Monday, December 31, 2012

स्वागत... नववर्ष का स्वागत करने को अब दिल नहीं करता


स्वागत !!!

( Old Poem )
नववर्ष का स्वागत करने को अब दिल नहीं करता
क्योंकि
कुछ लोग ऊपर से नजर आते हैं गांधी, कुछ नेहरू
मगर कोई बोस नहीं दिखता
इन सभी का जो सच्चा अवतार आ जाता
पता नहीं क्या से क्या हो जाता
कुछ लोग रावण हैं हर बार एक और चेहरा लगा लेते हैं
परन्तु रावण का चेहरा  नया हो या पुराना
देखकर रावण ही याद आता है
क्योंकि बदल लेने पर भी चेहरा
राम वो बन नहीं पाता इसलिए
स्वागत करने को अब दिल नहीं करता
क्योंकि
वर्ष नया हो या पुराना दिल के घाव नहीं भरता
पूरब को पश्चिम से नहीं जोड़ता
एषिया को यूरोप से नहीं मोड़ता
हिंसा, जो थी महाभारत काल में
या थी जो प्रभु यीशु के समक्ष
या उस समय जब गिराए गए परमाणु बम
वहीं हिंसा कारगिल की ऊंची पहाड़ी में छिपी
अपहृत हुए कंधार पहुंचे विमान में दिखी
इस हिंसा को कोई वर्श अहिंसा में नहीं बदलता
नववर्ष का स्वागत करने को अब दिल नहीं करता

Sunday, December 30, 2012

फिर सो ना जाना

फिर सो ना जाना

कह रही है
सितारों से झाँकती वो आंखें
हर घर हर बेटी बन
देखती रहूंगी
जाग्रत रहना
फिर सो ना जाना

Friday, December 28, 2012

Gidwani's "March of the Aryans" along with his earlier book, Return of the Aryans"


Gidwani's "March of the Aryans" along  with his earlier book, Return of the Aryans" 

सम्माननीय भगवान गिदवानी जी की सद्य प्रकाशित पुस्तक के बारे में ईमेल प्राप्त हुआ। अमूमन अनजाने स्रोत से प्राप्त ईमेल पढ़ने से गुरेज करता हूं किंतु श्री गिदवानी जी का नाम और प्रेषक  के बारे में अल्प जानकारी पर मेल पढ़ा और नायाब पुस्तक के बारे में जिज्ञासा बढ़ गई। प्राप्त मेल के अंश साझा कर रहा हूं...
...   Gidwani also explains how the country, with  far-flung frontiers, and thrice the size  of present-day India, came to be known as Bharat Varsha.

 All literature on India begins with the Vedic Age. Gidwani's "March of the Aryans" along  with his earlier book, Return of the Aryans"  are  the only books which trace India's drama far back to pre-Vedic roots. Its appeal is, therefore, powerful and enduring to those in search of India's pre-ancient cultural, philosophic, spiritual and material heritage. Also, it fulfils a long-felt need to keep alive, for younger generation, the awareness of the foundation and eternal values of India's culture.


Author Gidwani is a best-selling historical novelist. His earlier book, “The Sword of Tipu Sultan was made into a major TV Serial for which he wrote the script, screen-play & dialogues.

Writing recently about March of the Aryans, Mr. Jadunath Shiroor observed:

“….Gidwani was a bureaucrat by profession. He was India’s Additional
Director General of Tourism, ex officio Joint Secretary & Director
General of Civil Aviation, Counsel for India at the World Court at
The Hague, Representative of India at ICAO (UN agency)
and finally, Director of ICAO (UN) in Montreal, Canada. Yet, he makes
an original and fundamental contribution to historical literature….”

Dr.Keane and Prof.Townsend have also endorsed the view of Mr. Shiroor to say that ‘March of the Aryans’ as also Gidwani’s earlier work, ’Return of the Aryans’, present an original contribution to historical literature though Gidwani does combine novelistic imagination along with his considerable research.

You have no doubt read other reviews as well, though the book was released only recently.

Wednesday, December 26, 2012

समकालीन चूहे और लोहे की तराजू

समकालीन चूहे और लोहे की तराजू   

भेड़िया आया, रँगा सियार जैसी कहानियाँ हमेशा राह दिखाती हैँ।डरने और डराने वालोँ को। दोनों को । सभी को । आखिर लोहे की तुला और चूहे भी तो खत्म ना होवै ...। चूहे और तराजू किसके प्रतीक हैं, कथा में यह समझना उत्तर आधुनिक काल में साहित्यिक जगत में कोलाज की मीमांसा करने जैसा है । जिसे जैसा अनुभूत हो वैसा अर्थ अभिव्यक्त करे ।  जमाना चाहे कोई हो, अमर सँस्कृत साहित्य की कथाएँ जीवन के हर क्षेत्र मेँ प्रासँगिक लगती हैँ। समसामयिक परिप्रेक्ष्य मेँ जीवँत होती दिखती हैँ। छल कपट से भरे पात्रोँ के नकाब उतारने के अलावा ऐसी कहानियाँ मलिन विचारोँ वाले धूर्त पाखँडी लोगोँ की पहचान कराने मेँ भी सहायक हैँ। बड़े बुजुर्गोँ ऋषि मुनि व विषय विशेषज्ञ विद्वानोँ ने सुखी और सफल जीवन जीने के मँत्र साहित्य के जरिये सुरक्षित सँरक्षित रखे हैँ। पँचतँत्र, हितोपदेश लोक कथाएँ , कहावतेँ मुहावरे, लोकोक्तियाँ , लोकगीत , जनश्रुतियोँ मेँ ऐसे "मँत्र" भरे पड़े हैँ।   

साजिश और सादगी

साजिश और सादगी 

साजिश  में  मशगूल /
साजिशी  को  फुर्सत  नहीं  थी /
सज्जन  साजगिरी  गुंजाता /
सादगी  से  'पार ' पहुँच  गया...
......( दूसरो को भटकाने वाला अपने ही
लक्ष्य से भटक जाता है और  कभी मंजिल तक नहीं पहुचता जबकि अपने काम से काम रखते
हुव़े लगातार लक्ष्य की ओर बढ़ने वाले को निश्चय ही मंजिल मिल जाती है...)

Monday, December 24, 2012

रोने से रोज़ी नहीं बढ़ती

रोने से रोज़ी नहीं बढ़ती  

अनथक कर्म करने के बावजूद वांछित प्रतिफल नहीं मिलने की षिकायत करने वाले बहुतेरे होंगे लेकिन कोई उनसे पूछे क्या रोना रोने से रोज़ी बढ़ती है ! दरअसल मैनेजमेंट कोर्स, अध्यात्म और व्यक्तित्व विकास जैसे प्रषिक्षणों में सकारात्मक विचारों की महत्ता बताई ही जाती है। ये सकारात्मक विचार-पाठ कोई आज के ईजाद पाठ्यक्रमों में प्रयुक्त नहीं होते बल्कि ‘‘उस्ताद-षागिर्द’’ काल से भी बहुत - बहुत पहले ‘‘गुरु-षिश्य’’ युग से सकारात्मकता को महत्व मिला हुआ है। पुराण कथाओं, ऐतिहासिक एवं लोककथाओं में भी सकारात्मक विचार अपनाने संबंधी सीख देने वाले उद्धहरण भरे पड़े हैं। आज का युग कल कारखानों में सिक्के ढालता है तो कभी श्रमिक वर्ग को खेत खलिहान में पसीना बहाकर या व्यापार के लिए दुरूह यात्राएं कर सेठ साहूकारों के लिए ‘‘गिन्नियों की थैलियां’’ भर लानी होती थी। श्रमिक वर्ग तब भी वांछित लाभ से वंचित रहता और आज भी कमोबेस ऐसा होता है। साथ ही यह भी तय है कि जगह जगह ऐसा रोना रोने वाले को लाभ भी बढ़ा हुआ नहीं मिलता। अर्थात युग और काम का रूप बदल गया लेकिन व्यवस्था ले देकर वहीं की वहीं रही ! प्रवष्त्ति भी नहीं बदली ! हां, जमाने ने अनथक परिश्रम करने वालों को षिखर पहुंचते जरूर देखा है।

Saturday, December 22, 2012


पल पल
विश्वास मुस्करा रहा
पल पल
आओ करें
आने वाले नए पल का स्वागत
पल पल
बीत रहा
पल पल
जी रहा
पल पल
मुस्काना
सिखा रहा
पल पल
पास बुला रहा
पल पल
विश्वास बढ़ा रहा
पल पल
पल पल
अंधेरा दूर भाग रहा
पल पल
उजाला बढ़ा रहा
पल पल
आओ करें
आने वाले नए पल का स्वागत

Wednesday, December 19, 2012

मचलना हवाओं से सीख
संग चलना लहरों से सीख
जीना जिंदादिलों से सीख
हर खुशी हऱ दर्द से सीख
भीड़ में अलग दिखना सीख


Tuesday, December 18, 2012

कूचु ऐं शिकस्त...1300 साल पहले...

