माता जावांला...
देशनोक में करणीमाता जी के भी दर्शन किए तो अहमदबाद से आए भतीजे पिंटू ने काबा के दर्शनार्थ बहुत जतन किए... श्वेत काबा को तो कैमरे में नहीं ला सके...

लहरें सागर की / उनका ख्याल भी ...

उनका ख्याल भी लहरें सागर की ...    उनकी मुस्कान भी कहकहा मान दिल धड़क धड़क जाता है ...
वो आंख की कोर से देखते हैं आहट पे ... फिजां खुशबूदार हो जाती है ...
वो तो हैं हीं बलखाती उमंगें ... उनका ख्याल भी लहरें सागर की लगता है ... दिल धड़क धड़क जाता है ...

बचपन की दोस्ती और किशोरवय की मोहब्बत

भुलाने लगे कोई जब तो...
ठहरे हुए पानी में...
कंकर मार कर ...
हिलोरे उठाना, बताना...
बचपन की दोस्ती और...
किशोरवय की मोहब्बत...
कम नहीं होती ताउम्र ...
... वो भी जानते हैं...
ये सब...
फिर भी...
रहते क्यों दूर दूर...
... बता दो कोई उन्हें ये...
सपने देखे हैं---
 उनकी भी आंखों में---
हमने भरपूर !

अबकै दीवाली री मंगल वेला मायड़ भाषा मान्यता सागै..

दीवाली रा दीआ दीठा अबकै...
गजानंद जी रिद्धि सिद्धि सागै...

महालक्ष्मी विष्णु जी सागै...

अबकै दीवाली री मंगल वेला मायड़ भाषा मान्यता सागै...

जै जै गणेश जै जै महालक्ष्मी...
जै जै मां मरु भूमि... जै जै मायड़ भाषा ...

शुभ मंगल लाभ दीपावली

नूवीं पीढ़ी इण ग्यानगंगा में डुबकी लगावण सूं वंचित नीं रै जावै ...kailandar sun barai ... Rajasthani Novel se chuninda ansh....

kailandar sun barai ... Rajasthani Novel se chuninda ansh... राजस्थानी नावेल कैलंडर सूं बारै से चुनंदा अंश ... बाबोसा आपरै अ‘र समाज मांय जित्तो बदळाव देख्यो, ओ सगळो बीयांनै बारै सूं आयोड़ा पण अबै पकायत अठै रा ई पिछाण बणायोड़ा इण लोगां रै बदळाव सूं कमती लाग्यो। राजस्थान मांय बदळाव में इयां लोगां रो घणो महतव है। बंटवारै री पीड़ हिरदै में दाब्योड़ा अठै आवंणआळा घणा है। बंटवारै सूं पैळी आयोड़ा लोगां आपरी जगां अ‘र पिछाण सहर में बणा ली ही। अबै सगळा अठै रा ई यानी राजस्थानी ई गिणीजै।
बाबोसा ठीक ही कैवंता हा -

अेक मारग सूं जावै कित्ताई ऊंट, कित्तीई अरथियां
अ’र ठाकुरजी री सोभाजातरा निकळै
टाबर स्कूल भी अठै सूं ही जावै
जुआरी, सट्टेबाज भी ईं मारग रो जातरी
बळद अ’र बस-ट्रक भी ईं मारग सूं बैवै
कोई तीरथ करै कोई पूगै राज में
मारग तो मारग रैवै मिनख री सोच बणै मरज

मेलोडी बीं बगत तो मरज री बात जाण कोनि सकी पण जद खुद राजस्थान रै जीवटआळा मिनखां सूं मिल’र प्रकष्ति सूं संघर्ड्ढ करणो सीख्यो तो जाण सकी कै ओ मरज कांई होवै। इण मरज री जाण बीनैं राजस्थान रै जीवटआळा मिनखां सूं मिल’र होयी। अे जीवटआळा मिनख आपरै जीवन संधर्ड्ढ मा…

एलियन और सिनेमाई जादू ... क्या यह पौराणिक है...