पंजाब केसरी राजस्थान संस्करण में ... 

18 Dec 2012  

(श्री राजेंद्र सैन) 

ऐतिहासिक उपन्यास कूचु ऐं शिकस्त...1300 साल पहले का कथानक 


1300 साल पहले का कथानक ...

ऐतिहासिक उपन्यास कूचु ऐं शिकस्त...1300 साल पहले का कथानक 


Saturday, December 15, 2012

... सौदा कर नफा हो


... सौदा कर नफा हो   

अनोखे काम करने वाले को प्रसिद्धि मिलती है लेकिन ऐसे ‘‘अनोखे लाल’’ बहुत कम होते हैं। कम ही जगहों पर होते हैं। लेकिन सामाजिक जीवन में ही नहीं बल्कि हर क्षेत्र में एक बात बहुत ही विश्वास के साथ कही जाती है, भला कर भला हो । साधु संत या फकीर ही नहीं बल्कि साधारण गृहस्थ भी इस मंत्र को मानता और जपता है। सभी इसे क्रियान्वित भी करते हैं। जमाना आधुनिक है तो विचारों में भी नयापन आना ही है सो भला कर भला हो के साथ कहा जाने लगा सौदा कर नफा हो। यह कोई ताना मार कर कही जाने वाली बात नहीं बल्कि हकीकत की तरफ इशारा है। कहते हैं हर बात के एकाधिक अर्थ होते हैं। कभी किसी फकीर ने इसका मर्म समझा और कहा। क्योंकि जब भला करने पर भी भले की चाह हो तो इसे सर्वशक्तिमान से सौदा नहीं माना जाएगा क्या ! दूसरे अर्थ में व्यापारिक सौदे में भला करने से तो नफा हाथ आएगा नहीं लेकिन भलेमन यानी ईमानदारी से सौदा करने वाला नफे से वंचित भी नहीं रहता।

Thursday, December 13, 2012

रब वसदा उस घर ...

निक्की जई कुड़ी  

 रब वसदा उस घर
जिस घर विच होवे
 इक निक्की जई कुड़ी
जेड़े वेले वेखो
खेडदी कुडदी
खिलदी खिलाँदी
 रोन्दी पर
 रोण नीँ डेन्दी
वडे वडाँ वास्ते
तकलीफाँ दूर करण लई
इक इ दवा दी पुड़ी
 इक निक्की जई कुड़ी
 जेठ विच जदोँ तपदी दुपैरी
  झल झल पखा
थक जान्दी दादी
 राणी जगदी
सोन्दी बान्दी
 वेड़े विच खेडदी
नचदी टपदी
बण आन्दी ठँडी हवा
 दे जान्दी निन्दर दा झोँका
इक निक्की जई कुड़ी
 निक्के काके दी हँसी
पापे दी खुशी
माँ दी लाड़ली
भरावाँ दी अखाँ दा तारा
बुआ लई गुड्डे दी गुड्डी
 इक निक्की जई कुड़ी
ताँ ई ताँ केन्देन साडे बाबा
रब वसदा उस घर
जिस घर विच होवे
इक निक्की जई कुड़ी

सिन्धु जे करे... sindhi story - sindhu je kare....



सिन्धु जे करे... 

Sindhi story

सिंधी कहानी - मोहन थानवी
..........................................
बेबी - पचाइणि जे लाय अटो कोने। तव्हां था चवो दिकीय ते दियो बार। मटि वटि दियो बार।
शामो - पुटि, चांवर त रंध्या अथई। उननि जो पिण्डु ठाहे करे ब दिया बारे वठि।
बेबी - बाबा...खाइणि जो घीयु-तेल बि कोने। कवड़ो तेल प्यो आहे। दियनि में उवो विझां...।
शामो - हा...हा पुटि, अजु चण्डरात आहे। दियो बारनि जरूरी आहे।
गाल्हि-बोल्हि कन्दे बेबीअ दिया ठाहे-बारे वड़ता। 12वरहें जी बेबीअ खे याद आहे, साल अगि ताईं उनजी माउ, सखीबाई चण्डरात जे दिहं दियो जरूर बारदी हुई। उनजे बीमार थिहणि खां पोय बाबा बि दियो जरूर बारदो आहे। अजु बाबा चाक कोने। सखीबाई इस्पाताल में आहे। घर जो सजो कमुकारु बेबीअ जे कंधनि ते अची वियो आहे। पैसे जी सोड़, दवा-दारूअ जी घुरज। बाबा जी 1500रुप्यनि जी प्राइवेट नौकरी। इन सभिनी गाल्हिनि बेबीअ खे जल्दी वदो करे छजो आहे। उन बाबा खूं पूछो - चण्डरात ते दियो छो बारदा आह्यो।
शामो - पुटि, दरियाशाह जी मेहर कदंहि थे, कुझ खबरु कोने। उदेरेलालजी खुशी एं पंहिंजी सिन्धु जी रीति, पंहिंजा दिहं-त्योहार मनाइणि में सभिनी जो भलो आहे।
बेबी - पर बाबा, रन्धणे में भलि अटो बि न हुजे!
बेबीअ जे सुवाल शामेमल खे कुझु चवण जे लाइ लफ्ज गोलणि जो वंझ बि कोन दिनो। हू वीझे रखयलि लोटे खे खणी पाणीअ जा ब ढ़ु़ुक पंहिंजी सुकयलि निरीय में गिड़काए वियो।
बेबी बि पंहिंजे बाबा जी मजबूरी समझी वेई। उन चुपड़ी करे वेहणि सुख्यो समझियो। पर केतरी देर। आखिरु उन बाबा खे चई मन हलको कयो। बाबा - अजु राधी मासी आई हुई। चयांईं त स्कूल में सफाई करणि एं मास्तर-मास्तराननि खे चांय-पाणी पिराइणि जो कमु कन्दींअ त चार सौ रुपिया महीनो बधी दिन्दी। बाबा, मां सुभाणे खां स्कूल वं´ां!
शामेमल जी अख्यिूनि मूं गोड़ा प्या वहनि। इन नन्ढुड़ी उम्र में उनजी किकी पंहिंजे लाइ फ्राक कोन थी घुरे। साइरनि सां गदिजी रांद करणिजी जिद कोन थी करे। घर में पैसे जी सोड़ दिसी मुंहिंजी धीअ, मुंंिहंजो पुटि थी बणजे। शामे पंहिंजी अख्यिूं बे पासे फेराये बेबीअ खे चवो - पुटि, भलि वं´ें।
बेबी बाबा जे वातूूं हा बुधी खुश थी वेई। बाबा खे थालीअ में चांवर एं वटिअ में दहीअ जी कढ़ी विझी दिनई। इस्पाताल वं´णि जी तियारी कन्दे शामे खे चवई - बाबा, महीनो पूरो थीेन्देई स्कूल मूं मिलन्दड़ रुप्यिनि मूं मां छा वठि इन्दसि - खबर अथव!
शामे चयूसि - पुटि, बुधाइन्दीअं त खबरु पवन्दी।
बेबीअ चवो - सभनि खं अगु मां पितल जा ब सुहिणा दिया एं अध सेरु सचो घीअ आनदसि। सच्चे घीअ जा दिया रोज बारदसि। बाबा, दिसजो, पोइ त झूलणलाल सब दुख यकदमि दूर कन्दो। एं हा बाबा - अम्मा चाक थी इस्पाताल मूं घर इन्दी त थदो बि पचाइन्दसि। सिन्धु जी रीति आहे न! इयो मुहिंजे मन जो - लाल सांईंअ खे पल्लव बि आहे।
शामोमल अख्यिूनि मूं वहिन्दड़ पाणी हथ सां उघी अमरलाल जी फोटूअ खे प्यो निहारे। फोटूअ में पलो-मछीय ते वेठलि अमरलाल चपनि में मुश्के प्यो। शामे अख्यिूं बूटे ज्योतिनि वारे साहिब खे चवो - सिन्धु जा वली - लज रखजें। जंहिं नन्ढुड़ी नर फकत सिन्धु जो नालो इ बुधो - उवा बि तोखे ऐतरो मने थी। सिन्धु जे करे उनजे मन में बि प्रेम आहे। शलि - असां सभि वदा - नन्ढुड़ा थी वं´ूं। सिन्धु जे करे। जय झूलेलाल।

Wednesday, December 12, 2012

काटा और उलट गया


 काटा और उलट गया  

आज कतिपय लोग अपनी बात से, अपने द्वारा किए गए काम से, अपने बयान से, अपने वक्तव्य से, अपने वादों से मुकर जाते हैं। दरअसल ऐसी प्रवष्त्ति नई नई पैदा नहीं हुई है। प्राचीन काल से ऐसे लोग समाज और राज में रहे हैं। मैंने ऐसा तो नहीं कहा था, ... कहने में देर नहीं लगाते। फिर आज तो मीडिया द्वारा प्रचार प्रसार का जमाना है और ऐसे में कोई बात पलभर में दुनिया भर में चर्चा का विषय बन जाती है। तुर्रा यह कि अधिकांश विवादित मामलों में संबंधित पक्ष यह कह कर पल्ला झाड़ने का प्रयास करता है कि मेरे या हमारे कहने का गलत अर्थ लगाया गया है। हमारे कहे को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया है। बड़े बुजुर्गों की बात याद करें तो ‘‘काटा और उलट गया’’ के माइने समझ में आते हैं। बुजुर्ग कह गए हैं, काटा और उलट गया। उलट या पलट जाने के माइना भी हर बात की तरह एकाधिक हैं। उलट जाना यानी सर्प की तरह काट कर उलट जाना । किसी काम को करके मुकर जाना। अपने अनुभवों के इशारों से बुजुर्गों ने ऐसे लोगों से सचेत रहने की नसीहत दी है।

Sunday, December 9, 2012

आप से गया तो जहान से गया


आप से गया तो जहान से गया   

आज की बात नहीं बल्कि प्राचीन काल से हमारी संस्कष्ति, हमारे संस्कार और परंपराएं हमें सामाजिक जीवन में आगे बढ़ने में सहयोगी रहे हैं। हम किसी भी धर्म में आस्था रखते हों, किसी भी समुदाय से जुड़े हों हमंे अपने जमीर, अपनी अंतरआत्मा की आवाज को वरीयता देने की सीख मिली है। पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जी ने भी अंतरआत्मा की बात कही थी। दरअसल अध्यात्म में अपने विवेक को जगाने की शक्ति है और जो खुद उच्च विचारों वाला और मानसिक - बौद्धिक रूप से शक्तिशाली होता है उसे खुदा किसी भी क्षेत्र में कभी भी कमजोर नहीं होने देता। सूफी संतों ने भी कुछ ऐसा ही संदेश दिया है। मन की शक्ति बढ़ाने की बात कही है। यही कारण है कि हमारे बुजुर्ग कहते रहे हैं, आपसे गया तो जहान से गया। सच भी तो है, जो अपने काम से खुद संतुष्ट नहीं, वह आसानी से समझ जाता है, दूसरे लोग भी उसके काम से संतुष्ट नहीं हैं। जो जाने अनजाने खुद से हुए कुकष्त्यों को जान समझ कर भी पश्चाताप नहीं करता, उसे अंततः ग्लानि तो होती ही है और ऐसा व्यक्ति अपनी ही नजरों में गिर जाता है। यह तो जाहिर बात है कि जो खुद अपनी नजर में गिरा, वह दुनिया की नजरों में भी गिरा।

Friday, December 7, 2012

शब्द तेरे लिए हैं अपने मायना खुद लगा मेरे या किसी और के अर्थ किताबों से बाहर आ भी जाएं तो क्या तेरे लिए तो वो तब तक शब्द ही होंगे जब तक तेरे मायना न होंगे

शब्द तेरे लिए हैं
अपने मायना खुद लगा
मेरे
या
किसी और के अर्थ
किताबों से बाहर
आ भी जाएं तो क्या
तेरे लिए तो वो
तब तक शब्द ही होंगे
जब तक
तेरे मायना न होंगे  

Thursday, December 6, 2012

आगे चलते हैं पीछे की खबर नहीं

MUKHAUTE = mohan thanvi

आगे चलते हैं पीछे की खबर नहीं      
अकस्मात तो कुछ भी हो सकता है। जागरूक हो कर चलने वाले को कभी परेषानी का सामना नहीं करना पड़ता। वरना - आगे चलते हैं पीछे की खबर नहीं की तर्ज पर भविश्य प्रभावित हो सकता है। खासतौर से नव धनिकों को आज के ‘‘सेंसेक्स लाइन’’ पर दौड़ते युग में सोच विचार कर ही दांव लगाने चाहिए। बड़े बुजुर्गों ने अपने अनुभवों से ऐसी बातें कही हैं जो व्यक्ति को व्यवहार कुषल बनने में सहयोगी बनती हैं। मैनेजमेंट और व्यक्तित्व विकास के पाठ्यक्रमों में भी ऐसी बातें आज की आवष्यकता के अनुसार नए रंग रूप में ढाल कर षामिल की गई हैं। पैसा और रुतबा कमाने के लिए एक उम्र गुजार दी जाती है किंतु आसानी से धनिक बनने वाली नई पीढ़ी बेखबर रहकर धन राषि खर्चने के लिए कदम उठाती है तो लगता है बस चले जा रहे हैं, कहां पहुंचेंगे खबर नहीं। याद रखना जरूरी है, अकस्मात धन आने के रास्ते खुले है तो जाने के रास्ते बंद करने की जिम्मेवारी भी सामने है।

Monday, December 3, 2012

sindhi paheli = कारे बन में कारो जीवु खून पीअण वारो आ हीउ = जूं+ सिर के काले बालों में जूं


sindhi paheli = कारे बन में कारो जीवु
खून पीअण वारो आ हीउ = जूं+सिर के काले बालों में जूं

Sunday, December 2, 2012

तिनके की चटाई नौ बीघा फैलाई

तिनके की चटाई नौ बीघा फैलाई

आदमी का स्वभाव वक्त बीतने के साथ बदलता है और हम कहते हैं वक्त बदल गया। लेकिन आदमी का दिखावा करने का स्वभाव कितना ही वक्त बीत जाएए बदलने का नाम ही नहीं लेता। कोई न कोई कहीं न कहीं किसी न किसी बात पर दिखावा कर ही लेता है। किसी काम को बढ़ा चढ़ा कर भी पेष किया जाता है। तिनके की चटाईए नौ बीघा फैलाई। काम से अधिक प्रचारित करना। गंभीरता से किए जाने वाले कामों का भी ऐसा हश्र होता देख जानकार आदमी अफसोस जताता है। अक्सर सरकारी योजनाओं के प्रचार प्रसार में ऐसा होता है। कुछ निजी क्षेत्र की कपनियां भी अपने लाभ को बढ़ाने के लिए अपने कामों को बढ़ा चढ़ा कर प्रचारित करती हैं। ऐसी ही प्रवष्त्ति किसी व्यक्ति में भी दिख जाती है। बिजनेस के लिए प्रचार करना तो फिर भी समझ में आता है जैसे कि किसी सिनेमा के रिलीज होने के तीन चार महीने पहले से ही प्रतिदिन टीवी चैनल और अखबारों में रोजाना आठ दस बार प्रोमो दिखाना। इस तरह जितनी संख्या में प्रोमो दिखाया जाता है कुल उतने दिनों तक कोई फिल्म सुनहरे पर्दे पर टिकती भी है। इसकी जानकारी हो भी तो फर्क क्या पड़ेगा। हांए सीधा समाज और लोगों के हित से जुड़े सरकारी और अन्य क्षेत्रों के कामों के बारे में ऐसे प्रचार का असर पड़ता है। लोगों की जेब से ही निकाली गई राषि से भरी सरकार की तिजोरी जो खाली होती है। - mohan thanvi - 
बीकानेर एक्सप्रेस से साभार