एलियन और सिनेमाई जादू ... क्या यह पौराणिक है... ! 2009 में प्रकाशित सिंधी नॉवेल केदार साहब से चुनिंदा और संपादित अंश...
एलियनए कींअ न गोलमटोल मुंह वारो सिनेमा में डेखारियो अथवूं! परए असांजे पौराणिक ग्रन्थनि में बि त एहिड़नि चेहरनि जी गाल्हि डाडी बुधाइन्दी आहे! झूलेलाल!
केतराई दफा पाड़े में गोपाल डिठो आहेए होलीअ.डियारीअ खां अगु सिन्धी.पंजाबीए मुल्तानी पाड़े वारा भितनि ते गाइं जे छेणे सांए सिन्दूर ऐं बियूनि रंगदार शयूनि सां ऐहिड़ा लीका पाइन्दा आहिनिए जेके एलियन वांङुरु इ त लगन्दा आहिनि! घणो करे लीका पाइण जो कमु बुढ़यूं माइयूं कन्दयूं आहिनि। त छाण्ण्ण् त छा असांजी सिन्ध में माण्हूनि खे ऐहड़े एलियन जी पहिरी खां इ खबरु हुई! उननि एलियननि खे जूने जमाने में माण्हू देवी.देवताए पित्तर या केंहिं बे नाले सां पुकारीन्दा हुवा!
गोपाल पहिंजी एहिड़नि एलियननि जी दुनिया में गुमु हो ऐं रामी पहिंजी डॉल खे डाडीअ जे अगियूं नचाये पूछेसि पई . अम्माए इनि डॉल खे गाल्हाइणि केंहि सेखारियो! सखीबाईअ खे जयपुर जे डॉ कन्हैया अगनाणी जो लिख्यलि किताबु यादु आयो . बबलूअ खे सिन्धी सेखारियो न बाबा! अजु जे बबलूअ खे त सिन्धी सेखारण …

नाट्य कृति... जो छू गई दिल को...

नाट्य कृति... जो छू गई दिल को...
*************************
sindhi - पुस्तक परिचय
नाटक -     हत्या हिक सुपने जी (  Besed on Cross purposes – Albert Camus )
लेखक -     हरिकांत जेठवानी
प्रकाषक -     सुनील जेठवानी, 4 प्रकाष सोसायटी
                 राधे हरि अपोजिट निर्मल कान्वेंट
                 राजकोट 360007
संस्करण - 2012
सुपने जी हत्या मंझ रंगकर्म जी खुषी
सिंधी साहित्य जगत मंझ हरिकांत न सिर्फ नाटकनि लाइ बल्कि सिंधु समाज, साहित्य धारा ऐं आखाणी जे संपादन जे करे हमेषह याद रहिण वारो नालो आहे। पहिंजी लंबी हिंदी कविता एक टुकड़ा आकाष समेत हरिकांत हिंदी साहित्य संसार जो बि जातलि सुञातलि लेखक आहे। कविता में नवाचार ऐं पहिंजी कहाणिनि में समाज जी नुमाइंदी कंदड़ चरित्रनि खे बुलंद सिंधी जुबान डिअण वारे हरिकांत जेठवानी जो नवों नाटक हत्या हिक सुपने जी इनि साल 2012 मंझ साया थी आयो आहे।
मूल भावना खे कायम रखंदे नाटक जी आत्मा खे सिंधी भाषा जो वगो पाराइण हरिकांत जी लेखनीअ जो इ कमु थी सघंदो आहे।  ईआ खासियत इ हरिकांत जे इनि नाटक खे खास अहमियत वारो साबित करे थी। नाटक खे पुस्तक रूप में पाठकनि तोणी पहुंचाइण जोे …

पढ़ने वाले आगे निकल गए ... पढ़ाने वाले पीछे रह गए

महंगाई सज संवर कर बाज़ार पहुंची
बाकी सब पीछे हट गए
भ्रष्टाचार  की बोली में
कुछ लोगों के जेब कटे जूते  फट गए
पुलिस काबू  पा न सकी...
चीखों से सरकार के कान फट गए
महंगाई मिस वर्ल्ड हुई
राजा - भ्रष्टाचारी  कुर्सियों पर जुट  गए
पढ़ने वाले आगे आगे आगे और आगे निकल गए ...
पढ़ाने वाले देखो हाय ... कितना  पीछे रह गए

भासा अ’र देस री बात्यां कागद माथै उकेर आजादी री अलख जगाई / राजस्थानी उपन्यास *कुसुम संतो* से