Friday, November 30, 2012

सिंधी नाटक कृपालु संत साधु वासवाणी

सिंधी नाटक कृपालु संत

जे पहिरियें सीन जो आखिरी भांङों पेशु आहे --

( इयो नाटक हिंदू अजमेर में अरबी सिंधीअ में साया थिअलि आहे )

... दादा साहिब चवनि था, डिसो। जहिं संत माण्हूंनि खे इ न बल्कि हरेकु प्राणीअ खे हिकु जेहिड़ो भगवान जो सृजन बुधायो हो, उन्हींअ इ संत लाइ झूनी ऐं नई टहीअ में तकरार जी गाल्हि बुधी मूखे खिल इ त इन्दी।
माण्हूं चवनि था, दादा तव्हां असांखे साधु वासवाणी साहिब बाबत जाण ड्यो।
दादा जे पी वासवानी साहिब चवनि था, - संत साधु वासवानी त पाण चवन्दा हुआ, जीव मात्र में फर्कु न कजे। ऐं तव्हां उननि इ संतनि जी गाल्हियूंनि खे दरकिनार करे जीव मात्र इ न बल्कि खुद उननि संतनि जे नाले ते बि झेड़ो था कयो। इननि संतनि त पहिंजी सजी हयाती तप करे भगवान खां माण्हूनि जो भलो घुर्यो।
माण्हुनि जे वरी जोर डिहण ते दादा साहिब कृपालु संत साधु वासवानी जी हयाती ऐं उननि जे उपदेशनि बाबत तफसील सां गाल्हियूं बुधाइनि था। इनि वक्ति इ पार्टी में दादा श्याम जो भजन गूंजे थो, -
अलख धाम मां

नाल्हे मौत तिनि लाइ, अंखियूंनि जिनि जूं निहारनि,
पहाड़नि त तिनि डे, जीअं प्यारनि खे पुकारनि!
रहनि रहम में से त आल्यिूंनि अंख्यिूंनि,
सबक इक त सिक जो, से आहिनि सुख्यूं!
पया था त कोठनि, प्रभुअ जा पहाड़ा!
अचनि यादु वरी वरी, पया से त प्यारा!
करे केरु दूर, प्यारनि जी जुदाई !
जीवन आहे जिनि जी, प्रभुअ में समाये!
मरे ही बदनु थो, जिस्मु ही जले,
पर आत्मा अमर, सदा पयो हले!
काल डिस जो घर, फकत काल ढाहे,
पर आत्मा अजरु ऐं अविनाशी आहे!
मरे कीअं कोई ऊंव, न कोई कीअं साड़े,
न कोई मौत परदो, रखी उन परे
अलख धाम मां आहे, नूरी निमाणी
रहे रोज रोशन, न रह तूं वेगाणी।

दादा जे पी वासवानी साहिब इयो भजन अंख्यूं बूटे झूमन्दे झूमन्दे बुधी रहिया हुवा। जीअं इ भजन पूरो थे तो, दादा साहिब हथ जोड़े भगवान ऐं संत साधु वासवानी खे निमनि था। भरियलि अंख्यूं उघी करे दादा साहिब पहिरीं नूरी गं्रथ जी वाणीअ जे दोहनि जी व्याख्या था कनि । अध्यात्म जी इनि गाल्हि खे पूरो करण बैद दादा साहब तफसील सां कृपालु संत साधु वासवानी जे जन्म खां वठी उननि जी हयातीअ बाबत बुधाइण शुरू था कनि।
जीअं जीअं संतनि बाबत बुधाइन्दा था वंञनि, तीअं तीअं माण्हुनि जी अंखियूंनि जे अगियूं कृपालु संत साधु वासवानी साहिब जियूं लीलाऊं इअं तियूं थिअनि जण त सबकुझु साम्हूं ही थी रहियो आहे।
दादा जे पी वासवानी साहिब जो आवाजु गूंजी रहियो आहे। माण्हूनि जी निजरनि अगियूं ज्ञान जी ज्योतिअ सां चिमकन्दड़ दादा साहिब जी मूरति मुश्की रही आहे।

सीन -2................................

Thursday, November 29, 2012

अजब कीमियासाज ...

sckech by & PIYU
अजब कीमियासाज हैं 'वे' लोग । मिट्टी को सोना बताते हैं ...  । लेकिन इससे नुकसान न सोने को होता न मिट्टी को । क्योंकि तिजारत पसंद हैं बाकी लोग... अपने मिट्टी के ढेलों की भी कीमत  कीमियासाजों  से ही सोने के भाव वसूल लेते हैं ।  = आखिर नुकसान कीमियासाज को ही होता है ।

Tuesday, November 27, 2012

प्रकृति पहले स्वयं बदलती है फिर हमें बदलना ही पड़ता है।

Novelist Mohan Thanvi Bikaner
प्रकृति पहले स्वयं बदलती है फिर हमें बदलना ही पड़ता है।

Sunday, November 25, 2012

पांच रुपए की दीर्घ कथा

Hindi / Sindhi / Rajasthani Novelist Mohan Thanvi 

पांच रुपए की दीर्घ कथा- 

 बाबूजी साग वाले से बोले -  बेटा चार टाइम के लिए 2-2 रुपए की मिर्च धनियां अदरक और 5-5रुपए की पालक मैथी मूली तोल दोगे या ज्यादा का लूँ ? साग वाले ने कहा काफी है बाबूजी । आपको न दूंगा तो जीवन कैसे सुधारूंगा । और एक रुपया खुला न हो तो 20 रुपए ही दे देना । रुपए चुका कर साग से भरा थैला संभाल बाबूजी बोले - महंगाई को तो पंख लगे हैं । वृद्धावस्था पेंशन के हम दोनों को मिलने वाले 500 रुपए से हम दोनों का गुजारा नहीं होता बेटा । जाने लगे कि एक बच्चे ने साग वाले की पीठ पर चढ़ते हुए कहा , बाबा स्कूल जा रहा हूं खर्ची दो । साग वाले ने उसे लाड़ करते हुए 5 रुपए दिए । बच्चा तुनक कर बोला - ये क्या बाबा, 5 रुपए की तो मिर्ची भी नहीं आती और मुझे लेनी है चॉकलेट। कम से कम 50 रुपए लूंगा । साग वाले ने बाबूजी से नजरें चुराते हुए 50 रुपए देकर बच्चे को विदा किया । बाबूजी भी रुके नहीं । साग वाला मुझसे बोला - देख लो मास्टर जी । चॉकलेट 50 और साग 5 का, इसलिए महंगाई तो बढ़ेगी ही । 

Tuesday, November 20, 2012

गीत जीत रा गावां ला जी... करणी माता जावांला...

गीत जीत रा गावां ला जी... करणी माता जावांला...
देशनोक में करणीमाता जी के भी दर्शन किए तो अहमदबाद से आए भतीजे पिंटू ने काबा के दर्शनार्थ बहुत जतन किए... श्वेत काबा को तो कैमरे में नहीं ला सके...

गीत जीत रा गावां ला जी... करणी माता जावांला...

गीत जीत रा गावां ला जी... करणी माता जावांला...
देशनोक में करणीमाता जी के भी दर्शन किए तो अहमदबाद से आए भतीजे पिंटू ने काबा के दर्शनार्थ बहुत जतन किए... श्वेत काबा को तो कैमरे में नहीं ला सके...

Saturday, November 17, 2012

लहरें सागर की / उनका ख्याल भी ...

उनका ख्याल भी लहरें सागर की ...    

उनकी मुस्कान भी 
कहकहा 
मान 
दिल 
धड़क धड़क जाता है ...
 
वो 
आंख की कोर से देखते हैं 
आहट पे ... 
फिजां खुशबूदार हो जाती है ...
 
वो तो हैं हीं बलखाती उमंगें ... 
उनका ख्याल भी 
लहरें सागर की 
लगता है ... 
दिल 
धड़क धड़क जाता है ...

Friday, November 16, 2012

बचपन की दोस्ती और किशोरवय की मोहब्बत


भुलाने लगे कोई जब तो...
ठहरे हुए पानी में...
कंकर मार कर ...
हिलोरे उठाना, बताना...
बचपन की दोस्ती और...
किशोरवय की मोहब्बत...
कम नहीं होती ताउम्र ...
... वो भी जानते हैं...
ये सब...
फिर भी...
रहते क्यों दूर दूर...
... बता दो कोई उन्हें ये...
सपने देखे हैं---
 उनकी भी आंखों में---
हमने भरपूर !

Friday, November 9, 2012

अबकै दीवाली री मंगल वेला मायड़ भाषा मान्यता सागै..

दीवाली रा दीआ दीठा अबकै...

गजानंद जी रिद्धि सिद्धि सागै...

महालक्ष्मी विष्णु जी सागै...

अबकै दीवाली री मंगल वेला मायड़ भाषा मान्यता सागै...

जै जै गणेश जै जै महालक्ष्मी...
जै जै मां मरु भूमि... जै जै मायड़ भाषा ...

शुभ मंगल लाभ दीपावली

नूवीं पीढ़ी इण ग्यानगंगा में डुबकी लगावण सूं वंचित नीं रै जावै ...kailandar sun barai ... Rajasthani Novel se chuninda ansh....

kailandar sun barai ... Rajasthani Novel se chuninda ansh...

राजस्थानी नावेल कैलंडर सूं बारै से चुनंदा अंश ...

बाबोसा आपरै अ‘र समाज मांय जित्तो बदळाव देख्यो, ओ सगळो बीयांनै बारै सूं आयोड़ा पण अबै पकायत अठै रा ई पिछाण बणायोड़ा इण लोगां रै बदळाव सूं कमती लाग्यो। राजस्थान मांय बदळाव में इयां लोगां रो घणो महतव है। बंटवारै री पीड़ हिरदै में दाब्योड़ा अठै आवंणआळा घणा है। बंटवारै सूं पैळी आयोड़ा लोगां आपरी जगां अ‘र पिछाण सहर में बणा ली ही। अबै सगळा अठै रा ई यानी राजस्थानी ई गिणीजै।
बाबोसा ठीक ही कैवंता हा -

अेक मारग सूं जावै कित्ताई ऊंट, कित्तीई अरथियां
अ’र ठाकुरजी री सोभाजातरा निकळै
टाबर स्कूल भी अठै सूं ही जावै
जुआरी, सट्टेबाज भी ईं मारग रो जातरी
बळद अ’र बस-ट्रक भी ईं मारग सूं बैवै
कोई तीरथ करै कोई पूगै राज में
मारग तो मारग रैवै मिनख री सोच बणै मरज

मेलोडी बीं बगत तो मरज री बात जाण कोनि सकी पण जद खुद राजस्थान रै जीवटआळा मिनखां सूं मिल’र प्रकष्ति सूं संघर्ड्ढ करणो सीख्यो तो जाण सकी कै ओ मरज कांई होवै। इण मरज री जाण बीनैं राजस्थान रै जीवटआळा मिनखां सूं मिल’र होयी। अे जीवटआळा मिनख आपरै जीवन संधर्ड्ढ मायं मेलोडी नै सामिल कर्यो। मेलोडी, जिकी अठै आया सूं पैळी अमेरिका मायं दो-चार साल में पुरुड्ढ बदळ लैवंती ही, फिलिप्स सूं मिल्या बाद भारतीय संस्कष्ति री दीवानी हुयगी। भारत री आध्यात्मिकता री बात्यां उणनै राजस्थान खींच लायी। बाबोसा अ’र किरपाराम सूं जद बा मिली बीं दिनां में उणनै राजस्थान री विकास जातरा रो इत्तो ज्ञान कोनि हो जित्तो बाद मेें होवंतो गयो अ’र बा अचरज में पड़ती गई।
देस-समाज री विकास जात्रा री जाणकारी पौथ्यां में भले ही छप्योड़ी है, छपती रैवे, दुनिया बांचती रैवे पण जियांरै विकास री जात्रा है बै ई मिनख अणजाण रैवै। आ बात गांवां में कित्ताई मिनखां माथै उतरती दिखै। घणा मिनख है जियांनै कार-ट्रक-बस अ‘र रेलगाड़ी जिसी आधुनिक चीजां री जाणकारी है। अजकाळै टीवी अ‘र कम्प्यूटर माथै दुनियाभर री जाणकारी फोटूआं समेत दिखै आ बात भी लोग जाणै पण कोलायत रै एक गांव सूं दो-तीन बरस पैळी टाबरां रो एक दल नई दिल्ली गयो। अचरज री बात आ कोनी कि दल दिल्ली गयो। अचरज री बात तो आ है कि बीं दल में षामिल 15-16 साल रै टाबरां भी पैळी बार रेलगाड़ी देखी। बस देखी अ‘र दिल्ली में ऊंची-ऊंची बिल्डिंगा देख‘र बै टाबर अचरज रै सागर में उतरग्या। इण बात में कमी मिनखा री है कै राज री, आ सोचण री बात है।
मेलोडी आ बात भी जाणगी ही कै राजस्थान रै गांवां मायं घणा लोग आखरग्यानी भलेई कोनी पण बियांरे हिरदै में भगती भाव रो समन्दर बैवै। श्रीमद्भागवत री कथावां रै अलावा भी बै भांत-भांत री कथा सुणै। लोकदेवता बाबा रामदेव, नखत बन्ना अ’र ओसियां माता रै मंदिरां में कोसों दूर सूं लोग दरसन करणनै पूगै। कथा में रस होवै। संगीत हूवै। ताल हूवै। नूवें जमाने रे सागै कदमताल मिला‘र चालणरी एक कसिस हूवै। अचरज ओ भी कै कथा सुणावणआळा खुद निरक्षर होवंता भी जतन करै कै नूवीं पीढ़ी रो एक टाबर भी इण ग्यानगंगा में डुबकी लगावण सूं वंचित नीं रै जावै। बगेचियां अ‘र संता रै स्थान माथै भी बै संता सागै इण भांत री सीख दिराई जावै। संत भी समाज नै रास्तो दिखावण रो काम करै। संता री वाणी में ओज हूवै। बीं ओज सूं प्रवचन सुणनआळा रे हिरदै में कीं करण री इंछा जाग्रत हूवै। बाबो सा मेलोडी नै ओ भी बतायो कै कोई बगत हो जद अेक सहर सूं दूसरे सहर तांईं चिठ्ठी-पत्री पूगते-पूगते चार-छह दिन लाग जावंता। अजकाळै कुरियर सूं दूसरे दिन समाचार मालूम कर सकां। इत्तोई नीं बल्कि टेलीफोन सूं तो साम्हींआळा सूं बातचीत भी हो जावै, ,हाथोंहाथ। जमानो तो और भी आगे बढ्योड़ो है। कम्यूटर सूं ई-मेल होवै। आम्हीं-साम्हीं वीडियो रै मार्फत बातचीत होवै। पांच-दस मिनट मांय दुनिया रै अेक सूं दूसरे देस में बैठ्योड़े मिनख नै कांफें्रसिंग री मार्फत देख्यो-सुण्यो जावै। इंटरनेट सूं तो अजकाळै चारों धाम री जात्रा रो पुण्य मिल सकै। वेबसाइट माथै कित्ताई मिन्दरां रा दरसन होवै।
बाबोसा नै अेक पीड़ भी है। बै आंख्यां मायं आसा री किरणा चमकावंता बतायो - इत्तो सब है पण निरक्षरां री आज भी कमी कोनी। जात्रा रै वास्ते आज भी कित्ताई गांवां में साधन कोनी। पाणी-बिजली व्यवस्था रो अभाव है। कित्ताई गांव है जठै आज भी स्कूल कोनी। स्वास्थ्य केन्द्र कोनी। सड़क कोनी। सुराज सहर रै नजदीक है इण वास्ते बठै सुविधावां पूगी है। बाबोसा ही नीं मेलोडी नै राजस्थान रै बाकी सहरां रै लोगां भी अठै री काफी बात्यां बताई ही। क्यूंकि मेलोडी अबै राजस्थानी संस्कष्ति नै आपरै मायं समेट रैयी ही इण वास्तै उणरो वास्तो लेखकां अ’र कवियां सूं भी रैवंतो। जयपुर मायं अेक कवि सम्मेलन में जद ख्यातनाम कवियां आपरी अेक रै बाद अेक कवितावां री बरसात कर दी ही तो कद आधी रात भोर में बदळण लागी कोई नै ठा कोनि पड़ी ही। मेलोडी ने उण सम्मेलन में सुण्योड़ी आ कविता अजतांईं खूब याद है -