याद राखणौ जरूरी है कै 1857 रै जुद्ध रै बाद भारतेन्दु अष्र दूजा कवि भासा अष्र परतंत्र देस री बात्यां कागद माथै उकेर लोगां रै मन में आजादी री अलख जगाई ही ! ( राजस्थानी उपन्यास ’कुसुम संतो’ से  )...भाषा साहित्य मिनख.मिनख नै जोड़ै! देस री एकता रै वास्तै भासा अेक जरियो बणै! आ बात कैई जा सकै। जियांष्क विदेसियां रै आक्रमण सूं जद आपणै देस रो जनए या कैवां कै म्है लोग जद त्रस्त हुईग्या हाए बीं बखत साहित्यकार जगत जिकी एकता रो दरसण आपणी कलम सूं करायोए बा बात कोई दो.चार सताब्दियां में भी भूलीजणी आसान कोनी। बीं बखत किरसण भगवान रो बखान बिपती रै दिनां सूं छुटकारो पावण रो एक उपाय जियां लागै कैवां तो सायद गलत कोनी समझो जावैळा। सूरदास उण बगत स्री किरसनजी री लीलावां नै कागद माथै उकेर जीव.जगत नै जीवण रो नूवांे अंदाज दिरायो। राजपाट नै एक तरफां राख इब्राहीम मियां जद रसखान बण सकै तो समझणोें कै ओ भगती रो ई ज बखान है।  केरल रा एक महाराजा राम वर्मा ष्स्वाति तिरुनालष् रै नाम सूं कविता करता हा।  महारास्टर रा संत ज्ञानेस्वरए नामदेव अष्र सिन्धु प्रदेस  रा श्रीलालजी भी कवि ही नीं किरसनजी री लीलावां नै भगतां रै साम्है…

कृपालु संत साधु वासवानी जी / दादा श्याम जो भजन

कृपालु संत साधु वासवानी जी का यह भजन पूना से प्रकाशित श्याम साप्ताहिक से अरबी सिंधी से देवनागरी में रूपांतरित कर अपने नाटक कपालु संत में शामिल किया । यह नाटक अजमेर से प्रकाशित दैनिक हिंदू में अरबी सिंधी में  ( मोहन थानवी जी कलम मां कॉलम में ) 2011 प्रकाशित हो चुका है।  अलख धाम मां नाल्हे मौत तिनि लाइ, अंखियूंनि जिनि जूं निहारनि,
पहाड़नि त तिनि डे, जीअं प्यारनि खे पुकारनि!
रहनि रहम में से त आल्यिूंनि अंख्यिूंनि,
सबक इक त सिक जो, से आहिनि सुख्यूं!
पया था त कोठनि, प्रभुअ जा पहाड़ा!
अचनि यादु वरी वरी, पया से त प्यारा!
करे केरु दूर, प्यारनि जी जुदाई !
जीवन आहे जिनि जी, प्रभुअ में समाये!
मरे ही बदनु थो, जिस्मु ही जले,
पर आत्मा अमर, सदा पयो हले!
काल डिस जो घर, फकत काल ढाहे,
पर आत्मा अजरु ऐं अविनाशी आहे!
मरे कीअं कोई ऊंव, न कोई कीअं सड़े,
न कोई मौत परदो, रखी उन परे
अलख धाम मां आहे, नूरी निमाणी
रहे रोज रोषन, न रह तूं वेगाणी।

साथ जुड़ना ... हेनरी फ़ोर्ड (mahapurushon ki wani )

साथ जुड़ना एक शुरूआत है; साथ रहना प्रगति है और साथ काम करना ही सफलता है- हेनरी फ़ोर्ड

eid mubaraq ईद मुबारक

eid mubaraq eid mubaraq
ईद मुबारक eid mubaraq
ईद मुबारक eid mubaraq
ईद मुबारक eid mubaraq ईद मुबारक eid mubaraq  ईद मुबारक eid mubaraq  ईद मुबारक eid mubaraq  ईद मुबारक eid mubaraq
ईद मुबारक eid mubaraq
ईद मुबारक eid mubaraq
ईद मुबारक eid mubaraq
ईद मुबारक eid mubaraq
ईद मुबारक
ईद मुबारक

हम और हमारा विश्वास

हम और हमारा विश्वास

वैश्वीकरण... दिखाउं जो आईना तो बड़ी बात

देखू जो आईना तो कोई बड़ी बात नहीं कहती है दुनिया
दिखाउं जो आईना तो बड़ी बात मान लेती है दुनिया...
...  
अल्बर्ट कैमस के क्रास प्रपोज पर आधारित हरिकांत जेठवानी रचित पांच पात्रीय सिंधी नाटक हत्या एक सपने की... पढ़ते समय अहसास हुआ कि हिंदी अंग्रेजी सिंधी राजस्थानी गुजराती मराठी या किन्हीं भी भाषाओं में रचे साहित्य को किसी भी भाषा में अनूदित कर साहित्यकार किस तरह सहजता सरलता से वैश्वीकरण में पाठक की महत्वपूर्ण भूमिका बना देते हैं ।

मां, रोटी भी क्यों गोल !