धूळ भरी बुद्धि सूं कियां दीसै सूरज, आंख्यां में माया भरी कोढ़ी होसी तन
काळो कळूटो तन जियां बियां ही बीतै ईसै लोगां रो जीवन
सिंझा रो सूरज दिनूगे रो चांद
कुआं में भांग घोळै भजै भजन
दीसै मिनख रूंख माथै
इनसानियत होयगी दफन
पूरब-पस्चिम सागै रैवै ईसो होवै जीवन

Tuesday, November 6, 2012

एलियन और सिनेमाई जादू ... क्या यह पौराणिक है...


एलियन और सिनेमाई जादू ... क्या यह पौराणिक है... ! 2009 में प्रकाशित सिंधी नॉवेल केदार साहब से चुनिंदा और संपादित अंश...
एलियनए कींअ न गोलमटोल मुंह वारो सिनेमा में डेखारियो अथवूं! परए असांजे पौराणिक ग्रन्थनि में बि त एहिड़नि चेहरनि जी गाल्हि डाडी बुधाइन्दी आहे! झूलेलाल!
केतराई दफा पाड़े में गोपाल डिठो आहेए होलीअ.डियारीअ खां अगु सिन्धी.पंजाबीए मुल्तानी पाड़े वारा भितनि ते गाइं जे छेणे सांए सिन्दूर ऐं बियूनि रंगदार शयूनि सां ऐहिड़ा लीका पाइन्दा आहिनिए जेके एलियन वांङुरु इ त लगन्दा आहिनि! घणो करे लीका पाइण जो कमु बुढ़यूं माइयूं कन्दयूं आहिनि। त छाण्ण्ण् त छा असांजी सिन्ध में माण्हूनि खे ऐहड़े एलियन जी पहिरी खां इ खबरु हुई! उननि एलियननि खे जूने जमाने में माण्हू देवी.देवताए पित्तर या केंहिं बे नाले सां पुकारीन्दा हुवा!
गोपाल पहिंजी एहिड़नि एलियननि जी दुनिया में गुमु हो ऐं रामी पहिंजी डॉल खे डाडीअ जे अगियूं नचाये पूछेसि पई . अम्माए इनि डॉल खे गाल्हाइणि केंहि सेखारियो! सखीबाईअ खे जयपुर जे डॉ कन्हैया अगनाणी जो लिख्यलि किताबु यादु आयो . बबलूअ खे सिन्धी सेखारियो न बाबा! अजु जे बबलूअ खे त सिन्धी सेखारण लाइ मास्तर रखण बि डुख्यो थी वयो आहेए पर जूने जमाने में असांजी सिन्ध जियूं गुड्डियूं बि सिन्धी गाल्हाइन्दियूं हुइयूं! झूलेलाल! इअं कींअ थी सघन्दो आहे!
सखीबाईए गोपाल ऐं रामी टेई हिकु बे खे पहिंजे दिलु में वसियलु दुनिया सां वाकिफु कराइणि पया चाहिनि। किस्मत जी गाल्हि आहेए टीनि जे मनु जियूं गाल्हियूं मनु में इ दबयलि आहिनि। उवईं जीअं इनि दुनिया जे हरेक षख्स जे मनु जीयूं गाल्हियूं जुबान ते कोन अची सघन्दी आहे।
दिमागु ते जोर डेई सखीबाईअ यादु कयोए  अबाणाए हलु त भजी हलूं जेहिड़ा सिनेमा बि उनिखे यादु आया। हलु त भजी हलूं सिनेमा में त लता मंगेषकर बि हिकु गानो ष्मुंहिंजा सुपरी तोखां विछुड़ीण्ण्ण्ष् गातो हो। सखीबाई पहिंजी सिन्धु जी यादुनि में वरी गुमु थी वई। ऐहिड़िनि गाल्हिनि में भला छो न गुमु थीन्दीए जेके उनिजे नन्ढपणि ऐं मादरेवतन सां गंढयलि आहिनि! हमेषा वांङुरु अजु बि उव्हा पहिंजे जेहनु में वेठलु सिन्धी कलाए सभ्यता ऐं संस्कृति जी गाल्हियूंनि जी उथल.पुथलि में विचरजी वई।
सखीबाईअ जियूं इये गाल्हियूं नन्ढपणि खां केदार बुधियूं ऐं हाणे उनजे बियनि बारनि खे बुधणजो वंझु मिलन्दो आहे। उननि जे दिलोदिमागु में पहिंजी मिठड़ी सिन्धु बाबत बुधलि गाल्हियूं वसी वयूं आहिनि। हाणे इननि बारनि खे बि इननि जी जाण थी वं´ें त नई टहीअ खे अचणि वारे वक्त में सिन्धु ऐं सिन्धीयत विरासतु में मिली सघन्दीए उननि खे पहिंजी सिन्धीयत खे गोलणो कोन पइन्दो।
पहिंजी भाषाए साहित्य ऐं संस्कृतिअ सां उवे परे कोन थीन्दा बल्कि मिठी सिन्धी बोली उननि खे सुरग जेहिड़ी पहिंजी सिन्धु जी महिमा बुधाइन्दी।
फिक्रुरुजी इया गाल्हि आहे। वडनि जी विरासत खे नई टहीअ तांई पुजाइण जो जब्बो पैदा करणो आहे लेकिन अजु सभई पहिंजेई कमनि में पूरा लगा पया आहिनि।
छा सिन्धीयत बाबत अचण वारी नई टही कुझ जाण वठण काण सिन्धी रिसालनि बदरां अंग्रेजीए हिन्दी या बियूनि भाषाउनि जी मुहताज थी वेन्दीएएण्ण्ण् इया चिंता छा केंहिंजे बि दिमागु में कोने!

लकीरें ...आंखें ...अनंत


क्या होगा
मिट जाने वाली
लकीरें खींचने से
आंखें तो
अनंत तक
देखती रहेंगी

Thursday, November 1, 2012

नाट्य कृति... जो छू गई दिल को...

नाट्य कृति... जो छू गई दिल को...
*************************
sindhi - पुस्तक परिचय
नाटक -     हत्या हिक सुपने जी (  Besed on Cross purposes – Albert Camus )
लेखक -     हरिकांत जेठवानी
प्रकाषक -     सुनील जेठवानी, 4 प्रकाष सोसायटी
                 राधे हरि अपोजिट निर्मल कान्वेंट
                 राजकोट 360007
संस्करण - 2012
सुपने जी हत्या मंझ रंगकर्म जी खुषी
सिंधी साहित्य जगत मंझ हरिकांत न सिर्फ नाटकनि लाइ बल्कि सिंधु समाज, साहित्य धारा ऐं आखाणी जे संपादन जे करे हमेषह याद रहिण वारो नालो आहे। पहिंजी लंबी हिंदी कविता एक टुकड़ा आकाष समेत हरिकांत हिंदी साहित्य संसार जो बि जातलि सुञातलि लेखक आहे। कविता में नवाचार ऐं पहिंजी कहाणिनि में समाज जी नुमाइंदी कंदड़ चरित्रनि खे बुलंद सिंधी जुबान डिअण वारे हरिकांत जेठवानी जो नवों नाटक हत्या हिक सुपने जी इनि साल 2012 मंझ साया थी आयो आहे।
मूल भावना खे कायम रखंदे नाटक जी आत्मा खे सिंधी भाषा जो वगो पाराइण हरिकांत जी लेखनीअ जो इ कमु थी सघंदो आहे।  ईआ खासियत इ हरिकांत जे इनि नाटक खे खास अहमियत वारो साबित करे थी। नाटक खे पुस्तक रूप में पाठकनि तोणी पहुंचाइण जोे कमु करण लाइ लेखक हरिकांत, प्रकाषक सुनील जेठवानी, कवर डिजाइनर मेहरवान ममतानी ऐं कॉपी राइट रखदंड़ श्रीमती राधा जेठवानी खे साधुवाद। - मोहन थानवी ( publish in sujagu sindhi manthly Nov 2012 )

पढ़ने वाले आगे निकल गए ... पढ़ाने वाले पीछे रह गए

sindhi novel Kartar singh by mohan thanvi 

महंगाई सज संवर कर बाज़ार पहुंची
बाकी सब पीछे हट गए
भ्रष्टाचार  की बोली में
कुछ लोगों के जेब कटे जूते  फट गए
पुलिस काबू  पा न सकी...
चीखों से सरकार के कान फट गए
महंगाई मिस वर्ल्ड हुई
राजा - भ्रष्टाचारी  कुर्सियों पर जुट  गए
पढ़ने वाले आगे आगे आगे और आगे निकल गए ...
पढ़ाने वाले देखो हाय ... कितना  पीछे रह गए

Wednesday, October 31, 2012

भासा अ’र देस री बात्यां कागद माथै उकेर आजादी री अलख जगाई / राजस्थानी उपन्यास *कुसुम संतो* से

याद राखणौ जरूरी है कै 1857 रै जुद्ध रै बाद भारतेन्दु अष्र दूजा कवि भासा अष्र परतंत्र देस री बात्यां कागद माथै उकेर लोगां रै मन में आजादी री अलख जगाई ही ! ( राजस्थानी उपन्यास ’कुसुम संतो’ से  )...

भाषा साहित्य मिनख.मिनख नै जोड़ै! देस री एकता रै वास्तै भासा अेक जरियो बणै! आ बात कैई जा सकै। जियांष्क विदेसियां रै आक्रमण सूं जद आपणै देस रो जनए या कैवां कै म्है लोग जद त्रस्त हुईग्या हाए बीं बखत साहित्यकार जगत जिकी एकता रो दरसण आपणी कलम सूं करायोए बा बात कोई दो.चार सताब्दियां में भी भूलीजणी आसान कोनी। बीं बखत किरसण भगवान रो बखान बिपती रै दिनां सूं छुटकारो पावण रो एक उपाय जियां लागै कैवां तो सायद गलत कोनी समझो जावैळा। सूरदास उण बगत स्री किरसनजी री लीलावां नै कागद माथै उकेर जीव.जगत नै जीवण रो नूवांे अंदाज दिरायो। राजपाट नै एक तरफां राख इब्राहीम मियां जद रसखान बण सकै तो समझणोें कै ओ भगती रो ई ज बखान है। 
केरल रा एक महाराजा राम वर्मा ष्स्वाति तिरुनालष् रै नाम सूं कविता करता हा।  महारास्टर रा संत ज्ञानेस्वरए नामदेव अष्र सिन्धु प्रदेस  रा श्रीलालजी भी कवि ही नीं किरसनजी री लीलावां नै भगतां रै साम्है राखणियां भी मानीजे क्यों कै इयां सूं पैली लोगां रै साम्है भगती रा  दूजा सबद आयौड़ा हा। पंजाब रा गुरुनानकदेवजी नै कुण नीं बांच्यो हैए रनजीतसिंह रै दरबार में कवियां रो जित्तो मान हो बीनै भी साहित्य जगत जाणै ही है। गुजरात रा भालणए नरसी मेहताए दयाराम आज भी आपणै आखरां री गूंज बणाय राखी है। आ बात भूलीजण जिसी कोनी कै कोई अेक भासा में रचयोड़ी रचना नै बांचणै रै वास्ते कितराई विद्वान आपरी भासा रै अलावा दूजी भासावां सीख्या। बंगाल रा कवि यसोराज खांनए मिथिला रा विद्यापतिए आसाम रा संकरदेवए माधवदेव रा सबद राजस्थान रो गौरव मीरां रै सबदां स्यूं कम गूंज कोनी मचायोड़ा है। राजस्थान रा राजा.महाराजा ताईं ईं भगती री नद्यां मांय बहियोड़ा हाए जैपुर रा ब्रजनिधि संतागढ़ रा नागरीदासए जोधपुर रा जसवंतसिंहए झालावाड़ रा सुधाकर अष्र भरतपुर रा बलदेवसिंह जिसा कित्ताई नाम गिणाया जाय सकै। साहित्य अर भगती कवियां रो इतिहास रा जाणकार जाणै है कै जिकै बगत कलकत्ता रै फोर्ट विलियम कॉलेज रै वातायन सूं  पस्चिम री संस्कृति देस में झांक री ही बिण बखत भगती री कवितावां ई सूरज री किरणां जियां देस नै उजियारो दिरायो। इण रो कारण ओ है कै लोगां री भासा में कैयोड़ी बात्यां ही आम आदमी ताईं पूगावण में कवि.साहितकार सक्षम हुवै। बीं बखत गुजराती लल्लूलालजी प्रेम सागर री रचना करी ही। आ बात याद राखण आळी है कै ओ ग्रन्थ जित्तो कोई और ग्रन्थ सायद ही बिक्री रो रिकॉर्ड बणायो हुवै।भगती रै सागर रै मांय डुबकी लगाष्र सताब्दियां सूं अपां दुविधा री नद्यां री वैतरणी पार करतां रिया हां। याद राखणौ जरूरी है कै 1857 रै जुद्ध रै बाद भारतेन्दु अष्र दूजा कवि भासा अष्र परतंत्र देस री बात्यां कागद माथै उकेर लोगां रै मन में आजादी री अलख जगाई ही। राजस्थान रा गिरधर षर्मा नवरत्न री ष्मातृ.वंदनाष् स्वतंत्रता री जिकी भावना नै सबद दियोड़ा है बियांनै पढ़णियो भूलै कोनी। सूरए तुलसीए सूर्यमल्लए बांकीदास विद्यापति अष्र कित्ताई नाम भगती रै सागर में तैर रिया है अष्र प्रेरणा देता थकै कोनी कै भगती कोई भगवान सारू कोनी। इण कवियां रै सागै विगत सताब्दी अष्र आधुनिक युग रा कवियां नै सामिल करीजै तो फकत नामां सूं छोटी.मोटी पोथी लिखीज जावैलीए इण वास्तै नामां रो मोह छोड़ म्हैं ओ कैवणों चावूं कै भगती सारू भासाए प्रदेसए काल अष्र राज रै अवसर री जरूरत  बियानै पड़ सकै जिका लिखणिया पेट रै वास्तै ई ज लिखैए समाज रै वास्तै लिखणो धर्म समझणिया तो हजारू.हजार बरस पैली भी लिखताए बियांरो लिख्योड़ो बांचण रै वास्तै भी विद्वानां री फौज लगायोड़ी हैए जियां के सिन्धु सभ्यता री लिखावट अजताईं समझ सूं बारै है। अठै हूं कै सकूं कै भासा रै प्रति भगती और ज्यादा प्रगाढ़ता मांग रैयी है। भगती रचनावां लिखणी कै लिख्यौड़ी पर लिखणौं तो म्हानै भी सौरो लागैए मन में भगती राखणी जुदा बात लाग री है। सगळा एक जीसा कोनी हुवै आ बात भी हूं जाणूं। धन्य है बै मायड़ भासा रा हितैसी जिका तन.मन.धन सूं इण रै प्रति समर्पित हैए भगती में लीन है।भगती सूं काम करता अष्र उण रै प्रति समर्पण राखता निस्चै ही अपानै सफलता मिलैली। भगती रो परताप अपां सगळा जाणा हा। . ; मोहन थानवी के राजस्थानी उपन्यास कुसुम संतो से  )...