घर में तू बनाती
पेट भरने को
मां,
वह रोटी भी क्यों गोल !...

क्या हम भूख को देते धोखा
सच्ची बोल

मां, रोटी भी क्यों गोल!

मां, सारी दुनिया देती धोखा

चारों और हो रहा गोलमाल

लंबी, चपटी सब चीजों में भरी पोल

घर में तू बनाती पेट भरने को

मां, वह रोटी भी क्यों गोल!

क्या हम भूख को देते धोखा सच्ची बोल

सीखा तुझसे तोलमोल के बोल

मां, फिर भी सारी दुनिया देती धोखा

मानव-मानव में अपने पराये का जहर घोल

प्रकृति का खजाना स्वार्थ की चाबी से खोल

चांद-सूरज ठंडे-गरम मगर हैं वे भी गोल

मां, ऐसा कर कुछ समझे दुनिया सच्चाई का मोल

मां, सारी दुनिया में हो अपनापन

कहीं न हो कोई परेशान

सब तुझ-से हों निश्छल, ममतामयी

तू दे ऐसी घुट्टी बच्चों को मां

और घर में तू बनाती
पेट भरने को
मां,
वह रोटी भी क्यों गोल !...

क्या हम भूख को देते धोखा
सच्ची बोल

मां, रोटी भी क्यों गोल!

मां, सारी दुनिया देती धोखा

चारों और हो रहा गोलमाल

लंबी, चपटी सब चीजों में भरी पोल

घर में तू बनाती पेट भरने को

मां, वह रोटी भी क्यों गोल!

क्या हम भूख को देते धोखा सच्ची बोल

सीखा तुझसे तोलमोल के बोल

मां, फिर भी सारी दुनिया देती धोखा

मानव-मानव में अपने पराये का ज…

तितली बन पंख लगा ...

फ़ूल और तितली की तरह /
मुस्कुरा /
पंख लगा  /
काँटों में भी जी /
प्रकृति - समभाव आत्मसात कर !
तितली !
फ़ूल और तितली की तरह /
मुस्कुरा कर जीयें हम /
तितली बन पंख लगा कर जीयें हम /
काँटों में भी मुस्कुराएँ और फ़ूल बनकर जीयें हम /
फ़ूल - कांटे और तितली जैसे हिलमिल कर रहें हम /
फ़ूल और तितली की तरह ...मुस्कुरा कर जीयें हम...

प्रकृति के साथ रह कर हम समभाव से जीवन जीने की कला को आत्मसात कर सकते हैं !
ऐसे जैसे तितली ! प्रकृति के साथ नृत्य करती तितली...। तितली को देखकर बच्चे ही
नहीं बल्हि हर आयुवर्ग के लोग प्रसन्न होते हैं। खासतौर से बच्चों को तो मानो
तितली अपने पास बुलाती है... इसीलिए बाग बगीचे का नाम आते ही बच्चे सबसे पहले
तितली को याद करें तो आष्चर्य कैसा...! और ... हम भी ऐसे बन जाएँ की हर कोई
हमारे और हम हर किसी के पास जाकर प्रसन्न हों !

Life...

दूर हुआ निराशा का साया !..

पनघट पर... मुंह छुपाए... बेजुबान पशुओं के पास

घास
खाने को
नहीं मिलती
बरसात के बाद जल गई
तेज धूप से
मैं
पशुओं को ले
दर-दर भटकता रहा
षहर और गांवों में
टीवी, रेल, हवाई जहाज, आलीशान मकान
व्ैाज्ञानिकों का सम्मान
सबकुछ देखा
न देखा तो केवल कहीं बच्चों का स्वछन्द खेलना
कहीं हराभरा खेत और पशु धन के लिए
घास
संस्कृति एक कोने में दुबकी
गांव के पनघट पर
परंपरा मुंह छुपाए खड़ी
मेरे बेजुबान पशुओं के पास
जो निरीह आंखों से ढूंढ़ रहे
घास