   

Monday, October 29, 2012

कृपालु संत साधु वासवानी जी / दादा श्याम जो भजन


कृपालु संत साधु वासवानी जी का यह भजन पूना से प्रकाशित श्याम साप्ताहिक से अरबी सिंधी से देवनागरी में रूपांतरित कर अपने नाटक कपालु संत में शामिल किया । यह नाटक अजमेर से प्रकाशित दैनिक हिंदू में अरबी सिंधी में  ( मोहन थानवी जी कलम मां कॉलम में ) 2011 प्रकाशित हो चुका है। 

अलख धाम मां

नाल्हे मौत तिनि लाइ, अंखियूंनि जिनि जूं निहारनि,
पहाड़नि त तिनि डे, जीअं प्यारनि खे पुकारनि!
रहनि रहम में से त आल्यिूंनि अंख्यिूंनि,
सबक इक त सिक जो, से आहिनि सुख्यूं!
पया था त कोठनि, प्रभुअ जा पहाड़ा!
अचनि यादु वरी वरी, पया से त प्यारा!
करे केरु दूर, प्यारनि जी जुदाई !
जीवन आहे जिनि जी, प्रभुअ में समाये!
मरे ही बदनु थो, जिस्मु ही जले,
पर आत्मा अमर, सदा पयो हले!
काल डिस जो घर, फकत काल ढाहे,
पर आत्मा अजरु ऐं अविनाशी आहे!
मरे कीअं कोई ऊंव, न कोई कीअं सड़े,
न कोई मौत परदो, रखी उन परे
अलख धाम मां आहे, नूरी निमाणी
रहे रोज रोषन, न रह तूं वेगाणी।

Sunday, October 28, 2012

साथ जुड़ना ... हेनरी फ़ोर्ड (mahapurushon ki wani )

साथ जुड़ना एक शुरूआत है; साथ रहना प्रगति है और साथ काम करना ही सफलता है- हेनरी फ़ोर्ड

Saturday, October 27, 2012

eid mubaraq ईद मुबारक


eid mubaraq eid mubaraq
ईद मुबारक eid mubaraq
ईद मुबारक eid mubaraq
ईद मुबारक eid mubaraq ईद मुबारक eid mubaraq  ईद मुबारक eid mubaraq  ईद मुबारक eid mubaraq 
ईद मुबारक eid mubaraq
ईद मुबारक eid mubaraq
ईद मुबारक eid mubaraq
ईद मुबारक eid mubaraq
ईद मुबारक eid mubaraq
ईद मुबारक
ईद मुबारक

हम और हमारा विश्वास

हम और हमारा विश्वास

Monday, October 22, 2012

वैश्वीकरण... दिखाउं जो आईना तो बड़ी बात

देखू जो आईना तो कोई बड़ी बात नहीं कहती है दुनिया
दिखाउं जो आईना तो बड़ी बात मान लेती है दुनिया...
...  smile smile   smile smile   smile smile   smile smile
अल्बर्ट कैमस के क्रास प्रपोज पर आधारित हरिकांत जेठवानी रचित पांच पात्रीय सिंधी नाटक हत्या एक सपने की... पढ़ते समय अहसास हुआ कि हिंदी अंग्रेजी सिंधी राजस्थानी गुजराती मराठी या किन्हीं भी भाषाओं में रचे साहित्य को किसी भी भाषा में अनूदित कर साहित्यकार किस तरह सहजता सरलता से वैश्वीकरण में पाठक की महत्वपूर्ण भूमिका बना देते हैं । 

मां, रोटी भी क्यों गोल !


घर में तू बनाती
पेट भरने को
मां,
वह रोटी भी क्यों गोल !...
Panting :- Kritika Thanvi : Shishu Vihar BKN

क्या हम भूख को देते धोखा
सच्ची बोल

मां, रोटी भी क्यों गोल!

मां, सारी दुनिया देती धोखा

चारों और हो रहा गोलमाल

लंबी, चपटी सब चीजों में भरी पोल

घर में तू बनाती पेट भरने को

मां, वह रोटी भी क्यों गोल!

क्या हम भूख को देते धोखा सच्ची बोल

सीखा तुझसे तोलमोल के बोल

मां, फिर भी सारी दुनिया देती धोखा

मानव-मानव में अपने पराये का जहर घोल

प्रकृति का खजाना स्वार्थ की चाबी से खोल

चांद-सूरज ठंडे-गरम मगर हैं वे भी गोल

मां, ऐसा कर कुछ समझे दुनिया सच्चाई का मोल

मां, सारी दुनिया में हो अपनापन

कहीं न हो कोई परेशान

सब तुझ-से हों निश्छल, ममतामयी

तू दे ऐसी घुट्टी बच्चों को मां

और घर में तू बनाती
पेट भरने को
मां,
वह रोटी भी क्यों गोल !...

क्या हम भूख को देते धोखा
सच्ची बोल

मां, रोटी भी क्यों गोल!

मां, सारी दुनिया देती धोखा

चारों और हो रहा गोलमाल

लंबी, चपटी सब चीजों में भरी पोल

घर में तू बनाती पेट भरने को

मां, वह रोटी भी क्यों गोल!

क्या हम भूख को देते धोखा सच्ची बोल

सीखा तुझसे तोलमोल के बोल

मां, फिर भी सारी दुनिया देती धोखा

मानव-मानव में अपने पराये का जहर घोल

प्रकृति का खजाना स्वार्थ की चाबी से खोल

चांद-सूरज ठंडे-गरम मगर हैं वे भी गोल

मां, ऐसा कर कुछ समझे दुनिया सच्चाई का मोल

मां, सारी दुनिया में हो अपनापन

कहीं न हो कोई परेशान

सब तुझ-से हों निश्छल, ममतामयी

तू दे ऐसी घुट्टी बच्चों को मां

और मां, बना ऐसी रोटी भी जो न हो गोल

Tuesday, October 16, 2012

तितली बन पंख लगा ...


फ़ूल और तितली की तरह /
मुस्कुरा /
पंख लगा  /
काँटों में भी जी /
प्रकृति - समभाव आत्मसात कर !
तितली !
फ़ूल और तितली की तरह /
मुस्कुरा कर जीयें हम /
तितली बन पंख लगा कर जीयें हम /
काँटों में भी मुस्कुराएँ और फ़ूल बनकर जीयें हम /
फ़ूल - कांटे और तितली जैसे हिलमिल कर रहें हम /
फ़ूल और तितली की तरह ...मुस्कुरा कर जीयें हम...

प्रकृति के साथ रह कर हम समभाव से जीवन जीने की कला को आत्मसात कर सकते हैं !
ऐसे जैसे तितली ! प्रकृति के साथ नृत्य करती तितली...। तितली को देखकर बच्चे ही
नहीं बल्हि हर आयुवर्ग के लोग प्रसन्न होते हैं। खासतौर से बच्चों को तो मानो
तितली अपने पास बुलाती है... इसीलिए बाग बगीचे का नाम आते ही बच्चे सबसे पहले
तितली को याद करें तो आष्चर्य कैसा...! और ... हम भी ऐसे बन जाएँ की हर कोई
हमारे और हम हर किसी के पास जाकर प्रसन्न हों !

Friday, October 5, 2012

पनघट पर... मुंह छुपाए... बेजुबान पशुओं के पास

घास
खाने को
नहीं मिलती
बरसात के बाद जल गई
तेज धूप से
मैं
पशुओं को ले
दर-दर भटकता रहा
षहर और गांवों में
टीवी, रेल, हवाई जहाज, आलीशान मकान
व्ैाज्ञानिकों का सम्मान
सबकुछ देखा
न देखा तो केवल कहीं बच्चों का स्वछन्द खेलना
कहीं हराभरा खेत और पशु धन के लिए
घास
संस्कृति एक कोने में दुबकी
गांव के पनघट पर
परंपरा मुंह छुपाए खड़ी
मेरे बेजुबान पशुओं के पास
जो निरीह आंखों से ढूंढ़ रहे
घास